पश्चिम एशिया की लड़ाई में युद्धविराम के बाद इस्लामाबाद में हुई पहली बातचीत के सफल नहीं होने का मतलब यह भी नहीं है कि वह विफल हो गई. ऐसे मसले एक दिन की वार्ता से हल होते भी नहीं हैं.
अब सवाल पूछा जा सकता है कि तब क्या दो हफ्ते
बाद लड़ाई फिर से उसी बिंदु से शुरू हो जाएगी, जहाँ पर वह रुकी थी? कोई नहीं कह सकता कि अब क्या होगा. सबसे बड़ी बात है कि लड़ाई रुकी नहीं
है, बल्कि उसका तरीका बदला है.
लेबनान में तो लड़ाई चल ही रही है. और ट्रंप
की घोषणा के बरक्स अमेरिकी सेंटकॉम ने होर्मुज की नाकाबंदी शुरू कर दी है, जिसके बाद दोनों देशों की सेनाएँ आमने-सामने हैं. यह बात बड़े खतरनाक परिदृश्य को जन्म
दे रही है.
दूसरी तरफ बातचीत भी रुकी नहीं है, किसी न किसी
स्तर पर चल ही रही है. ऐसे मसलों के फैसले सोशल मीडिया की पोस्टों और मीडिया के
विश्लेषणों से तय नहीं होते हैं, बल्कि ‘बैकरूम वार्ताओं’ से ही तय होते हैं.
इन बातों के
मद्देनज़र तीन-चार ‘प्रत्यक्ष’ मुद्दे सामने आ चुके हैं, ‘परोक्ष’ मुद्दे अक्सर कभी सामने नहीं आते.
हरमूज़ की नाकाबंदी
इस्लामाबाद वार्ता खत्म होने के बाद अमेरिकी
सेना ने रविवार को कहा कि वह ‘ईरानी बंदरगाहों और तटीय क्षेत्रों में प्रवेश करने
या वहाँ से निकलने वाले’ किसी भी जहाज की नाकाबंदी करेगी. उसके पहले राष्ट्रपति
ट्रंप ने आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण जलमार्ग हरमूज़ (या होर्मुज) को पूरी तरह से
अवरुद्ध करने की घोषणा की थी.
अब यह नाकाबंदी शुरू हो चुकी है. अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने सोशल मीडिया पर जारी एक बयान में कहा था कि ईरानी बंदरगाहों पर नाकाबंदी सोमवार को पूर्वी समयानुसार सुबह 10 बजे (यानी भारतीय समयानुसार रात 8.30 बजे) से शुरू होगी.
इसमें यह भी कहा गया है कि अमेरिकी सेनाएं होर्मुज जलडमरूमध्य से गैर-ईरानी बंदरगाहों तक आने-जाने वाले जहाजों के लिए नौवहन की स्वतंत्रता में बाधा नहीं डालेंगी. एक तरह से यह लड़ाई जारी रहने की घोषणा ही है.
हालाँकि बयान में कहा गया कि यह कदम ‘राष्ट्रपति
की घोषणा के अनुरूप’ है, लेकिन लगता है कि ट्रंप की उस घोषणा
को नरम कर दिया गया है. पहले उन्होंने जलडमरूमध्य में प्रवेश करने या बाहर निकलने
की कोशिश करने वाले ‘सभी जहाजों’ को रोकने की बात कही थी.
सुबह फॉक्स न्यूज को दिए एक साक्षात्कार में
राष्ट्रपति ने दोहराया था कि यह ‘पूर्ण नाकाबंदी’ होगी और कहा था कि जलडमरूमध्य से
यातायात ‘या तो पूरी तरह से होगा या बिल्कुल नहीं होगा’.
ईरानी जवाब
उधर ईरान के सर्वोच्च नेता मोज़्तबा खामनेई के
एक सलाहकार ने चेतावनी दी है कि ईरान के पास किसी भी नौसैनिक नाकाबंदी का मुकाबला
करने के लिए ‘बड़े, अप्रयुक्त साधन’ मौजूद हैं. शीर्ष
वार्ताकार, मोहम्मद बाग़ेर ग़ालिबफ़ ने, सीधे अमेरिकी उपभोक्ताओं को संबोधित करते हुए कहा: ‘जल्द ही आपको 4-5 डॉलर
के पेट्रोल की याद आएगी.’
लड़ाई शुरू होने के बाद से ईरान ने जलडमरूमध्य
में जहाजों के आवागमन पर पूरी तरह से रोक लगा दी है, जिससे
होकर दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल का प्रवाह होता है. ईरान केवल अपने जहाजों को और
कुछ दूसरे देशों के जहाजों को ही गुजरने की अनुमति दे रहा है.
इस वजह से संघर्ष के दौरान वैश्विक तेल की
कीमतों में 50 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई थी, और अमेरिका
ने ईरान से जलडमरूमध्य को खोलने की माँग की थी और कहा था कि तेहरान ऐसा करेगा, तभी
युद्धविराम होगा.
तेल की कीमतें
यातायात ठप होने से तेल की कीमतों में उछाल आया
है. ईरान से आने-जाने वाले जहाजों पर अमेरिकी नाकाबंदी के कारण फारस की खाड़ी के
देशों से तेल ले जाने वाले जहाजों को जलमार्ग से गुजरने की स्वतंत्रता मिली, तो
कीमतें कम हो सकती हैं. ऐसा होगा या नहीं यही देखना और समझना है.
अभी बहुत कुछ अनिश्चित है. क्या ऐसी गहमागहमी
में पोत संचालक ऐसे में जलडमरूमध्य से
गुजरने का जोखिम उठाएंगे? जहाजरानी से जुड़ी खुफिया जानकारी देने वाली
कंपनी टैंकर ट्रैकर्स ने रविवार को बताया कि नेशनल ईरानी टैंकर कंपनी का एक सुपर
टैंकर सात साल में पहली बार 20 लाख बैरल ईरानी कच्चे तेल के साथ भारत पहुँचा है.
इस्लामाबाद वार्ता
लड़ाई जितने नाटकीय तरीके से शुरू हुई, उतने ही
नाटकीय तरीके से ‘युद्धविराम’ हुआ. नाटकीय तरीके से पाकिस्तान के
प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ ने किसी ‘बाहरी स्रोत’ से प्राप्त ‘ड्राफ्ट’ को अपना कहकर एक्स पर जारी किया.
उस सूचना की
पर्याप्त फज़ीहत होती, उसके पहले ही शनिवार की शाम ‘इस्लामाबाद वार्ता’ का नाटकीय पटाक्षेप हो गया. अब इस नाटक
के दूसरे अंक की प्रतीक्षा करनी चाहिए, क्योंकि समस्या जस की तस है.
देखना यह भी
होगा कि पाकिस्तान की कथित मध्यस्थता जारी रहेगी या इस शतरंज की बिसात पर कोई नया
मोहरा रखा जाएगा. अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस रविवार
को ही पाकिस्तान से वापस अमेरिका चले गए.
वापसी से करीब एक घंटे पहले उन्होंने 'इस्लामाबाद वार्ता' स्थल पर संवाददाता सम्मेलन में
कहा, ‘अच्छी खबर यह है कि 21 घंटे में हमने कई ठोस चर्चाएँ
की हैं. बुरी खबर यह है कि हम किसी समझौते पर नहीं पहुँचे हैं.’
दोनों तरफ अविश्वास
वेंस ने कहा, ‘हमने साफ कर
दिया है कि हमारी रेड लाइन क्या हैं, हम किन बातों के लिए
तैयार हैं और किन बातों के लिए तैयार नहीं हैं.…ईरानी प्रतिनिधिमंडल ने हमारी
शर्तों को स्वीकार नहीं करने का फैसला किया है.’
अमेरिका ने इस बात पर जोर दिया है कि ईरान
परमाणु हथियारों का काम छोड़ने की गारंटी दे, जिसे तेहरान ने स्वीकार करने से
इनकार कर दिया. ईरान ने कहा कि प्रगति अमेरिका के 'अच्छे
विश्वास' और प्रतिबंधों से राहत और धन तक पहुँच सहित उसके
अधिकारों की मान्यता पर निर्भर करती है.
ईरान के सरकारी टेलीविजन प्रसारण में कहा गया कि
अमेरिका की ‘आत्यंतिक माँगें’ समझौते में बाधा बन रही हैं. रिपोर्ट में कहा गया कि
होर्मुज जलसंधि को खोलना, ईरान के यूरेनियम संवर्धन के
अधिकार और ‘अन्य मुद्दे’ प्रमुख अड़चनें पैदा कर रहे हैं.
इस प्रसारण के अनुसार, ‘ईरानी
टीम की सकारात्मक कोशिशों के बावजूद, अमेरिकियों की हद से
ज्यादा दखलअंदाजी और अनुचित माँगों ने वार्ता को आगे बढ़ने से रोक दिया.’
जादू की छड़ी नहीं
यह तो शुरू से ही मुश्किल लग रहा था. कोन सी
जादू की छड़ी एक दिन की वार्ता में बरसों पुराने विवादों पर समझौता करा देगी? ईरान के साथ 2015 का समझौते करीब दो साल के विमर्श के बाद हो पाया था.
हालाँकि आज परिस्थितियाँ अलग हैं, क्योंकि दोनों देश युद्ध की स्थिति में हैं, लेकिन
मुद्दों की जटिलता, ईरान की राष्ट्रीय पहचान में नाभिकीय कार्यक्रम
की केंद्रीय भूमिका और होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण को लेकर चल रहे विवाद,
ये सभी बातें एक लंबी वार्ता का संकेत देती हैं.
वेंस का यह कहना विचित्र है कि उन्हें परमाणु
हथियार न बनाने के लिए ‘साफ प्रतिबद्धता’ की ज़रूरत है. दूसरी तरफ यह भी ध्यान दें कि ईरान ने अक्सर कहा है कि हम
नाभिकीय अस्त्र नहीं बनाएँगे.
ओबामा प्रशासन के साथ 2015 के परमाणु समझौते के
तहत इस आशय की लिखित प्रतिबद्धता भी शामिल है. ईरान परमाणु अप्रसार संधि का भी
हस्ताक्षरकर्ता है, जिसका मूल समझौता यह है कि वह परमाणु
प्रौद्योगिकी प्राप्त कर सकता है, बशर्ते हथियार न बनाने की
प्रतिबद्धता जताए और अंतरराष्ट्रीय निरीक्षणों की अनुमति दे.
प्रस्ताव, जवाबी प्रस्ताव
मार्च 2026 में, अमेरिका
ने ईरान के साथ मध्य-पूर्व संघर्ष को समाप्त करने के लिए एक 15-सूत्री शांति
प्रस्ताव रखा था, जो आधिकारिक रूप से तो सामने नहीं आया, केवल 'लीक' दस्तावेजों के माध्यम से ही मीडिया में आया.
इसका मुख्य उद्देश्य ईरान के परमाणु और मिसाइल
कार्यक्रमों को सीमित करना, होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलना और
क्षेत्र में प्रॉक्सी समूहों को समर्थन बंद करना है.
ईरान ने इन मांगों को ‘आत्यंतिक’ और ‘अस्वीकार्य’
बताते हुए इस प्रस्ताव को लगभग खारिज कर दिया. उसने इसके बदले अपनी शर्तें रखी,
जिनमें अमेरिका द्वारा सैन्य कार्रवाई न करने की गारंटी और
क्षेत्रीय शत्रुता को समाप्त करना शामिल है.
ईरान ने 10-सूत्री प्रस्ताव रखा, जिसमें मुख्य रूप से परमाणु संवर्धन की स्वीकृति, होर्मुज
जलडमरूमध्य पर नियंत्रण, और सभी अमेरिकी प्रतिबंधों को हटाना
शामिल है. इन माँगों का उद्देश्य क्षेत्रीय दबदबा बढ़ाना और अमेरिकी प्रभाव को कम
करना है. अमेरिका ने इन्हें 'अस्वीकार्य' बताया है.
ये माँगें पाकिस्तान में मध्यस्थों के माध्यम से
पेश की गई थीं. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इन शुरुआती माँगों को 'अस्वीकार्य' और 'मज़ाकिया'
बताते हुए खारिज कर दिया था.
इसराइल की भूमिका
यह मसला केवल अमेरिका और ईरान के बीच का है भी
नहीं. इसमें इसराइल की भी भूमिका है, जो इस्लामाबाद-वार्ता में सीधे तौर पर शामिल
नहीं था. फिलहाल हम नहीं कह सकते कि अमेरिका उससे किनाराकशी कर लेगा.
युद्धविराम की घोषणा के कुछ ही घंटों के भीतर,
इसराइल ने लेबनान में एक समन्वित हमला किया, जिसे
उसकी सेना ने ‘लेबनान में अब तक का सबसे बड़ा समन्वित हमला’ बताया. इस हमले में 10 मिनट के भीतर 100 से अधिक ठिकानों पर हमला किया गया.
इसमें करीब 250 लोग मारे
गए. इन हमलों की वजह से भी अस्थिर युद्धविराम लगभग टूट चुका है. अमेरिका का दावा
है कि लेबनान में अभियान रोकना समझौते का हिस्सा नहीं था.
इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने भी
कहा है, हालाँकि इसराइल युद्धविराम का समर्थन करता है, लेकिन
लेबनान पर हमले जारी रहेंगे. मोटे तौर पर लगता है कि इसराइल इस लड़ाई को किसी न
किसी रूप में जारी रखना चाहता है. इसलिए यह युद्धविराम स्थायी नहीं लगता.
यह भी लगता है कि यह युद्धविराम अमेरिकी रणनीति
का हिस्सा है, ताकि लड़ाई के नए लक्ष्यों और तरीकों को तय किया जा सके. ईरान इस
बात को बेहतर समझता होगा.

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