Tuesday, September 1, 2026

बदलते वैश्विक-हालात में चीन से सुधरते रिश्ते


पिछले दो साल से भारत और चीन के रिश्तों की बर्फ पिघलाने के प्रयास चल रहे हैं. अब लगता है कि प्रयास रंग लाएँगे. शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के शिखर सम्मेलन के हाशिए पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात को लेकर राजनयिक-सरगर्मियाँ अचानक बढ़ गई हैं. 

यह शिखर सम्मेलन एससीओ के 25 साल पूरे होने के अवसर पर आयोजित किया गया था, जिसमें पीएम मोदी 31 अगस्त और 1 सितंबर तक किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में थे.

शिखर सम्मेलन से पहले, प्रधानमंत्री मोदी ने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से बातचीत की और अन्य एससीओ नेताओं के साथ एक समूह तस्वीर खिंचवाई. बाद में उन्होंने शिखर सम्मेलन की चर्चाओं में भाग लिया और अन्य सदस्य देशों के नेताओं के साथ एससीओ घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए.

दो हफ्ते बाद 12-13 सितंबर को दिल्ली में ब्रिक्स का शिखर सम्मेलन भी है, जिसमें दोनों नेताओं की फिर से मुलाकात होने की संभावनाएँ हैं. दोनों सम्मेलनों में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की उपस्थिति भी महत्त्वपूर्ण है.

चीनी राष्ट्रपति की दिल्ली-यात्रा के बड़े निहितार्थ हैं. इस यात्रा की सीधी जानकारी रखने वाले एक भारतीय सूत्र ने रॉयटर्स को बताया, ‘चीनी अधिकारी होटल और सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े प्रोटोकॉल को अंतिम रूप देने में जुटे हैं. उनके साथ क़रीब 400 अधिकारियों का प्रतिनिधिमंडल आने की संभावना है.

Monday, August 31, 2026

अच्छी तरह पिटने तक लड़ाई जारी क्यों रखता है अमेरिका?


न्यूयॉर्क टाइम्स के रिपोर्टर ग्रेग जैफ ने अपने एक लेख में लिखा है कि अमेरिका  का सबसे लंबा युद्ध ठीक पाँच साल पहले अफगानिस्तान में समाप्त हुआ था। आज यह ईरान में अंतहीन युद्ध से बचने की कोशिश कर रहे नीति निर्माताओं के लिए सबक पेश करता है। ग्रेग जैफ ने 15 साल तक अफगानिस्तान की रिपोर्टिंग की थी। उन्होंने इस लेख में अमेरिका की नीतियों की बखिया उधेड़ी है। इस लेख का हिंदी में अनुवाद नीचे पेश कर रहा हूँ। आप चाहें तो न्यूयॉर्क टाइम्स की वैबसाइट पर जाकर भी इसे अंग्रेजी मूल रूप में पढ़ सकते हैं। उसका लिंक नीचे दिया है। 

अफगानिस्तान युद्ध के दौरान अधिकांश समय, अमेरिका के लिए जीत से भी ज्यादा मुश्किल काम युद्ध खत्म करना था।

देश का सबसे लंबा युद्ध पाँच साल पहले अराजकता और हार के साथ समाप्त हुआ। तालिबान विद्रोहियों से बचने के लिए बेताब लाखों अफगान नागरिक काबुल हवाई अड्डे पर उमड़ पड़े। वहाँ एक आत्मघाती बम के हमले में तेरह अमेरिकी सैनिक मारे गए।

तब से, तीन राष्ट्रपतियों के वे भय निराधार साबित हुए हैं, जिन्हें लेकर उन्हें लगता था कि लड़ाई खत्म करना खतरे से खाली नहीं है। अफगानिस्तान न तो आतंकवाद का अड्डा बना, और न अमेरिका पर हमले हुए।

आज अमेरिकी सेना ईरान में एक नए युद्ध में उलझी हुई है। एक बार फिर, फौजी जीत की संभावनाएं धूमिल हैं। यहाँ तक ​​कि राष्ट्रपति ट्रंप ने भी युद्ध खत्म करने की इच्छा जताई थी, लेकिन बाद में अपना रुख बदलते हुए युद्ध में बने रहने की वकालत की।

उन्होंने ओवल ऑफिस में अपने भाषण में कहा, ‘हमें वहां रहने की जरूरत नहीं है। हमें उनके तेल की जरूरत नहीं है। हमें उनकी किसी भी चीज की जरूरत नहीं है। लेकिन हम अपने सहयोगियों की मदद के लिए वहां मौजूद हैं।’

अफगानिस्तान में लंबे समय से चल रहे युद्ध ने ईरान के भविष्य पर विचार कर रहे जनरलों और नीति निर्माताओं के सामने कई कठिन प्रश्न खड़े कर दिए हैं: अफगानिस्तान से पीछे हटना इतना कठिन क्यों था? वहां हार स्वीकार करने के लिए किया गया लंबा संघर्ष ईरान में ट्रंप प्रशासन की दुविधा के बारे में क्या बताता है?

Tuesday, August 25, 2026

वर्णाश्रम व्यवस्था पर महात्मा गांधी


इधर मनुस्मृति और वंदे मातरम जैसे प्रश्नों पर बहस के दौरान ऐसे उद्धरण खोजे जा रहे हैं, जिनसे किसी एक तरह का निष्कर्ष निकाला जा सके। ऐसा अपनी धारणा को स्थापित करने के लिए ज्यादा होता है, किसी विषय पर संज़ीदगी से बहस चलाना नहीं। गांधी जी हिंदू धर्म के रूपकों का सहारा लेते थे। शायद यह उनकी रणनीति भी थी, क्योंकि वे हिंदुओं को अपने साथ रखना चाहते रहे होंगे। इन रूपकों के कारण उनकी बातों में वैचारिक अंतर्विरोध पैदा हो गए थे, जो बीआर आंबेडकर की किताब जाति-व्यवस्था का उच्छेद के बाद दोनों के बीच चली बहस में देखे जा सकते हैं। डॉ आंबेडकर मानते थे कि जाति व्यवस्था हिंदू धर्मग्रंथों में निहित है और इसे केवल सामाजिक सुधारों से नहीं मिटाया जा सकता, बल्कि इसके धार्मिक आधार को पूरी तरह नकारना होगा। इसके विपरीत, गांधी जी वर्ण व्यवस्था और हिंदू धर्म के आदर्श स्वरूप में विश्वास रखते थे और उनका मानना था कि बुराइयों को दूर करके और वर्ण व्यवस्था को शुद्ध करके सामाजिक समरसता बनाए रखी जा सकती है। भारत के वर्तमान राजनीतिक-अंतर्विरोधों को समझने के लिए हमें राममोहन रॉय, जोतिबा फुले, गोपाल कृष्ण गोखले, सावरकर, महात्मा गांधी, आंबेडकर, नेहरू और लोहिया समेत दूसरे समकालीन विचारकों की बातों को समझने की कोशिश करनी होगी। यहाँ मैं गांधी के वर्णाश्रम-व्यवस्था के विचारों पर कृष्णन नंदेला के एक आलेख को प्रकाशित कर रहा हूँ।

कृष्णन नंदेला*

गांधी जी को वर्ण-आश्रम व्यवस्था के समर्थक के रूप में व्यापक रूप से आलोचना का सामना करना पड़ता है। जी हां, गांधी जी वर्ण व्यवस्था के समर्थक थे और उनके अनुसार हिंदू होने के लिए वर्ण-आश्रम व्यवस्था में विश्वास करना एक अनिवार्य योग्यता थी। हालांकि, गांधी जी की वर्ण व्यवस्था में आंतरिक लचीलापन था और हिंदू समाज में वर्ण परस्पर विनिमय योग्य थे। गांधी जी की वर्ण व्यवस्था में, एक शूद्र को अपने पैतृक कर्तव्य का पालन करना होता था और यदि वह पुरोहिती कर्तव्यों का पालन करने में सक्षम है, तो उसे अपने पैतृक कर्तव्यों का त्याग या अस्वीकार किए बिना उनका पालन करना चाहिए। यह लचीलापन गांधी जी की वर्ण-आश्रम व्यवस्था में सभी वर्णों के लिए लागू होता था। एक ब्राह्मण शस्त्र उठाना और युद्ध की तकनीक सीखना, शूद्र के कर्तव्यों का पालन करना या वैश्य के कर्तव्यों का पालन करना स्वतंत्र था, लेकिन अपने पैतृक पुरोहिती कर्तव्यों का पालन किए बिना नहीं। गांधी जी के लिए, वर्ण व्यवस्था पदानुक्रमित नहीं थी। चारों वर्ण समान दर्जा रखते थे और समाज के लिए कार्यात्मक थे। चारों वर्णों को क्षैतिज रूप से रखा गया था और वे परस्पर प्रतिस्थापनीय थे।

कश्मीर पर गोर का बयान, कहीं कुछ चल रहा है


कश्मीर के बारे में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर के एक बयान ने भारत और पाकिस्तान के पर्यवेक्षकों का ध्यान खींचा है. कश्मीर-विवाद के अलावा भारत-अमेरिका रिश्तों के लिहाज से भी यह बयान महत्त्वपूर्ण है.

भारतीय पर्यवेक्षक मानते हैं कि भारत को इस विषय पर आत्यंतिक प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करनी चाहिए. बयान के मतलब को समझने का प्रयास अभी किया ही जा रहा है.

सच यह भी है कि किसी राजदूत का बयान अंतिम नहीं होता. यह बयान कोई संधि नहीं है, और न राष्ट्रपति की घोषणा या विदेश विभाग के बयान जैसा आधिकारिक. फिर भी डिप्लोमेसी में शब्दावली और समय का महत्त्व होता है.

Wednesday, August 19, 2026

चुनाव बताएँगे ट्रंप और नेतन्याहू की दशा-दिशा


अमेरिका और इसराइल ने 28 फरवरी को ईरान में सत्ता बदलने के मकसद से जो युद्ध शुरू किया था, वह बड़ी नाकामी साबित हुआ है. इससे दुनिया में पैदा हुआ संकट अपनी जगह है, पर अब देखना होगा कि अमेरिका और इसराइल की राजनीति पर उसका क्या प्रभाव पड़ा है.  

इसका पहला अनुमान इस साल अमेरिका में होने वाले मध्यावधि चुनावों और इसराइल के आम चुनावों से लगेगा. हालाँकि डॉनल्ड ट्रंप के कार्यकाल में दो साल बाकी हैं, पर मध्यावधि चुनावों से उनकी लोकप्रियता का पता ज़रूर लगेगा.

अमेरिका में हरेक चार साल पर राष्ट्रपति, पूरे प्रतिनिधि सदन और उच्च सदन सीनेट के एक तिहाई सदस्यों और राज्यों के गवर्नरों के चुनाव होते हैं. उसके दो साल बाद मध्यावधि चुनाव होते हैं, जिसमें प्रतिनिधि सदन का चुनाव होता है.

प्रतिनिधि सदन का कार्यकाल दो साल का होता है, इसलिए हरेक दो साल में पूरे सदन का नया गठन होता है, साथ ही सीनेट के खाली हो रहे एक तिहाई स्थानों और राज्यों के गवर्नरों के चुनाव होते हैं.