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Tuesday, October 27, 2026

यूरोप की अराजकता ने बजाई खतरे की घंटी


फ्रांस, इटली, स्पेन, पुर्तगाल, बेल्जियम, अल्बानिया, जर्मनी और सर्बिया सहित कई यूरोपीय देशों में महंगाई, बढ़ते जीवन-यापन, आवास की कमी, वेतन संकट और शिक्षा सुधारों को लेकर भारी विरोध प्रदर्शन और अराजकता का माहौल है.

क्या यह किसी बड़े बदलाव का संकेत है? बदलाव कैसा? कुछ पर्यवेक्षकों का अंदेशा है कि इसकी प्रतिक्रिया में इन देशों में दक्षिणपंथी राजनीति की एक और लहर आ सकती है. मूलतः यह लोकतांत्रिक-व्यवस्था में सामाजिक कल्याण से जुड़े प्रश्नों का मसला है. 

पहले इस अराजकता पर एक नज़र डालें. पिछले कुछ समय से महंगाई, शिक्षकों की भारी किल्लत और शिक्षा तथा सार्वजनिक सेवाओं में बजट कटौती के खिलाफ फ्रांस में पेरिस से लेकर मार्सेलिस तक सड़कों पर हिंसक प्रदर्शन हो रहे हैं.

सोशल कॉन्ट्रैक्ट का टूटना

अमेरिकी काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के एक विश्लेषण के अनुसार हाल के हफ़्तों में हमने जो देखा है, वह बिल्कुल अलग तरह का लगता है. ये विरोध प्रदर्शन फ्रांस के ‘सोशल कॉन्ट्रैक्ट’ के पूरी तरह से खत्म होने से पैदा हुए हैं.

फ्रांस में जनता के सड़क पर आने का मतलब है ‘सोशल कॉन्ट्रैक्ट’ का टूटना, जो ज्याँ-जाक रूसो के 1762 के प्रसिद्ध ग्रंथ ‘सोशल कॉन्ट्रैक्ट; या राजनीतिक अधिकार के सिद्धांत’ से जुड़ा है.

‘सोशल कॉन्ट्रैक्ट’ एक काल्पनिक या मौन समझौता है, जिसमें हर व्यक्ति अपनी प्राकृतिक स्वतंत्रता और अधिकारों को पूरी तरह से समुदाय को सौंप देता है. बदले में उसे नागरिक स्वतंत्रता, सुरक्षा और समानता मिलती है.

इस विचार ने फ्रांसीसी क्रांति (1789) पर गहरा प्रभाव डाला था. क्रांतिकारियों ने संप्रभुता, समानता और गणतंत्र की अवधारणाओं के लिए रूसो के विचारों का इस्तेमाल किया. फ्रांसीसी राजनीतिक संस्कृति में यह आज भी एक मूल अवधारणा है—नागरिकों और राज्य के बीच का अंतर्निहित समझौता.