भारत और अमेरिका के व्यापारिक-रिश्तों को लेकर लंबे समय से चले आ रहे असमंजस के बाद अब यह साफ हो रहा है कि यह डील जल्द होने की उम्मीद नहीं है.
इसका मतलब यह है
कि अमेरिका को भारत की चिंताओं का समाधान पहले करना होगा. ऐसा संभव नहीं है कि
अमेरिका जब चाहे तब टैरिफ बढ़ाता रहे.
इसके साथ ऐसे
संकेत भी मिल रहे हैं कि अमेरिका और चीन दोनों के साथ भारत के रिश्तों में
बुनियादी मोड़ आने वाला है. सबसे बड़ी बात यह है कि रूस के साथ अपने ऐतिहासिक
रिश्तों की बदौलत यूक्रेन युद्ध को रुकवाने में भारत बड़ी भूमिका निभाने के लिए
तैयार हो रहा है.
भारत-अमेरिका
ट्रेड डील को लेकर अमेरिका के व्यापार प्रतिनिधि जैमीसन ग्रीअर ने कहा है कि बात
जारी है, पर डील जल्द होने की आशा नहीं है.
यह बात
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के बीच गत 27 सितंबर को हुई
फोन-वार्ता के बाद ज्यादा स्पष्ट हुई है.
अमेरिकी
कोशिशें
उधर विदेशमंत्री
एस जयशंकर ने ‘अकेली महाशक्ति’ बनने की अमेरिकी कोशिशों को लेकर कहा है कि वाशिंगटन की आमूल-चूल
पुनर्व्यवस्था और चीन का उदय वैश्विक परिदृश्य को नया आकार दे रहा है. हमें
तदनुरूप अपनी रणनीतियों को परिभाषित करना होगा.
62वें म्यूनिख
सुरक्षा सम्मेलन में उन्होंने कहा कि विश्व-व्यवस्था को अमेरिका-चीन की तीव्र
प्रतिस्पर्धा, उभरती और मध्यम
शक्तियों के बीच बढ़ती आत्मनिर्भरता और साझेदारियों में विविधता लाने तथा जोखिमों
को कम करने के प्रयासों द्वारा परिभाषित किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि वैश्विक-प्रतिस्पर्धा दो शक्तियों से परे तक फैली हुई है और इसने देशों को अपने पास मौजूद हर तरह के प्रभाव का हथियार के रूप में इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित किया है.
