न्यूयॉर्क टाइम्स के रिपोर्टर ग्रेग जैफ ने अपने एक लेख में लिखा है कि अमेरिका का सबसे लंबा युद्ध ठीक पाँच साल पहले अफगानिस्तान में समाप्त हुआ था। आज यह ईरान में अंतहीन युद्ध से बचने की कोशिश कर रहे नीति निर्माताओं के लिए सबक पेश करता है। ग्रेग जैफ ने 15 साल तक अफगानिस्तान की रिपोर्टिंग की थी। उन्होंने इस लेख में अमेरिका की नीतियों की बखिया उधेड़ी है। इस लेख का हिंदी में अनुवाद हैं, पेश कर रहा हूँ। आप चाहें तो न्यूयॉर्क टाइम्स की वैबसाइट पर जाकर भी इसे मूल रूप में पढ़ सकते हैं। उसका लिंक नीचे दिया है।
अफगानिस्तान युद्ध के दौरान अधिकांश समय, अमेरिका के लिए जीत से भी ज्यादा मुश्किल काम युद्ध खत्म करना था।
देश का सबसे लंबा युद्ध पाँच साल पहले अराजकता और हार के साथ समाप्त हुआ।
तालिबान विद्रोहियों से बचने के लिए बेताब लाखों अफगान नागरिक काबुल हवाई अड्डे पर
उमड़ पड़े। वहाँ एक आत्मघाती बम के हमले में तेरह अमेरिकी सैनिक मारे गए।
तब से, तीन राष्ट्रपतियों के वे भय
निराधार साबित हुए हैं, जिन्हें लेकर उन्हें लगता था कि लड़ाई खत्म करना खतरे से
खाली नहीं है। अफगानिस्तान न तो आतंकवाद का अड्डा बना, और न अमेरिका पर हमले हुए।
आज अमेरिकी सेना ईरान में एक नए युद्ध में उलझी हुई है। एक बार फिर, फौजी जीत की संभावनाएं धूमिल हैं। यहाँ तक कि
राष्ट्रपति ट्रंप ने भी युद्ध खत्म करने की इच्छा जताई थी, लेकिन बाद में अपना रुख बदलते हुए युद्ध में बने
रहने की वकालत की।
उन्होंने ओवल ऑफिस में अपने भाषण में कहा, ‘हमें वहां रहने की जरूरत नहीं है। हमें उनके तेल की जरूरत नहीं है। हमें उनकी
किसी भी चीज की जरूरत नहीं है। लेकिन हम अपने सहयोगियों की मदद के लिए वहां मौजूद
हैं।’
अफगानिस्तान में लंबे समय से चल रहे युद्ध ने ईरान के भविष्य पर विचार कर रहे जनरलों और नीति निर्माताओं के सामने कई कठिन प्रश्न खड़े कर दिए हैं: अफगानिस्तान से पीछे हटना इतना कठिन क्यों था? वहां हार स्वीकार करने के लिए किया गया लंबा संघर्ष ईरान में ट्रंप प्रशासन की दुविधा के बारे में क्या बताता है?
