ब्रिक्स समूह का दिल्ली शिखर-सम्मेलन जिस मापदंड पर सफल रहा है, वह है ‘नई दिल्ली घोषणा’, जो सर्वानुमति से जारी हो गई. इससे संकेत मिलता है कि ब्रिक्स का काफी समय भू-राजनीति की विसंगतियों को दूर करने में लगा है.
सम्मेलन में ईरान और संयुक्त अरब अमीरात की उपस्थिति के बावज़ूद पश्चिम एशिया
की लड़ाई से संदर्भ में कोई अड़चन नहीं आई. यह डिप्लोमेटिक सफलता है, क्योंकि इसे लेकर
कई तरह के अंदेशे थे.
अंतिम घोषणापत्र उस संतुलन को दर्शाता है, जिसमें पश्चिम एशिया में चल रहे युद्धों और तनावों को संबोधित किया गया है, लेकिन किसी एक देश को सीधे तौर पर जिम्मेदार नहीं माना
गया है.
सम्मेलन के समांतर चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग की भारत-यात्रा और नरेंद्र मोदी
के साथ उनकी वार्ता को भी इन उपलब्धियों में शामिल किया जाएगा, पर वह अपने आप में
अलग और विषद विषय है.
भारत ने लगातार अपनी गैर-पश्चिमी पहचान पर बल दिया है. इसकी जटिलता को समझना आसान नहीं है. पश्चिम के राजनीतिक और मानवीय-मूल्यों को भारत भी स्वीकार करता है, लेकिन वह अमेरिका और यूरोप की भू-राजनीति का अनिवार्य हिस्साा बनने से इनकार करता है.



