इस्लामाबाद में बातचीत के विफल दौर के कारण फिलहाल इस बात की संभावना नहीं है कि पश्चिम एशिया में स्थायी युद्धविराम होगा। इस वजह से भारत के सामने पेट्रोलियम आधारित ऊर्जा-संकट खड़ा हो गया है। यह संकट मुख्य रूप से होर्मुज जलसंधि के रास्ते आने वाली सप्लाई में अवरोध, वैश्विक कीमतों में उछाल और घरेलू उत्पादों, खासकर एलपीजी की कमी के रूप में सामने आया है। हालाँकि पेट्रोल-डीजल का करीब 50-64 दिन का बफर स्टॉक देश के पास है, लेकिन लंबे समय में कीमतें बढ़ सकती हैं। ऐसा महसूस किया जा रहा है कि देश की दीर्घकालीन ऊर्जा-सुरक्षा के लिए 90 दिन का बफर स्टॉक बनाया जाए।
वैश्विक भू-राजनीति ने हमारी आर्थिक सच्चाई को
उजागर किया है। सबसे पहले हमें जीवाश्म ईंधनों पर अत्यधिक-निर्भरता से छुटकारा पाना
होगा। इसके बाद वैकल्पिक स्रोतों को बढ़ावा देना होगा। हमें उन सभी रास्तों की
तलाश करनी होगी, जिनसे हम ऊर्जा के क्षेत्र में स्वावलंबी बनें।
यह संकट सिर्फ कीमतों का नहीं, बल्कि आपूर्ति शृंखला टूटने का है, जो रसोई गैस जैसे जरूरी पेट्रोलियम उत्पादों पर सबसे ज्यादा असर डाल रहा है। मार्च 2026 में भारत को एलपीजी की भारी कमी का सामना करना पड़ा। घरेलू बुकिंग 55 लाख से बढ़कर 88 लाख प्रतिदिन हो गई। कुछ शहरों/गाँवों में सिलेंडर की वेटिंग 25-45 दिन तक पहुँच गई।
भारत सरकार विविधीकरण यानी वैकल्पिक स्रोतों की
तलाश कर रही है, पर उसमें समय लगेगा। फिलहाल हमें पेट्रोलियम भंडारण को बढ़ाना
होगा, ताकि आसन्न संकट का सामना किया जा सके। इसके लिए वर्तमान भंडारों का विस्तार
तेज किया जा रहा है। ओडिशा और कर्नाटक में नई क्षमता का सृजन किया जा रहा है। वर्तमान
भंडारण क्षमता 53.3 करोड़ मीट्रिक टन (लगभग 9-10 दिन की आपूर्ति) फिलहाल दो-तिहाई
भरी हुई है। कुल बफर (रिफाइनरी स्टॉक + भंडारण): लगभग 50-74
दिन का है। माना जा रहा है कि लंबे संकट का सामना करने के लिए और मजबूती की जरूरत
है।
देश के प्रमुख पेट्रोकेमिकल हब गुजरात (जामनगर,
दहेज), महाराष्ट्र (मुंबई, नागोठणे, रत्नागिरि), हरियाणा
(पानीपत), पश्चिम बंगाल (हल्दिया) और आंध्र प्रदेश
(विशाखापत्तनम) में हैं। रिलायंस इंडस्ट्रीज की जामनगर रिफाइनरी दुनिया का सबसे
बड़ा रिफाइनरी-पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स है। बीपीसीएल मध्य प्रदेश में बीना के पास
एक नया पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स विकसित कर रहा है। भारत में शोधित पेट्रोलियम का
निर्यात भी हो रहा है।
ऊर्जा विविधीकरण अब हमारे विकास की दीर्घकालीन
आवश्यकता बन चुका है। सरकार आपूर्ति स्रोतों, ईंधन मिश्रण और
घरेलू उत्पादन को विविधता प्रदान करने पर जोर दे रही है। यह रणनीति ऊर्जा सुरक्षा,
मूल्य स्थिरता और स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण दोनों को संतुलित करती है।
मोटे तौर पर देखें, तो हमें देश में विद्युत उत्पादन, वितरण और उसके
मूल्य-निर्धारण पर ध्यान देना चाहिए, जो जीवाश्म ऊर्जा यानी पेट्रोलियम की जरूरत
को तेजी से कम कर सके।
हमारी कुल ऊर्जा आपूर्ति में 21.7 प्रतिशत हिस्सा आयातित खनिज तेल का है। इसके अलावा 2.6 प्रतिशत हिस्सा आयातित प्राकृतिक गैस का है। कुल मिलाकर, कुल ऊर्जा ज़रूरत का 24.3 प्रतिशत हिस्सा आयात पर
निर्भर है। राजनीतिक रूप से अस्थिर खाड़ी देशों पर हमारी यह निर्भरता देश के लिए
बड़े खतरे पैदा कर सकती है और भारत लंबे समय से इस बात पर चिंता जताई जाती रही है।
पहले पश्चिम एशिया के देशों पर 45-55 प्रतिशत निर्भरता
थी। अब भारत ने स्रोतों को 27 से बढ़ाकर 41 देशों तक पहुँचा दिया है। इसमें रूस,
अमेरिका, पश्चिम अफ्रीका (नाइजीरिया), वेनेजुएला, लैटिन अमेरिका (अर्जेंटीना, ब्राजील), कनाडा आदि शामिल हैं। रसोई गैस की 60 प्रश
आपूर्ति आयातित है और ज्यादातर पश्चिम एशिया से है। अब अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया से नए स्रोत जोड़े जा रहे हैं। प्राकृतिक
गैस में कतर के अलावा यूएई, अमेरिका और अन्य देशों से लंबी अवधि के अनुबंध किए जा
रहे हैं। इसके साथ ही ‘होर्मुज जोखिम’ कम करने के लिए ‘ईस्टर्न और वेस्टर्न
बाईपास’ रूट्स को स्थायी बनाने की योजना।
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा खनिज तेल आयातक
देश है और उसकी ऊर्जा सुरक्षा बहुत कुछ पश्चिम एशिया पर निर्भर है। कुल खनिज तेल
की जरूरत का 85-88 प्रतिशत भारत आयात करता है। इसमें से 45-55 प्रश खाड़ी देशों से
आता है, जो मुख्यतः होर्मुज से गुजरता है। रसोई गैस की हमारी
कुल खपत का 60 प्रतिशत आयातित होता है, जिसमें 90 प्रश होर्मुज
रूट से आता है। प्राकृतिक गैस का 50-60 प्रश होर्मुज मार्ग से आता है, मुख्यतः कतर
से।
विश्व बाजार में खनिज तेल की कीमत बढ़ने से आयात
बिल बढ़ा। इससे मुद्रास्फीति का खतरा बढ़ा। इसके अलावा उर्वरक संयंत्रों की 70
प्रश सप्लाई पर असर पड़ा, जिससे खेती प्रभावित हुई है। इस
पूरी अव्यवस्था से देश की अर्थव्यवस्था पर विपरीत प्रभाव पड़ा है, रुपये की कीमत
कम हुई है और मुद्रास्फीति का खतरा बढ़ा है। इसके कारण स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण पर
अस्थायी बाधा भी पड़ी है।
हमारी कुल ऊर्जा आपूर्ति में 20 प्रतिशत हिस्सा पारंपरिक बायोमास (लकड़ी, गोबर आदि)
का है। हमें आधुनिक विकास के लिए बायोमास पर निर्भरता खत्म करनी होगी। इसके लिए
उद्योग, परिवहन और घरेलू कामकाज का बड़े पैमाने पर
विद्युतीकरण करना होगा। भारतीय रेलवे ने इस मामले में पहल की है, जहाँ 99 प्रतिशत
से ज्यादा लाइनों का विद्युतीकरण हो चुका है, जो दुनिया में सबसे ज्यादा है।
अमेरिका, रूस और चीन से भी ज्यादा। ज़ाहिर है कि इसके लिए बिजली की उपलब्धता को भी
बढ़ाना होगा। रसोईघरों से भी पेट्रोलियम गैस का स्थान विद्युत उपकरणों को लेना
होगा।
हमारी आर्थिक संवृद्धि तभी संभव है, जब ऊर्जा
आपूर्ति ज्यादा तेजी से बढ़े। तेजी से हो रहे शहरीकरण और औद्योगीकरण के कारण आने
वाले समय में ऊर्जा की माँग कई गुना बढ़ेगी। सौभाग्य से भारत में इतनी धूप पड़ती है
कि अक्षय ऊर्जा की आधुनिक तकनीकें अपनाकर हम ऊर्जा के मामले में पूरी तरह
आत्मनिर्भर बन सकते हैं। पिछले एक दशक में, भारत में आधुनिक अक्षय
ऊर्जा के उत्पादन में हर साल 8 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इसका
मतलब है कि हम सही दिशा में हैं। 8 प्रतिशत की दर से 10 साल में कुल उत्पादन लगभग दोगुना हो जाता है। इस बढ़ोतरी के बावजूद,
हमारी ज़रूरतें पूरी नहीं होंगी, क्योंकि आज भी हमारी कुल ऊर्जा
आपूर्ति में अक्षय ऊर्जा की हिस्सेदारी सिर्फ़ 3.2 प्रतिशत है।
दूसरी तरफ आयातित खनिज तेल और गैस पर हमारी निर्भरता 24.3
प्रतिशत है। क्या हम अक्षय ऊर्जा को 3.2 से 32 प्रतिशत तक ले जा सकते हैं? इसके लिए बहुत बड़े स्तर पर निवेश और प्रयासों की जरूरत होगी।
बहरहाल अक्षय ऊर्जा और स्वच्छ स्रोतों में
विविधीकरण में सबसे तेज प्रगति हुई है। भारत ने 2030 का लक्ष्य (50 प्रतिशत गैर-जीवाश्म
क्षमता) 2025 में ही हासिल कर ली है। स्थापित विद्युत क्षमता (जनवरी 2026 तक): कुल
~520 गीगावॉट है, जिसमें अक्षय ऊर्जा (सौर + पवन आदि) का
बड़ा योगदान है।
अब एक नज़र ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए देश
में चल रही प्रमुख योजनाओं पर डालें, तो तस्वीर कुछ इस तरह उभर कर आती है:
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नाभिकीय
ऊर्जा: अप्रैल
2026 तक 8-9 गीगावॉट क्षमता है, जिसके 2032 तक 22 गीगावॉट
और 2047 तक 100 गीगावॉट का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा गया है। देश में
नाभिकीय ऊर्जा क्षेत्र निजी क्षेत्र के लिए खोला जा रहा है।
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'मिशन समुद्र मंथन' भारत सरकार द्वारा शुरू किया
गया राष्ट्रीय डीप वॉटर एक्सप्लोरेशन मिशन है। इसका उद्देश्य 2026-27 से अगले 5
वर्षों में गहरे समुद्र में तेल, गैस और खनिज संसाधनों की खोज को 30 से बढ़ाकर 100 कुओं
तक करना है। इस रणनीतिक पहल का लक्ष्य ऊर्जा आत्मनिर्भरता, आयात पर निर्भरता को कम करना
और ब्लू इकोनॉमी को बढ़ावा देना है।
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पाइप्ड नेचुरल गैस (पीएनजी) को बढ़ावा। एलपीजी पर
निर्भरता कम करने के लिए शहरी गैस वितरण नेटवर्क विस्तार।
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पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना: एक करोड़ घरों में
रूफटॉप सोलर पैनल।
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पीएम-कुसुम: कृषि क्षेत्र में सौर पंप।
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राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन: 2030 तक 5 मिलियन
मीट्रिक टन हरित हाइड्रोजन उत्पादन, जिसमें जनवरी तके 8,000 टन प्रति वर्ष
(टीपीए) क्षमता को कमीशन किया जा चुका है।
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इथेनॉल ब्लेंडिंग: 2025-26 में पेट्रोल में 20 प्रतिशत
इथेनॉल मिश्रण का लक्ष्य है।
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नीति आयोग के अनुसार, 2030 तक भारत में बैटरी
भंडारण क्षमता लगभग 600 गीगावॉट घंटा (जीडब्लूएच) होने का अनुमान है। यह
महत्वाकांक्षी लक्ष्य इलेक्ट्रिक वाहनों, उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स, और नवीकरणीय ऊर्जा
(सौर/पवन) ग्रिड एकीकरण की बढ़ती माँग को पूरा करने के लिए निर्धारित किया गया है।
हिंदी विवेक में
प्रकाशित

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