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Tuesday, March 3, 2026

अल्मोड़ा की होली


हिंदी की लोकप्रिय लेखिका गौरा पंत शिवानी ने अपनी आत्मकथा
सुनहु तात यह अकथ कहानी में एक जगह अल्मोड़ा की होली का बड़ा सुंदर विवरण दिया है, गौर करें:

होली आती तो अल्मोड़ा के छोटे से बाजार की शोभा ही द्विगुणित हो जाती…. पहाड़ की होली का तब अपना ही जादू था। आमल की एकादशी से होली की बैठकें लगतीं। मोट के दन (कालीन), उन पर बिछती दुग्ध-धवल चादरें, सफेद गिलाफ चढ़ा गाव-तकिया, उनका सहारा लिए लखनऊ की अम्बरी तम्बाकू की सुगन्धित धूम्र-रेखा से हुक्के का कश खचते प्रतिष्ठित व्यक्ति। थोड़ी ही देर में थाल के थाल जम्बू हुँके आलू और गोझे परिवेशित होते, पीतल के चमचमाते गिलासों में मसाले डली अदरक की चाय। फिर आरभ्भ होती बैठक होली

अपनों बीरन मोहे दे री ननदिया

मैं होली खेलन जाऊँ वृन्दावन।

           या

जाय पड़ईं पी के अंक

चाहे कलंक लगै री़

तबले पर संगत करते कुमाऊँ के अल्लारक्खा, दाम दा, हारमोनियम पर पहाड़ के जलगाँवकर, कांति दा; और रसीले कंठ का माधुर्य बिखेरते वे संगीत रसिक गायक, जिन्होंने न कभी विधिवत संगीत की शिक्षा पाई, न किसी गुरु का गंडा ही बाँधा। स्वयं विधाता ने जिनके कंठ में प्रतिभा को खूँटे की गाय-सा बाँधकर रख दिया था। न कह अश्लील प्रलाप, न छींटाकशी; वह मधुर स्वरलहरी, सम पार आती, तो वाह-वाह की साधुध्वनि छज्जे को गुंजायमान करती सड़क तक चली जाती।

राह चलते लोग ठिठककर खड़े हो जाते, ‘‘कौन गा रहा है यह? भवानी शाह या बद्रिया?’’