Friday, May 1, 2026

ऊर्जा-आत्मनिर्भरता की राह में बड़ा कदम


भारत ने अपने परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम में हाल में एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। तमिलनाडु के कल्पक्कम में स्वदेशी डिजाइन से निर्मित प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (पीएफबीआर) ने 6 अप्रैल को सफलतापूर्वक अपनी प्रथम क्रिटिकैलिटी प्राप्त की, जो नाभिकीय चेन रिएक्शन की शुरुआत है। यह प्रोटोटाइप एफबीआर 500 मेगावॉट विद्युत (एमडब्लूई) रिएक्टर है, जिसे भारतीय नाभिकीय विद्युत निगम लिमिटेड (भाविनी) ने तमिलनाडु के कल्पक्कम नाभिकीय परिसर में निर्मित किया है।

यह तकनीक नाभिकीय ऊर्जा में यूरेनियम पर निर्भरता कम करेगी। इस उपलब्धि के साथ, भारत अपने तीन-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के दूसरे चरण में प्रवेश कर गया है, जिसकी परिकल्पना डॉ होमी जहाँगीर भाभा ने की थी। वैश्विक स्तर पर भी यह महत्त्वपूर्ण परिघटना है। इसके पूर्ण संचालन में आने के बाद, रूस के बाद भारत, फास्ट ब्रीडर रिएक्टर का संचालन करने वाला, दुनिया का दूसरा देश बन जाएगा।

ईरान-युद्ध के आर्थिक दुष्प्रभावों के साथ, दुनिया भर के देश ऊर्जा सुरक्षा की तलाश में हैं। ज्यादातर देश कोयले और पेट्रोलियम के रूप में फॉसिल फ्यूल के सहारे हैं, पर अब उनके खत्म होने का समय है। वैसे भी उनके पर्यावरणीय दुष्प्रभाव को देखते हुए विकल्पों की तलाश चल रही है। पनबिजली, सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा जैसे विकल्पों की तुलना में नाभिकीय ऊर्जा सबसे आगे है, क्योंकि बड़े स्तर पर वही जरूरत पूरी कर सकती है। उसके साथ भविष्य के तकनीकी विकास भी जुड़े हैं, जो नए विकल्पों को खोलेंगे।

अमेरिका के वैज्ञानिकों ने हाल में संलयन (फ्यूज़न) ऊर्जा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त घोषणा की है। व्यावसायिक रूप से इस पद्धति से बिजली बनाने में अभी कई दशक लगेंगे, पर भविष्य में यह ऊर्जा का विश्वसनीय स्रोत साबित होगा। यह बिजली भी परमाणु के नाभिकीय में छिपे ऊर्जा स्रोत पर आधारित होगी, पर अभी प्रचलित विखंडन पर आधारित नाभिकीय ऊर्जा से एकदम अलग और सुरक्षित होगी।

नाभिकीय ऊर्जा स्वच्छ है, पर उसके साथ दुर्घटनाओं के जोखिम हैं। इस वजह से जर्मनी ने 2023 में परमाणु विखंडन (फ़िज़न) को छोड़ने का फैसला किया है। वह भी परमाणु संलयन तकनीक पर भारी निवेश कर रहा है, जिसे वह भविष्य की स्वच्छ ऊर्जा के रूप में देखता है। जापानी नेतृत्व ने 2011 की फुकुशिमा आपदा से पैदा हुई सार्वजनिक चिंताओं के बावजूद अब परमाणु ऊर्जा को फिर से अपनी प्राथमिकता बनाया है। ईरान युद्ध ने, उनके परमाणु संयंत्रों को फिर से खोलने और नए संयंत्र बनाने की बातें हैं। दक्षिण कोरिया पहले से ही दुनिया के सबसे बड़े परमाणु ऊर्जा उत्पादकों में से एक है। वह भी अपनी असैनिक-परमाणु क्षमता का विस्तार कर रहा है।

भारत में परमाणु ऊर्जा के सतत विकास के लिए फास्ट ब्रीडर की अनिवार्यता को डॉ होमी भाभा ने 1950 के दशक में ही समझ लिया था। उन्होंने माना कि भारत में यूरेनियम के सीमित भंडार नाभिकीय ऊर्जा कार्यक्रम को लंबे समय तक चला नहीं पाएँगे। उन्होंने यूरेनियम के कुशल उपयोग के लिए ब्रीडर प्रणाली का सुझाव दिया। भारत में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थोरियम, दीर्घकालीन परमाणु कार्यक्रम में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

पीएफबीआर परियोजना की गतिविधियाँ 2003 में शुरू हुईं और उसी वर्ष भाविनी’ नामक सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम की स्थापना हुई। प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर में क्रिटिकैलिटी केवल तकनीकी उपलब्धि नहीं है। यह भारत के दीर्घकालिक परमाणु विज़न की परिपक्वता और उसकी स्वदेशी क्षमताओं की मजबूती को दर्शाती है। सीमित यूरेनियम संसाधनों से लेकर थोरियम-संचालित भविष्य तक, भारत का तीन-चरणीय कार्यक्रम अब क्रियान्वयन की दिशा में बढ़ रहा है। कल्पक्कम नाभिकीय परिसर में हुई प्रगति उन्नत रिएक्टर प्रौद्योगिकियों में भरोसे को दर्शाती है।

जैसे-जैसे क्षमता का विस्तार होगा और नई प्रौद्योगिकियाँ आकार लेंगी, परमाणु ऊर्जा भारत के ऊर्जा मिश्रण में कहीं अधिक केंद्रीय भूमिका निभाने लगेगी। इस समय रूस ही फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (एफबीआर) संचालित कर रहा है। हालाँकि कई देशों ने प्रायोगिक फास्ट रिएक्टर विकसित या संचालित किए हैं, जिनमें अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान, जर्मनी और चीन शामिल हैं, पर इनमें से ज्यादातर कार्यक्रम बंद हैं। इनकी लागत और तकनीकी सुरक्षा आड़े आई, पर भारत ने इन दिक्कतों पर काबू पाया है, क्योंकि यह तकनीक ही हमारी मददगार है।

भारत के पास सीमित यूरेनियम भंडार हैं, लेकिन थोरियम के विश्व के सबसे बड़े भंडारों में से एक है। इसके लिए हमारे परमाणु ऊर्जा विभाग ने तीन-चरणों वाला नाभिकीय ऊर्जा कार्यक्रम बनाया है। इस कार्यक्रम का पहला चरण है, प्रेशराइज़्ड हैवी वॉटर रिएक्टर (पीएचडब्लूआर), जिसमें प्राकृतिक यूरेनियम का उपयोग किया जाता है। इनमें प्रयुक्त ईंधन प्लूटोनियम उत्पन्न करता है, जो अगले चरण के लिए मुख्य इनपुट बनता है। दूसरा चरण है, फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (एफबीआर)। चरण 1 से प्राप्त प्लूटोनियम का उपयोग फास्ट ब्रीडर रिएक्टरों में ईंधन के रूप में किया जाता है।

कल्पक्कम स्थित प्रोटोटाइप एफबीआर इस चरण में भारत के प्रवेश का संकेत देता है। इन रिएक्टरों का उपयोग थोरियम से यूरेनियम-233 बनाने के लिए किया जाएगा, जो चरण 3 की नींव रखेगा। चरण 3 है थोरियम-आधारित रिएक्टर। इसमें भारत के विशाल थोरियम भंडार का बड़े पैमाने पर उपयोग किया जाएगा, जिसमें चरण 2 में उत्पन्न यूरेनियम-233 को ईंधन के रूप में प्रयोग किया जाएगा। थोरियम को व्यावहारिक रूप से असीमित ऊर्जा स्रोत माना जाता है और यह चरण भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा की कुंजी है।

छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों के अलावा भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र अगली पीढ़ी के रिएक्टर डिजाइनों का विकास कर रहा है, जिनमें 200 मेगावॉट विद्युत (एमडब्लूई) भारत स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर (बीएसएमआर-200), 55 मेगावॉट विद्युत (एमडब्लूई) एसएमआर-55, और हाइड्रोजन उत्पादन के लिए डिजाइन किया गया 5 मेगावॉट तापीय (एमडब्लूटीएच) तक का उच्च-ताप गैस-शीतित रिएक्टर शामिल है। इस मिशन को सफल बनाने के लिए सरकार ने ‘द सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया (शांति) अधिनियम, 2025’ लागू किया है, जिसके तहत देश का निजी क्षेत्र भी नाभिकीय ऊर्जा उत्पादन से जुड़ेगा।  

देश में कोयले और नवीकरणीय स्रोतों के बाद बिजली का पाँचवाँ सबसे बड़ा स्रोत नाभिकीय ऊर्जा है, जो कुल उत्पादन का लगभग 3 प्रतिशत है। अप्रैल 2026 तक, भारत में 22 से अधिक रिएक्टरों के माध्यम से 8.8 गीगावॉट की स्थापित क्षमता है। इसे 2047 तक इसे बढ़ाकर 100 गीगावॉट करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य है। यह कार्यक्रम मुख्य रूप से स्वदेशी तकनीक प्रेशराइज़्ड हैवी वॉटर रिएक्टर पर आधारित है और कजाकिस्तान के साथ हाल में यूरेनियम सौदों से मजबूत हुआ है।

हाल में शुरू किए गए ‘परमाणु मिशन’ के अंतर्गत, 2033 तक पाँच लघु मॉड्यूलर रिएक्टर (एसएमआर) स्थापित करने की योजना भी है, जो खास तौर से उद्योग, घनी आबादी वाले क्षेत्रों, ग्रिड कनेक्शन से वंचित दूर-दराज़ के क्षेत्रों, थर्मल संयंत्रों के पुन: उपयोग आदि के लिए उपयोगी होंगे। इस समय नाभिकीय ऊर्जा की क्षमता देश की ऊर्जा क्षमता का तीन प्रतिशत ही है, पर भविष्य में नाभिकीय ऊर्जा केवल पूरक स्रोत नहीं रहेगी।

सरकार ने केंद्रीय बजट 2025–26 में परमाणु ऊर्जा मिशन की घोषणा की है, जिसका उद्देश्य 2047 तक 100 गीगावॉट परमाणु विद्युत उत्पादन क्षमता प्राप्त करना है। नाभिकीय ऊर्जा बिजली का बेस स्रोत बनेगा, जो चौबीसों घंटे उपलब्ध रहेगा। यह पनबिजली, सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा जैसे अक्षय स्रोतों के मुकाबले ज्यादा बड़े स्तर पर उपलब्ध भी होगा। यह केवल फौरी विकल्प नहीं, बल्कि दीर्घकालीन व्यावहारिक आवश्यकता है।

दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित

 

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