Saturday, May 23, 2026

क्या हम बंदरों की संतानें हैं?


विज्ञान के अनुसार, मनुष्य सीधे तौर पर आज के बंदरों की संतान नहीं है।  इसके बजाय, दूसरे शब्दों में कहें कि इंसान और आज के बंदर (जैसे चिम्पांजी) दोनों एक ही विलुप्त हो चुके प्राचीन 'वानर (Ape)' प्रजाति के वंशज हैं। लाखों वर्ष के क्रमिक विकास (Evolution) के बाद दोनों अलग-अलग दिशाओं में विकसित हुए हैं। मानव उत्पत्ति और विकास के बारे में वैज्ञानिक दृष्टिकोण इस प्रकार है:

उद्विकास सिद्धांत (Evolution Theory) साझा पूर्वज (Common Ancestor): लगभग 60-80 लाख वर्ष पहले एक ऐसा जीव धरती पर मौजूद था, जो इंसानों और आज के चिम्पांजी दोनों का साझा पूर्वज था। समय के साथ उस प्रजाति के जीव अलग-अलग वातावरण में रहने लगे और खुद को ढालने (Evolve) लगे। इसी प्रक्रिया में एक शाखा आधुनिक मानव (Homo sapiens) के रूप में विकसित हुई।

डीएनए (DNA) प्रमाण: आनुवंशिक शोध बताते हैं कि आधुनिक मानव का डीएनए चिम्पैंजी के डीएनए से लगभग 98.8% तक मेल खाता है, जो दर्शाता है कि हमारे पूर्वज एक ही थे। अधिक जानकारी के लिए आप स्मिथसोनियन नेशनल म्यूजियम ऑफ नेचुरल हिस्ट्री के मानव उत्पत्ति कार्यक्रम के आनुवंशिकी प्रमाण देख सकते हैं।

सवाल है कि मनुष्य और चिंपैंजी के बीच फर्क कैसे पैदा हुआ? मनुष्य सभी प्राणियों से भिन्न और विवेकशील कैसे बना? वैज्ञानिक मानते हैं कि करोड़ों साल पहले इनके साझा पूर्वज हुआ करते थे। वातावरण में बदलाव, प्राकृतिक चयन और आनुवंशिक उत्परिवर्तन (Genetic Mutation) के कारण दोनों की प्रजातियों के रास्ते अलग हो गए। इन दोनों प्रजातियों में यह बड़ा अंतर मुख्य रूप से इन कारकों से पैदा हुआ:

मस्तिष्क का विकास और क्षमता: इंसानों का मस्तिष्क चिंपैंजी से लगभग तीन गुना बड़ा हो गया, विशेषकर 'सेरेब्रम' (Cerebrum) का हिस्सा। इससे इंसानों में अमूर्त सोच (Abstract Thinking), जटिल भाषा और योजना बनाने की क्षमता विकसित हुई।

सीधे खड़े होकर चलना (Bipedalism): लाखों साल पहले जलवायु परिवर्तन के कारण जब जंगल कम होने लगे, तब मानव पूर्वजों ने जमीन पर सीधे खड़े होकर चलना शुरू किया। इससे उनके हाथ औजार बनाने और उपयोग करने के लिए स्वतंत्र हो गए।

सुरजीत भल्ला की आलोचनात्मक टिप्पणी

सुरजीत भल्ला को आमतौर पर भारतीय जनता पार्टी की सरकार का समर्थक माना जाता है, पर हाल में इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित उनके एक लेख को भाजपा-विरोधियों ने भी खूब शेयर किया है। इसकी वजह है कि भल्ला ने सरकार की बुनियादी आर्थिक-नीतियों की आलोचना की है। वे आर्थिक-सुधारों के पक्षधर हैं, पर उन्हें लगता है कि सरकार राजनीतिक कारणों से सुधारों को भूल रही है। मैंने यहाँ उनके आलेख के मुख्य अंश को हिंदी में पेश किया है, साथ ही उनकी इंडिया टुडे की प्रतिनिधि मारिया शकील और आज तक के प्रतिनिधि साहिल जोशी से बातचीत के अंश को भी प्रस्तुत किया है। पहले पढ़ें उनका लेख:

भाजपा चुनाव तो जीत रही है, लेकिन अर्थव्यवस्था को खो रही है

पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत राजनीतिक प्रदर्शन की चरम सीमा और एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। 2029 में नरेंद्र मोदी को मिली ज़बरदस्त जीत ही पार्टी के लिए बंगाल में हासिल की गई चुनावी सफलता को पार करने का एकमात्र रास्ता है। वहीं दूसरी ओर, भाजपा द्वारा अर्थव्यवस्था को संभालने का तरीका बेहद खराब रहा है और यह कहना मुश्किल है कि स्थिति और खराब नहीं होगी। सबसे अहम सवाल यह है: क्या ये दोनों घटनाएं महज़ संयोग हैं या एक साथ घटित हुईं? जवाब है दूसरा विकल्प-आगे विस्तार से बताया जाएगा।

आर्थिक संकट के लिए चार कारक जिम्मेदार हैं। पहला और सबसे महत्वपूर्ण कारक स्वयं सरकार है। सरकार समस्या को पहचानती तो है, लेकिन संकट के लिए दूसरों को दोष देने में संतुष्ट है-इस मामले में, दूसरा कारक: प्रमुख उद्योग। तीसरा कारक कांग्रेस पार्टी है, जो गांधी परिवार के नेतृत्व में इतनी सहज है कि भाजपा का एकदलीय लोकतांत्रिक शासन लगभग सुनिश्चित है। चौथा कारक शीर्ष तीन को नियंत्रित करने वाला कठपुतली शासक है: गुप्त राज्य। संकट इसलिए बना हुआ है क्योंकि अर्थव्यवस्था लगातार उस गति से बढ़ रही है जिसे दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज गति से बढ़ने का दावा किया जाता है।

Tuesday, May 19, 2026

किसे चाहिए ईमानदारी?

पत्रकारिता या दूसरे शब्दों में कहें, तो ईमानदार पत्रकारिता की ज़रूरत किसे है? पत्रकारों को, उनके संगठनों को, प्रेस क्लबों को, मीडिया-मालिकों को, राजनीतिक दलों को या आम जनता यानी पाठकों और दर्शकों को? सिद्धांततः पत्रकारिता खुद में एक प्रकार की राजनीति है। ऐसी राजनीति जिसका केंद्रीय विषय सार्वजनिक हित है, सत्ता पाना नहीं। सत्ता की राजनीति भी ऐसा ही दावा करती है, पर वह जिन आधारों पर चल रही है, वे संकीर्ण होते जा रहे हैं। पत्रकारिता की जिम्मेदारी है कि वह उन संकीर्ण आधारों पर चोट करे। इसके लिए उसे अपनी साख बनानी होगी।

यह काम पत्रकारिता ने अपने लिए खुद तय नहीं किया है, बल्कि समाज ने तय किया है। शुरूआती पत्रकार ताकतवर राजनेताओं के लिए पैम्फलेट लिखते हुए ही इस धंधे में आए थे। पर आज की लोकतांत्रिक-व्यवस्था में पत्रकार की जरूरत सोसायटी को है, और इस बात में ही तमाम पेच हैं। वोटर को सूचना चाहिए, जिसके आधार पर वह अपनी राय बनाए।

सोलह साल पहले नीरा राडिया ने बड़ी ईमानदारी से अपना काम किया। पता नहीं वे अपने क्लाइंट्स के दृष्टिकोण को किस हद तक मीडिया में ला पाने में कामयाब हुईं, पर इतना तय है कि उन्होंने उसी तरह काम किया जैसी हमारे मीडिया की संरचना है। एक दौर तक इस मीडिया के भीतर कुछ आदर्श थे, जो अब आउटडेटेड हैं। ओल्ड स्टाइल मीडिया माने जो सूचना के गैर-वाजिब इस्तेमाल को तैयार न हो। और नए स्कूल के माने? सवाल है कि क्या सब ऐसे ही रहेगा?

मुझे रसूख चाहिए

कुछ साल पहले मुझे माखन लाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल जाने और नए पुराने छात्रों से संवाद करने का मौका मिला। मौका था नए सत्र का आरम्भ, जिसका समारोह था। मैंने सभा में बैठे छात्रों से पूछा- आप पत्रकार क्यों बनना चाहते हैं?  ज्यादातर का जवाब था- सामाजिक जरूरत के लिए। पाठकों को सही जानकारी देने के लिए। एक छात्र ने खड़े होकर कहा, “ मैं पैसे, पहचान और ऊंची पहुंच और रसूख बनाने के लिए पत्रकार बनना चाहता हूं।” पूरे हाउस में ठहाका लगा।

पता नहीं उस छात्र ने वह बात गंभीरता में कही या मजाक में, पर यह महत्वपूर्ण बात थी। सभी न सही कुछ पत्रकार सेलिब्रिटी बन रहे हैं। पैसे, पद औऱ पहचान के लिहाज से वे टॉप पर आने लगे हैं। इसकी कीमत कौन देता है? पत्रकार महात्मा गांधी थे, तिलक भी। महावीर प्रसाद द्विवेदी, गणेश शंकर विद्यार्थी से लेकर राजेंद्र माथुर तक तमाम नाम हैं। उस छात्र का आशय जो भी रहा हो, पर उसने कहा, मैं ताकत चाहता हूँ जिससे लोग डरें।

जमानत पर अलग राय

सोमवार को कथित नार्को-आतंकवाद मामले में एक कश्मीरी व्यक्ति को जमानत देते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने शीर्ष न्यायालय में न्यायिक दृष्टिकोणों की विविधता को रेखांकित किया, जिसमें विभिन्न पीठों ने इस जटिल प्रश्न पर अलग-अलग दृष्टिकोण अपनाए कि क्या कड़े गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत जमानत प्रतिबंध संवैधानिक सुरक्षा उपायों पर हावी हो सकते हैं।

“यदि छोटी बेंचें बड़ी बेंच द्वारा निर्धारित सिद्धांत से सहमत नहीं हो पाती हैं, तो उचित और एकमात्र उपाय यह है कि मामले को माननीय मुख्य न्यायाधीश के समक्ष एक और बड़ी बेंच के विचारार्थ प्रस्तुत किया जाए। दो न्यायाधीशों की बेंच होने के नाते, हम केए नजीब मामले में तीन न्यायाधीशों के बेंच द्वारा निर्धारित सिद्धांत से बँधे हुए हैं। हम बस इतना ही कहते हैं,” न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने 102 पृष्ठों के अपने फैसले में कहा।

अदालत की चिंता उन मिसालों की श्रृंखला से उपजी है जिनकी उसने जांच की है कि क्या यूएपीए की धारा 43 (डी) (5) की कठोरता - जो जमानत देने पर प्रतिबंध लगाती है - "पिघल जाएगी" जहां लंबे समय तक कारावास और विलंबित परीक्षण संविधान के अनुच्छेद 21 के उल्लंघन की ओर ले जाता है।

भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना की अध्यक्षता वाली तीन-न्यायाधीशों की पीठ द्वारा 2021 में दिए गए फैसले ने इस मुद्दे पर पालन किए जाने वाले "सही कानून" को स्थापित किया। अदालत ने कहा था कि आपराधिक मुकदमे के अंत की कोई उम्मीद न होने पर लंबे समय से कारावास झेल रहे विचाराधीन अभियुक्त को जमानत पर रिहा किया जाना चाहिए।

अदालत ने तब यूएपीए मामलों में जमानत पर सबसे महत्वपूर्ण फैसले - एनआईए बनाम ज़हूर अहमद शाह वटाली मामले में 2019 के फैसले - की समीक्षा की थी। वटाली मामले में दो-न्यायाधीशों की पीठ ने फैसला सुनाया था कि यूएपीए के तहत जमानत याचिकाओं पर विचार करते समय अदालतों को राज्य के मामले को उसके गुण-दोषों की जांच किए बिना स्वीकार करना चाहिए।

इंडियन एक्सप्रेस एक्सप्लेंड में पढ़ें विस्तार से

 

बदलते वैश्विक-संदर्भों में भारत की चुनौतियाँ


वैश्विक-राजनीति में हमेशा ही कोई न कोई घटना ऐसी होती रहती है, जो किसी खास इलाके के लिए महत्त्वपूर्ण होती है. पिछले हफ्ते भारत में ‘ब्रिक्स’ विदेशमंत्रियों का सम्मेलन और प्रधानमंत्री का पाँच देशों की यात्रा पर निकलना भी ऐसी ही घटनाएँ हैं.

पिछले हफ्ते भारत ने नई दिल्ली में ‘ब्रिक्स’ के विदेशमंत्रियों की बैठक की मेजबानी की और अगले सप्ताह ‘क्वॉड’ के विदेश मंत्रियों मेजबानी और महीने के अंत में भारत-अफ़्रीका शिखर सम्मेलन का आयोजन भी करेगा. इनमें से हरेक आयोजन भारतीय डिप्लोमेसी के अलग-अलग पहलुओं पर रोशनी डालता है.

‘ब्रिक्स’ और ‘क्वॉड’ को अक्सर वैचारिक रूप से विरोधी संगठनों के रूप में चित्रित किया जाता है. ‘ब्रिक्स’ को पूर्वी देशों द्वारा पश्चिमी वर्चस्व को उखाड़ फेंकने के साधन के रूप में, जबकि ‘क्वॉड’ को चीन के विरुद्ध एक रणनीतिक सुरक्षा कवच के रूप में. इस प्रकार के वर्णन दोनों समूहों की अतिरंजना करते हैं.

‘ब्रिक्स’ में टकराव

‘ब्रिक्स’ में ऐसे देश शामिल हैं, जिनके बीच प्रत्यक्ष संघर्ष हैं. ‘क्वॉड’, अपने बढ़ते सहयोग के बावजूद, औपचारिक गठबंधन नहीं है. भारत ने तो ‘क्वॉड’ को सुनियोजित सुरक्षा सहयोग के मंच में बदलने का हमेशा विरोध किया है.

पिछले हफ्ते अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की चीन-यात्रा के पीछे भी हमारे लिए कुछ संकेत छिपे हैं. उधर ‘ब्रिक्स’ के सम्मेलन में ईरान और यूएई के मतभेद उभर कर आए, जिनके कारण संयुक्त बयान जारी नहीं हो सका.

अमेरिका और चीन की वार्ता के केंद्र में भारत भले ही नहीं था, पर दोनों के रिश्ते सुधरे, तो उसका, भारत-अमेरिका और भारत-चीन रिश्तों पर भी प्रभाव पड़ेगा. सवाल है कि क्या रिश्ते सुधरे?