Friday, January 16, 2026

दक्षिण में चुनावी बयार और भाषा की राजनीति


तमिलनाडु में इन दिनों दो फिल्में चर्चा का विषय हैं। एक है फिल्म अभिनेता से राजनेता बने विजय की जन नायकन और दूसरी शिवकार्तिकेयन की पराशक्ति।दक्षिण भारतीय फ़िल्मों के सुपरस्टार विजय ने करीब डेढ़ साल पहले ‘तमिषगा वेत्री कषगम’ (टीवीके) नाम से पार्टी बनाकर राजनीति में प्रवेश किया है। दूसरी तरफ पराशक्ति अपनी एंटी-हिंदी थीम के कारण चर्चित है। दोनों को फिल्म सेंसर बोर्ड की कुछ आपत्तियों का सामना करना पड़ा है। इस वजह से जन नायकन रिलीज़ नहीं हो पाई, जबकि पराशक्ति करीब बीस बदलाव करके रिलीज़ हो गई है।

तमिल राजनीति में दोनों फिल्मों के गहरे निहितार्थ हैं। हालाँकि विजय पेरियार के रास्ते पर चलने का दावा करते हैं और राज्य की द्रविड़ पार्टियों की भाषा नीति के पक्षधर हैं, पर वे सत्तारूढ़ डीएमके के सामने चुनौती के रूप में उभर कर आना चाहते हैं। उनकी फिल्म की थीम जनता के बीच से उभर कर आए ऐसी ही नेता पर केंद्रित है। इसमें जनता के नायक की अवधारणा, विजय के किरदार के इर्द-गिर्द घूमती है।  

तमिलनाडु की राजनीति में सिनेमा के कलाकारों का बोलबाला पचास के दशक से ही शुरू हो गया था। वहाँ की ‘कटआउट’ संस्कृति में ‘आसमानी कद’ के राजनेता सिनेमा के पर्दे से आए। तमिलनाडु शायद अकेला ऐसा राज्य है, जहाँ लगातार पाँच मुख्यमंत्री सिनेमा जगत से आए। केवल कलाकारों की बात ही नहीं है, वहाँ की फिल्मों की स्क्रिप्ट में द्रविड़ विचारधारा को डालने का काम भी किया। 1952 की फिल्म ‘पराशक्ति’ ने द्रविड़ राजनीतिक संदेश जनता तक पहुँचाया था। इस फिल्म का स्क्रीनप्ले और संवाद के करुणानिधि ने लिखे थे, जो बाद में राज्य के मुख्यमंत्री बने।

Thursday, January 15, 2026

ईरान में क्या सत्ता-परिवर्तन होगा, क्रूर दमन का सामना कर पाएगी जनता?


ईरान एकबार फिर से बड़े बदलाव के मुहाने पर खड़ा है। वहाँ चल रहे आंदोलन और हिंसा के बाद स्थितियाँ चाहे, जिस दिशा में जाएँ, राज-व्यवस्था वैसी ही नहीं रहेगी, जैसी अभी तक चल रही थी। 1979 में, ईरान के लोग तीन बड़े  आदर्शों को लेकर खड़े हुए थे: आज़ाद राज व्यवस्था, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, और सामाजिक न्याय। उस क्रांति को फ्रांस की राज्यक्रांति और रूस की बोल्शेविक क्रांति और चीन की कम्युनिस्ट क्रांति के बाद विश्व की सबसे महान क्रांतियों में गिना जाता है।

ईरान में एक तरफ जनता का जबर्दस्त विरोध-प्रदर्शन चल रहा है, वहीं सरकार ने भयानक दमन शुरू कर दिया है, जिसमें तीन हजार से ज्यादा लोगों के मरने की खबरें आ रही हैं। यह संख्या दिनों-दिन बढ़ती जा रही है, क्योंकि सरकार ने सैनिकों को खुला आदेश दिया है कि वे देखते ही गोली मारें। इतना ही नहीं अब गिरफ्तार किए गए आंदोलनकारियों को फाँसी देने की बातें भी कही जा रही हैं, जिसे लेकर ट्रंप ने कहा है कि फाँसी दी गई, तो हम हमला कर देंगे।

सितंबर 2022 में महिलाओं के लिए देश के ड्रेस कोड का उल्लंघन करने के आरोप में गिरफ्तार ईरानी-कुर्द महिला महसा अमिनी की हिरासत में मौत के बाद बड़े पैमाने पर प्रदर्शनों के दमन के लिए इसी किस्म की सख्ती का सहारा लिया गया था। पर क्या अब वह सख्ती काम करेगी। खबरें हैं कि लोगों के मन से अब डर निकल गया है।

प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि सरकारी बलों को घरों की छतों पर तैनात किया गया है, जहाँ से वे निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर ऑटोमेटिक हथियारों से अंधाधुंध गोलीबारी कर रहे हैं। जो लोग अब भी ईरान की धार्मिक सरकार का समर्थन करते हैं और जो लोग सड़कों पर इसके पतन का आह्वान कर रहे हैं, वे मानते हैं कि ऐसी क्रूरता उन्होंने पहले कभी नहीं देखी।

सरकार ने पूरे देश में पूरी तरह से संचार प्रतिबंध लगा दिया है। ईरानी अधिकारियों ने इंटरनेट, अंतरराष्ट्रीय फ़ोन लाइनें और बीच-बीच में घरेलू मोबाइल फ़ोन कनेक्शन भी बंद कर दिए हैं। देश से बाहर आ रहे वीडियो और कभी-कभार सैटेलाइट इंटरनेट कनेक्शन पाने वाले कुछ ईरानियों के संदेश रक्तपात की विनाशकारी तस्वीर पेश कर रहे हैं।

Tuesday, January 13, 2026

अनायास नहीं है ट्रंप की ग्रीनलैंड में दिलचस्पी


वेनेजुएला में सैनिक हस्तक्षेप के बाद डॉनल्ड ट्रंप ने कहा है कि अपने देश के हित में हमें नेटो सहयोगी डेनमार्क से ग्रीनलैंड को भी हासिल करना होगा. उनके इस सुझाव या धमकी से यूरोपीय नेता नाराज़ और किंचित भयभीत भी हैं.

सवाल है कि वे इसे कैसे हासिल करेंगे? समझाकर, खरीद कर या फौजी कार्रवाई की धमकी देकर? यूरोप के देशों को यूक्रेन की विश्वसनीय सुरक्षा के लिए अमेरिका की ज़रूरत है, पर ग्रीनलैंड की संप्रभुता का उल्लंघन भी उन्हें स्वीकार नहीं.

इस पृष्ठभूमि में, यूरोपीय नेताओं ने मंगलवार 6 जनवरी को पेरिस में वरिष्ठ अमेरिकी वार्ताकारों के साथ मुलाकात की, जिसमें यूक्रेन में शांति समझौते से जुड़े मसलों पर विचार किया.

यूरोपीय चिंताएँ

इससे एक दिन पहले इन्हीं देशों में से कुछ ने एक संयुक्त बयान जारी किया था, जिसमें डेनमार्क के साथ एकजुटता व्यक्त की गई थी. हालाँकि उस बयान में वाशिंगटन की स्पष्ट आलोचना नहीं थी, पर कुछ चिंताएँ प्रकट हो रही थीं.

यूरोप और अमेरिका की एकता के बाहरी दिखावे के बावजूद ऐसा लग रहा है कि साम्राज्यवादी युग में ट्रंप की अचानक वापसी को लेकर चिंताएँ हैं. वेनेजुएला में अमेरिकी हस्तक्षेप को अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन मानने वाले यूरोप के लोग अमेरिकी राष्ट्रपति की सैन्य कार्रवाई से भयभीत हैं.

Wednesday, January 7, 2026

वेनेजुएला पर हमला और ‘ग्लोबल-ऑर्डर’ में दरारें


अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप एक तरफ शांति का नोबेल पुरस्कार हासिल करना चाहते हैं, वहीं वेनेजुएला पर हमला करके और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो का अपहरण करके उन्होंने विकासशील देशों में बेचैनी पैदा कर दी है.

अमेरिका के इस कदम ने भारत के सामने भी दुविधा की स्थिति पैदा की है. नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय-व्यवस्था को लेकर भारत का एक सैद्धांतिक स्टैंड है, और ऐसे वक्त में जब टैरिफ को लेकर अमेरिका के साथ उसकी तनातनी चल रही है, वेनेजुएला-प्रसंग दुविधा को बढ़ाएगा.

खासतौर से इसलिए भी कि ग्लोबल साउथ के अनेक देश इस मामले में भारत की ओर देखेंगे. पिछले साल से ही दुनिया के पुराने ऑर्डरमें दरार पड़ने लगी हैं, जो इस साल और गहरी हो जाएगी.

भारतीय विदेश मंत्रालय की ओर से जारी बयान में कहा गया, वेनेजुएला में हालिया घटनाक्रम गहरी चिंता का विषय है. हम वहाँ की बदलती स्थिति पर क़रीबी नज़र रखे हुए हैं…हम सभी संबंधित पक्षों से अपील करते हैं कि मुद्दों का समाधान बातचीत के ज़रिए और शांतिपूर्ण तरीक़े से किया जाए.

डॉनरो सिद्धांत

वेनेजुएला में अमेरिकी हस्तक्षेप से कोई हैरत नहीं होनी चाहिए, क्योंकि इसके आसार पिछले एक साल से भी ज्यादा समय से थे. वेनेजुएला के बाद अब वे कोलंबिया को भी धमकी दे रहे हैं.

नवंबर में ट्रंप ने अपनी रक्षा-नीति का जो दस्तावेज़ जारी किया था, उसमें कहा गया था, पहला मुद्दा हमारा अपना क्षेत्र है—पश्चिमी गोलार्ध. यह विचार, ‘मुनरो सिद्धांत का ट्रंप-निहितार्थ (कॉरोलरी)’ है. इसे कुछ लोग डॉनरो सिद्धांत कह रहे हैं.

मुनरो सिद्धांत उन्नीसवीं सदी में अमेरिकी विदेश नीति थी. उसे 1823 में राष्ट्रपति जेम्स मुनरो ने प्रतिपादित किया था. उसका मुख्य उद्देश्य पश्चिमी गोलार्ध, यानी पूरे अमेरिका महाद्वीप में यूरोपीय देशों के किसी भी नए उपनिवेश-निर्माण को रोकना था.

बदले में, अमेरिका ने यूरोपीय देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने का वादा किया था. यह सिद्धांत अमेरिका को लैटिन अमेरिका का संरक्षक या दारोगा बनाता था.

Sunday, January 4, 2026

2026 का भारतीय मन, नए संकल्प-नई ऊर्जा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिसंबर के आखिरी हफ्ते में प्रसारित अपने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में कहा था कि 2026 का साल विकसित भारत के लक्ष्य की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा। कैसा होगा यह मील का पत्थर? पिछल साल से विश्व-व्यवस्था में बुनियादी बदलावों की शुरुआत हुई ही है। बदलाव इस साल भी जारी रहेंगे, पर भारत के लिए यह साल कैसा होगा? भारत माने यहाँ का जन-गण-मन। भारत के लोग और उनका मन। क्या विश्व की प्राचीनतम सभ्यता, आधुनिकतम सपनों के साथ भविष्य की उड़ान भरने को तैयार है?

ज्योतिषियों की भाषा में दुनिया इस वक्त एक महत्वपूर्ण खगोलीय घटना के बीच से गुज़र रही है। वह है, नेपच्यून का मेष राशि में प्रवेश। नेपच्यून ने 30 मार्च, 2025 को एक नए 14 वर्षीय अध्याय के साथ-साथ एक नए राशिचक्र की शुरुआत कर दी है। 165 वर्षों के बाद उसने मेष राशि में प्रवेश किया है, जो 2039 तक रहेगा। इससे व्यक्तिगत पहचान, नए आदर्शों और आध्यात्मिक खोजों का दौर शुरू हुआ है, जहाँ लोग अपने सपनों को साकार करने और साहसिक कदम उठाने के लिए प्रेरित होंगे। यह ऐसा दौर है, जब साहस हमें पुकारता है। हमारी आकांक्षाएं, महत्वाकांक्षाएं, दृष्टियां, इच्छाएं और रचनात्मकता भीतर से जागती है। फलित ज्योतिष का संदर्भ यहाँ केवल प्रतीक रूप में है, उसका व्यावहारिक अर्थ कुछ भी नहीं है।

हमारे सामूहिक संकल्प

साठ के दशक में हिंदी के लोकप्रिय व्यंग्य लेखक काका हाथरसी ने एक कविता लिखी थी, जन-गण मन के देवता, अब तो आँखें खोल/ महँगाई से हो गया, जीवन डावाँडोल/ जीवन डावाँडोल, ख़बर लो शीघ्र कृपालू/ कलाकंद के भाव बिक रहे बैंगन-आलू। यह कविता हमें अपने आसपास से जोड़ती है और आप इसे हरेक दौर में पसंद कर सकते हैं। यह जनता के की मन की बात है। इसका मतलब यह भी नहीं कि हम निराशावादी हैं, बल्कि यह है कि समाधान चाहते हैं।