Wednesday, June 17, 2026

नेटक्रांति के सांस्कृतिक-राजनीतिक निहितार्थ


करीब एक दशक पहले नए दौर का सूत्र था नेट-साक्षरता। यानी इंटरनेट पटु होना सामान्य साक्षरता का हिस्सा बना। सिद्धांत थी कि जो इंटरनेट का इस्तेमाल कर पाएगा वही सजग नागरिक है। वजह साफ थी। जीवन से जुड़ा ज्यादातर कार्य-व्यवहार इंटरनेट के मार्फत होने लगा था। इसका व्यावसायिक महत्व बढ़ा। इस तकनीक ने जीवन को पारदर्शी बनाया और लोकतंत्र को सार्थक बनाने में महत्त्वपूर्ण योगदान किया।

नेट के विस्तार के साथ-साथ कुछ अंतर्विरोधी बातें भी सामने आई हैं, जिनके बीज पत्रकारिता के करीब चार सौ से ज्यादा वर्षों के इतिहास में भी देखे जा सकते हैं। इसकी वजह दो बातें हैं, तकनीक और पूँजी। इंटरनेट की सार्वजनिक जीवन में भूमिका होने के बावजूद इसका विस्तार निजी पूँजी की मदद से हो रहा है। निजी पूँजी मुनाफे के लिए काम करती है।

सूचना-प्रसार केवल व्यावसायिक गतिविधि नहीं है। वह लोकतांत्रिक व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण कच्चा माल उपलब्ध कराने वाली व्यवस्था है। जानकारी पाना या देना, कनेक्ट करना और जाग्रत विश्व के संपर्क में रहना समय की सबसे बड़ी जरूरत है। इंटरनेट के सहारे यह काम आसानी से हो सकता है।

Tuesday, June 16, 2026

मतदाता, नागरिकता और ‘डेमोग्राफिक चेंज’


गत 8 जून को ‘इंडिया गठबंधन ने पाँच-सूत्री प्रस्ताव पारित किया, जिसमें एक यह भी है कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) अभियान को लेकर भारत के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखा जाएगा। यह गठबंधन एसआईआरको ‘वोट चोरी’ मानता है। इसके कुछ दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर को लेकर चुनाव-आयोग को क्लीन-चिट दी है। प्रश्न है कि ऐसे में पत्र लिखने से मिलेगा क्या? यह व्यक्तिगत मसला नहीं है।

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का कहना है, हम इसे ‘वोट लूट’ की कोशिश मानते हैं। भारत में घुसपैठ और नागरिकता रजिस्टर पिछले कई दशकों से बहस में हैं और यह बहस अब मतदाता सूची की बहस के साथ जुड़ गई है। एसआईआर के देश में दो दौर हो चुके हैं और तीसरा शुरू हो गया है। पहला दौर मुख्यतः बिहार-केंद्रित था, जो जून से सितंबर 2025 तक चला। 27 अक्तूबर से दूसरा दौर शुरू हुआ, जिसमें उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल समेत, नौ राज्य और तीन केंद्र-शासित क्षेत्र शामिल थे।

गत 14 मई को निर्वाचन आयोग ने एसआईआर के तीसरे दौर की भी घोषणा कर दी, जिसमें सोलह राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों को कवर किया गया है। इसके पूरा होने के बाद जम्मू-कश्मीर, लद्दाख और हिमाचल प्रदेश को छोड़कर पूरे देश में यह प्रक्रिया पूरी हो जाएगी। इसके साथ इस प्रक्रिया से जुड़ी बहस नए सिरे से शुरू होगी, जिसकी अनुगूँज संसद के मॉनसून सत्र में सुनाई पड़ेगी।

ईरान-समझौते के अटकते-खटकते निष्कर्ष


अमेरिका और ईरान के बीच प्रारंभिक-समझौता हो गया है, जिसके तहत 60 तक युद्धविराम लागू रहेगा और होर्मुज़ का रास्ता खुलेगा. समझौते पर दस्तखतों को लेकर अंतिम क्षण तक असमंजस बना रहा, पर अब बताया गया है कि दस्तखत 19 जून को होंगे.

अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने घोषणा की कि अब हम ईरान की नौसैनिक नाकाबंदी समाप्त कर देंगे, जो महीनों की बातचीत में सबसे बड़ी सफलता है.

रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान के सरकारी टीवी का कहना है कि तेहरान ने अमेरिका को शांति समझौते को स्वीकार करने के लिए मजबूर कर दिया.

दोनों पक्षों ने समझौते का विवरण तुरंत जारी नहीं किया है, पर मीडिया में दोनों तरफ से आई बातों में अंतर्विरोध हैं. इसके अलावा ईरान के कट्टरपंथी और इसराइली सरकार अपने-अपने कारणों से नाराज़ हैं।

इस समझौते से दोनों पक्षों के बीच दोस्ती कायम नहीं हो जाएगी. सच यह है कि यह दो दुश्मनों के बीच सीमा रेखाएँ तय करने का समझौता है, जिसकी सफलता या विफलता का फैसला समय करेगा.

Sunday, June 14, 2026

'सभी मनुष्य समान हैं', इस वाक्य में क्या महिलाएं भी शामिल हैं?


न्यूयॉर्कटाइम्स में पारुल सहगल के लेख का हिंदी अनुवाद

5 नवंबर, 1872 को न्यूयॉर्क के रोचेस्टर में, 15 अमेरिकी महिलाएँ एक अपराध को अंजाम देने के लिए अपने घर से निकलीं। उनकी 50 वर्षीय नेता को, जो अपनी शांत और अडिग निगाहों के लिए प्रसिद्ध थी, उसी महीने गिरफ्तार किया गया था। उसने अपने अपराध से इनकार नहीं किया था। और  एक साल बाद अपने मुकदमे में जज के सामने दिए बयान में, उसने अन्य महिलाओं से आह्वान किया, ‘ठीक वैसा ही करो जैसा मैंने किया है, मानव निर्मित, अन्यायपूर्ण और असंवैधानिक कानूनों के खिलाफ विद्रोह करो।’

मतदान करने के लिए सूज़न बी एंथनी की गिरफ्तारी ठीक उसी तरह हुई जैसा उन्होंने और उनकी साथी मताधिकार समर्थकों ने चाहा था, जिससे उनके आंदोलन को प्रचार मिला और यह बात उनके आंदोलन की परीक्षा साबित हुई। एंथनी ने मुकदमे से पहले भाषण देने के लिए कई जगहों का दौरा किया और घोषणा की कि अब धैर्य का समय समाप्त हो गया है। उन्होंने 14वें संशोधन का हवाला देते हुए अपने श्रोताओं से इसकी भाषा और तर्क का गहन अध्ययन करने का आग्रह किया। और फिर उन्होंने अपनी बात को बहुत ही सरल शब्दों में कहा।

1873 के भाषण में उन्होंने कहा: अब सिर्फ एक बात तय होनी बाकी रह गई है, क्या स्त्रियाँ व्यक्ति (इनसान) हैं​​​​​​? (The only question left to be settled, now, is: Are women persons?)

यह बात बहुत साफ और बहुत मजबूत है। खासकर आखिरी शब्द ध्यान खींचता है। एंथनी ने ‘लोगों’ की जगह ‘व्यक्तियों’ का इस्तेमाल किया है क्योंकि वह संविधान के सटीक शब्दों का प्रयोग कर रही थीं: ‘संयुक्त राज्य अमेरिका में जन्मे या प्राकृतिक रूप से नागरिकता प्राप्त सभी व्यक्ति’, जो इसके अधिकार क्षेत्र के अधीन हैं, संयुक्त राज्य अमेरिका और उस राज्य के नागरिक हैं जहाँ वे रहते हैं। कोई भी राज्य ऐसा कोई कानून नहीं बनाएगा या लागू नहीं करेगा जो संयुक्त राज्य अमेरिका के नागरिकों के विशेषाधिकारों या स्वतंत्रताओं को कम करे।’

यदि एंथनी जैसी महिलाएं व्यक्ति थीं, तो वे नागरिक भी थीं। और यदि वे नागरिक थीं, तो न्यूयॉर्क जैसे किसी भी राज्य के कानूनों को उनके विशेषाधिकारों या उन्मुक्तियों (Immunities) को, जैसे कि मतदान के अधिकार को, कम नहीं करना चाहिए।

एंथनी द्वारा प्रस्तुत किए जा रहे मामले में यह महत्वपूर्ण बिंदु था, जिसके के दूरगामी परिणाम होने थे।

महिलाओं के मताधिकार के लिए संघर्ष अमेरिकी इतिहास के सबसे लंबे और सबसे कठिन संघर्षों में से एक था। इसे शराब लॉबी के भयंकर विरोध का सामना करना पड़ा, जिन्हें डर था कि मताधिकार प्राप्त महिलाएं शराबबंदी के पक्ष में मतदान करेंगी; उद्योगपतियों को यह भी डर था कि वे बाल श्रम कानूनों के पक्ष में तर्क देंगी; और मताधिकार विरोधी महिलाओं के विशाल और शक्तिशाली समूह ने भी इसका विरोध किया।

Wednesday, June 10, 2026

ट्रंप की पहेलियों और पुतिन के दावों के दौर में भारत


डॉनल्ड ट्रंप की फुलझड़ियों, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बयानों और चीनी गतिविधियों को एक सतह पर रखकर विचार करें, तो भारत की विदेश-नीति को लेकर कुछ सवाल बनते हैं.

एक तरफ गाहे-बगाहे ट्रंप के पहेली जैसे बयान सुनाई पड़ते हैं, वहीं अब रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा है कि भारत को अमेरिका के दबाव में आना बंद करना चाहिए. अमेरिका का सूर्यास्त और ब्रिक्स का सूर्योदय होने वाला है.

ईरान-युद्ध की वजह से मिली छूट के कारण रूस से पेट्रोलियम की खरीद में वृद्धि हुई है, पर कहना मुश्किल है कि आने वाले समय में अमेरिका इसे रोकने के लिए किस प्रकार के दबाव डालेगा.

सवाल है कि क्या वास्तव में अमेरिका के सूर्यास्त की घड़ी आ गई है? भारत क्या वास्तव में अमेरिका के दबाव में है? क्या अब हमारी दूरियाँ बढ़ने वाली हैं? ट्रंप कैसी पहेली बूझ रहे हैं? हमें वाइट हाउस प्रशासन की पल में तोला, पल में माशानीति के प्रति सचेत रहना होगा.

देखना यह भी होगा कि ब्रिक्स के मंच पर भारत-रूस और चीन के सहयोग की नई संभावनाएँ क्या हैं? वस्तुतः भारत को न सबके बीच से अपना रास्ता खुद खोजना होगा और स्वतंत्र-नीति का संचालन करना होगा. क्या ऐसा संभव है

फिलहाल इतना कहा जा सकता है कि भारत किसी ध्रुवीकरण में शामिल नहीं होगा और उसके अमेरिका के साथ रिश्ते बने रहेंगे, जो इस समय भले ही कारोबारी लेन-देन तक सिमट गए हैं. दूसरी तरफ उसे न तो 'अमेरिकी-पिट्ठू' साबित किया जा सकता है और न उसके दबाव में.