यों तो हरेक चुनाव महत्त्वपूर्ण होता है, पर पाँच राज्यों के आगामी विधानसभा चुनाव कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी की भावी राजनीति के लिहाज से बेहद महत्त्वपूर्ण साबित होने वाले हैं। असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल में कांग्रेस की प्रासंगिकता की एक और परीक्षा होंगी, वहीं बंगाल में बीजेपी की संगठन-क्षमता की परीक्षा होगी। क्या वह तृणमूल कांग्रेस के चक्रव्यूह को इस बार भेद पाएगी? पार्टी के सामने तमिलनाडु और केरल के प्रवेशद्वार को पार करने की परीक्षा भी है।
2024 के लोकसभा चुनावों में विरोधी ‘इंडिया’ गठबंधन के मन में एक आस जागी थी। उस आस की भी परीक्षा इन चुनावों में
होगी। 2024 के बाद छह में से चार राज्यों में बीजेपी के हाथों शिकस्त खाने के बाद,
कांग्रेस के नेतृत्व वाले विरोधी दलों के पास नई रणनीति बनाने और नए राजनीतिक
मुहावरे गढ़ने का मौका है। कांग्रेस के लिए अब ‘करो या मरो’ की स्थिति है।
संसद में विपक्षी गठबंधन की तीसरी और चौथी सबसे
बड़ी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और डीएमके को अपनी ‘ताकत’ को साबित करने का
मौका भी अब मिलेगा। वहीं ठंडे पड़ते वाममोर्चे को केरल में कुछ ‘अभूतपूर्व’ कर दिखाने और बंगाल में कम से कम
हाज़िरी लगाने का एक मौका और मिलेगा। बंगाल और केरल में विरोधी गठबंधन के
अंतर्विरोध भी दिखाई पड़ेंगे। बंगाल में जहाँ टीएमसी, कांग्रेस
और वामपंथी दल अकेले चुनाव लड़ रहे हैं, और केरल में,
जहाँ कांग्रेस और वामपंथी दल आमने-सामने हैं।
कांग्रेस
2024 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को 2014 के बाद के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के रूप में 99 सीटें मिली थीं। इससे उम्मीद जागी थी कि कांग्रेस का पुनरुत्थान हो सकता है। उसके बाद से पार्टी एक भी राज्य का चुनाव नहीं जीत पाई है। हरियाणा और दिल्ली में उसे भाजपा के हाथों हार का सामना करना पड़ा और महाराष्ट्र और बिहार में भाजपा नीत गठबंधन के हाथों।




