पश्चिम एशिया की लड़ाई को तीन महीने पूरे हो गए हैं, और वह पूरी तरह खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। एक महीने से ज्यादा चली ताबड़तोड़ बमबारी से इस इलाके के देशों का काफी नुकसान हुआ है, पर समस्या का कोई स्थायी समाधान नज़र आता दिखाई नहीं पड़ रहा है। अमेरिका और ईरान दोनों ने होर्मुज़ जलसंधि मार्ग को बंद कर रखा है, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति ठप्प होने का खतरा पैदा हो गया है। इस दौरान पाकिस्तान में दोनों पक्षों की वार्ता के बाद उसके दूसरे दौर की नौबत ही नहीं आई है। उधर अमेरिका का साथ देने वाले देशों की संख्या कम होती जा रही है।
राष्ट्रपति ट्रंप बार-बार दावा कर रहे हैं कि
हमने ईरान की कमर तोड़ दी है, पर वास्तविकता कुछ और नज़र आती है। ‘न्यूयॉर्क
टाइम्स’ ने अमेरिकी इंटेलिजेंस के हवाले से खबर दी है कि, इस
महीने की शुरुआत में किए गए गोपनीय आकलन से पता चलता है कि ईरान ने अपने ज्यादातर मिसाइल
स्थलों, लॉन्चरों और भूमिगत सुविधाओं तक दोबारा पहुँच हासिल
कर ली है, और इस संबंध में ट्रंप प्रशासन द्वारा सार्वजनिक
रूप से ईरान की सेना को बिखरी हुई स्थिति में चित्रित करना अमेरिकी खुफिया
एजेंसियों द्वारा नीति निर्माताओं को बंद दरवाजों के पीछे बताई जा रही जानकारी से
बिल्कुल विपरीत है।
रिपोर्ट के अनुसार ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य
के किनारे स्थित अपने 33 मिसाइल स्थलों में से 30 तक परिचालन पहुंच बहाल कर दी है,
जिससे संकरे जलमार्ग से गुजरने वाले अमेरिकी युद्धपोतों और तेल
टैंकरों को खतरा हो सकता है। इन सूचनाओं से अलग-अलग स्थलों पर हुए नुकसान के स्तर
के आधार पर पता लगता है, कि ईरानी इन स्थलों के अंदर मौजूद
मोबाइल लॉन्चरों का उपयोग करके मिसाइलों को अन्य स्थानों पर ले जा सकते हैं।
आकलनों के अनुसार, ईरान के
पास अभी देश भर में लगभग 70 प्रतिशत मोबाइल लॉन्चर तैनात हैं और उसने युद्ध-पूर्व
मिसाइल भंडार का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा बरकरार रखा है। इस भंडार में बैलिस्टिक
मिसाइलें शामिल हैं, जो क्षेत्र के अन्य देशों को निशाना बना
सकती हैं, और क्रूज मिसाइलों की एक छोटी आपूर्ति भी है,
जिनका उपयोग जमीन या समुद्र पर कम दूरी के लक्ष्यों के खिलाफ किया
जा सकता है।
सीधा युद्ध
यों तो लंबे अर्से से इस इलाके में 'छाया युद्ध' चल रहा था, पर 28 फरवरी से शुरू हुए हमलों ने इसे 'छाया युद्ध' से सीधे युद्ध में बदल दिया है। इस दौरान अमेरिकी हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर खामनेई के मारे जाने के बाद तनाव और बढ़ गया है। लड़ाई के दौरान अमेरिका और इसराइल ने ईरान पर हमले बोले, तो ईरान और उसके समर्थक हूतियों (यमन), हिज़बुल्ला (लेबनान), और अन्य समूहों ने इसराइल तथा अमेरिकी ठिकानों (कतर, बहरीन, कुवैत) को निशाना बनाया।




