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Tuesday, August 25, 2026

वर्णाश्रम व्यवस्था पर महात्मा गांधी


इधर मनुस्मृति और वंदे मातरम जैसे प्रश्नों पर बहस के दौरान ऐसे उद्धरण खोजे जा रहे हैं, जिनसे किसी एक तरह का निष्कर्ष निकाला जा सके। ऐसा अपनी धारणा को स्थापित करने के लिए ज्यादा होता है, किसी विषय पर संज़ीदगी से बहस चलाना नहीं। गांधी जी हिंदू धर्म के रूपकों का सहारा लेते थे। शायद यह उनकी रणनीति भी थी, क्योंकि वे हिंदुओं को अपने साथ रखना चाहते रहे होंगे। इन रूपकों के कारण उनकी बातों में वैचारिक अंतर्विरोध पैदा हो गए थे, जो बीआर आंबेडकर की किताब जाति-व्यवस्था का उच्छेद के बाद दोनों के बीच चली बहस में देखे जा सकते हैं। डॉ आंबेडकर मानते थे कि जाति व्यवस्था हिंदू धर्मग्रंथों में निहित है और इसे केवल सामाजिक सुधारों से नहीं मिटाया जा सकता, बल्कि इसके धार्मिक आधार को पूरी तरह नकारना होगा। इसके विपरीत, गांधी जी वर्ण व्यवस्था और हिंदू धर्म के आदर्श स्वरूप में विश्वास रखते थे और उनका मानना था कि बुराइयों को दूर करके और वर्ण व्यवस्था को शुद्ध करके सामाजिक समरसता बनाए रखी जा सकती है। भारत के वर्तमान राजनीतिक-अंतर्विरोधों को समझने के लिए हमें राममोहन रॉय, जोतिबा फुले, गोपाल कृष्ण गोखले, सावरकर, महात्मा गांधी, आंबेडकर, नेहरू और लोहिया समेत दूसरे समकालीन विचारकों की बातों को समझने की कोशिश करनी होगी। यहाँ मैं गांधी के वर्णाश्रम-व्यवस्था के विचारों पर कृष्णन नंदेला के एक आलेख को प्रकाशित कर रहा हूँ।

कृष्णन नंदेला*

गांधी जी को वर्ण-आश्रम व्यवस्था के समर्थक के रूप में व्यापक रूप से आलोचना का सामना करना पड़ता है। जी हां, गांधी जी वर्ण व्यवस्था के समर्थक थे और उनके अनुसार हिंदू होने के लिए वर्ण-आश्रम व्यवस्था में विश्वास करना एक अनिवार्य योग्यता थी। हालांकि, गांधी जी की वर्ण व्यवस्था में आंतरिक लचीलापन था और हिंदू समाज में वर्ण परस्पर विनिमय योग्य थे। गांधी जी की वर्ण व्यवस्था में, एक शूद्र को अपने पैतृक कर्तव्य का पालन करना होता था और यदि वह पुरोहिती कर्तव्यों का पालन करने में सक्षम है, तो उसे अपने पैतृक कर्तव्यों का त्याग या अस्वीकार किए बिना उनका पालन करना चाहिए। यह लचीलापन गांधी जी की वर्ण-आश्रम व्यवस्था में सभी वर्णों के लिए लागू होता था। एक ब्राह्मण शस्त्र उठाना और युद्ध की तकनीक सीखना, शूद्र के कर्तव्यों का पालन करना या वैश्य के कर्तव्यों का पालन करना स्वतंत्र था, लेकिन अपने पैतृक पुरोहिती कर्तव्यों का पालन किए बिना नहीं। गांधी जी के लिए, वर्ण व्यवस्था पदानुक्रमित नहीं थी। चारों वर्ण समान दर्जा रखते थे और समाज के लिए कार्यात्मक थे। चारों वर्णों को क्षैतिज रूप से रखा गया था और वे परस्पर प्रतिस्थापनीय थे।

Sunday, July 19, 2026

गांधी के उपवास


देश में माँगें मनवाने के लिए अनशन करने की परंपरा है। आमतौर पर इसे गांधी की परंपरा माना जाता है। बेशक गांधी ने उपवास की परंपरा चलाई, पर इस बात की पड़ताल करें कि क्या गांधी जी ने भारत की आज़ादी के लिए अंग्रेजों पर दबाव बनाने के लिए क्या कोई अनशन किया था? बेशक उन्होंने लंबे स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया और कुछ उपवासों के मार्फत उन्होंने ब्रिटिश-सरकार के प्रति विरोध भी दर्ज कराया। उस दौरान कम से कम 18 उपवास रखे, जिन्हें वे आत्मशुद्धि और अहिंसक प्रतिरोध (सत्याग्रह) का सबसे शक्तिशाली हथियार मानते थे।

Friday, September 29, 2017

हर वक्त प्रासंगिक गांधी


कुछ लोग कहते हैं, मजबूरी का नाम महात्मा गांधी। उनके जन्मदिन को राष्ट्रीय पर्व के रूप में मनाने और तमाम शहरों की सड़कों को महात्मा गांधी मार्ग बनाने के बावजूद हमें लगता है कि उनकी जरूरत 1947 के पहले तक थी। अब होते भी तो क्या कर लेते? सन 1982 में रिचर्ड एटनबरो की फिल्म गांधी ने दुनियाभर का ध्यान खींचा, तब इस विषय पर एकबार फिर चर्चा हुई कि क्या गांधी आज प्रासंगिक हैं? वह केवल भारत की बहस नहीं थी।

शीतयुद्ध खत्म होने और सोवियत संघ के विघटन के करीब दस साल पहले चली उस बहस का दायरा वैश्विक था। गांधी अगर प्रासंगिक हैं, तो दुनिया के लिए हैं, केवल भारत के लिए नहीं, क्योंकि उनके विचार सम्पूर्ण मानवता से जुड़े है। फिर भी सवाल है कि क्या उनका देश भारत आज उन्हें उपयोगी मानता है?

Tuesday, October 6, 2015

गोबध पर गांधी की राय

25 जुलाई 1947 की प्रार्थना सभा में महात्मा गांधी ने गोबध को लेकर कुछ बातें कहीं थीं। उनकी सलाह थी कि जबरन कोई कानून किसी पर थोपा नहीं जा सकता। कलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ गांधी, गांधी हेरिटेज पोर्टल से लेकर 'दि वायर' ऑनलाइन पत्रिका ने उनके इस भाषण का तर्जुमा अंग्रेजी में छापा। यह वक्तव्य मूल रूप में हिन्दी में है। इसे हिन्दी में ही पढ़ना ज्यादा उपयोगी होगा। सबसे नीचे वह लिंक भी दिया है जहाँ इसे आप सीधे पढ़ सकते हैं।