Tuesday, June 23, 2026

पश्चिम एशिया में करवट-करवट, ‘कभी हाँ, कभी ना’!


पश्चिम एशिया में दीर्घकालीन शांति-स्थापना का सपना, बड़ी तेजी से कभी हाँ और कभी नामें तब्दील हो रहा है. उसकी विसंगतियाँ बार-बार दरवाज़े पर दस्तक दे रही हैं.

इसराइल की खुली बगावत ने समझौते के अंतर्विरोधों को उजागर किया है, जिसकी वजह से शुक्रवार 19 जून को, स्विट्ज़रलैंड में बातचीत नहीं हो पाई, जो दो दिन बाद रविवार को होने पर उम्मीदें पटरी पर वापस भी आ गई हैं.

समझौते के प्रारंभिक प्रारूप पर चूँकि बुधवार को ही राष्ट्रपति ट्रंप और पेज़ेश्कियान के हस्ताक्षर हो गए हैं, इसलिए अब सब कुछ केवल कयास भर नहीं है. फिर भी लेबनान पर ईरान और इसराइल के रुख के बरक्स यह काम टेढ़ी खीर जैसा लगता है.

ईरान ने कहा है, होर्मुज़ पर टोल वसूलेंगे, और ट्रंप ने कहा है, कत्तई नहीं. ट्रंप की धमकियाँ लगातार जारी हैं. ऐसी दर्जनों असहमतियाँ हैं, फिर भी लगता है कि समझौता-वार्ता जारी रहेगी.   

Saturday, June 20, 2026

रॉयल कॉलेज ऑफ़ सर्जन्स में महर्षि सुश्रुत की प्रतिमा

एडिनबर्ग के प्रतिष्ठित रॉयल कॉलेज ऑफ़ सर्जन्स (RCSEd) में महर्षि सुश्रुत की कांस्य प्रतिमा गत 19 जून को स्थापित की गई है। शल्य चिकित्सा (Surgery) और विशेष रूप से प्लास्टिक सर्जरी के जनक के रूप में उनके अतुलनीय योगदान को सम्मानित करने के लिए इसे कॉलेज के ऐतिहासिक प्रांगण में जगह दी गई है।

महर्षि सुश्रुत की इस प्रतिमा को कॉलेज के भीतर एक विशेष समारोह में स्थापित किया गया। प्राचीन भारतीय चिकित्सक सुश्रुत को ईसा पूर्व छठी शताब्दी (लगभग 2800 साल पहले) का ‘शल्य चिकित्सा का जनक’ (Father of Surgery) माना जाता है। आयुर्वेद के महान ग्रंथ 'सुश्रुत संहिता' में लगभग 300 प्रकार की शल्य चिकित्साओं और 125 से अधिक सर्जिकल उपकरणों का विस्तृत वर्णन है। कटी हुई नाक या कान को जोड़ने के लिए उनके द्वारा विकसित की गई स्किन-फ्लैप तकनीक (राइनोप्लास्टी) को आज भी आधुनिक चिकित्सा में 'इंडियन मैथड' कहा जाता है।

एडिनबर्ग के अलावा, ऑस्ट्रेलिया के रॉयल ऑस्ट्रेलियन कॉलेज ऑफ़ सर्जन्स (RACS) (मेलबर्न) में भी सुश्रुत की एक संगमरमर की प्रतिमा (1.2 मीटर ऊँची और 550 किलो वजनी) स्थापित है।


Friday, June 19, 2026

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पंजीकरण क्यों नहीं कराता?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ऐतिहासिक रूप से गैर-पंजीकृत स्वैच्छिक संगठन के रूप में कार्य करता रहा है। अक्सर उसके विरोधी सवाल उठाते हैं कि वह अपना पंजीकरण क्यों नहीं कराता। विवाद इसके कानूनी दर्जे पर केंद्रित है, जहाँ आलोचक वित्तीय पारदर्शिता और संवैधानिक अनुपालन की माँग करते हैं, वहीं आरएसएस अपने दृष्टिकोण का बचाव करते हुए इसे एक विकेंद्रीकृत, स्व-वित्तपोषित, व्यक्तिगत आंदोलन बताता है।

खासतौर से कांग्रेस के नेता प्रियांक खरगे ने संघ के सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन के पंजीकरण के बिना काम करने को लेकर सवाल उठाए हैं। उन्होंने उसके वित्तपोषण, कर अनुपालन और लेखा-परीक्षा की आवश्यकता का मुद्दा भी उठाया। 13 जून को लिखे एक पत्र में, खरगे ने कहा: ‘आरएसएस के इस पैमाने, प्रभाव और पहुँच के कारण ही इसे पारदर्शिता, जवाबदेही और संवैधानिक अनुपालन के उच्चतम मानकों पर खरा उतरना होगा।’

वस्तुतः भारत में ऐसा कोई सामान्य कानून नहीं है जो नागरिकों के प्रत्येक संगठन को पंजीकरण कराने के लिए बाध्य करता हो, लेकिन आलोचकों का तर्क है कि आरएसएस जैसे बड़े संगठन को जवाबदेही के उच्चतम मानकों का पालन करना चाहिए।

विरोधी दलों के नेताओं तथा अन्य आलोचकों का तर्क है कि पर्याप्त दान राशि संभालने वाले एक विशाल संगठन (जैसे गुरु दक्षिणा ) को अन्य गैर-लाभकारी संस्थाओं और राजनीतिक संस्थाओं की तरह अनिवार्य लेखा-परीक्षा और आयकर जांच के अधीन होना चाहिए।

पहाड़ के जलस्रोत

प्यास बुझाते हुए: उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में रानीधारा नौला पर स्थित एक आउटलेट से स्कूली बच्चे 
अपनी बोतलों में पानी भर रहे हैं।

रविवार 24 मई के हिंदू में मुझे कुमाऊँ के नौलों (जल मंदिरों) पर एक फीचर देखने को मिला, तो अचानक कुछ पुरानी खुशबुओं के साथ यादें ताज़ा हो उठीं। 1961 की गर्मियों में मेरा नौलों, धारों और स्रोतों से पहला परिचय हुआ था।

1961 की गर्मियों में मुझे पहली बार कुमाऊँ के पहाड़ देखने का मौका मिला। अपनी दादी के साथ पहले मैं रानीखेत आया। चाचा के घर कैंटूनमेंट में मॉल रोड पर बने के डबल डेकर घर में रहना एक नया अनुभव था। उस वक्त हम मथुरा में रहते थे। लंबे अरसे तक मैं बीमारियों से घिरा रहा, इसलिए मेरे बाबू ने सोचा पहाड़ जाकर कुछ समय रहने से सेहत में सुधार होगा।

मथुरा के कैंट स्टेशन से हम आगरा फोर्ट एक्सप्रेस पर बैठे, जिसने अगली सुबह हमें काठगोदाम पहुँचाया। वहाँ से उत्तर प्रदेश रोडवेज़ की बस से रानीखेत। रानीखेत का घर चीड़ के पेड़ों से घिरा हुआ था। हरेक सुबह घर के नीचे वाली सड़क से होकर सेना के जवान कवायद करते हुए परेड ग्राउंड की ओर जाते थे, आल्मा ग्राउंड। शाम को लौटते।

Thursday, June 18, 2026

अमेरिका और ईरान के 14-सूत्री समझौते का पाठ

अमेरिका और ईरान के बीच शुक्रवार को जिस समझौता ज्ञापन पर आधिकारिक रूप से हस्ताक्षर होने की उम्मीद है, उसमें 60 दिनों के विस्तारित युद्धविराम की शर्तें निर्धारित की जाएँगी, जिससे आगे की बातचीत के लिए समय मिल सकेगा।

14-सूत्री समझौते के पुराने पाठ के कुछ मीडिया आउटलेट्स में लीक होने के कुछ घंटों बाद, एक वरिष्ठ अमेरिकी प्रशासनिक अधिकारी ने ज्ञापन पढ़कर सुनाया, जिसमें होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह से और बिना किसी शुल्क के फिर से खोलने और ‘लेबनान सहित सभी मोर्चों पर सैन्य अभियानों की समाप्ति’ सुनिश्चित करने के उद्देश्य से की गई प्रतिबद्धताओं की रूपरेखा दी गई है।

समझौते में कहा गया है कि ईरान कभी नाभिकीय-अस्त्र विकसित नहीं करेगा। यह वादा ईरान ने पहले भी किया है। समझौते में यह भी कहा गया है कि अमेरिका और ईरान, अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के निरीक्षकों की देखरेख में, ईरान के मौजूदा संवर्धित पदार्थों के भंडार को ‘साइट पर ही कम से कम करने की पद्धति’ से नष्ट करेंगे।

इस समझौते से संकेत मिलता है कि तेहरान को ईरान के ‘पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास’ के लिए 300 अरब डॉलर के विकास कोष का लाभ मिल सकता है, बशर्ते वह अंतिम समझौते में निर्धारित प्रतिबद्धताओं को पूरा करे। वार्ता में ईरान पर लगे सभी अमेरिकी प्रतिबंधों को ‘सहमत समय-सारणी के अनुसार’ हटाने की योजना भी तय की जाएगी।

एक वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी ने इस बात पर ज़ोर दिया कि अमेरिकी टीम ईरान के साथ हुए समझौते और उससे अपेक्षित अपेक्षाओं को लेकर पूरी तरह से सचेत है, और ज़रूरत पड़ने पर राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप, सैन्य कार्रवाई फिर से शुरू करने के लिए तैयार हैं। अधिकारी ने कहा, ‘अगर ईरान वाकई में वह सब करेगा, जो वह कह रहा है...तो यह एक ज़बरदस्त समझौता होगा।’ उन्होंने आगे कहा, ‘आप कह सकते हैं कि समझौता ज्ञापन अंतिम है... लेकिन जब तक कोई पूर्ण और बाध्यकारी समझौता नहीं हो जाता, तब तक दोनों पक्षों में से कोई भी किसी भी समय इससे पीछे हट सकता है।’ 

14-सूत्री समझौता ज्ञापन इस प्रकार है:

1— संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान तथा वर्तमान युद्ध में उनके सहयोगी इस समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर करके लेबनान सहित सभी मोर्चों पर सैन्य अभियानों की तत्काल और स्थायी समाप्ति की घोषणा करते हैं, और वचन देते हैं कि वे अब से एक-दूसरे के विरुद्ध कोई युद्ध या सैन्य अभियान शुरू नहीं करेंगे, एक-दूसरे के विरुद्ध बल प्रयोग या धमकी से बचेंगे तथा लेबनान की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता सुनिश्चित करेंगे। अंतिम समझौता लेबनान सहित सभी मोर्चों पर युद्ध की स्थायी समाप्ति तथा इस अनुच्छेद के अन्य प्रावधानों की पुष्टि करेगा।