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Tuesday, October 13, 2026

चुनाव आयोग को लेकर चल रहे आंदोलन क्या चुनावों पर असर डालेंगे?


मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के विरोध में हाल में दिल्ली में इंडी गठबंधन और कॉक्रोच जनता पार्टी के आंदोलनों को देखते हुए एक बात साफ हो गई है कि आंदोलनकारियों की योजना अब 2029 के लोकसभा चुनाव तक किसी न किसी रूप में लगातार आंदोलन चलाने की है। यह बड़ा संकल्प है? क्या वे ऐसा कर पाएँगे? महत्त्वपूर्ण यह नहीं है कि ज्ञानेश कुमार रहेंगे या जाएँगे। महत्त्वपूर्ण यह है कि आंदोलनकारी अपनी ताकत को कब तक बनाए रखेंगे और भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार किस तरह से उसका सामना करेगी?

फिलहाल इन आंदोलनों के असर को अगले छह महीने में होने वाले पाँच राज्यों के विधानसभा चुनावों के संदर्भ में देखना होगा। चुनावों को प्रभावित करने में ये आंदोलन विफल रहे, तो फिर उनका उसके आगे चलना निरर्थक हो जाएगा। सफल हुए तो उनकी रणनीति सफल साबित होगी। इसलिए परीक्षा अगले छह महीनों में ही होनी है। उसके पहले राहुल गांधी के ‘वोट चोरी आंदोलन’ की न्यायिक समीक्षा पर भी नज़र रखनी होगी, जो सुप्रीम कोर्ट में चलेगी। उन्होंने इस मामले को इतना ज्यादा तूल दिया है कि देश में ही नहीं विदेश में भी लोगों की निगाहें इस मामले पर हैं।  

हाल में भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा ने इन प्रदर्शनों को लेकर सत्तारूढ़ पार्टी की प्रतिक्रिया को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि जंतर-मंतर ‘लगभग चार वर्ग किलोमीटर का इलाका’ है, जबकि भारत 32,87,000 वर्ग किलोमीटर का है। जंतर-मंतर की कहानी पूरे भारत की कहानी नहीं है। उनके अनुसार ये विरोध प्रदर्शन विफल रहे और उन्होंने सिविल सोसायटी के प्रदर्शनकारियों और विपक्षी नेताओं को ‘अराजकतावादी’ करार दिया। बहरहाल पात्रा ने इस बयान के माध्यम से कुछ मूलभूत प्रश्नों को उठाया है, देश की राजनीति के बड़े फलक को संबोधित कर रहे हैं।

Monday, April 10, 2017

ईवीएम नहीं, निशाने पर चुनाव आयोग की साख है

हाल में भिंड में ईवीएम मशीन को लेकर जो विवाद खड़ा हुआ उसके पीछे जो बात सामने आ रही है, वह यह कि एक अखबार की अस्पष्ट खबर के कारण संदेश गया कि ईवीएम का कोई भी बटन दबाया गया तब हर बार कमल की पर्ची बाहर निकली। चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि ऐसा नहीं हुआ था। बात का बतंगड़ बना था। इसके लिए प्रत्यक्षतः वह अखबार भी जिम्मेदार है, जिसने विवाद बढ़ जाने के बावजूद यह स्पष्ट नहीं किया कि उसके संवाददाता ने क्या देखा। 

चुनाव आयोग और देश के कुछ राजनीतिक दलों के बीच ईवीएम को लेकर विवाद आगे बढ़े उससे पहले सरकार और सुप्रीम कोर्ट को पहल करके कुछ बातों को स्पष्ट करना चाहिए। जिस तरह न्याय-व्यवस्था की साख को बनाए रखने की जरूरत है, उसी तरह देश की चुनाव प्रणाली का संचालन करने वाली मशीनरी की साख को बनाए रखने की जरूरत है। उसकी मंशा को ही विवाद का विषय बनाने का मतलब है, लोकतंत्र की बुनियाद पर चोट। इस वक्त हो यही रहा है, जनता के मन में यह बात डाली जा रही है कि मशीनों में कोई खराबी है।