Thursday, July 9, 2026

हिंद-प्रशांत क्षेत्र के बदलते समीकरणों के बीच मोदी की इंडोनेशिया समेत तीन देशों की यात्रा


वैश्विक-राजनीति में आते बदलाव की रोशनी में पिछले हफ्ते जापानी प्रधानमंत्री की भारत-यात्रा और अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड-यात्रा के दूरगामी अर्थ हैं. यह यात्रा 11 जुलाई तक चलेगी.

पिछले साल से अमेरिकी-नीतियों में आए बदलाव के कारण एशिया के देशों ने अपनी भावी नीतियों पर पुनर्विचार शुरू कर दिया है. यह विचार केवल सामरिक-दृष्टि से ही नहीं है, बल्कि इसका काफी बड़ा हिस्सा आर्थिक-सामाजिक सहयोग से जुड़ा है.

पिछले हफ्ते जापानी प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची और पिछले अप्रैल में दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे-म्युंग की दिल्ली यात्राओं ने अमेरिका के दो प्रमुख एशियाई सहयोगियों, तोक्यो और सोल में अपने एशियाई संबंधों को व्यापक बनाने की तात्कालिकता को रेखांकित किया था.

प्रधानमंत्री की इंडोनेशिया-यात्रा और इस दौरान चर्चाओं और समझौतों से भारत और इंडोनेशिया का एक दूरदर्शी एजेंडा झलकता है, जिसमें समुद्री सहयोग, रक्षा उद्योग में साझेदारी, आर्थिक विस्तार, स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा पर जोर दिया गया है. इस यात्रा ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री पड़ोसी और रणनीतिक साझेदार के रूप में दोनों देशों के साझा दृष्टिकोण को और पुष्ट किया है.

सामरिक-महत्त्व

भारत का लगभग 40 फीसदी समुद्री व्यापार दुनिया के सबसे व्यस्त जलमार्गों में से एक, मलक्का जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है. और इस रणनीतिक मार्ग के प्रवेश द्वार पर स्थित देश इंडोनेशिया है.

भौगोलिक और भू-राजनीतिक दृष्टि से इंडोनेशिया की इसमें बेहद महत्त्वपूर्ण भूमिका है. हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के संगम पर स्थित, यह विश्व के सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक स्थानों में से एक है.

प्रधानमंत्री की यह यात्रा, 2018 के बाद उनकी इंडोनेशिया की पहली द्विपक्षीय यात्रा है. यह भारत के समुद्री हितों को सुरक्षित करने, आर्थिक साझेदारी का विस्तार करने और तेजी से प्रतिस्पर्धी होते हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपनी स्थिति को मजबूत करने से जुड़ी है.

उनकी 2018 की यात्रा के दौरान, दोनों देशों ने एक साझा समुद्री दृष्टिकोण का अनावरण किया था, और हालिया चर्चाओं का उद्देश्य उस ढाँचे को आगे बढ़ाना है. वार्ता में आपसी समुद्री क्षेत्र जागरूकता, संपर्क और दोनों देशों के तटरक्षक बलों के बीच सहयोग बढ़ाने जैसे विषय शामिल है.

Tuesday, July 7, 2026

भारत-पाक रिश्तों में ‘अमन’ की आशा-निराशा के मोड़


भारत-पाकिस्तान के रिश्तों को लेकर हाल के दो घटनाक्रमों ने ध्यान खींचा है. एक, दोनों देशों के 117 नागरिकों की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शहबाज़ शरीफ के नाम लिखी गई खुली चिट्ठी. दूसरे, दोनों देशों के कुछ लोगों के बीच कोलंबो में हुए संवाद की खबर, जिसे 'ट्रैक-2 वार्ता' बताया जा रहा है. 

इस संवाद को लेकर कई तरह के कयास हैं. वहीं भारत सरकार ने किसी वार्ता में शामिल होने की खबरों का जोरदार खंडन किया है. विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने कहा है कि इस तरह की चर्चा से सरकार का कोई लेना-देना नहीं है.

जिस बैठक को ट्रैक-2 कहा जा रहा है, वस्तुतः वह आईआईएस-एनईएसए ट्रैक 1.5 साउथ एशिया सिक्योरिटी डायलॉग की सालाना बैठक का 10वाँ संस्करण था. इससे पिछली बैठक पिछले साल जुलाई में हुई थी, ऑपरेशन सिंदूर के सिर्फ़ दो महीने बाद.

डिप्लोमैटिक भाषा में ट्रैक-1, ट्रैक-2 और ट्रैक-1.5 के अलग-अलग अर्थ होते हैं. ट्रैक-1 आधिकारिक वार्ता होती है, ट्रैक 1.5 में वरिष्ठ सरकारी अधिकारी और ग़ैर-सरकारी प्रतिभागी दोनों शामिल होते हैं और ट्रैक-2 प्रभावशाली, लेकिन ग़ैर-सरकारी व्यक्तियों के बीच होता है. पर तीनों 'बैकचैनल' डिप्लोमेसी नहीं हैं.

Tuesday, June 30, 2026

भारत-अमेरिका ट्रेड-डील के आसार और वैश्विक-विखंडन

इलस्ट्रेशन द प्रिंट से साभार

अमेरिका के विदेशमंत्री मार्को रूबियो ने कहा है कि राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप अगले साल के शुरू में भारत का दौरा कर सकते हैं. उन्होंने यह भी कहा कि दोनों देशों के बीच व्यापार-समझौता होने के करीब है.  

फ्रांस में हुए जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान 17 जून को ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच 16 महीनों में हुई पहली मुलाकात से रिश्तों में जमी बर्फ कुछ पिघलती नज़र आ रही है.

पिछले हफ्ते अमेरिकी व्यापार प्रमुख जैमीसन ग्रीअर की भारत यात्रा के बाद भी संकेत मिले हैं कि व्यापार-वार्ता के लिए बातचीत लगभग पूरी हो चुकी है, और बहुत जल्द ही समझौता हो जाएगा.

भारत उन कुछ देशों में शामिल है, जिनके साथ अमेरिका ने अभी तक व्यापार समझौता नहीं किया है. इसके पहले यूरोपीय संघ, जापान, दक्षिण कोरिया और कई आसियान देशों सहित लगभग एक दर्जन व्यापारिक साझेदारों के साथ वह समझौते कर चुका है.

Wednesday, June 24, 2026

युद्ध ने ईरान के गैर-वफादारों को भी मुख्यधारा से जोड़ा

ऐसे दृश्य भी नज़र आने लगे हैं। तेहरान में लोग सड़क पार कर रहे हैं। दो महिलाओं ने नकाब नहीं पहना है।

ईरान की सामाजिक-हलचल पर न्यूयॉर्क टाइम्स की यह रपट पढ़ें
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गुलाबी टॉप और एसिड-वॉश जींस पहने वीडियो में दिख रही युवती ईरान के धार्मिक शासकों की कट्टर समर्थक जैसी बिल्कुल नहीं लग रही थी, जो सिर से पैर तक काले कपड़ों में लिपटी महिलाओं की भीड़ के बीच खड़ी थी। यही तो असल मकसद था।

अपने घुंघराले बालों को कंधों पर बिखेरते हुए, महिला ने कैमरे के सामने कहा, “मैं न तो इस्लामी गणराज्य की समर्थक थी और न ही सर्वोच्च नेता की,” उन्होंने सरकार समर्थक फिल्म निर्माता हुसैन शमागदारी से कहा, जिन्होंने उनके बीच हुई बातचीत को ऑनलाइन प्रकाशित किया। उन्होंने बताया कि फरवरी में अमेरिका और इसराइल  के हमले के बाद, उन्होंने ईरान की कट्टरपंथी सेनाओं की प्रशंसा करना शुरू कर दी, क्योंकि वे दुनिया की दो सबसे शक्तिशाली सेनाओं से लड़ रही थीं।

“अगर क्रांतिकारी गार्ड और बासिजी लड़ाई नहीं लड़ रहे होते, तो हम आज भी यहाँ नहीं होते,” उन्होंने आँसू रोकते हुए कहा और उन्हीं बलों की प्रशंसा की जिन्होंने कभी नकाबपोश महिलाओं और प्रदर्शनकारियों पर अत्याचार किया था। “मैं युद्ध की शुरुआत को याद कर रही हूँ और इस्लामी गणराज्य के बारे में अपने विचारों पर पुनर्विचार कर रही हूँ।”

वीडियो में महिला की पहचान नहीं बताई गई है, और यह स्पष्ट नहीं है कि वह कौन है, यह दूर की बात है कि क्या उसने वास्तव में ईरान की निरंकुश सरकार के बारे में अपना विचार बदल लिया है। हालाँकि, वीडियो से जो बात स्पष्ट है, वह यह है कि ईरान की सरकार और उसके समर्थक एक नए प्रकार के राष्ट्रवाद को जन्म दे रहे हैं, ऐसा राष्ट्रवाद जो उन लोगों को भी गले लगाता है जिन्होंने कभी उसके खिलाफ विद्रोह किया था।

चीनी सुपरकंप्यूटर ने अमेरिका को पीछे छोड़ा

लाइनशाइन कंप्यूटर

चीन के एक सुपरकंप्यूटर ने अब दुनिया के सबसे शक्तिशाली सुपरकंप्यूटर के रूप में अमेरिकी कंप्यूटरों को पीछे छोड़ दिया है। 2017 के बाद ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी चीनी कंप्यूटर ने उस सूची में शीर्ष स्थान हासिल किया है जिसे कभी-कभी किसी देश की तकनीकी क्षमता का मापक माना जाता है।

शेनझेन स्थित लाइनशाइन कंप्यूटर ने मंगलवार को जारी टॉप 500 रैंकिंग में शीर्ष स्थान पर रहे अमेरिकी कंप्यूटर एल कैपिटन (El Capitan) को पीछे छोड़ दिया। लाइनशाइन ने पहली बार इस सूची में जगह बनाई है।

चीन का लाइनशाइन अन्य उच्च-प्रदर्शन वाले कंप्यूटरों से इस मायने में अलग है कि यह कृत्रिम मेधा के लिए आमतौर पर उपयोग किए जाने वाले ग्राफिक्स प्रोसेसर (जीपीयू) के बजाय पूरी तरह से पारंपरिक कंप्यूटर चिप्स (सीपीयू) पर चलता है। सूची के अनुसार, इसे चलाने के लिए लगभग 42.2 मेैगावाट बिजली की आवश्यकता होती है।