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Wednesday, January 21, 2026

अमेरिका ने ईरान पर हमले से हाथ क्यों खींचे?

ईरान के सेनाधिकारी

ईरान में करीब तीन हफ्ते से ज्यादा समय तक चला झंझावात पिछले हफ्ते  धीमा पड़ गया. इसके पीछे कई तरह के कयास हैं. यह किसी नए तूफान से पहले का ठहराव है या स्थायी शांति की तैयारी. या फिर साबित यह हुआ कि ट्रंप के बादल गरजते ज्यादा है, बरसते कम है.  

मोटे तौर पर लगता है कि दोनों पक्षों ने हाथ खींचे हैं. खबरें हैं कि ईरानी शासन ने बड़े पैमाने पर दमन करके प्रदर्शनकारियों के हौसले पस्त कर दिए हैं. देश में कई सौ लोगों को सामूहिक रूप से फाँसी देने की तैयारी थी.

फाँसियाँ होतीं, तो टकराव बढ़ जाता, जिससे घबराकर ईरान ने हाथ खींच लिए. ट्रंप ने कहा था, फाँसियाँ हुईं तो अमेरिका हमला बोलेगा. इस बात की पुष्टि करते हुए वॉशिंगटन पोस्ट ने वाइट हाउस के एक अधिकारी के हवाले से रिपोर्ट छापी है, कि ईरान सरकार के एक संदेश के बाद 'राष्ट्रपति ट्रंप ने हमले के फ़ैसले को रद्द कर दिया.'

अख़बार के मुताबिक़, ईरानी विदेशमंत्री अब्बास अराग़ची की ओर से ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ़ को भेजे गए संदेश ने माहौल को शांत किया और संकट को टाला. संदेश में कहा गया था कि ईरान सरकार का प्रदर्शनकारियों को फाँसी देने का कोई इरादा नहीं है.

अख़बार ने राजनयिक के हवाले से कहा है कि सऊदी अरब, क़तर, ओमान, मिस्र और यूएई जैसे आसपास के कुछ देशों ने वाइट हाउस से अनुरोध किया कि ईरान पर हमला नहीं किया जाए. जेरूसलम पोस्ट की खबर के अनुसार इसराइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने भी ट्रंप से कहा कि जल्दबाज़ी में हमला न करें. 

सेना तैयार नहीं थी

दूसरी तरफ ऐसी खबरें भी आईं कि गुरुवार की शाम होते-होते स्पष्ट होने लगा था कि पारा ठंडा हो रहा है. अमेरिका ने क़तर में अपने अल-उदैद एयर बेस पर सुरक्षा अलर्ट का स्तर घटा दिया.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने एक सूत्र के हवाले से खबर दी कि बुधवार को जिन अमेरिकी लड़ाकू विमानों को इस बेस से हटा लिया गया था, वे अब धीरे-धीरे वापस लौट रहे हैं.

लंदन के अख़बार 'द टेलीग्राफ़' ने ख़बर दी कि अमेरिकी सेना हमले के लिए तैयार नहीं थी. इस ख़बर के मुताबिक़ ट्रंप ने राष्ट्रीय सुरक्षा टीम को निर्देश दिया कि वे कार्रवाई तभी करें, जब निर्णायक प्रहार की गारंटी दे सकें.

अधिकारियों ने कहा कि वे ऐसी गारंटी नहीं दे सकते और यह भी कहा कि फौजी कार्रवाई करेंगे, तो बड़ी लड़ाई शुरू हो सकती है, जो हफ़्तों तक चल सकती है.

अखबार ने एक और खबर में लिखा, ट्रंप का कोई भरोसा नहीं. उन्होंने मंगलवार को प्रदर्शनकारियों से कहा, मदद रास्ते में है. उसके 24 घंटे बाद वह यह कहते हुए पीछे हट गए कि ईरान सरकार अब अपने विरोधियों को मार नहीं रही है, और गिरफ्तार लोगों को फाँसी नहीं दी जाएगी.

बहरहाल अमेरिका ने अपने विमानवाहक पोत यूएसएस अब्राहम लिंकन के कैरियर स्ट्राइक ग्रुप को इस तरफ भेजा है, जिससे लगता है कि वह दबाव बनाकर रखेगा.   

ट्रंप पर आरोप

शनिवार को ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्ला अली खामनेई ने माना कि विरोध प्रदर्शनों के दौरान कई हजार लोग मारे गए हैं. अभी तक ईरान सरकार कह रही थी कि आंदोलन की अफवाहें हैं, वास्तविकता कम. अब मौतों को लेकर आधिकारिक स्वीकृति उसकी भयावहता को बताती है.

आयतुल्ला खामनेई ने देश में हताहतों, विनाश और उथल-पुथल के लिए डॉनल्ड ट्रंप को सीधे दोषी ठहराया. उन्होंने कहा, ईरानी राष्ट्र को हुई क्षति और बदनामी के लिए हम उन्हें अपराधी मानते हैं.

उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, इस उत्पात में अमेरिकी राष्ट्रपति व्यक्तिगत रूप से शामिल थे. उन्होंने प्रदर्शनकारियों को संदेश भेजा कि हम आपको फौजी मदद देंगे. अमेरिकी राष्ट्रपति खुद इस देशद्रोह में शामिल हैं. यह आपराधिक कृत्य हैं.

खामनेई के इस आरोप के जवाब में ट्रंप ने फिर कहा कि ईरान को आयतुल्ला के लंबे शासन को समाप्त करते हुए नए नेतृत्व की तलाश करनी चाहिए. वे देश के विनाश और जनता के विरुद्ध ऐसी हिंसा के प्रयोग के दोषी हैं, जैसी पहले कभी नहीं हुई.

अमेरिका ईरान पर सैनिक कार्रवाई करेगा या नहीं, इसके बारे में पूछे जाने पर ट्रंप ने कहा, फिलहाल उन्होंने अच्छा काम यह किया है कि 800 से अधिक लोगों को फाँसी देने का फैसला रोक दिया है.

कनेक्टिविटी बहाल

अब खबरें आ रही हैं कि ईरान ने आंशिक रूप से इंटरनेट कनेक्टिविटी बहाल कर दी. अर्ध-सरकारी समाचार एजेंसी मेहर ने कहा कि कुछ उपयोगकर्ता ऑनलाइन वापस आ गए हैं, एसएमएस सेवाएँ फिर से शुरू हो गई हैं.

इंटरनेट निगरानी समूह नेटब्लॉक्स ने कहा कि 200 घंटे से अधिक समय तक लगभग पूरी तरह बंद रहने के बाद कनेक्टिविटी कुछ बेहतर हुई है, लेकिन यह सामान्य के लगभग दो प्रतिशत पर है.

ईरानी विदेशमंत्री अब्बास अराग़ची ने कहा है कि विदेश से से निर्देशित हो रहे आतंकवादी अभियानों को रोकने के मक़सद से इंटरनेट को बंद किया गया है, पर उन्होंने या सरकार ने यह नहीं बताया है कि इंटरनेट सेवाएं पूरी तरह कब वापस आएँगी.

मीडिया रिपोर्टों से ऐसा संकेत भी मिला है कि ईरानी अधिकारी इसे स्थायी रूप से प्रतिबंधित करने या चीन की तरह नियंत्रित करने की योजना बना रहे हैं.

ईरान इस समय दुनिया की सबसे खराब मुद्रास्फीति का सामना कर रहा है, जो 50 प्रतिशत से अधिक और खाद्य सामग्री के मामले में 70 प्रतिशत है. उसकी मुद्रा डॉलर के मुकाबले 80 प्रतिशत से अधिक गिर गई है.

आंदोलन का क्या होगा?

सवाल है कि क्या ईरान के भीतर आंदोलन चलेगा या खत्म हो जाएगा? अमेरिका के तमाम पर्यवेक्षकों का कहना है कि अमेरिका को सीधे हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, बल्कि आंदोलन के प्रभाव को देखना चाहिए. ट्रंप प्रशासन को यह नहीं मान लेना चाहिए कि ईरान सरकार इस विस्फोट को दबा लेगी.

आंदोलन और हिंसा के बाद स्थितियाँ चाहे, जिस दिशा में जाएँ, राज-व्यवस्था वैसी ही नहीं रहेगी, जैसी अभी तक चल रही थी. इसके पहले 1953 और 1979 में ईरान ने दो बड़े बदलाव देखे

1979 के पिछले बदलाव में ईरान के लोग तीन बड़े आदर्शों को लेकर खड़े हुए थे: आज़ाद राज व्यवस्था, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, और सामाजिक न्याय. उस क्रांति को फ्रांस की राज्यक्रांति, रूस की बोल्शेविक क्रांति और चीन की कम्युनिस्ट क्रांति के बाद विश्व की सबसे महान क्रांतियों में गिना जाता है.

रसूख में कमी

पिछले कुछ वर्षों से देश में सरकारी रसूख कम हुआ है. विरोध के स्वर तेज हुए हैं. सितंबर 2022 में महिलाओं के लिए देश के ड्रेस कोड का उल्लंघन करने के आरोप में गिरफ्तार ईरानी-कुर्द महिला महसा अमिनी की हिरासत में मौत के बाद बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए. उनके दमन के लिए सरकार ने सख्ती का सहारा लिया था.

क्या अब वही सख्ती काम करेगी? खबरें हैं कि लोगों के मन से अब डर निकल गया है. पर क्या वे निर्णायक जीत हासिल कर पाएँगे? या सरकारी दमन के भय से पूरी तरह दब जाएँगे? सरकार के समर्थन में भी रैलियाँ हुई हैं.

ज्यादा बड़ा सवाल है कि क्या सत्ता परिवर्तन होगा? मान लिया अमेरिकी सैनिक हस्तक्षेप से परिवर्तन हो भी जाए, तो उसके बाद क्या होगा? अमेरिका दूध का जला है. क्या गारंटी है कि ईरान में भी वैसी ही अराजकता पैदा नहीं होगी, जैसी इराक, लीबिया और अफगानिस्तान में हो गई?

सरकारी कामयाबी?

दूसरी तरफ क्रूरता के सहारे विरोध को दबाने में सरकार कामयाब हो भी जाए, तब भी उसके पास आम ईरानियों के जीवन स्तर में सुधार करने और महिलाओं के बीच जन्म लेते विरोध का कोई व्यावहारिक समाधान नहीं है. इस आंदोलन के छींटे कमोबेश पश्चिम एशिया के कुछ और देशों पर भी पड़ेंगे.  

ईरान में सर्वोच्च सत्ता 86 वर्षीय सर्वोच्च नेता आयतुल्ला खामनेई के हाथों में है. वे अपने सबसे वफादार बलों से घिरे हुए हैं, जिनमें इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कोर भी शामिल है. उसका ईरान की अर्थव्यवस्था, राजनीति और सुरक्षा पर दबदबा है.

आंदोलनकारियों का कोई केंद्रीय नेतृत्व नहीं है. इस दौरान पुरानी राजशाही के पक्ष में भी नारे लगे हैं. राष्ट्रपति ट्रंप से ईरान में हस्तक्षेप करने का आह्वान करने वालों में निर्वासित पूर्व युवराज रज़ा पहलवी भी शामिल हैं, जिनके पिता को 1979 की इस्लामी क्रांति में ईरान के शाह के पद से हटा दिया गया था.

शांतिपूर्ण परिवर्तन?

समझदार लोगों का मानना ​​है कि स्थायी परिवर्तन तभी आ सकेगा, जब वह शांतिपूर्ण होगा, और देश के भीतर से ही हो. लोगों में बदलाव की इच्छा है, पर कैसा बदलाव? कुछ लोग परिचित या पुराने प्रतीकों की ओर लौट रहे हैं. सिंह और सूर्य वाले ईरान के क्रांति-पूर्व ध्वज एक बार फिर सड़कों पर दिखाई देने लगे हैं.

पहलवी ने बार-बार इस बात पर ज़ोर दिया है कि वे ईरान में राजशाही को बहाल नहीं करना चाहते. उनका दावा है कि वे एक ऐसे परिवर्तन का नेतृत्व करना चाहते हैं जो ईरान को लोकतंत्र की ओर ले जाए.

दो हफ्ते पहले, जब देश की मुद्रा के तीव्र अवमूल्यन के विरोध में लोग सड़कों पर उतरे थे, तब अधिकारियों ने उनकी शिकायतों को जायज़ माना था, पर अब वे उन्हें आतंकवादी बता रहे हैं. पिछले दो हफ्तों में, शहरों के बाज़ारों और विश्वविद्यालयों में छोटे-छोटे प्रदर्शन एक बड़े जनांदोलन में बदल गए हैं.

सरकारी समझदारी

28 दिसंबर को, तेहरान में आयातित इलेक्ट्रॉनिक सामान बेचने वाले व्यापारी देश की करेंसी के अचानक और तेज़ अवमूल्यन से हैरान रह गए. उन्होंने अपनी दुकानें बंद कर दीं और हड़ताल पर चले गए, और बाज़ार के अन्य व्यापारियों से भी उनका साथ देने का आह्वान किया.

सरकार की शुरुआती प्रतिक्रिया त्वरित और समझौते वाली थी. राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान ने व्यापारियों से बातचीत करने का वादा किया. आम लोगों की तकलीफों को कम करने के लिए हरेक के बैंक खाते में लगभग सात डॉलर का नया भत्ता जमा किया गया, लेकिन समस्या का समाधान नहीं हुआ. चीजों की कीमतें और बढ़ गईं और प्रदर्शनों की लहर और तेज़ हो गई.

पश्चिम एशिया के अन्य देशों के मुकाबले ईरानी जनता, सुशिक्षित, जागरूक और अनुशासित है. यह दुनिया की प्राचीनतम सभ्यताओं में एक है.

ईरानी क्रांति

1979 की ईरानी क्रांति ने पहलवी राजवंश का अंत किया और आयतुल्ला खुमैनी को नए धर्मतंत्र का प्रमुख बनाया. वहाँ सर्वोच्च नेता धार्मिक इमाम होते हैं, पर शासन एक निर्वाचित राष्ट्रपति चलाता है.

उस क्रांति का उद्देश्य अमेरिकी प्रभुत्व को समाप्त करना, राजनीतिक और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी देना और संपदा के वितरण के लिए एक निष्पक्ष प्रणाली स्थापित करना था.

क्रांति के 47 वर्षों के बाद, ईरान के बहुत से नागरिक नई व्यवस्था को उन आदर्शों के वाहक के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक विफलता के रूप में देखते हैं. इस दौरान राजनीतिक और नागरिक स्वतंत्रताएँ कम हो गईं. उनकी जीवनशैली और व्यक्तिगत पसंद भी निगरानी और दमन की शिकार हो गई.

नए ईरान ने अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ शुरू से ही रंजिश मोल ले ली. अपने नाभिकीय-कार्यक्रम के कारण वह विवादों में घिर गया और फिर इराक, लेबनॉन, सीरिया और फलस्तीन में पैर फँसा दिए. इससे उसकी अर्थव्यवस्था पर भी विपरीत प्रभाव पड़ा.

पश्चिमी हस्तक्षेप

अंतिम बादशाह शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी अमेरिका और इसराइल के करीबी सहयोगी थे. तख्त पर उनकी वापसी भी अमेरिका और ब्रिटेन की मदद से हुई थी, जिन्होंने 1953 में ईरान के लोकतांत्रिक पद्धति से चुने गए प्रधानमंत्री मुहम्मद मुसद्देक़ का तख्ता-पलट कराया था.

इस क्रिया की प्रतिक्रिया होनी थी. जनता के मन में विरोध ने जन्म ले लिया था. परिणाम यह हुआ कि ईरान में इस्लामिक-क्रांति ने जन्म लिया, जिसके कारण 1979 में आयतुल्ला खुमैनी की वापसी हुई.

1979 की क्रांति में वामपंथियों ने भी शाह के शासन के खिलाफ एकजुट विपक्ष का हिस्सा बनकर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसमें मार्क्सवादी और वामपंथी इस्लामी समूह शामिल थे. क्रांति के बाद आयतुल्ला खुमैनी के नेतृत्व में वामपंथियों को दबा दिया गया. उनके नेताओं और कार्यकर्ताओं को हाशिए पर धकेल दिया, जिसके बाद धार्मिक सत्तावादी शासन स्थापित हुआ.

वर्तमान राजव्यवस्था का सिद्धांत है ‘विलायत-ए-फ़कीह.’ यानी फ़कीह (इस्लामी न्यायविद) का संरक्षण, जो शिया वैचारिक-आधारशिला से जुड़ा है. मौजूदा वली-ए-फ़कीह (संरक्षक न्यायविद-गार्डियन ज्यूरिस्‍ट) आयतुल्ला अली खामनेई हैं. सवाल है कि क्या वे ऐसी व्यवस्था कायम कर पाएँगे, जो सर्वस्वीकृत हो?

आवाज़ द वॉयस में प्रकाशित

Thursday, January 15, 2026

ईरान में क्या सत्ता-परिवर्तन होगा, क्रूर दमन का सामना कर पाएगी जनता?


ईरान एकबार फिर से बड़े बदलाव के मुहाने पर खड़ा है। वहाँ चल रहे आंदोलन और हिंसा के बाद स्थितियाँ चाहे, जिस दिशा में जाएँ, राज-व्यवस्था वैसी ही नहीं रहेगी, जैसी अभी तक चल रही थी। 1979 में, ईरान के लोग तीन बड़े  आदर्शों को लेकर खड़े हुए थे: आज़ाद राज व्यवस्था, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, और सामाजिक न्याय। उस क्रांति को फ्रांस की राज्यक्रांति और रूस की बोल्शेविक क्रांति और चीन की कम्युनिस्ट क्रांति के बाद विश्व की सबसे महान क्रांतियों में गिना जाता है।

ईरान में एक तरफ जनता का जबर्दस्त विरोध-प्रदर्शन चल रहा है, वहीं सरकार ने भयानक दमन शुरू कर दिया है, जिसमें तीन हजार से ज्यादा लोगों के मरने की खबरें आ रही हैं। यह संख्या दिनों-दिन बढ़ती जा रही है, क्योंकि सरकार ने सैनिकों को खुला आदेश दिया है कि वे देखते ही गोली मारें। इतना ही नहीं अब गिरफ्तार किए गए आंदोलनकारियों को फाँसी देने की बातें भी कही जा रही हैं, जिसे लेकर ट्रंप ने कहा है कि फाँसी दी गई, तो हम हमला कर देंगे।

सितंबर 2022 में महिलाओं के लिए देश के ड्रेस कोड का उल्लंघन करने के आरोप में गिरफ्तार ईरानी-कुर्द महिला महसा अमिनी की हिरासत में मौत के बाद बड़े पैमाने पर प्रदर्शनों के दमन के लिए इसी किस्म की सख्ती का सहारा लिया गया था। पर क्या अब वह सख्ती काम करेगी। खबरें हैं कि लोगों के मन से अब डर निकल गया है।

प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि सरकारी बलों को घरों की छतों पर तैनात किया गया है, जहाँ से वे निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर ऑटोमेटिक हथियारों से अंधाधुंध गोलीबारी कर रहे हैं। जो लोग अब भी ईरान की धार्मिक सरकार का समर्थन करते हैं और जो लोग सड़कों पर इसके पतन का आह्वान कर रहे हैं, वे मानते हैं कि ऐसी क्रूरता उन्होंने पहले कभी नहीं देखी।

सरकार ने पूरे देश में पूरी तरह से संचार प्रतिबंध लगा दिया है। ईरानी अधिकारियों ने इंटरनेट, अंतरराष्ट्रीय फ़ोन लाइनें और बीच-बीच में घरेलू मोबाइल फ़ोन कनेक्शन भी बंद कर दिए हैं। देश से बाहर आ रहे वीडियो और कभी-कभार सैटेलाइट इंटरनेट कनेक्शन पाने वाले कुछ ईरानियों के संदेश रक्तपात की विनाशकारी तस्वीर पेश कर रहे हैं।

Tuesday, June 24, 2025

पश्चिम-एशिया के चक्रव्यूह का ख़तरनाक दौर


पश्चिम एशिया में युद्ध फिलहाल थम गया है। यहाँ फिलहाल शब्द सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है, क्योंकि दूसरी लड़ाई कब और कहाँ शुरू हो जाएगी, कहना मुश्किल है। गज़ा में एक तरह से वह चल ही रही है। ईरान-इसराइल सीधा टकराव फिलहाल रुक गया है। अमेरिका के भी लड़ाई में शामिल हो जाने के बाद एकबारगी लगा था कि शायद यह तीसरे विश्वयुद्ध की शुरुआत है। शायद उसी घड़ी सभी पक्षों ने सोचना शुरू कर दिया था कि ज्यादा बड़ी लड़ाई को रोकना चाहिए। लड़ाई रुकी भी इस अंदाज़ में है कि अमेरिका, इसराइल और ईरान तीनों कह सकते हैं कि अंतिम विजय हमारी ही हुई है। अमेरिका कह सकता है कि उसने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पीछे धकेल दिया है। इसराइल कह सकता है कि उसने ईरान को कमज़ोर कर दिया है, और ईरान कह सकता है कि उसने बहुत ज़्यादा ताकतवर सैन्य शक्तियों को पीछे धकेल दिया है।

ईरान अब आगे क्या करेगा, यह अभी एक खुला प्रश्न है। हालाँकि क्षेत्र में अमेरिकी सेना पर उसका सीमित हमला एक गहरे संघर्ष से बचने के लिए किया गया था, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि शत्रुता समाप्त हो गई है। पश्चिमी अधिकारी मानते हैं कि ईरान के परमाणु प्रतिष्ठानों पर अमेरिकी हमलों के बावजूद, उन्हें नहीं पता कि ईरान के यूरेनियम भंडार का क्या हुआ। क्या ईरान के पास यूरेनियम को और समृद्ध करने की क्षमता है? क्या वह आक्रामकता के और अधिक गुप्त तरीके आजमाएगा? या अब वह अपने खिलाफ़ लगे कड़े प्रतिबंधों को हटाने के लिए बातचीत करने की कोशिश करेगा?

अमेरिकी बेस पर मिसाइलें दागने और राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा इसराइल के साथ युद्ध विराम कराने के प्रयास से पहले ही, ईरान बाहर निकलने का रास्ता तलाश रहा था। सोमवार 23 जून की सुबह, ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद ने अमेरिका के खिलाफ जवाबी हमले पर चर्चा करने के लिए एक आपातकालीन बैठक की। अमेरिकियों ने उसके पहले शनिवार को ईरान के तीन मुख्य परमाणु केंद्रों पर बमबारी की थी, जो इसराइल द्वारा एक सप्ताह तक किए गए हमलों के बाद एक और गंभीर झटका था, जिसने ईरान के सैन्य नेतृत्व और बुनियादी ढाँचे को गंभीर नुकसान पहुँचाया था।

सोच-समझ कर लड़े

न्यूयॉर्क टाइम्स की संयुक्त राष्ट्र ब्यूरो प्रमुख फ़र्नाज़ फ़स्सिही ने लिखा है कि  ईरान को अपनी प्रतिष्ठा बचाने की जरूरत थी। युद्ध की योजना से परिचित चार ईरानी अधिकारियों के अनुसार, एक बंकर के अंदर से ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्ला अली खामनेई ने जवाबी हमला करने का आदेश दिया था। अधिकारियों के अनुसार, आयतुल्ला ने यह भी निर्देश भेजे कि हमलों को सीमित रखा जाए, ताकि अमेरिका के साथ पूर्ण युद्ध से बचा जा सके।

Thursday, November 28, 2024

सुलगता पश्चिम एशिया और इस्लामिक-देशों की निष्प्रभावी-एकता


अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के चुनाव जीतने के बाद सऊदी अरब की राजधानी रियाद में पिछले 11 नवंबर को हुए अरब और इस्लामी देशों के सम्मेलन को लेकर इस्लामी देशों में ही काफी चर्चा हो रही है. खासतौर से इस बात को लेकर कि इस्लामिक-देशों की कोशिशें सफल क्यों नहीं हो पाती हैं?

यह सम्मेलन ग़ज़ा और लेबनान में इसराइली सैनिक कार्रवाइयों को रोकने के लिए अमेरिका पर दबाव डालने के इरादे से ही बुलाया गया था. माना जाता है कि इस मामले में अमेरिका के नए प्रशासन के दृष्टिकोण पर बहुत कुछ निर्भर करेगा. 

यह शिखर सम्मेलन काहिरा स्थित अरब लीग और जेद्दा स्थित ओआईसी की रियाद में हुई इसी तरह की बैठक के एक साल बाद हुआ. उस सम्मेलन में भी मुस्लिम देशों ने गज़ा में इसराइली कार्रवाइयों की निंदा करते हुए उसे ‘बर्बर’ बताया था.

इसबार के सम्मेलन के प्रस्ताव को देखने पर पहली नज़र में लगता है कि इसमें इसराइल की निंदा-भर्त्सना करने में इस्लामिक देशों ने अपनी एकता ज़रूर साबित की है, पर ऐसी कोई व्यावहारिक योजना पेश नहीं की है, जिससे लड़ाई रुके या फलस्तीन की समस्या का दीर्घकालीन समाधान हो सके.  

सम्मेलन का प्रस्ताव 

सम्मेलन में गज़ा और लेबनान पर इसराइल के फौजी हमले को तत्काल रोकने की माँग की गई है. अलग-अलग देशों के नेताओं ने अपने भावुक भाषणों में इसराइली सेना के ‘भयानक अपराधों’, ‘नरसंहार’ और गज़ा में ‘जातीय सफाए’ की निंदा की और इन मामलों की ‘स्वतंत्र, विश्वसनीय’ अंतरराष्ट्रीय जाँच की माँग की. 

सम्मेलन के समापन के बाद जारी एक बयान में कहा गया कि सम्मेलन में भाग लेने वाले सभी पक्ष फलस्तीनी लोगों को उनके वैध और अविभाज्य राष्ट्रीय अधिकारों को साकार करने और सभी प्रासंगिक संयुक्त राष्ट्र प्रस्तावों को लागू करने का दृढ़ता से समर्थन करते हैं. 

Wednesday, October 30, 2024

बेहद जोखिम भरी राह पर बढ़ता पश्चिम एशिया


पहले ईरान के इसराइल पर और अब ईरान पर हुए इसराइली हमलों के बाद वैश्विक-शांति को लेकर कुछ गंभीर सवाल खड़े हुए हैं. एक तरफ लगता है कि हमलों का यह क्रम दुनिया को एक बड़े युद्ध की ओर ले जा रहा है. दूसरी तरफ दोनों पक्ष सावधानी से नाप-तोलकर अपने कदम बढ़ा रहे हैं, जिससे इस बात का संकेत मिलता है कि मौके की भयावहता का उन्हें अंदाज़ा है.

क्या लड़ाई को आगे बढ़ने से रोका जा सकता है? पश्चिम एशिया में स्थायी शांति की स्थापना क्या संभव ही नहीं है? दुनिया की बड़ी ताकतों को क्या संभावित तबाही की तस्वीर नज़र नहीं आ रही है?

बेशक टकराव जारी है, लेकिन अभी तक के घटनाक्रम से सबक लेकर दोनों पक्ष,  भविष्य में बहुत कुछ सकारात्मक भी कर सकते हैं, जिसका हमें अनुमान नहीं है. लड़ाई के भयावह परिणामों को दोनों पक्ष भी समझते हैं. इसे भय का संतुलन भी कह सकते हैं.

Friday, August 9, 2024

देस-परदेस: पश्चिम एशिया के आकाश पर युद्ध के बादल


हमास के प्रमुख इस्माइल हानिये और हिज़बुल्ला के टॉप कमांडर फवाद शुकर की हत्याओं के बाद दो तरह की बातें हो रही हैं. इसराइल और ईरान के बीच सीधी लड़ाई होने का खतरा पैदा हो रहा है. हानिये की हत्या कहीं और हुई होती, तब शायद बात दूसरी होती, पर तेहरान में हत्या होने से लगता है कि ईरान को सायास लपेट लिया गया है.

दूसरी बात इस हत्या से जुड़ी पेचीदगियाँ हैं. इतने सुरक्षित इलाके में हत्या हुई कैसे? इसराइल ने भी की, तो कैसे? ईरान की सरकारी फ़ारस समाचार एजेंसी के अनुसार, जिस जगह पर इस्माइल हनिये रह रहे थे, वहाँ बिल्डिंग के बाहर से शॉर्टरेंज प्रक्षेपास्त्र या प्रोजेक्टाइल दाग़ा गया, जिसमें सात किलो का विस्फोटक लगा था.

यह बयान ईरानी रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स का है. इसमें कहा गया है कि इस अभियान की योजना और इसका कार्यान्वयन इसराइली सरकार ने किया था, जिसे अमेरिकी सरकार का समर्थन मिला हुआ है.

बढ़ती पेचीदगियाँ

पेचीदगी अमेरिकी मीडिया स्रोतों की इस खबर से भी बढ़ी है कि हत्या के लिए, जिस विस्फोटक का इस्तेमाल हुआ है, वह करीब दो महीने पहले उस कक्ष में लगा दिया गया था, जिसमें हानिये ठहरे थे. उसे रिमोट की मदद से दागा गया.

इसराइल ने इस सिलसिले में कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है. अमेरिका ने कहा है कि इस हमले से हमारा कोई लेना-देना नहीं है. हनिये तेहरान में कहाँ रुके थे, इस बारे में न तो आधिकारिक जानकारी उपलब्ध है और न उनकी मौत के बारे में इस बयान से ज्यादा कोई अधिक विवरण सामने आया है.

Wednesday, July 10, 2024

ईरान के राष्ट्रपति पेज़ेश्कियान के सामने ‘सुधार’ से जुड़ी चुनौतियाँ


राष्ट्रपति-चुनाव में सुधारवादी और मध्यमार्गी नेता मसूद पेज़ेश्कियान की विजय के साथ ही सवाल पूछे जाने लगे हैं कि क्या अपने देश की विदेश और सामाजिक-नीतियों में वे बड़े बदलाव कर पाएंगे? अधिकतर पर्यवेक्षक मानते हैं कि फौरन किसी बड़े बदलाव की उम्मीद उनसे नहीं करनी चाहिए, पर यह भी मानते हैं कि जनादेश बदलाव के लिए है. सवाल है कि कैसा बदलाव?

पेज़ेश्कियान ने अपने चुनाव-प्रचार के दौरान पश्चिमी देशों के साथ रचनात्मक-संवाद की बातें कई बार कही हैं. माना जा रहा है कि 2015 में हुए और 2018 में टूटे नाभिकीय-समझौते पर वे देर-सबेर फिर से बातचीत शुरू कर सकते हैं. संभवतः जावेद ज़रीफ उनके विदेशमंत्री बनेंगे, जो अतीत में इस समझौते के मुख्य-वार्ताकार रहे हैं.

सच यह भी है कि ईरान में बुनियादी फैसले राष्ट्रपति के स्तर पर नहीं होते. पेज़ेश्कियान ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान बदलाव की बातें ज़रूर की हैं, पर आमूल बदलाव का कोई वायदा नहीं किया है. वे जो भी करेंगे, व्यवस्था के भीतर रहकर ही करेंगे. बदलाव आएगा भी, तो व्यवस्था के भीतर से और शायद धीरे-धीरे.  

सुधारवाद की परीक्षा

देश में सुधारवादियों का भी जनाधार है और व्यवस्था इतनी कठोर नहीं है कि उनकी अनदेखी करे. पेज़ेश्कियान भी सावधानी से कदम रखेंगे. वे मध्यमार्गी हैं. उनकी तुलना में मीर हुसेन मौसवी और पूर्व राष्ट्रपति अली अकबर हाशमी रफसंजानी की बेटी फाज़ेह हाशमी रफसंजानी ज्यादा बड़े स्तर पर सुधारों की माँग कर रहे हैं.   

Thursday, April 18, 2024

पश्चिम एशिया के विस्फोटक हालात और ‘फोकस’ से हटता फलस्तीन


पिछले साल 7 अक्तूबर से ग़ज़ा में शुरू हुई लड़ाई के बजाय खत्म होने के ज्यादा बड़े दायरे में फैलने का खतरा पैदा हो गया है. ईरान ने इसराइल पर सीधे हमला करके एक बड़े जोखिम को मोल जरूर ले लिया है, पर उसने लड़ाई को और ज्यादा बढ़ाने का इरादा व्यक्त नहीं किया है. दूसरी तरफ इसराइल का कहना है कि यह हम तय करेंगे कि अपनी रक्षा कैसे की जाए.  

ईरान ने इस सीमित-हमले की जानकारी पहले से अमेरिका को भी दे दी थी. उधर अमेरिका ने इसराइल को समझाया है कि अगला कदम उठाने के पहले अच्छी तरह उसके परिणामों पर विचार कर लेना. अमेरिका ने संरा सुरक्षा परिषद में यह भी कहा है कि ईरान ने यदि हमारे या इसराइली रक्षा-प्रतिष्ठानों पर अब हमला किया, तो उसके परिणामों का जिम्मेदार वह होगा.

ईरान का कहना है कि हमारे दूतावास पर इसराइल ने हमला किया था, जिसका जवाब हमने दिया है. अब यदि इसपर जवाबी कार्रवाई हुई, तो हम ज्यादा बड़ा जवाब देंगे. हम ऐसा हमला करेंगे, जिसका आप मुक़ाबला नहीं कर पाएंगे.

यह टकराव कौन-सा मोड़ लेगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि अब इसराइली प्रतिक्रिया क्या होगी. इसराइल के अलावा जी-7 देशों, खासतौर से अमेरिका का रुख भी महत्वपूर्ण है. फिलहाल लगता है कि दोनों पक्ष इसे बढ़ाना नहीं चाहते, पर अगले दो-तीन दिन के घटनाक्रम पर नज़र रखनी होगी. दुनिया भर के देशों ने भी दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील की है.

Wednesday, November 10, 2021

अफगानिस्तान को लेकर भारत और पाकिस्तान की समांतर बैठकों का औचित्य

 

अफगानिस्तान पर दिल्ली में बैठक

अफगानिस्तान को लेकर भारत और पाकिस्तान में दो अलग-अलग बैठकें हो रही हैं। एक बैठक आज 10 नवंबर को भारत में और दूसरी कल पाकिस्तान में। इन बैठकों से भारत और पाकिस्तान के दो नजरियों की पुष्टि हो रही है, साथ ही यह बात भी स्पष्ट हो रही है कि अफगानिस्तान की समस्या के हल के लिए भारत और पाकिस्तान दोनों से बात करनी होगी। पाकिस्तान को महत्व इसलिए मिला है, क्योंकि तालिबान के साथ उसके रिश्तों को अब दुनिया जान चुकी है। भारत की जरूरत इसलिए है, क्योंकि अफ़ग़ानिस्तान की विकास-योजनाओं में भारत की भूमिका है। इसके अलावा अफ़ग़ानिस्तान के काफी गैर-पश्तून कबीले भारत के करीब हैं।

भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने दिल्ली में क्षेत्रीय सुरक्षा संवाद नाम से जो बैठक बुलाई है, उसमें रूस, ईरान और मध्य एशिया के पाँच देशों, ताजिकिस्तान, कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और किर्गिस्तान के सुरक्षा सलाहकार या मुख्य सुरक्षा अधिकारी भाग ले रहे हैं। एक दिन की इस बैठक में एक संयुक्त घोषणापत्र भी जारी हुआ है, जिसमें दो बातें महत्वपूर्ण हैं। एक, अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल आतंकी गतिविधियों में नहीं होना चाहिए और दूसरे, वहाँ सभी समुदायों के मेल से समावेशी सरकार का गठन होना चाहिए।

भारत में हुई इस बैठक का फॉर्मेट सितंबर 2018 और दिसंबर 2019 में ईरान में हुई बैठकों में तय हुआ था। इसका उद्देश्य तालिबान के बारे में एक सामान्य राय बनाना है। हालांकि इन देशों ने तालिबान सरकार को मान्यता नहीं दी है, पर इन्होंने तालिबान से संपर्क बनाकर रखा है। हालांकि भारत अशरफ गनी की चुनी हुई सरकार को अपदस्थ करने के तरीकों से असहमत है, फिर भी वह तालिबान के साथ संपर्क बनाए रखना चाहता है। इस बैठक का एक उद्देश्य यह भी है कि भारत यह बताना चाहता है कि अफ़ग़ानिस्तान में हालात को सुधारने के काम में भारत को भी साथ में रखना पड़ेगा।

Saturday, November 28, 2020

ईरान के नाभिकीय वैज्ञानिक की हत्या


 ईरान के खुफिया परमाणु बम कार्यक्रम के अगुआ शीर्ष वैज्ञानिक मोहसिन फ़ख़रीज़ादेह की शुक्रवार को तेहरान के निकट घात लगाकर हत्या कर दी गई। इस घटना से नाराज़ ईरान के सुप्रीम नेता आयतुल्ला अली खामनेई के सैन्य सलाहकार और कमांडर होसेन देहग़ान ने फ़ख़रीज़ादेह के हत्यारों पर कहर बरपाने की धमकी दी है। इससे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल के आखिरी कुछ सप्ताह में ईरान और उसके शत्रुओं के बीच टकराव बढ़ने के आसार बनते दिख रहे हैं। 

Monday, January 13, 2020

विस्फोटक समय में भारतीय विदेश-नीति के जोखिम


नए साल की शुरुआत बड़ी विस्फोटक हुई है। अमेरिका में यह राष्ट्रपति-चुनाव का साल है। देश की सीनेट को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के विरुद्ध लाए गए महाभियोग पर फैसला करना है। अमेरिका और चीन के बीच एक नए आंशिक व्यापार समझौते पर इस महीने की 15 तारीख को दस्तखत होने वाले हैं। बातचीत को आगे बढ़ाने के लिए ट्रंप इसके बाद चीन की यात्रा भी करेंगे। ब्रिटिश संसद को ब्रेक्जिट से जुड़ा बड़ा फैसला करना है। अचानक पश्चिम एशिया में युद्ध के बादल छाते नजर आ रहे हैं। इन सभी मामलों का असर भारतीय विदेश-नीति पर पड़ेगा। हम क्रॉसफायरिंग के बीच में हैं। पश्चिमी पड़ोसी के साथ हमारे रिश्ते तनावपूर्ण हैं, जिसमें पश्चिम एशिया में होने वाले हरेक घटनाक्रम की भूमिका होती है। संयोग से इन दिनों इस्लामिक देशों के आपसी रिश्तों पर भी बदलाव के बादल घिर रहे हैं।

Friday, February 17, 2012

पश्चिम एशिया के क्रॉस फायर में भारत

बुधवार को ईरानी राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेज़ाद ने तेहरान के रिसर्च रिएक्टर में अपने बनाए नाभिकीय ईंधन के रॉड्स के इस्तेमाल की शुरूआत करके अमेरिका और इस्रायल को एक साथ चुनौती दी है। इस्रायल कह रहा है कि पानी सिर से ऊपर जा रहा है अब कोई कड़ी कारवाई करनी होगी। ईरान ने नाभिकीय अप्रसार संधि पर दस्तखत कर रखे हैं। उसका कहना है एटम बम बनाने का हमारा इरादा नहीं है, पर ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए हमारे एटमी कार्यक्रमों को रोका नहीं जा सकता। इसके साथ ही खबरें मिल रही हैं कि दिल्ली में इस्रायली दूतावास की कार पर हुए हमले का सम्बन्ध बैंकॉक की घटनाओं से जोड़ा जा सकता है।

दिल्ली में इस्रायली दूतावास की गाड़ी में हुआ विस्फोट क्या किसी बड़े वैश्विक महाविस्फोट की भूमिका है? क्या भारतीय विदेश नीति का चक्का पश्चिम एशिया की दलदल में जाकर फँस गया है? एक साथ कई देशों को साधने की हमारी नीति में कोई बुनियादी खोट है? इसके साथ यह सवाल भी है कि हमारी सुरक्षा व्यवस्था इतनी लचर क्यों है? दिल्ली के सबसे संवेदनशील इलाके में इस्रायल जैसे देश की अरक्षित कार को निशाना बनाने में सफल होना हमारी विफलता को बताता है। चिन्ता की बात यह भी है कि प्रधानमंत्री निवास काफी करीब था।