Thursday, May 14, 2026

अमेरिका-ईरान ‘अनिर्णीत’ युद्ध


पश्चिम एशिया की लड़ाई को तीन महीने पूरे हो गए हैं, और वह पूरी तरह खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। एक महीने से ज्यादा चली ताबड़तोड़ बमबारी से इस इलाके के देशों का काफी नुकसान हुआ है, पर समस्या का कोई स्थायी समाधान नज़र आता दिखाई नहीं पड़ रहा है। अमेरिका और ईरान दोनों ने होर्मुज़ जलसंधि मार्ग को बंद कर रखा है, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति ठप्प होने का खतरा पैदा हो गया है। इस दौरान पाकिस्तान में दोनों पक्षों की वार्ता के बाद उसके दूसरे दौर की नौबत ही नहीं आई है। उधर अमेरिका का साथ देने वाले देशों की संख्या कम होती जा रही है।

राष्ट्रपति ट्रंप बार-बार दावा कर रहे हैं कि हमने ईरान की कमर तोड़ दी है, पर वास्तविकता कुछ और नज़र आती है। न्यूयॉर्क टाइम्स ने अमेरिकी इंटेलिजेंस के हवाले से खबर दी है कि, इस महीने की शुरुआत में किए गए गोपनीय आकलन से पता चलता है कि ईरान ने अपने ज्यादातर मिसाइल स्थलों, लॉन्चरों और भूमिगत सुविधाओं तक दोबारा पहुँच हासिल कर ली है, और इस संबंध में ट्रंप प्रशासन द्वारा सार्वजनिक रूप से ईरान की सेना को बिखरी हुई स्थिति में चित्रित करना अमेरिकी खुफिया एजेंसियों द्वारा नीति निर्माताओं को बंद दरवाजों के पीछे बताई जा रही जानकारी से बिल्कुल विपरीत है।

रिपोर्ट के अनुसार ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य के किनारे स्थित अपने 33 मिसाइल स्थलों में से 30 तक परिचालन पहुंच बहाल कर दी है, जिससे संकरे जलमार्ग से गुजरने वाले अमेरिकी युद्धपोतों और तेल टैंकरों को खतरा हो सकता है। इन सूचनाओं से अलग-अलग स्थलों पर हुए नुकसान के स्तर के आधार पर पता लगता है, कि ईरानी इन स्थलों के अंदर मौजूद मोबाइल लॉन्चरों का उपयोग करके मिसाइलों को अन्य स्थानों पर ले जा सकते हैं।

आकलनों के अनुसार, ईरान के पास अभी देश भर में लगभग 70 प्रतिशत मोबाइल लॉन्चर तैनात हैं और उसने युद्ध-पूर्व मिसाइल भंडार का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा बरकरार रखा है। इस भंडार में बैलिस्टिक मिसाइलें शामिल हैं, जो क्षेत्र के अन्य देशों को निशाना बना सकती हैं, और क्रूज मिसाइलों की एक छोटी आपूर्ति भी है, जिनका उपयोग जमीन या समुद्र पर कम दूरी के लक्ष्यों के खिलाफ किया जा सकता है।

सीधा युद्ध

यों तो लंबे अर्से से इस इलाके में 'छाया युद्ध' चल रहा था, पर 28 फरवरी से शुरू हुए हमलों ने इसे 'छाया युद्ध' से सीधे युद्ध में बदल दिया है। इस दौरान अमेरिकी हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर खामनेई के मारे जाने के बाद तनाव और बढ़ गया है। लड़ाई के दौरान अमेरिका और इसराइल ने ईरान पर हमले बोले, तो ईरान और उसके समर्थक हूतियों (यमन), हिज़बुल्ला (लेबनान), और अन्य समूहों ने इसराइल तथा अमेरिकी ठिकानों (कतर, बहरीन, कुवैत) को निशाना बनाया।

राष्ट्र-हित में सोने की अनावश्यक खरीद से बचें


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक अपील के बाद अचानक देश में सोने की कीमत और उसकी खरीद को लेकर चर्चा चल निकली है। इस अपील के अर्थ को समझने के पहले हमें सोने के महत्त्व को समझना होगा। दुनिया में डॉलर को सबसे विश्वसनीय मुद्रा समझा जाता है, पर सोना उससे भी ज्यादा विश्वसनीय संपदा है। वैश्विक स्तर पर सोने का कारोबार अमेरिकी डॉलर में होता है, इसलिए डॉलर के साथ भारतीय रुपये की विनिमय दर में उतार-चढ़ाव स्थानीय बाजार में सोने की कीमत निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

भारत हर साल लगभग 700 से 800 टन सोना बाहर से खरीदता है। इस वजह से यह दुनिया के सबसे बड़े सोना आयात करने वाले देशों में से एक है। सोने का घरेलू उत्पादन काफी कम है। कुल जरूरत का लगभग 90 से 95 प्रतिशत सोना बाहर से खरीदा जाता है। भारतीय कारीगर सोने के जेवर बनाकर उनका निर्यात भी करते हैं, इसलिए कुछ सोना बाहर भी जाता है। सोने के रासायनिक उपयोग भी हैं।

बहरहाल इसकी खरीद का हमारे मुद्राकोष पर सीधा प्रभाव पड़ता है। प्रधानमंत्री ने सोने की खरीद से बचने की सलाह इसीलिए दी है, क्योंकि पश्चिम एशिया की लड़ाई के कारण भारत के सामने ऊर्जा संकट पैदा हो गया है। हमें पेट्रोलियम आयात करने के लिए विदेशी मुद्रा की ज़रूरत है। इस लड़ाई के कारण हमारे विदेशी मुद्राकोष पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।

सराफा में तेजी

भारत के सराफा बाजारों में पिछले कुछ महीनों से तेजी का दौर चल रहा है। प्रधानमंत्री की अपील के अलावा भारत सरकार ने सोने और चाँदी की खरीद पर काबू पाने के लिए 13 मई से सोने और चाँदी के आयात पर 10 प्रतिशत बेसिक कस्टम ड्यूटी और 5 प्रतिशत एग्रीकल्चर इंफ्रास्ट्रक्चर एंड डेवलपमेंट सेस लगाया है।

महँगाई और विदेशी-मुद्रा पलायन रोकने के भारतीय प्रयास


पश्चिम एशिया की लड़ाई का कोई हल नजर नहीं आ रहा है। होर्मुज जलसंधि मार्ग को, अमेरिका और ईरान दोनों ने बंद कर रखा है। इस रास्ते से भारत के 45-55 फीसदी खनिज तेल का आवागमन होता है। भारत के निर्यात पर भी असर पड़ा है। अर्थव्यवस्था पर दबाव नज़र आने लगा है। रुपये और शेयर बाजार की गिरावट ने भी चिंता का माहौल बनाया है।

लड़ाई शुरू होने के बाद से विदेशी मुद्रा भंडार में 38 अरब डॉलर की गिरावट और खनिज तेल की कीमतों के 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बने रहने के कारण बढ़ता दबाव नीति निर्माताओं के लिए चिंता का विषय है। हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नागरिकों से मितव्ययिता का आह्वान किया है, जिसके पीछे कारण है सोने का आयात और विदेश-यात्राओं पर विदेशी मुद्रा का खर्च।

दो वर्षों में सोने का आयात बिल लगभग दोगुना होकर 2025-26 में 72 अरब डॉलर हो गया है। विदेश-यात्रा पर उदारीकृत रेमिटेंस स्कीम के तहत व्यय 2025-26 के पहले 11 महीनों में, इस स्कीम का 57 प्रतिशत यानी कुल 26.34 अरब डॉलर में 15 अरब डॉलर रहा। विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय बाजारों से डॉलर खींच रहे हैं, जिसके कारण मुद्रा भंडार घटकर 691 अरब डॉलर तक पहुँच गया है। फरवरी में यह भंडार 728.49 अरब डॉलर के सार्वकालिक उच्च स्तर पर था।

Wednesday, May 13, 2026

भारत-पाकिस्तान रिश्ते सुधरते क्यों नहीं?

मरियम नवाज़ की पुत्रवधू
दो साल पहले सितंबर 2024 में सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च और सी-वोटर के एक सर्वे के परिणामों की घोषणा की, जिसमें भारत-पाकिस्तान और बांग्लादेश के लोगों से राय ली गई थी. उसमें एक सवाल था कि भारत और पाकिस्तान के रिश्ते क्या सुधर सकते हैं?

सर्वे में 60 प्रतिशत से अधिक भारतीयों और करीब 50 प्रतिशत पाकिस्तानियों ने माना कि इस दशक में तो कम से कम नहीं सुधरेंगे. कुछ ने कहा, कभी नहीं सुधरेंगे.

सर्वे 2022 में हुआ था, उसके परिणाम 2024 में जारी किए गए थे. विषय था,'बदलती दुनिया में दक्षिण एशिया: विभाजन के 75 साल बाद भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के नागरिक क्या सोचते हैं?'

बातचीत ठप्प

सोशल मीडिया पर एक प्रतिक्रिया पढ़ने को मिली, पाकिस्तान और भारत कभी दोस्त नहीं हो सकते. यह दुश्मनी उन लोगों के लिए फायदे का सौदा है, जिनका धंधा इसी दुश्मनी से चलता है.

ऑपरेशन सिंदूर की वर्षगाँठ के मौके पर अब यह सवाल मन में आता है कि ऐसी क्या बात है, जो टकराव को इस शिद्दत तक ले आई है? पाकिस्तान हमें अज़ली दुश्मन क्यों मानता है?

पिछले दस साल से दोनों के बीच कोई उच्च-स्तरीय वार्ता नहीं हुई है. 2019 के बाद से दोनों देशों के उच्चायोग बगैर हाई कमिश्नर चल रहे हैं. कारोबारी रिश्ते नहीं के बराबर हैं. ट्रेन बंद, बस बंद और हवाई सेवा भी बंद. सिंधु जल-संधि रद्द कर है. डिप्लोमेसी का लेवल ज़ीरो है.

Saturday, May 9, 2026

टीवीके यानी ‘स्टार्टअप’ राजनीतिक विकल्प

तमिलनाडु विधानसभा के चुनाव-परिणामों ने देश में एक नए राजनीतिक 'स्टार्टअप' का नाम जोड़ा है। अभिनेता से राजनेता बने विजय की पार्टी टीवीके का चुनावी पदार्पण बेहद शानदार रहा है। 'स्टार्टअप' शब्द बिजनेस से आया है।  तेजी से बढ़ने वाली कंपनियों को यह नाम दिया जाता है और एक अरब डॉलर से ऊपर का कारोबार करने वाली कंपनी को 'यूनिकॉर्न' कहते हैं। माना जा रहा है कि टीवीके ने रातों-रात भारतीय राजनीति में 'यूनिकॉर्न' बनकर दिखाया है।

तमिलगा वेट्री कषगम (टीवीके) ने अपने पहले ही चुनावी मुकाबले के बाद तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी), आम आदमी पार्टी (आप), असम गण परिषद (एजीपी) और वाईएसआर कांग्रेस (वाईएसआरसीपी) जैसी पार्टियों के नक्शे-कदम सफलता हासिल की है। वह बेशक पहले ही राउंड में यूनीकॉर्नबनकर उभरी है, पर पर्यवेक्षक मानते हैं कि उसे अभी कठोर परीक्षा से गुजरना होगा। अभी यह सेमीफ़ाइनल जैसा लगता है। शायद साल-दो साल, नई सरकार आए या फिर से चुनाव कराने पड़ें।

टीवीके के पीछे नौजवानों की ताकत है, जिसे जेन-ज़ी माना जा रहा है। हाल में नेपाल में भी नए नेता जीतकर आए हैं। उस सरकार की स्थिरता को लेकर भी संदेह है। सोशल मीडिया के ज़रिए चुनाव जीतना एक बात है, लेकिन सत्ता के खेल को खेलना दूसरी बात है। इस पीढ़ी को घोषणापत्र पढ़ना, आर्थिक मुद्दों का अध्ययन करना या नेताओं की जवाबदेही का मतलब भी समझना होगा। परंपरागत राजनीति में भी युवा ही आगे आते हैं। पर समाधान झटपट नहीं मिलते और सिनेमा को नायकों की तरह, खासतौर से नहीं।