Saturday, July 25, 2026

अराजक और हास्यास्पद राजनीति और व्यवस्था बदलने के इरादे


जंतर-मंतर पर सोनल वांगचुक के अनशन, संसद-भवन मार्च और उसके बाद हुई हिंसा ने अंततः इस आंदोलन के राजनीतिक चेहरे पर पड़ी नकाब हटा दी है। बेशक इस आंदोलन के समर्थकों में बड़ी संख्या किशोरों और उनके अभिभावकों की है, जिनका प्रतियोगी परीक्षाओं से भरोसा टूट रहा है। पर इस आंदोलन को चलाने वाली ताकत कहीं और से काम कर रही है। इसमें देश के विरोधी दल भी शामिल हैं, और बुनियादी तौर पर आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता हैं, जिनके पुराने नाम की साख अब काफी कम हो चुकी है। किशोरों के प्रति सहानुभूति से ज्यादा इस आंदोलन के पीछे सत्ता-प्राप्ति की उनकी मनोकामना है। जनता के मसलों को लेकर आंदोलन चलाना उनका वैधानिक अधिकार है, ज्यादा बड़ा सवाल है कि संपूर्ण-व्यवस्था में उनकी भूमिका क्या है।

पहली नज़र में ऐसा लगता है कि सरकार करीब-करीब उसी रास्ते पर जा रही है, जिसपर 2013 में केंद्र सरकार गई थी। एनडीए सरकार जो समाधान पेश कर रही है, वह है कड़ी सजा। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, केंद्रीय मंत्रिमंडल ने शुक्रवार को एक मसौदा विधेयक को मंजूरी दे दी, जिसमें 10 साल तक की कैद, 10 करोड़ रुपये तक का जुर्माना, त्वरित अदालतों के लिए वैधानिक समर्थन और मामलों की जाँच और मुकदमे के लिए पाँच महीने की समय सीमा का प्रावधान है।

इसके कुछ घंटों बाद, इंस्टाग्राम पर एक पोस्ट में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार आधी रात को प्रसारित अपने वीडियो पर मिली प्रतिक्रियाओं और सकारात्मक सुझावों के लिए सभी को धन्यवाद दिया, जिसमें उन्होंने सरकार के फैसले की घोषणा की थी। उन्होंने कहा, ‘धन्यवाद दोस्तो। मुझे आधी रात को आप लोगों से बात करने का मौका मिला। मेरे वीडियो पर आपकी प्रतिक्रिया और आपके सकारात्मक सुझावों के लिए आप सभी का धन्यवाद। आपका प्यार ऐसे ही बरसता रहेगा; हमारे रिश्ते और भी मजबूत होते जाएगे। धन्यवाद, धन्यवाद दोस्तो

दोस्त क्या चाहते हैं?

अब 13 साल पीछे चलें। 2012 के निर्भया कांड के बाद भारी जनाक्रोश के बीच केंद्र सरकार ने क्रिमिनल लॉ (अमेंडमेंट) एक्ट, 2013 पास करा दिया। यह वह कानून है, जिसे जल्दबाज़ी में राजनीतिक व सामाजिक दबाव के तहत पारित गैंगरेप कानून के रूप में मुख्य रूप से याद किया जाता है। इस कानून में गैंगरेप के लिए न्यूनतम 20 साल से लेकर उम्रकैद (शेष प्राकृतिक जीवन) तक की अनिवार्य सजा का प्रावधान किया गया। अदालतों से विशेष कारणों का हवाला देकर न्यूनतम सजा से कम देने का अधिकार छीन लिया गया वगैरह।  

कानूनी विशेषज्ञों का मानना था कि संसद ने बिना किसी व्यापक व शांत-चित्त सार्वजनिक विमर्श के इसे अत्यधिक दबाव में पारित किया। कानून केवल सजा को कठोर बनाने पर केंद्रित था, जबकि पुलिस जाँच में सुधार, फॉरेंसिक क्षमता और त्वरित न्याय की प्रणाली पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। परिणाम सामने है, न बलात्कार कम हुए और न गैंगरेप। 

पेपर लीक की सजा बढ़ाने का लाभ क्या होगा, यह बाद में पता लगेगा, पर सवाल है कि कॉक्रोच-आंदोलन में शामिल लोग किस उम्मीद से आए हैं? मुझे नहीं लगता कि सामूहिक रूप से कोई एक उम्मीद है। इसके नेताओं के बारे में मुझे ज्यादा जानकारी नहीं है, पर राजनीतिक दलों के नेताओं के इरादे साफ हैं। वे विरोध करते हुए नज़र आना चाहते हैं। जनता के मन में भी गुस्सा है, वह उसे व्यक्त करना चाहती है। 

Wednesday, July 22, 2026

पाकिस्तान फिर से टूटने का खतरा

बलोच हमलों में महिला आत्मघातियों की संख्या बढ़ रही है। यह है सुमैया कलंदरानी बलोच जिसने 24 जून 2023 को तुरबत में एक सैन्य काफिले पर आत्मघाती हमला किया। हमले के पहले बलोच लिबरेशन आर्मी के ध्वज के सामने खड़े होकर उसने फोटो खिंचवाया।

अशांत बलोचिस्तान में मस्तुंग के पास गुरुवार 16 जुलाई को सुरक्षा काफिले पर हुए हमले में 45 पाकिस्तानी सैनिकों के मारे जाने की खबर है. बलोचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) ने इस हमले की जिम्मेदारी ली है, जो दो सप्ताह से भी कम समय में सुरक्षा-कर्मियों पर तीसरा बड़ा हमला है.

उपरोक्त जानकारी बलोचिस्तान पोस्ट ने दी है, हालाँकि पाकिस्तानी सेना ने हमले की पुष्टि की, लेकिन मरने वालों की संख्या नहीं बताई. बीएलए के प्र
वक्ता जियंद बलोच ने बताया कि मीडिया को बयान जारी करते समय भी बीएलए के लड़ाकों और पाकिस्तानी सेना के बीच लड़ाई जारी थी, और हताहतों की संख्या बढ़ सकती है.

आर्थिक-गिरावट और आंतरिक-संघर्षों के कारण पाकिस्तान, गंभीर अस्थिरता का सामना कर रहा है. बलोचिस्तान में विद्रोह और पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) में हो रहे प्रदर्शनों से देश की अखंडता को खतरा पैदा हो गया है. सवाल है कि क्या पाकिस्तान फिर से टूटेगा?

Sunday, July 19, 2026

मेक्सिको का पूरा नाम

उत्तरी और मध्य अमेरिका को जोड़ने वाले इस देश को मानचित्र पर आने के बाद से ही इसे किसी न किसी रूप में ‘मेक्सिको’ के नाम से जाना जाता रहा है। यह शब्द विश्व के पहले आधुनिक एटलस, थियोट्रम ऑर्बिस टेरारम के 1603 के अंग्रेजी संस्करण में भी मिलता है, लेकिन दो सदी से अधिक वर्षों के अपने इतिहास में, इस देश का आधिकारिक नाम कभी मेक्सिको नहीं रहा। इसके बजाय, अमेरिकी क्रांति से प्रेरित होकर, 1824 के देश के संविधान ने हिस्पानी भाषा में एस्टाडोस यूनिडोस मेक्सिकानोस, या संयुक्त मेक्सिकन राज्य (यूनाइटेड मेक्सिकन स्टेट्स) की स्थापना की। दो शताब्दियों के बाद भी, यही देश का आधिकारिक नाम है।

हाल के वर्षों में, देश के सरल नाम को अधिक प्रचलित और प्रचारित करने के प्रयास किए गए हैं। 2012 में, मैक्सिको के तत्कालीन राष्ट्रपति फेलिप काल्डेरोन ने देश के आधिकारिक नाम के रूप में ‘मेक्सिको’ को अपनाने का प्रस्ताव रखा। उस समय काल्डेरोन ने कहा था, ‘अब समय आ गया है कि हम मेक्सिकन अपनी मातृभूमि के नाम की सुंदरता और सरलता को पुनः प्राप्त करें: मेक्सिको, एक ऐसा नाम जिसका उपयोग हम गीत गाते समय करते हैं, एक ऐसा नाम जो हमें पूरी दुनिया में पहचान देता है और जिस पर हमें गर्व है।’ हालांकि, काल्डेरोन के इस प्रयास का कोई परिणाम नहीं निकला। वर्तमान में, राष्ट्रीय नाम, जो हर मेक्सिकन पासपोर्ट पर अंकित है, Mexico के साथ ‘Estados Unidos Mexicanos’ ही है।

इंटरेस्टिंग फैक्ट्स


गांधी के उपवास


देश में माँगें मनवाने के लिए अनशन करने की परंपरा है। आमतौर पर इसे गांधी की परंपरा माना जाता है। बेशक गांधी ने उपवास की परंपरा चलाई, पर इस बात की पड़ताल करें कि क्या गांधी जी ने भारत की आज़ादी के लिए अंग्रेजों पर दबाव बनाने के लिए क्या कोई अनशन किया था? बेशक उन्होंने लंबे स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया और कुछ उपवासों के मार्फत उन्होंने ब्रिटिश-सरकार के प्रति विरोध भी दर्ज कराया। उस दौरान कम से कम 18 उपवास रखे, जिन्हें वे आत्मशुद्धि और अहिंसक प्रतिरोध (सत्याग्रह) का सबसे शक्तिशाली हथियार मानते थे।

Wednesday, July 15, 2026

भारत की ‘एक्ट-ईस्ट पॉलिसी’ में नई ऊर्जा का संचार


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले शनिवार को ऑकलैंड से रवाना होते हुए इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के अपने तीन देशों के दौरे का समापन किया. यह एक ऐतिहासिक दौरा था जिसने इस इलाके के देशों के साथ भारत के संबंधों को दीर्घकालिक-साझेदारी के स्तर तक पहुँचाया.

इस यात्रा के महत्व और प्रभाव को समझने के लिए हमें इन तीन देशों के अलावा दक्षिण, दक्षिण पूर्व और सुदूर एशिया के बारे में भी विचार करना होगा.  यह दौरा हिंद-प्रशांत क्षेत्र के भू-राजनीतिक और आर्थिक भविष्य में भारत की उभरती आकांक्षाओं को उजागर करता है. इसलिए भी कि यह क्षेत्र वैश्विक-स्पर्धा का केंद्र बनता जा रहा है.

प्रधानमंत्री की यह यात्रा कोरिया और जापान के नेताओं के साथ उनकी हालिया मुलाकातों के बाद हुई हैं. ये सभी मुलाकातें भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी में नई ऊर्जा का संचार करती हैं और इस बात की मान्यता को दर्शाती हैं कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र की मध्यम शक्तियों के बीच गहरा सहयोग पारस्परिक आर्थिक और रणनीतिक लाभ संभव है.

तीन देशों की इस यात्रा ने व्यापार, प्रौद्योगिकी, सुरक्षा, शिक्षा, नवाचार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण परिणाम दिए, जिससे हिंद-प्रशांत क्षेत्र और उससे परे एक प्रमुख भागीदार के रूप में भारत की भूमिका मजबूत हुई.