
जेडी वेंस की इस्लामाबाद से वापसी
पश्चिम एशिया की लड़ाई, जितने नाटकीय तरीके से
शुरू हुई, उतने ही नाटकीय तरीके से उसका युद्धविराम हुआ। चारों तरफ नाटकों की
भरमार नज़र आ रही है। नाटकीय तरीके से पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ ने
किसी बाहरी स्रोत से प्राप्त ‘ड्राफ्ट’ को अपना कहकर एक्स पर जारी किया। उस सूचना की
पर्याप्त फज़ीहत होती, उसके पहले ही शनिवार की शाम ‘इस्लामाबाद वार्ता’
का नाटकीय पटाक्षेप हो गया।
अब इस नाटक के दूसरे अंक की प्रतीक्षा करनी चाहिए, क्योंकि समस्या जस की तस है। देखना
यह भी होगा कि पाकिस्तान की कथित मध्यस्थता जारी रहेगी या इस शतरंज की बिसात पर
कोई नया मोहरा रखा जाएगा।
इस पूरे घटनाक्रम पर ब्रिटिश पत्रिका इकोनॉमिस्ट
ने एक लंबी टिप्पणी की है। यह टिप्पणी ‘इस्लामाबाद वार्ता’ विफल होने
के पहले की है। इसके शुरुआत से ठीक पहले एक पैराग्राफ इस प्रकार है:
संपादक का
नोट: 12 अप्रैल को, 21 घंटे की बातचीत के बाद, अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा
कि अमेरिका और ईरान किसी समझौते पर पहुंचने में विफल रहे हैं।
हरेक युद्ध में
कोई विजेता नहीं होता, लेकिन कम से कम एक हारने वाला ज़रूर होता है, और अगर युद्धविराम से युद्ध का अंत हुआ, तब सबसे
बड़ा हारने वाला डॉनल्ड ट्रंप होगा। इस संघर्ष ने उनके प्रमुख लक्ष्यों को झटका
दिया है और अमेरिकी ताकत के इस्तेमाल के
उनके नए नज़रिए की खोखली सच्चाई को उजागर किया है।
शांति की
स्थिति बेहद नाजुक है। अमेरिका और ईरान इस बात पर सहमत नहीं हो पा रहे हैं कि क्या
यह शांति लेबनान पर भी लागू होती है, जिस पर इसराइल, इतने
भीषण हमले कर रहा है कि व्यापक युद्धविराम के लिए खतरा जानबूझकर पैदा किया गया
प्रतीत होता है। वे इस बात पर भी असहमत हैं कि ईरान को होर्मुज जलडमरूमध्य कैसे
खोलना चाहिए, जो वार्ता के लिए अमेरिका की एक पूर्व
शर्त है।
ट्रंप के
दोबारा युद्ध में न लौटने का सबसे बड़ा कारण यह है कि अब उन्हें समझ आ गया है कि
उन्हें युद्ध शुरू ही नहीं करना चाहिए था। ईरान को नष्ट करने की धमकी भरे उनके
घृणित बयान मानो अपनी बात से पलटने का दिखावा मात्र हैं। वे जानते हैं कि दोबारा
युद्ध छेड़ने से बाज़ार में दहशत फैल जाएगी और पश्चिम एशिया में ‘स्वर्ण युग’ की घोषणा करने के बाद, चार-आयामी शतरंज के खिलाड़ी के रूप में वे मूर्ख
साबित होने का जोखिम उठाएंगे।
ईरान के पास भी
पीछे हटने के कारण हैं। उसके नेता लगातार मारे जा रहे हैं। हालांकि उन्हें अपने
नागरिकों की कोई परवाह नहीं है, जिनमें युद्ध में
मारे गए हजारों लोग भी शामिल हैं, लेकिन बिजली और
परिवहन नेटवर्क के पूरी तरह नष्ट हो जाने से देश में शासन करना और भी मुश्किल हो
जाएगा। वे प्रतिबंध हटवाना भी चाहते हैं।
इस्लामाबाद वार्ता
अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस रविवार को ही
पाकिस्तान से वापस अमेरिका चले गए। पाकिस्तानी मीडिया के अनुसार वापसी से करीब एक
घंटे पहले उन्होंने 'इस्लामाबाद वार्ता' स्थल पर संवाददाता सम्मेलन में कहा, ‘अच्छी खबर यह
है कि 21 घंटे में हमने कई ठोस चर्चाएँ की हैं। बुरी खबर यह है कि हम किसी समझौते
पर नहीं पहुँचे हैं।’
उन्होंने कहा, ‘हमने साफ कर
दिया है कि हमारी रेड लाइन क्या हैं, हम किन बातों के लिए
तैयार हैं और किन बातों के लिए तैयार नहीं हैं।…ईरानी प्रतिनिधिमंडल ने हमारी
शर्तों को स्वीकार नहीं करने का फैसला किया है।’
·
अमेरिका ने इस बात पर जोर दिया कि ईरान परमाणु
हथियारों का काम छोड़ने की गारंटी दे, जिसे तेहरान ने स्वीकार करने से इनकार कर
दिया।
·
ईरान ने कहा कि प्रगति अमेरिका के 'अच्छे विश्वास'
और प्रतिबंधों
से राहत और धन तक पहुँच सहित उसके अधिकारों की मान्यता पर निर्भर करती है।
·
पाकिस्तानी मीडिया के अनुसार गतिरोध के बावजूद
मध्यस्थता करने के लिए दोनों पक्षों ने पाकिस्तान की प्रशंसा की।
·
वेंस ने प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और फील्ड मार्शल असीम
मुनीर की सराहना करते हुए संवाददाता सम्मेलन की शुरुआत करते हुए कहा कि वे ‘अविश्वसनीय
मेजबान’ हैं।
ईरान के सरकारी टेलीविजन प्रसारण में कहा गया कि
अमेरिका की ‘आत्यंतिक माँगें’ समझौते में बाधा बन रही हैं। रिपोर्ट में कहा गया कि
होर्मुज जलसंधि को खोलना, ईरान के यूरेनियम संवर्धन के
अधिकार और ‘अन्य मुद्दे’ प्रमुख अड़चनें पैदा कर रहे हैं। सरकारी टेलीविजन के
अनुसार, ‘ईरानी टीम की सकारात्मक कोशिशों के बावजूद, अमेरिकियों की हद से ज्यादा दखलअंदाजी और अनुचित माँगों ने वार्ता को आगे
बढ़ने से रोक दिया।’
यह तो शुरू से ही मुश्किल लग रहा था कि एक ही
वार्ता में समझौता हो जाएगा। ईरान के साथ 2015 का समझौते करीब दो साल की बात के
बाद हो पाया था। हालाँकि आज परिस्थितियां अलग हैं, क्योंकि
दोनों देश युद्ध की स्थिति में हैं, लेकिन मुद्दों की जटिलता,
ईरान की राष्ट्रीय पहचान में नाभिकीय कार्यक्रम की केंद्रीय भूमिका
और होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण को लेकर चल रहे विवाद, ये
सभी बातें एक लंबी वार्ता का संकेत देती हैं।
वेंस का यह कहना विचित्र है कि उन्हें परमाणु
हथियार न बनाने के लिए ‘साफ प्रतिबद्धता’ की ज़रूरत है। ईरान ने अक्सर कहा है कि हम नाभिकीय अस्त्र नहीं बनाएँगे। ओबामा
प्रशासन के साथ 2015 के परमाणु समझौते के तहत इस आशय की लिखित प्रतिबद्धता भी
शामिल है। ईरान परमाणु अप्रसार संधि का भी हस्ताक्षरकर्ता है, जिसका मूल समझौता यह है कि वह परमाणु प्रौद्योगिकी प्राप्त कर सकता है,
बशर्ते हथियार न बनाने की प्रतिबद्धता जताए और अंतरराष्ट्रीय
निरीक्षणों की अनुमति दे।
15 सूत्री प्रस्ताव
मार्च 2026 में, अमेरिका
ने ईरान के साथ मध्य-पूर्व संघर्ष को समाप्त करने के लिए एक 15-सूत्री शांति
प्रस्ताव रखा था, जिसे 'लीक' दस्तावेजों
के माध्यम से जाना गया है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य ईरान के परमाणु और मिसाइल
कार्यक्रमों को सीमित करना, होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलना और
क्षेत्र में प्रॉक्सी समूहों को समर्थन बंद करना है।
अमेरिका के 15-सूत्री प्रस्ताव के मुख्य बिंदु
(लीक रिपोर्ट के अनुसार):
·
परमाणु कार्यक्रम पर रोक: ईरान को यूरेनियम संवर्धन को
3.67% तक सीमित करना होगा और सभी संवर्धन सुविधाओं को निष्क्रिय करना होगा।
·
मिसाइल और ड्रोन पर प्रतिबंध: लंबी दूरी की बैलिस्टिक
मिसाइल कार्यक्रम को बंद करना और मध्य पूर्व में प्रॉक्सी समूहों को ड्रोन और
हथियार निर्यात रोकना।
·
होर्मुज जलडमरूमध्य: अंतरराष्ट्रीय नौवहन की सुरक्षा
सुनिश्चित करने के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलना।
·
निगरानी: संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में ईरानी परमाणु
सुविधाओं की कड़ी जांच।
·
क्षेत्रीय सुरक्षा: ईरान द्वारा क्षेत्रीय सशस्त्र
समूहों का समर्थन समाप्त करना।
·
प्रतिबंधों में ढील: इन शर्तों को मानने के बदले में
अमेरिका ईरान पर से परमाणु संबंधी आर्थिक प्रतिबंधों को हटाने पर विचार करेगा।
ईरानी जवाब
ईरान ने इन मांगों को ‘आत्यंतिक’ और ‘अस्वीकार्य’
बताते हुए इस प्रस्ताव को लगभग खारिज कर दिया। उसने इसके बदले अपनी शर्तें रखी,
जिनमें अमेरिका द्वारा सैन्य कार्रवाई न करने की गारंटी और
क्षेत्रीय शत्रुता को समाप्त करना शामिल है। ईरान ने 10-सूत्री प्रस्ताव रखा,
जिसमें मुख्य रूप से परमाणु संवर्धन की स्वीकृति, होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण, और सभी अमेरिकी
प्रतिबंधों को हटाना शामिल है। इन माँगों का उद्देश्य क्षेत्रीय दबदबा बढ़ाना और
अमेरिकी प्रभाव को कम करना है। अमेरिका ने इन्हें 'अस्वीकार्य'
बताया है।
ईरान की 10-सूत्री माँगों के प्रमुख बिंदु:
1. प्रतिबंध हटाना:
अमेरिका द्वारा ईरान पर लगे सभी प्राथमिक और माध्यमिक प्रतिबंधों को तुरंत और
पूर्ण रूप से हटाना।
2. यूरेनियम संवर्धन की
स्वीकृति: शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए यूरेनियम संवर्धन करने के ईरान के अधिकार
की मान्यता।
3. होर्मुज जलडमरूमध्य
पर नियंत्रण: तेल परिवहन के महत्वपूर्ण मार्ग पर ईरान का निरंतर और बढ़ाया हुआ
नियंत्रण।
4. अमेरिकी सेना की
वापसी: मध्य पूर्व (क्षेत्र) से अमेरिकी लड़ाकू सैनिकों की पूरी तरह से वापसी।
5. युद्ध हर्जाना:
संघर्ष के कारण ईरान को हुए नुकसान के लिए पुनर्निर्माण लागत के मुआवजे का भुगतान।
6. जब्त संपत्तियां वापस
करना: अमेरिका में जमी हुई ईरान की सभी संपत्तियों और निधियों की रिहाई।
7. सुरक्षा गारंटी: यह
गारंटी कि अमेरिका भविष्य में ईरान के खिलाफ कोई और सैन्य कार्रवाई या हमला नहीं
करेगा।
8. सैन्य अभियानों का
अंत: लेबनान सहित क्षेत्र में ईरान समर्थित बलों के खिलाफ सभी कार्रवाइयों को
रोकना।
9. संरा सुरक्षा परिषद
के प्रस्तावों की समाप्ति: ईरान के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और अंतरराष्ट्रीय
नाभिकीय ऊर्जा एजेंसी के सभी प्रतिबंधात्मक प्रस्तावों को रद्द करना।
10.
सशर्त युद्धविराम: ऊपर दी गई शर्तों की स्वीकृति के
बाद ही पूर्ण और स्थायी युद्धविराम लागू करना।
ये माँगें पाकिस्तान
में मध्यस्थों के माध्यम से पेश की गई थीं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने
इन शुरुआती माँगों को 'अस्वीकार्य' और 'मजाकिया' बताते हुए खारिज कर दिया था।
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