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| प्यास बुझाते हुए: उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में रानीधारा नौला पर स्थित एक आउटलेट से स्कूली बच्चे अपनी बोतलों में पानी भर रहे हैं। |
रविवार 24 मई के हिंदू में मुझे कुमाऊँ के नौलों (जल मंदिरों) पर एक फीचर देखने को मिला, तो अचानक कुछ पुरानी खुशबुओं के साथ यादें ताज़ा हो उठीं। 1961 की गर्मियों में मेरा नौलों, धारों और स्रोतों से पहला परिचय हुआ था।
1961 की गर्मियों में मुझे पहली बार कुमाऊँ के
पहाड़ देखने का मौका मिला। अपनी दादी के साथ पहले मैं रानीखेत आया। चाचा के घर
कैंटूनमेंट में मॉल रोड पर बने के डबल डेकर घर में रहना एक नया अनुभव था। उस वक्त
हम मथुरा में रहते थे। लंबे अरसे तक मैं बीमारियों से घिरा रहा, इसलिए मेरे बाबू
ने सोचा पहाड़ जाकर कुछ समय रहने से सेहत में सुधार होगा।
मथुरा के कैंट स्टेशन से हम आगरा फोर्ट एक्सप्रेस पर बैठे, जिसने अगली सुबह हमें काठगोदाम पहुँचाया। वहाँ से उत्तर प्रदेश रोडवेज़ की बस से रानीखेत। रानीखेत का घर चीड़ के पेड़ों से घिरा हुआ था। हरेक सुबह घर के नीचे वाली सड़क से होकर सेना के जवान कवायद करते हुए परेड ग्राउंड की ओर जाते थे, आल्मा ग्राउंड। शाम को लौटते।
