हाल में अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने बीजिंग में रंगारंग कार्यक्रमों के बीच चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की जमकर तारीफ करते हुए उन्हें ‘महान नेता’ और ‘मित्र’ बताया. इसके बाद वे एशिया के किसी और देश में रुके बिना अमेरिका वापस लौट आए. यात्रा के दौरान और बाद के साक्षात्कारों में उन्होंने अमेरिकी सहयोगियों या साझेदारों के बारे में कोई आश्वस्तिकारक बात नहीं कही.
ऐसा ही उन्होंने पिछले साल भारत-पाकिस्तान टकराव
के बाद फील्ड मार्शल आसिम मुनीर का स्वागत करते हुए किया था. भारत की जनता और विश्लेषकों
ने पिछले एस साल से खामोशी के साथ उनके बर्ताव को देखा है.
उन्होंने इस बात पर भी ध्यान दिया, कि ट्रंप ने
बीजिंग में फॉक्स न्यूज को दिए एक साक्षात्कार में अमेरिका और चीन के बीच संबंधों
को संदर्भित करने के लिए ‘जी2’ शब्द का इस्तेमाल किया. ‘टू ग्रेट कंट्रीज़.’
और अब भारत आए अमेरिकी विदेशमंत्री मार्को
रूबियो ने शनिवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ व्यापार और ऊर्जा पर चर्चा
की. हालाँकि वे क्वॉड विदेशमंत्रियों की बैठक के सिलसिले में भारत आए हैं, पर
पर्यवेक्षक इसे भारत-अमेरिका रिश्तों को पटरी पर वापस लाने की कोशिश के रूप में
देख रहे हैं.
दरार पाटेंगे
वे मानते हैं कि यह यात्रा वॉशिंगटन द्वारा लगाए
गए टैरिफ और पाकिस्तान और चीन के साथ अमेरिका के बदलते रिश्तों के कारण भारत के
साथ संबंधों में आई दरार को भरने के इरादे से की गई है.
भारत के साथ संबंधों को ‘रणनीतिक गठबंधन’ बताते
हुए, रूबियो ने रविवार को इस बात पर जोर दिया कि भारत उन
चुनिंदा देशों में से एक है जिनका ‘वैश्विक प्रभाव’ है और ‘वैश्विक घटनाओं को
प्रभावित करने की क्षमता’ है.
विदेशमंत्री एस जयशंकर के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस में
रूबियो ने भारत से वैध प्रवासन, भारतीयों और
भारतीय-अमेरिकियों के खिलाफ नस्लवादी टिप्पणियों और पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व के
साथ अमेरिका के घनिष्ठ संबंधों से जुड़ी चिंताओं को दूर करने की कोशिश की. साथ ही
आश्वासन दिया कि भारत के साथ द्विपक्षीय संबंधों में कोई कमी नहीं आई है.
रूबियो के बराबर खड़े भारत के विदेशमंत्री एस जयशंकर ने कहा, ‘ट्रंप प्रशासन ने अपनी विदेश-नीति को 'अमेरिका फर्स्ट' के रूप में व्यक्त किया है.’ और, ‘हमारी नीति 'इंडिया फर्स्ट' है.’
आई लव इंडिया
अमेरिका के स्वतंत्रता दिवस की 250वीं वर्षगांठ
मनाने के लिए दिल्ली में अमेरिकी दूतावास द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में शामिल
होते हुए, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रविवार को एक
लाइव फोन कॉल में भारत को अपना ‘100 प्रतिशत’ समर्थन देने का
आश्वासन दिया.
‘मुझे भारत से प्यार है… मुझे प्रधानमंत्री से
प्यार है. (नरेंद्र) मोदी महान हैं. वे
मेरे मित्र हैं, और मैं आज सुबह यहाँ और आज शाम आप सभी को
बहुत-बहुत शुभ संध्या कहना चाहता हूँ. और मैं बस इतना कहना
चाहता हूँ कि आप महान हैं. हम भारत के पहले से कहीं अधिक
करीब हैं, और भारत मुझ पर और हमारे देश पर शत प्रतिशत भरोसा
कर सकता है,’ ट्रंप ने कहा.
ट्रंप स्पीकर फोन पर अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर
से बात कर रहे थे, जिन्होंने उन्हें भारतीय समयानुसार रात
करीब 9 बजे (वाशिंगटन डीसी में सुबह 11:30 बजे) फोन किया था.
इस कार्यक्रम में मार्को रूबियो और एस जयशंकर सहित लगभग 1,500
मेहमान शामिल हुए थे.
इन अच्छी बातों के बरक्स महाकवि रहीम का दोहा
याद आता है, ‘रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय/ टूटे से फिर
ना जुड़े, जुड़े गाँठ परि जाय’. अमेरिका चाहेगा, तो रिश्ते सुधर भी जाएँगे, पर ‘गाँठ’ पड़ी रहेगी.
क्वॉड की बैठक
जापान, ऑस्ट्रेलिया और
अमेरिका के विदेशमंत्रियों के भारत आने के साथ 26 मई को नई दिल्ली में क्वॉड विदेश
मंत्रियों की बैठक भी हुई. क्वाड समूह ने महत्वपूर्ण खनिजों और ऊर्जा में सहयोग को
विस्तार देने का निश्चय किया. साथ ही इस क्षेत्र में चीन की बढ़ती सैन्य सक्रियता
की पृष्ठभूमि में हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री निगरानी और बंदरगाह बुनियादी
ढांचे को बढ़ावा देने के लिए नए उपायों का अनावरण किया.
बैठक की अध्यक्षता विदेशमंत्री एस जयशंकर ने की
और इसमें अमेरिकी विदेशमंत्री मार्को रूबियो, ऑस्ट्रेलियाई
विदेशमंत्री पेनी वोंग और जापानी विदेशमंत्री तोशिमित्सु मोतेगी ने भाग लिया.
अपने मीडिया बयान में, रूबियो
ने कहा कि क्वाड की बैठक में इंडो-पैसिफिक समुद्री निगरानी सहयोग पहल शुरू करने का
निर्णय लिया गया है. उन्होंने क्वाड देशों के बीच हिंद प्रशांत क्षेत्र जागरूकता
पहल के विस्तार की भी घोषणा की. उन्होंने यह भी कहा कि क्वाड ने प्रशांत द्वीप
समूह में बंदरगाह बुनियादी ढाँचे को बढ़ावा देने के लिए एक नई पहल शुरू करने का
निर्णय लिया है।
भारत में क्वॉड शिखर सम्मेलन भी होना है, जिसे लेकर
अभी स्थिति स्पष्ट नहीं है. वस्तुतः इसे 2025 के अंत में ही होना था, लेकिन नहीं हो सका. इस साल भी संभावना कम लगती है.
इसमें राष्ट्रपति ट्रंप को भी आना है. सवाल यही
है कि क्या वे आएँगे? इस साल ब्रिक्स का शिखर सम्मेलन भी होने वाला है, जिसमें चीन के
राष्ट्रपति शी चिनफिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के आने की संभावना
है.
रूबियो की यात्रा
रूबियो ने अपनी यात्रा शुरू करने के पहले कहा था
कि अमेरिका भारत को ऊर्जा बेचना चाहता है. मायामी में पत्रकारों से बात करते हुए
रूबियो ने कहा, ‘भारत हमसे जितना तेल ख़रीदना चाहता है,
उतना हम देने के लिए तैयार हैं. अमेरिका इस समय रिकॉर्ड स्तर पर तेल
उत्पादन और निर्यात कर रहा है.’
अपना तेल ही नहीं, वेनेज़ुएला का तेल भी अमेरिका
बेचना चाहता है. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अमेरिका, ईरान को वैश्विक ऊर्जा
बाजार को बंधक बनाने नहीं देगा. वह, भारत की रूसी तेल पर
निर्भरता को खत्म कराना चाहता है, पर ईरान-युद्ध के कारण ऐसा पूरी तरह हो नहीं सका
है.
तेल ख़रीदने का विरोध, वेनेज़ुएला में सत्ता
परिवर्तन और ईरान पर हमले के पीछे वस्तुतः अमेरिका की पेट्रोडॉलर व्यवस्था को बचाए
रखने की कोशिश है. तेल का वैश्विक-व्यापार मुख्य रूप से अमेरिकी डॉलर में होता है.
इस वजह से भी डॉलर का वैश्विक-प्रभुत्व है. वैकल्पिक-स्रोत खुलेंगे, तो डॉलर का पराभव
हो जाएगा.
अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने, जिनमें ट्रंप का पहला कार्यकाल भी शामिल है, भारत को, हिंद-प्रशांत
क्षेत्र में रूस और चीन के मुकाबले, बैलेंसिंग-फोर्स के रूप में खड़ा करने का
प्रयास किया है.
ऐसी भारत की इच्छा नहीं है, केवल अमेरिकी
मनोकामना है, जो अब बदलती दिखाई पड़ रही है. पिछले साल ट्रंप ने भारत पर उच्चतम
अमेरिकी टैरिफ लगाते हुए इस बात की ओर इशारा कर दिया था. सवाल है कि तब रूबियो
क्या करने आए हैं?
रूबियो ने पीएम मोदी से मुलाकात के बाद
पत्रकारों से कहा, भारत इस बात की आधारशिला है कि अमेरिका
हिंद-प्रशांत क्षेत्र के प्रति किस तरह का दृष्टिकोण अपनाएगा. ऐसा सिर्फ क्वॉड के
माध्यम से ही नहीं, बल्कि द्विपक्षीय रूप से भी होगा. यानी
अमेरिका, पूरी तरह इस डोर को तोड़ना नहीं चाहता.
रिपेयर की कोशिश
रूबियो अब टैरिफ से प्रभावित संबंधों को सुधारने
का प्रयास कर रहे हैं. उसके कई प्रावधानों को अंतरिम समझौते में वापस ले लिया गया
था, पर दोनों देशों ने व्यापार-समझौते को अंतिम रूप नहीं
दिया है.
पिछले एक साल में भारत के प्रतिद्वंद्वी,
पाकिस्तान से अमेरिकी याराना बढ़ा है. ईरान-युद्ध को समाप्त करने के प्रयासों में पाकिस्तान,
प्रमुख वार्ताकार के रूप में उभरा है. भारत के नीति-निर्धारकों ने इसे नोट तो किया
ही है.
बहरहाल अमेरिका ने ट्रंप के विश्वस्त सर्जियो
गोर को भारत का राजदूत बनाकर भेजा है, जिन्होंने कहा है कि रूबियो ने अमेरिकी
राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की ओर से मोदी को निकट भविष्य में वाइट हाउस आने का
निमंत्रण भी दिया है.
टैरिफ-प्रहार
ट्रंप के पहले जो बाइडेन प्रशासन ने भारत को
महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार के रूप में महत्त्व दिया था. 2023 की राजकीय यात्रा के दौरान, अमेरिका में मोदी का भव्य स्वागत हुआ था.
ट्रंप ने भी अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत में उनका
वाइट हाउस में स्वागत किया, लेकिन उसके फौरन बाद भारी टैरिफ
लगा दिए, जिससे दोनों के संबंध बिगड़े. इस बिगाड़ को सुधारने की कोशिश भी साथ ही
साथ चली.
इस साल फरवरी में, दोनों
देशों ने व्यापार पर एक ‘अंतरिम समझौते की रूपरेखा’ बनाई, जिसके तहत भारतीय
वस्तुओं पर ट्रंप द्वारा लगाए गए टैरिफ को 50 से घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया गया.
फरवरी में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप के
टैरिफ को रद्द कर दिया, जिसके बाद भारत से समझौते को अंतिम रूप देने की बातचीत
धीमी पड़ गई. पिछले साल के अंत में क्वॉड शिखर सम्मेलन के लिए ट्रंप की
भारत-यात्रा, बदलते हालात में हो नहीं पाई.
कठिन डगर…
रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक
एंड इंटरनेशनल स्टडीज थिंक टैंक के रिचर्ड रॉसो का कहना है, ‘मुझे उम्मीद नहीं है कि रूबियो इस गिरावट की दिशा को बदलने में बहुत असर डाल
पाएँगे.’
उनके अनुसार, ‘अंतरिम
समझौते' की घोषणा के तीन महीने से अधिक समय बीत जाने के बाद
भी व्यापार समझौते का न होना, अन्य क्षेत्रों में आपसी सहयोग
की संभावनाओं को धूमिल कर देता है.’
उधर क्वॉड का महत्त्व भी कम हो रहा है. यह समूह
2007 से अस्तित्व में है, लेकिन काफी समय तक यह निष्क्रिय
रहा. 2017 में यह पुनर्जीवित हुआ और इसने नियमित रूप से चीन के प्रति असंतोष को व्यक्त
किया है.
पाकिस्तान और चीन के प्रति अमेरिकी-नीति ने भारत
के लिए पहेली है. बेशक भारत-अमेरिका संबंध जारी रहेंगे क्योंकि दोनों देशों की साझेदारी
के आर्थिक-कारण भी हैं, पर घनिष्ठ मित्रता का भाव खत्म हो रहा है.
भटकते रिश्ते
अमेरिका के काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस में दक्षिण
एशिया के वरिष्ठ फैलो सदानंद धूमे ने लिखा है, रूबियो सुधार के इरादे से भारत गए
हैं. वे दशकों की प्रगति के बाद भटकते संबंधों को पुनर्जीवित करने का प्रयास
करेंगे.
पिछले साल भारत ने उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और
उनके परिवार का भव्य स्वागत किया था. उस यात्रा ने न केवल द्विपक्षीय संबंधों की
मजबूती को उजागर किया, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और
ट्रंप प्रशासन के शुरुआती दौर में देखने को मिली व्यक्तिगत गर्मजोशी को भी दर्शाया.
वेंस की भारत यात्रा से पहले, पीएम मोदी ने फरवरी में राष्ट्रपति ट्रंप से वाइट हाउस में मुलाकात की थी.
राष्ट्रपति के दूसरे कार्यकाल में ऐसा करने वाले वे जापान के पूर्व प्रधानमंत्री
इशिबा शिगेरु के बाद दूसरे एशियाई नेता थे.
‘मागा’ और ‘मीका’
उस दौरान मोदी ने कहा था, ‘मागा’ (मेक अमेरिका ग्रेट अगेन) और ‘मीका’ (मेक इंडिया ग्रेट अगेन) मिलकर ‘समृद्धि के लिए एक
मेगा पार्टनरशिप’ का निर्माण करेंगे.
उस समय, अमेरिका के साथ
संबंधों को लेकर भारत का आशावाद उचित प्रतीत होता था. सदी की शुरुआत से ही,
वाशिंगटन और नई दिल्ली मौखिक और वास्तविक दोनों नज़रियों से
एक-दूसरे के करीब आ गए थे, पर अब भारत के नीति-नियंता ही नहीं, जनता भी अमेरिका को
लेकर बहुत सतर्क है.
इस साल जनवरी में ‘इंडिया टुडे’ के एक सर्वेक्षण में पाया गया कि 54 प्रतिशत भारतीय
मानते हैं कि ट्रंप के शासनकाल में भारत और अमेरिका के संबंध बिगड़ गए हैं.
क्वॉड का महत्त्व
पिछले पच्चीस वर्षों में, रिपब्लिकन
और डेमोक्रेट दोनों ही सरकारों ने एशिया में चीन के प्रति-संतुलन में भारत को
लुभाने का प्रयास किया. आज यह संबंध दिशाहीन हैं. इन्हें फिर से पटरी पर लाना आसान
नहीं है.
भारतीय अब इस बात को लेकर आश्वस्त नहीं हैं कि
अमेरिकी-नीतियाँ, अब भी चीन को प्रतिस्पर्धी निगाहों से देखती हैं. पिछले साल भारत
में होने वाला क्वॉड शिखर सम्मेलन इसीलिए नहीं हो सका.
नई अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति में इस
समूह का नाममात्र का ही जिक्र है. ट्रंप की अगर क्वॉड में दिलचस्पी नहीं है,
तो उसका प्रासंगिक बने रहना मुश्किल होगा.
भारत, अपने तईं अनावश्यक रूप से चीन को उकसाना
नहीं चाहता. 2017 और 2020 में दोनों देशों के बीच गंभीर सैन्य टकराव हो चुके हैं.
अब अमेरिका खुद ही चीन से टकराव नहीं चाहता.
ईरान में चल रहे युद्ध से भारत की ऊर्जा-सुरक्षा
और अर्थव्यवस्था को गंभीर रूप से नुकसान पहुँचा है. इसके लिए भी भारत के लोग ट्रंप
की नीतियों को जिम्मेदार मानते हैं.

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