Sunday, August 16, 2026

भारत ने हॉकी विश्वकप में क्राउडफंडिंग से बनी वेल्स की टीम को हराया

 


हरमनप्रीत सिंह ने दो गोल दागकर भारत को ऐसी टीम के खिलाफ 3-1 से जीत दिलाई, जिसे प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए चंदे से करके उतनी रकम का इंतज़ाम और करना था, जितना भारतीय कोच क्रेग फुल्टन का दो महीने का वेतन होता है। आज के इंडियन एक्सप्रेस में मिहिर वासवडा की यह रिपोर्ट पढ़ने लायक है। मैंने उसके मशीन-अनुवाद को कुछ सँवारते हुए यहाँ पेश किया है। नीचे पढ़ें यह रिपोर्ट:

वेल्स ने विश्व कप में भाग लेने से पहले एक लक्ष्य हासिल करने की कोशिश शुरू कर दी थी। यह वैगनर स्टेडियम के अंदर वाला स्कोरबोर्ड नहीं, बल्कि क्राउडफंडिंग पेज पर बना स्कोरबोर्ड था। उनका लक्ष्य 40,000 पाउंड था। टूर्नामेंट शुरू होने तक भी उनके 1,929 पाउंड कम पड़ रहे थे। दूसरे शब्दों में कहें तो, उन्होंने जो 38,071 पाउंड जुटाए, लगभग 49.26 लाख रुपये, वह लगभग उतनी ही रकम है, जितनी भारतीय कोच क्रेग फुल्टन दो महीने में कमाते हैं।

मैदान पर, भारत ने एमस्टेलवीन में पूल डी के अपने पहले मैच में वेल्स को 3-1 से हराया। मैच में ज्यादातर समय तक भारत का प्रदर्शन वैसा ही संयमित रहा जैसा फुल्टन ने उम्मीद की होगी। रक्षापंक्ति अंतिम कुछ मिनटों तक मज़बूत बनी रही, पेनल्टी कॉर्नर सटीक साबित हुए, कप्तान हरमनप्रीत सिंह ने दो गोल किए और रिजर्व खिलाड़ी संजय ने भी एक गोल दागा। यह प्रदर्शन एक क्लीन शीट और एक फील्ड गोल से पूर्णता के करीब था। हालांकि, यह कहना अतिशयोक्ति होगी,  खासकर तब जब यह एक लंबे टूर्नामेंट का पहला मैच था।

स्कोरलाइन ने कहानी का सिर्फ एक हिस्सा बताया। यह दो बिल्कुल अलग-अलग हॉकी प्रणालियों का भी मुकाबला था। एक टीम पूरी तरह से वित्त पोषित राष्ट्रीय शिविर में कई महीने बिताने के बाद पहुँची थी। दूसरी टीम समर्थकों से अपने विश्व कप सफर के लिए आर्थिक सहायता मांगने के बाद पहुँची थी।

इस मंच पर अपनी दूसरी उपस्थिति से कुछ महीने पहले, हॉकी वेल्स ने एक ऑनलाइन क्राउडफंडिंग अभियान शुरू किया। इस अपील की शुरुआत 'हम कौन हैं' यह बताते हुए होती है और आगे कहा गया है: “हॉकी विश्व कप में प्रतिस्पर्धा करने के लिए खिलाड़ियों, कर्मचारियों और पूरे कार्यक्रम से जबरदस्त प्रतिबद्धता की आवश्यकता होती है। एक टीम के रूप में, हम पहले से कहीं अधिक प्रशिक्षण ले रहे हैं क्योंकि हम उच्च स्तरीय अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता की माँगों के लिए तैयारी कर रहे हैं। अतिरिक्त प्रशिक्षण शिविरों और तैयारी मैचों से लेकर प्रदर्शन सहायता और यात्रा तक, इस स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने में शामिल लागतें काफी अधिक हैं।”

‘कॉक्रोच-विद्रोह’ क्या उलट सकता है भाजपा के सत्ता-समीकरण?


मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की बेरोजगार युवाओं/सक्रियतावादियों की तुलना ‘कॉक्रोच’ और ‘परजीवियों’ से करती अदालती टिप्पणी के जवाब में आम आदमी पार्टी के पूर्व कम्युनिकेशन स्ट्रैटजिस्ट और बोस्टन यूनिवर्सिटी के छात्र अभिजीत दीपके ने व्यंग्यात्मक ‘कॉक्रोच जनता पार्टी (सीजेपी)’ शुरू की। इसका नाम ही बीजेपी की पैरोडी है। यह जल्दी ही मीम से बड़े डिजिटल आंदोलन में बदल गया—इंस्टाग्राम पर करोड़ों फॉलोअर्स (बीजेपी/कांग्रेस हैंडल्स से ज्यादा), लाखों रजिस्ट्रेशन हो गए। यह बेरोजगारी, परीक्षा लीक (खासकर NEET), जवाबदेही और व्यवस्था से नाराजगी का प्रतीक बन गया।

इसके दवाब में जुलाई में 36-37 दिनों के जंतर-मंतर धरने, ‘संसद चलो’ मार्च और देशव्यापी प्रदर्शनों के बाद केंद्रीय शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हो गया। मोदी सरकार (2014 के बाद) पर सार्वजनिक दबाव से यह मंत्री का दुर्लभ इस्तीफा था। सरकार ने अन्य माँगों (मुआवजा, FIR वापसी, परीक्षा सुधारों पर बात) पर भी सहमति जताई, जिसके बाद CJP ने आंदोलन स्थगित कर दिया।

इसके बाद सीजेपी ने अपनी राष्ट्रीय टीम घोषित कर दी, जिसके दीपके राष्ट्रीय संयोजक हैं। इसने 15 अगस्त से स्कूल ठीक करो’ अभियान शुरू किया है, जिला-स्तरीय संगठन बनाने की योजना है, ‘क्या बोलती पब्लिक’ जैसा सुनने वाली यात्रा और ‘सीजन-2’ की घोषणा भी की गई है। इतना होने के बावज़ूद यह ग्रुप औपचारिक पार्टी नहीं, बल्कि युवा राजनीतिक आंदोलन/प्रेशर ग्रुप के रूप में आगे बढ़ रहा है।

पहली नज़र में साफ दिखाई पड़ता है कि बीजेपी ने इसे शुरू में गंभीरता से नहीं लिया, पर बाद में इसे लेकर अफरा-तफरी में फैसले करना शुरू कर दिया। सवाल है कि यह आंदोलन व्यवस्था-परिवर्तन के लिए है या बीजेपी को सत्ता से बाहर करने के लिए? व्यवस्था-परिवर्तन करना है, तो इस संगठन की व्यवस्था योजना क्या है? सत्ता-परिवर्तन कराना है, तो किस पार्टी के पक्ष में? क्या यह संगठन बीजेपी से टक्कर ले सकता है? पहले एक नज़र में दोनों की तुलनात्मक ताकतों पर नज़र डालें:

बीजेपी की मजबूती: चुनावी मशीनरी, संगठन (RSS), कल्याण योजनाएं, हिंदू राष्ट्रवाद और विपक्ष की कमजोरी या आपसी टकराव, अब भी प्रमुख हैं। 2024 में बीजेपी को 37% वोट मिले थे; हाल के राज्य चुनावों में भी उसका असर दिखाई पड़ा है। CJP अभी चुनावी ताकत नहीं है—वह न तो पंजीकृत पार्टी है, न उसके पास राष्ट्रीय प्रतीक हैं, न बड़े पैमाने पर संगठन या काडर। हाँ, यह विचार का विषय ज़रूर है कि उसके पास संसाधन कहाँ से आ रहे हैं? इस विषय में कोई जानकारी हासिल हो पाई, तो यह बीजेपी के पक्ष में होगा।

CJP की सीमाएं: व्यंग्य और मुद्दा-आधारित (शिक्षा, युवा बेरोजगारी) होने से व्यापक वैचारिक आधार या ग्रामीण/जातिगत गठबंधन बनाना मुश्किल काम है। कई विश्लेषक कहते हैं कि गुस्सा अस्थायी हो सकता है; बीजेपी मांगों को को-ऑप्ट कर सकती है या दमन/अवहेलना कर सकती है। विपक्ष इसे अपना मंच बनाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन CJP खुद स्वतंत्र रहने पर जोर दे रहा है।

संभावनाएं: युवा (भारत की आबादी का बड़ा हिस्सा) असंतोष अगर स्थायी संगठन और स्थानीय मुद्दों में बदल जाए, तो शहरी/युवा वोट प्रभावित हो सकते हैं, खासकर अगर परीक्षा लीक, नौकरियां या संस्थागत विश्वसनीयता जैसे मुद्दे दोहराए जाएं। दक्षिण एशिया में Gen-Z आंदोलनों (बांग्लादेश, नेपाल आदि) ने सरकारें गिराईं—भारत में संस्थाएं मजबूत हैं, लेकिन सड़क दबाव ने पहली बार मंत्री गिराया। यह ‘बीजेपी के अजेय’ होने की छवि को चुनौती ज़रूर देता है। पर इसके आगे क्या?

Wednesday, August 12, 2026

पश्चिम एशिया में ‘सेंटो’ जैसा नया गठबंधन


अरसे से अनुमान था कि पश्चिम एशिया में पाकिस्तान की पहल पर पचास के दशक में हुए बग़दाद पैक्ट या ‘सेंटो’ को फिर से जगाया जा सकता है, जिसे इस्लामिक ‘नेटो’ भी कहा गया था. कमोबेश उसी तर्ज पर एक नई संधि की शुरुआत पिछले हफ्ते हो गई है.   

सऊदी अरब के पवित्र शहर मक्का में गत 7 अगस्त को क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगान और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने मक्का समझौते पर दस्तखत कर दिए हैं.

हालांकि मिस्र और क़तर ने शुरुआती चर्चाओं में भाग लिया था, लेकिन शुक्रवार को हुई चर्चा में उनका उल्लेख प्रतिभागी के रूप में नहीं किया गया. फिर भी, कुछ नए देशों के इसमें शामिल होने की संभावनाएँ खुली हुई हैं.

समझौते को दुनियाभर के विशेषज्ञों ने अलग-अलग नज़रों से देखा है. मसलन क्षेत्रीय और वैश्विक भू-राजनीति, सऊदी-ईरान और इसराइल रिश्ते, अमेरिका और दूसरी ताकतों की भूमिका और भारत का नज़रिया. मुस्लिम देशों के संगठन ओआईसी की सार्थकता को लेकर भी सवाल हैं.

समझौते पर हस्ताक्षर होने के 48 घंटे बाद ही उसे पहली गंभीर चुनौती का सामना करना पड़ा है. ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने जाज़ान में अरामको रिफाइनरी पर ड्रोन से हमला किया, जिससे आग लग गई. 

Tuesday, August 4, 2026

बांग्लादेश पर चीनी प्रभाव और भारत से रिश्ते


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तीन देशों की यात्रा के दौरान कुछ पर्यवेक्षकों ने टिप्पणी की कि, अपनी 'एक्ट-ईस्ट पॉलिसी' के तहत भारत सुदूर-पूर्व के देशों के साथ रिश्ते बनाने के पहले अपने निकटतम पड़ोसी बांग्लादेश के साथ संबंध सुधारने का काम क्यों नहीं करता? अब समय आ रहा है, जब इस सवाल का जवाब मिल सकता है.

भारत ने बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान को नई दिल्ली में 12-13 सितंबर को होने वाले 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के आउटरीच सत्र में विशेष अतिथि के रूप में आमंत्रित किया है. हालांकि, बांग्लादेश सरकार ने इस निमंत्रण पर अभी कोई निर्णय नहीं किया है, पर इससे कुछ संकेत मिलेंगे.

नया फौजी-गठबंधन

इस विषय पर आगे बात करने के पहले एक नई खबर पर भी ग़ौर करना चाहिए. सऊदी अरब ने एक समुद्री-सुरक्षा गठबंधन की घोषणा की है, जिसमें पाकिस्तान, तुर्की और बांग्लादेश समेत 13 देश शामिल हैं.

Sunday, August 2, 2026

कॉक्रोच-विद्रोह के तीन चेहरे

 


वायरल युवा-आक्रोश से प्रेरित, कॉक्रोच जनता पार्टी का तेजी से उदय तीन बेहद अलग-अलग व्यक्तियों के कारण हुआ, जिनके कौशल, महत्त्वाकांक्षाओं और राजनीतिक इतिहास ने एक व्यंग्यात्मक ऑनलाइन अभियान को एक राष्ट्रीय विरोध में बदल दिया, जिसके परिणामस्वरूप केंद्रीय शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान को पद छोड़ना पड़ा। आज यानी 2 अगस्त 2026 के द हिंदू में तीन व्यक्तियों के जीवन-वृत्त पर रोशनी डाली गई हैं। मैंने इसे हिंदी में अपने पाठकों के लिए तैयार किया है। इसमें कुछ जगहों पर ज़रूरत के हिसाब से अपनी टिप्पणी भी की है, जो इटैलिक्स में है। इसे लिखा है शोभना के. नायर और निखिल एम बाबू ने।

व्यंग्य से लेकर धरने तक, यह छात्रों के उस विरोध आंदोलन की सबसे लोकप्रिय और शायद सबसे आसान व्याख्या है, जिसके परिणामस्वरूप केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा। यह व्याख्या अपनी सरलता में सशक्त प्रतीत होती है। लेकिन यह अपूर्ण है।

अब तक तो सभी को पता ही है कि कहानी क्या है। 15 मई, 2026 को भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सक्रियता और सोशल मीडिया का सहारा लेने वाले बेरोजगार युवाओं की तुलना ‘कॉक्रोचों’ से की, जिससे व्यापक विरोध हुआ। इस टिप्पणी को भुनाते हुए, बोस्टन में पढ़ रहे एक भारतीय छात्र अभिजीत दीपके ने अपने जैसे ‘कॉक्रोचों’ के लिए एक व्यंग्यात्मक ऑनलाइन मंच शुरू किया और इस अपमान को असंतुष्ट युवाओं के लिए एक एकजुटता के आह्वान में बदल दिया। पहले 24 घंटों के भीतर ही 50,000 लोगों ने इसमें पंजीकरण कराया। पाँच दिनों के भीतर यह संख्या बढ़कर दस लाख से अधिक हो गई, जबकि इस आंदोलन के इंस्टाग्राम अकाउंट पर 2.2 करोड़ से अधिक फॉलोवर हो गए।

वायरल पोस्ट, फॉलोवरों की बढ़ती संख्या और रंगीन प्रतीकों के पीछे तीन शख्सियतें थीं: अभिजीत दीपके (30), आशुतोष रांका (30) और सौरभ दास (27), जिनकी प्रतिभाएँ एक-दूसरे की पूरक हैं। वे देश के अलग-अलग हिस्सों, अलग-अलग सामाजिक पृष्ठभूमियों से आते हैं और उनके स्वभाव भी काफी भिन्न हैं।