सीजेपी का आंदोलन सफल हुआ या विफल, इसे लेकर कई तरह के विचार और निष्कर्ष हैं। इसका भविष्य क्या है, यह भी इन निष्कर्षों का हिस्सा है। मुझे लगता है कि यह समूह अपनी गतिविधियों को ठीक से तय नहीं कर पाया है। इसके नेता खुद को प्रेशर ग्रुप बता रहे हैं। प्रेशर ग्रुप के कार्यों का दायरा फोकस्ड होता है। बिखरा हुआ नहीं। मसलन ये युवाओं की मनोकामना लेकर आगे आए हैं, तो वह मनोकामना क्या है?
हालाँकि बड़े
निष्कर्ष अभी नहीं निकाले जा सकते हैं, पर ढाई महीने की गतिविधियों से कुछ अनुमान
लगाए जा सकते हैं। इसे शुरुआती दो मौकों पर अनायास मिली सफलताएँ इनकी उपलब्धियाँ
हैं और उनमें ही इनके पराभव के सूत्र छिपे हैं। पहली सफलता थी, उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की
टिप्पणी आते ही सोशल मीडिया में इस समूह के जन्म की घोषणा का भारी स्वागत होना।
दूसरी सफलता थी, 20 जुलाई का
आंदोलन। सोशल मीडिया की सफलता के पीछे बॉट्स का हाथ हो सकता है, पर 20 जुलाई को समस्या वास्तविक थी और उससे प्रभावित
किशोरों और उनके अभिभावकों की हताशा भी नकली नहीं थी।
उस आंदोलन के बाद
इस समूह ने कुछ जगहों पर स्कूलों की दुर्दशा को उजागर करना शुरू किया। मेरी समझ से
वह काम 20 जुलाई के कार्यक्रम से ज्यादा महत्त्वपूर्ण मुद्दे को लेकर था। इसके
करता-धरता यदि इस कार्यक्रम को गैर-राजनीतिक बनाते तो और अच्छा होता। यानी कि वे
राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार जैसे भाजपा शासित राज्यों के साथ पंजाब और कर्नाटक जैसे
गैर-भाजपा शासित राज्यों के स्कूलों की दशा को भी सामने लाते, तो उनकी साख बनती। बहरहाल
अभी कुछ भी कहना जल्दबाज़ी होगी।
इस आंदोलन के
संचालकों की मंशा क्या है, इनका कोई संगठन है भी या नहीं और इनके संसाधन कहा से आ
रहे हैं? ऐसे कुछ सवाल
जरूर पूछे जाएँगे। यदि पारदर्शिता और ईमानदारी रही, तो देश की जनता इन्हें
सिर-आँखों पर बैठा सकती है और जवाब साफ नहीं मिले, तो इन्हें भी इतिहास के
कूड़ेदान में भेजा जा सकता है। ऐसा नहीं है कि भारत में आंदोलन से बदलाव नहीं होता
या होगा, पर आंदोलन की साख सबसे महत्त्वपूर्ण है। साख बनाने के लिए इन्हें खुद को सत्ता
की राजनीति से अलग रखना होगा। और सत्ता की राजनीति करनी है, तो खुलकर वही करें। सवाल
है कि क्या यह आम आदमी पार्टी के समांतर कोई नई पार्टी बनाना चाहते हैं? ऐसा है, तो जल्द से जल्द इस आशय की घोषणा करें।
