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Thursday, May 7, 2026

संकट के दौर में ऊर्जा-स्वावलंबन का लक्ष्य

इस्लामाबाद में बातचीत के विफल दौर के कारण फिलहाल इस बात की संभावना नहीं है कि पश्चिम एशिया में स्थायी युद्धविराम होगा। इस वजह से भारत के सामने पेट्रोलियम आधारित ऊर्जा-संकट खड़ा हो गया है। यह संकट मुख्य रूप से होर्मुज जलसंधि के रास्ते आने वाली सप्लाई में अवरोध, वैश्विक कीमतों में उछाल और घरेलू उत्पादों, खासकर एलपीजी की कमी के रूप में सामने आया है। हालाँकि पेट्रोल-डीजल का करीब 50-64 दिन का बफर स्टॉक देश के पास है, लेकिन लंबे समय में कीमतें बढ़ सकती हैं। ऐसा महसूस किया जा रहा है कि देश की दीर्घकालीन ऊर्जा-सुरक्षा के लिए 90 दिन का बफर स्टॉक बनाया जाए।

वैश्विक भू-राजनीति ने हमारी आर्थिक सच्चाई को उजागर किया है। सबसे पहले हमें जीवाश्म ईंधनों पर अत्यधिक-निर्भरता से छुटकारा पाना होगा। इसके बाद वैकल्पिक स्रोतों को बढ़ावा देना होगा। हमें उन सभी रास्तों की तलाश करनी होगी, जिनसे हम ऊर्जा के क्षेत्र में स्वावलंबी बनें।

यह संकट सिर्फ कीमतों का नहीं, बल्कि आपूर्ति शृंखला टूटने का है, जो रसोई गैस जैसे जरूरी पेट्रोलियम उत्पादों पर सबसे ज्यादा असर डाल रहा है। मार्च 2026 में भारत को एलपीजी की भारी कमी का सामना करना पड़ा। घरेलू बुकिंग 55 लाख से बढ़कर 88 लाख प्रतिदिन हो गई। कुछ शहरों/गाँवों में सिलेंडर की वेटिंग 25-45 दिन तक पहुँच गई।