Thursday, May 28, 2026

मुस्लिम देश क्या अब्राहम समझौते को स्वीकार करेंगे?

15 सितंबर 2020 को वाइट हाउस में हुए समझौते के समय की तस्वीर

 अब्राहम समझौते को पश्चिम एशिया में ऐतिहासिक शांति पहल के रूप में प्रस्तुत किया गया था। वास्तव में, वे अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के पहले दौर में किए गए समझौते थे, जिसके तहत कुछ अरब देशों ने फलस्तीनी मुद्दे को हल किए बिना इसराइल के साथ संबंधों को सामान्य कर लिया । अब ट्रंप फिर से समझौतों का विस्तार करने के इच्छुक दिखाई देते हैं। वे वर्तमान क्षेत्रीय-अस्थिरता का इस्तेमाल करते एक बड़ा समझौता करना चाहते हैं, जो पश्चिम एशिया की एक मूल समस्या को संबोधित करता है।

क्या वे इसमें सफल होंगे? हालाँकि कुछ देश इसमें शामिल हो चुके हैं, पर शेष मुस्लिम देशों के लिए इसे स्वीकार करना बहुत मुश्किल होगा। पर इसमें सऊदी अरब शामिल हुआ, तो पाकिस्तान जैसे देश के लिए मुसीबत खड़ी हो जाएगी। पाकिस्तानी दृष्टिकोण रहा है कि इसराइल को तब तक मान्यता नहीं दी जा सकती जब तक कि फलस्तीनियों  के लिए एक उचित समाधान और एक स्वतंत्र फलस्तीनी राज्य के निर्माण पर स्पष्टता नहीं होती है।

उधर इसराइल ने इस समस्या के वास्तविक समाधान की ओर बढ़ने की बहुत कम इच्छा दिखाई है। उसके कब्जे वाले क्षेत्र में यहूदी बस्तियों का विस्तार जारी है। गज़ा का इलाका बमबारी से तबाह हो गया है। जॉर्डन नदी के पश्चिमी किनारे में हिंसा जारी है। ऐसी परिस्थितियों में ट्रंप की नए सिरे से रुचि इसराइली लॉबी के प्रभाव को दर्शाती है। सरकारें रणनीतिक कारणों से इस किस्म की डिप्लोमेसी में शामिल हो सकती हैं, पर आम लोग फलस्तीनी समस्या को पश्चिम एशिया में न्यायपूर्ण समझौते के रूप में देखना चाहते हैं।

अब्राहम समझौते क्या हैं?

राष्ट्रपति ट्रंप ने सोमवार 25 मई को पश्चिम एशियाई देशों से अब्राहम समझौते में शामिल होने का आह्वान किया। अब्राहम समझौते अमेरिका की मध्यस्थता से इसराइल और कई अन्य देशों के बीच हुए सामान्यीकरण समझौते हैं, जिन्हें उन्होंने अपने पहले कार्यकाल की सबसे महत्वपूर्ण राजनयिक उपलब्धियों में से एक बताया था।

ट्रंप ने अब सोशल मीडिया पर कहा कि अगर और देश इस समझौते में शामिल होते हैं तो मध्य पूर्व में सहयोग और भी मजबूत होगा, और उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि ईरान भी उनमें से एक हो सकता है। उन्होंने एक अलग पोस्ट में इस आह्वान को दोहराते हुए कहा कि उन्होंने सऊदी अरब, कतर और पाकिस्तान से आग्रह किया है कि वे समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए ‘तैयार, इच्छुक और समर्थ’ हों। पिछले साल नवंबर में, कजाकिस्तान भी इसमें शामिल हो गया। उसके इसराइल के साथ पहले से ही पूर्ण राजनयिक संबंध थे।

Wednesday, May 27, 2026

भारत-अमेरिका रिश्तों में ‘गाँठ’ तो पड़ ही गई है


हाल में अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने बीजिंग में रंगारंग कार्यक्रमों के बीच चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की जमकर तारीफ करते हुए उन्हें ‘महान नेता’ और ‘मित्र’ बताया. इसके बाद वे एशिया के किसी और देश में रुके बिना अमेरिका वापस लौट आए. यात्रा के दौरान और बाद के साक्षात्कारों में उन्होंने अमेरिकी सहयोगियों या साझेदारों के बारे में कोई आश्वस्तिकारक बात नहीं कही.

ऐसा ही उन्होंने पिछले साल भारत-पाकिस्तान टकराव के बाद फील्ड मार्शल आसिम मुनीर का स्वागत करते हुए किया था. भारत की जनता और विश्लेषकों ने पिछले एस साल से खामोशी के साथ उनके बर्ताव को देखा है.

उन्होंने इस बात पर भी ध्यान दिया, कि ट्रंप ने बीजिंग में फॉक्स न्यूज को दिए एक साक्षात्कार में अमेरिका और चीन के बीच संबंधों को संदर्भित करने के लिए जी2 शब्द का इस्तेमाल किया. टू ग्रेट कंट्रीज़.

और अब भारत आए अमेरिकी विदेशमंत्री मार्को रूबियो ने शनिवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ व्यापार और ऊर्जा पर चर्चा की. हालाँकि वे क्वॉड विदेशमंत्रियों की बैठक के सिलसिले में भारत आए हैं, पर पर्यवेक्षक इसे भारत-अमेरिका रिश्तों को पटरी पर वापस लाने की कोशिश के रूप में देख रहे हैं.

दरार पाटेंगे

वे मानते हैं कि यह यात्रा वॉशिंगटन द्वारा लगाए गए टैरिफ और पाकिस्तान और चीन के साथ अमेरिका के बदलते रिश्तों के कारण भारत के साथ संबंधों में आई दरार को भरने के इरादे से की गई है.

भारत के साथ संबंधों को ‘रणनीतिक गठबंधन’ बताते हुए, रूबियो ने रविवार को इस बात पर जोर दिया कि भारत उन चुनिंदा देशों में से एक है जिनका ‘वैश्विक प्रभाव’ है और ‘वैश्विक घटनाओं को प्रभावित करने की क्षमता’ है.

विदेशमंत्री एस जयशंकर के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस में रूबियो ने भारत से वैध प्रवासन, भारतीयों और भारतीय-अमेरिकियों के खिलाफ नस्लवादी टिप्पणियों और पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व के साथ अमेरिका के घनिष्ठ संबंधों से जुड़ी चिंताओं को दूर करने की कोशिश की. साथ ही आश्वासन दिया कि भारत के साथ द्विपक्षीय संबंधों में कोई कमी नहीं आई है.

रूबियो के बराबर खड़े भारत के विदेशमंत्री एस जयशंकर ने कहा, ट्रंप प्रशासन ने अपनी विदेश-नीति को 'अमेरिका फर्स्ट' के रूप में व्यक्त किया है.’ और, ‘हमारी नीति 'इंडिया फर्स्ट' है.’

Tuesday, May 26, 2026

आशा की किरण, भारत-ओमान समुद्री पाइपलाइन


होर्मुज़ जलसंधि का रास्ता बंद होने और भारत में ऊर्जा-संकट के बादल गहराने से जुड़ी खबरों के बीच एक खबर को ज्यादा सुर्खियाँ नहीं मिल पाईं कि भारत, गहरे समुद्र में एक गैस पाइपलाइन परियोजना पर विचार कर रहा है, जो हमें ओमान से जोड़ेगी। भारत सरकार ने अब इसपर तेजी से काम करना शुरू किया है, जिसके परिणामों का इंतजार है।  

हाल में कुछ मीडिया स्रोतों ने पेट्रोलियम मंत्रालय के एक अधिकारियों को उद्धृत करते हुए खबर दी है कि मंजूरी मिली, तो करीब 4.8 अरब डॉलर की लागत से बनने वाली परियोजना खाड़ी क्षेत्र से निर्बाध गैस आपूर्ति सुनिश्चित करेगी। परियोजना को समय से हरी झंडी मिली, तब भी इसे पूरा होने में पाँच से सात साल लगेंगे। उसके पहले इसके सभी आर्थिक और तकनीकी पहलुओं पर विचार करना भी ज़रूरी होगा।

सौ साल से ज्यादा समय से इसकी परिकल्पना चल रही है। इसपर यूपीए सरकार के दौर में भी बात चली थी। ओमान की वैबसाइट मस्कट डेलीकी एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत सरकार नई दिल्ली स्थित निजी क्षेत्र के कंसोर्शियम साउथ एशिया गैस एंटरप्राइज (सेज) द्वारा प्रस्तुत पूर्व-व्यवहार्यता अध्ययन पर विचार कर रही है, जो समुद्र तल की स्थितियों का अध्ययन करने के लिए टेस्ट-सेक्शन बिछा रह है।

Saturday, May 23, 2026

क्या हम बंदरों की संतानें हैं?


विज्ञान के अनुसार, मनुष्य सीधे तौर पर आज के बंदरों की संतान नहीं है।  इसके बजाय, दूसरे शब्दों में कहें कि इंसान और आज के बंदर (जैसे चिम्पांजी) दोनों एक ही विलुप्त हो चुके प्राचीन 'वानर (Ape)' प्रजाति के वंशज हैं। लाखों वर्ष के क्रमिक विकास (Evolution) के बाद दोनों अलग-अलग दिशाओं में विकसित हुए हैं। मानव उत्पत्ति और विकास के बारे में वैज्ञानिक दृष्टिकोण इस प्रकार है:

उद्विकास सिद्धांत (Evolution Theory) साझा पूर्वज (Common Ancestor): लगभग 60-80 लाख वर्ष पहले एक ऐसा जीव धरती पर मौजूद था, जो इंसानों और आज के चिम्पांजी दोनों का साझा पूर्वज था। समय के साथ उस प्रजाति के जीव अलग-अलग वातावरण में रहने लगे और खुद को ढालने (Evolve) लगे। इसी प्रक्रिया में एक शाखा आधुनिक मानव (Homo sapiens) के रूप में विकसित हुई।

डीएनए (DNA) प्रमाण: आनुवंशिक शोध बताते हैं कि आधुनिक मानव का डीएनए चिम्पैंजी के डीएनए से लगभग 98.8% तक मेल खाता है, जो दर्शाता है कि हमारे पूर्वज एक ही थे। अधिक जानकारी के लिए आप स्मिथसोनियन नेशनल म्यूजियम ऑफ नेचुरल हिस्ट्री के मानव उत्पत्ति कार्यक्रम के आनुवंशिकी प्रमाण देख सकते हैं।

सवाल है कि मनुष्य और चिंपैंजी के बीच फर्क कैसे पैदा हुआ? मनुष्य सभी प्राणियों से भिन्न और विवेकशील कैसे बना? वैज्ञानिक मानते हैं कि करोड़ों साल पहले इनके साझा पूर्वज हुआ करते थे। वातावरण में बदलाव, प्राकृतिक चयन और आनुवंशिक उत्परिवर्तन (Genetic Mutation) के कारण दोनों की प्रजातियों के रास्ते अलग हो गए। इन दोनों प्रजातियों में यह बड़ा अंतर मुख्य रूप से इन कारकों से पैदा हुआ:

मस्तिष्क का विकास और क्षमता: इंसानों का मस्तिष्क चिंपैंजी से लगभग तीन गुना बड़ा हो गया, विशेषकर 'सेरेब्रम' (Cerebrum) का हिस्सा। इससे इंसानों में अमूर्त सोच (Abstract Thinking), जटिल भाषा और योजना बनाने की क्षमता विकसित हुई।

सीधे खड़े होकर चलना (Bipedalism): लाखों साल पहले जलवायु परिवर्तन के कारण जब जंगल कम होने लगे, तब मानव पूर्वजों ने जमीन पर सीधे खड़े होकर चलना शुरू किया। इससे उनके हाथ औजार बनाने और उपयोग करने के लिए स्वतंत्र हो गए।

सुरजीत भल्ला की आलोचनात्मक टिप्पणी

सुरजीत भल्ला को आमतौर पर भारतीय जनता पार्टी की सरकार का समर्थक माना जाता है, पर हाल में इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित उनके एक लेख को भाजपा-विरोधियों ने भी खूब शेयर किया है। इसकी वजह है कि भल्ला ने सरकार की बुनियादी आर्थिक-नीतियों की आलोचना की है। वे आर्थिक-सुधारों के पक्षधर हैं, पर उन्हें लगता है कि सरकार राजनीतिक कारणों से सुधारों को भूल रही है। मैंने यहाँ उनके आलेख के मुख्य अंश को हिंदी में पेश किया है, साथ ही उनकी इंडिया टुडे की प्रतिनिधि मारिया शकील और आज तक के प्रतिनिधि साहिल जोशी से बातचीत के अंश को भी प्रस्तुत किया है। पहले पढ़ें उनका लेख:

भाजपा चुनाव तो जीत रही है, लेकिन अर्थव्यवस्था को खो रही है

पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत राजनीतिक प्रदर्शन की चरम सीमा और एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। 2029 में नरेंद्र मोदी को मिली ज़बरदस्त जीत ही पार्टी के लिए बंगाल में हासिल की गई चुनावी सफलता को पार करने का एकमात्र रास्ता है। वहीं दूसरी ओर, भाजपा द्वारा अर्थव्यवस्था को संभालने का तरीका बेहद खराब रहा है और यह कहना मुश्किल है कि स्थिति और खराब नहीं होगी। सबसे अहम सवाल यह है: क्या ये दोनों घटनाएं महज़ संयोग हैं या एक साथ घटित हुईं? जवाब है दूसरा विकल्प-आगे विस्तार से बताया जाएगा।

आर्थिक संकट के लिए चार कारक जिम्मेदार हैं। पहला और सबसे महत्वपूर्ण कारक स्वयं सरकार है। सरकार समस्या को पहचानती तो है, लेकिन संकट के लिए दूसरों को दोष देने में संतुष्ट है-इस मामले में, दूसरा कारक: प्रमुख उद्योग। तीसरा कारक कांग्रेस पार्टी है, जो गांधी परिवार के नेतृत्व में इतनी सहज है कि भाजपा का एकदलीय लोकतांत्रिक शासन लगभग सुनिश्चित है। चौथा कारक शीर्ष तीन को नियंत्रित करने वाला कठपुतली शासक है: गुप्त राज्य। संकट इसलिए बना हुआ है क्योंकि अर्थव्यवस्था लगातार उस गति से बढ़ रही है जिसे दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज गति से बढ़ने का दावा किया जाता है।