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Tuesday, April 14, 2026

‘युद्धविराम’ जो है ही नहीं!


पश्चिम एशिया की लड़ाई में युद्धविराम के बाद इस्लामाबाद में हुई पहली बातचीत के सफल नहीं होने का मतलब यह भी नहीं है कि वह विफल हो गई. ऐसे मसले एक दिन की वार्ता से हल होते भी नहीं हैं.

अब सवाल पूछा जा सकता है कि तब क्या दो हफ्ते बाद लड़ाई फिर से उसी बिंदु से शुरू हो जाएगी, जहाँ पर वह रुकी थी? कोई नहीं कह सकता कि अब क्या होगा. सबसे बड़ी बात है कि लड़ाई रुकी नहीं है, बल्कि उसका तरीका बदला है.

लेबनान में तो लड़ाई चल ही रही है. और ट्रंप की घोषणा के बरक्स अमेरिकी सेंटकॉम ने होर्मुज की नाकाबंदी शुरू कर दी है, जिसके बाद दोनों देशों की सेनाएँ आमने-सामने हैं. यह बात बड़े खतरनाक परिदृश्य को जन्म दे रही है.  

दूसरी तरफ बातचीत भी रुकी नहीं है, किसी न किसी स्तर पर चल ही रही है. ऐसे मसलों के फैसले सोशल मीडिया की पोस्टों और मीडिया के विश्लेषणों से तय नहीं होते हैं, बल्कि बैकरूम वार्ताओं से ही तय होते हैं.

इन बातों के मद्देनज़र तीन-चार प्रत्यक्ष मुद्दे सामने आ चुके हैं, परोक्ष मुद्दे अक्सर कभी सामने नहीं आते. 

हरमूज़ की नाकाबंदी

इस्लामाबाद वार्ता खत्म होने के बाद अमेरिकी सेना ने रविवार को कहा कि वह ‘ईरानी बंदरगाहों और तटीय क्षेत्रों में प्रवेश करने या वहाँ से निकलने वाले’ किसी भी जहाज की नाकाबंदी करेगी. उसके पहले राष्ट्रपति ट्रंप ने आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण जलमार्ग हरमूज़ (या होर्मुज) को पूरी तरह से अवरुद्ध करने की घोषणा की थी.

अब यह नाकाबंदी शुरू हो चुकी है. अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने सोशल मीडिया पर जारी एक बयान में कहा था कि ईरानी बंदरगाहों पर नाकाबंदी सोमवार को पूर्वी समयानुसार सुबह 10 बजे (यानी भारतीय समयानुसार रात 8.30 बजे) से शुरू होगी. 

इसमें यह भी कहा गया है कि अमेरिकी सेनाएं होर्मुज जलडमरूमध्य से गैर-ईरानी बंदरगाहों तक आने-जाने वाले जहाजों के लिए नौवहन की स्वतंत्रता में बाधा नहीं डालेंगी. एक तरह से यह लड़ाई जारी रहने की घोषणा ही है.

Sunday, April 12, 2026

बात हुई, पर बनी नहीं

जेडी वेंस की इस्लामाबाद से वापसी

पश्चिम एशिया की लड़ाई, जितने नाटकीय तरीके से शुरू हुई, उतने ही नाटकीय तरीके से उसका युद्धविराम हुआ। चारों तरफ नाटकों की भरमार नज़र आ रही है। नाटकीय तरीके से पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ ने किसी बाहरी स्रोत से प्राप्त
ड्राफ्ट को अपना कहकर एक्स पर जारी किया। उस सूचना की पर्याप्त फज़ीहत होती, उसके पहले ही शनिवार की शाम इस्लामाबाद वार्ताका नाटकीय पटाक्षेप हो गया। अब इस नाटक के दूसरे अंक की प्रतीक्षा करनी चाहिए, क्योंकि समस्या जस की तस है। देखना यह भी होगा कि पाकिस्तान की कथित मध्यस्थता जारी रहेगी या इस शतरंज की बिसात पर कोई नया मोहरा रखा जाएगा।

Thursday, March 26, 2026

युद्ध के दुष्प्रभावों से निपटने को तैयार भारत


जिन लोगों को आज से तीन दशक पहले की बातें याद हैं, उन्हें गैस एजेंसियों, सरकारी राशन और चीनी की दुकानों के आगे लगी कतारें भी याद होंगी. पश्चिम एशिया के युद्ध के साथ कुछ यादें ताज़ा हो गई हैं.

उसके पहले चीन युद्ध के बाद देश में खाद्य संकट पैदा हुआ था और हमें काफी समय तक अमेरिकी गेहूँ खाना पड़ा था. शायद वह काफी पुरानी बात हो गई, पर कोविड महामारी तो हाल की बात है, जब शहर-शहर गाँव-गाँव लॉकडाउन के कारण रोज़ी-रोज़गार पर तो संकट आया, आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता भी चुनौती बन गई.

पश्चिम एशिया की लड़ाई ने हमें एकबार फिर से चौंकाया है. आपदाएँ किसी भी वक्त आ सकती हैं, पर भारत की विशेषता है कि वह संकटों का सामना आसानी से कर लेता है. आपको समझना ही है, तो इस समय अपने पड़ोसी देशों की स्थिति पर एक बार नज़र ज़रूर डालें.

कहना मुश्किल है कि लड़ाई जल्द खत्म होगी या देर से होगी. इसलिए मानकर चलिए कि समस्याएँ नए रूप में भी आ सकती है. ऐसे में आपके धैर्य, अनुशासन और एकजुटता की सबसे बड़ी ज़रूरत है. भाईचारा बनाकर रखें. बेशक संकट आया है, तो दूर भी होगा.

प्रधानमंत्री का बयान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम एशिया में चल रही लड़ाई को लेकर संसद के दोनों सदनों में भारत के सामने खड़ी 'अप्रत्याशित चुनौतियों' का ज़िक्र करते हुए कहा है कि हम उनका सामना करने में समर्थ हैं. सच यह है कि देश अतीत में ऐसे संकटों का सफलतापूर्वक सामना कर चुका है.

अलबत्ता प्रधानमंत्री ने इस बात को रेखांकित किया कि इस टकराव का असर लंबे समय तक बने रहने की आशंका है. ऐसा शायद पहली बार हो रहा है कि महामारी और युद्ध का आगमन आगे-पीछे हुआ है. कोविड के दौरान भी सप्लाई चेन में संकट पैदा हुआ था और देश ने एकजुटता से उसका मुकाबला किया.

भारत में बड़ी मात्रा में कच्चा तेल, गैस और उर्वरक जैसी अनेक ज़रूरी चीजें होर्मुज़ जलसंधि मार्ग से आती हैं. युद्ध के बाद से ही वहाँ से जहाज़ों का आना-जाना बहुत चुनौतीपूर्ण हो गया है. बावजूद इसके, हमारी सरकार का प्रयास रहा है कि पेट्रोल-डीज़ल और गैस की सप्लाई बहुत ज़्यादा प्रभावित न हो.

Wednesday, March 25, 2026

ट्रंप को अब युद्ध से निकलने के रास्ते की तलाश


ईरान-युद्ध शुरू होने के पहले से ही कहा जा रहा था कि लड़ाई शुरू हो गई, तो उसे खत्म करना मुश्किल हो जाएगा. यह बात अब सच साबित हो रही है. अब ट्रंप अपनी योजनाओं को लेकर किंतु-परंतु करने लगे हैं. पहले धमकी दी कि ईरानी ऊर्जा केंद्रों पर हमले करेंगे और फिर कहा कि 120 घंटे तक ऐसा नहीं करेंगे.

उनका यह भी कहना है कि ईरान से बात चल रही है. पाकिस्तान के हाथों 15 सूत्री प्रस्ताव भेजा है.  उधर ईरान के नेता कह रहे हैं कि हमारी कोई बात नहीं हो रही है.

न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा है कि जब से राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान-युद्ध में ‘प्रवेश’ किया है, तब से वे इस सवाल से रूबरू हैं कि इसे समाप्त कब करेंगे? सच यह है कि युद्ध के उनके कई घोषित लक्ष्य अब भी अधूरे हैं.

ट्रंप ने ईरान-युद्ध के लिए ‘भ्रमण’ शब्द का प्रयोग करना शुरू कर दिया है, ताकि लगे कि कोई बड़ी परेशानी की बात नहीं है, लेकिन व्यावहारिक रूप से लगता है कि वे फँस गए हैं.

अब वे परेशान हैं. पिछले शुक्रवार शाम को जब ट्रंप फ्लोरिडा के लिए रवाना हुए, तो ऐसा लग रहा था कि वे शायद लड़ाई को कोई मोड़ देकर एक्ज़िट यानी हाथ खींचने की घोषणा करेंगे.

बहरहाल अभी तक ऐसा कुछ नहीं हुआ है. दूसरी तरफ उनकी और वैश्विक अर्थव्यवस्था की परेशानियाँ बढ़ती जा रही हैं. पेट्रोल की औसत कीमतें आसमान छूने की तैयारी कर रही है. फारस की खाड़ी में बुनियादी ढाँचा खंडहर में तब्दील हो चुका है, वहीं ईरान की कमजोर धार्मिक सत्ता की पकड़ मजबूत होती जा रही है.

Wednesday, March 4, 2026

पश्चिम एशिया को इस ‘भँवर’ से निकालना मुश्किल होगा


अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप और इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने ईरान पर हमला करके, जो लंबा दाँव खेला है, उसके कारण पश्चिम एशिया का भविष्य फिलहाल अनिश्चित नज़र आने लगा है. लगता है कि भानुमती के पिटारे की तरह एक के बाद एक नई चीजें सामने आ रही हैं और अभी आएँगी।

उनका यह ऑपरेशन 'एपिक फ्यूरी' नए क्षेत्रीय संघर्षों को भी जन्म दे गया है, जिनमें अमेरिका फँसा तो उससे बाहर निकलना मुश्किल हो जाएगा. ट्रंप ने एक वीडियो में ईरानी जनता को संबोधित करते हुए, कहा देश की सत्ता पर ‘आपको कब्ज़ा करना होगा. यह संभवतः पीढ़ियों के लिए आपको मिला एकमात्र मौका है.’

पर्यवेक्षकों का कहना है कि ईरान का इस्लामिक गणराज्य एक वैचारिक प्रणाली है, जिसमें बहुस्तरीय अभिजात वर्ग और समर्थन का आधार है. हो सकता है कि हाल के वर्षों में यह समर्थन कम हुआ हो, पर वह सत्ता बनाए रखने की ताकत रखता है. बमबारी से पस्त और घायल होने के बावज़ूद यह धार्मिक व्यवस्था खड़ी रहेगी.

इस आक्रमण के बाद जहाँ एकाध अपवाद को छोड़कर पूरा यूरोप, अमेरिका और इसराइल के साथ खड़ा नज़र आ रहा है, वहीं रूस और चीन ने आयतुल्ला खामनेई की हत्या की निंदा की है.

चीन ने इसे 'संयुक्त राष्ट्र चार्टर के उद्देश्यों और सिद्धांतों के ख़िलाफ़' बताया और कहा कि हम इसका सख़्त विरोध और कड़ी निंदा करते हैं. पर वे निंदा तक ही सीमित रह सकते हैं. वे जो भी करेंगे, दूर रहते हुए परोक्ष तरीकों से करेंगे, प्रत्यक्ष तरीके से नहीं. 

दुबई की पहचान खतरे में और पेट्रोलियम-संकट के आसार

 

28 फरवरी से शुरू हुए अमेरिकी और इसराइली हमलों के जवाब में ईरान की जवाबी कार्रवाई ने दुबई की सुरक्षित छवि को हिलाकर रख दिया है। आलीशान कृत्रिम आवास पाम जुमेराह पर स्थित फेयरमों होटल पहले ही दिन आग की चपेट में आ गया। अमेज़न वैब सर्विसेज का एक डेटा सेंटर भी जल गया। विश्व की सबसे बड़ी अंतरराष्ट्रीय एयरलाइन, अमीरात एयरलाइंस का मुख्यालय और दुबई के पर्यटन व्यापार के लिए महत्वपूर्ण हवाई अड्डा क्षतिग्रस्त हो गया और उड़ानें स्थगित कर दी गईं। अमीरात के तेजी से विकसित हो रहे बंदरगाह और माल ढुलाई केंद्र, जबल अली, में परिचालन रोक दिया गया।

दुबई, संयुक्त अरब अमीरात ( यूएई ) के बाकी हिस्सों की तरह, अब तक इस स्थिति से अप्रभावित रहा था; युद्ध के दीर्घकालिक प्रभावों के बारे में अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन जो कुछ दिन पहले तक गुप्त रखा गया था, वह अब हकीकत बन गया है। हालांकि ज्यादातर विदेशी निवासी सुरक्षित हैं, कुछ लोग ओमान या सऊदी अरब के रास्ते, जहां हवाई क्षेत्र खुला है, कुछ समय के लिए ही सही, देश छोड़ रहे हैं या छोड़ने की योजना बना रहे हैं। अमेरिका के विदेश विभाग ने नागरिकों को क्षेत्र छोड़ने की सलाह दी है। व्यवसायी अभी टिके हुए हैं, लेकिन इमर्जेंसी योजनाएँ बना रहे हैं। सवाल यह है कि क्या दुबई को वैश्विक व्यापार केंद्र के रूप में विकसित करने वाले लोग और पैसा पहले की तरह आता रहेगा?