Tuesday, September 29, 2026

करवट लेते चीन-अमेरिका रिश्तों की विसंगतियाँ


पिछला हफ्ता वैश्विक घटनाक्रम के लिहाज से बहुत महत्त्वपूर्ण था. संयुक्त राष्ट्र महासभा के कारण यों भी यह हफ्ता हर साल महत्त्वपूर्ण होता है, पर अमेरिका-चीन रिश्तों में आ रहे बदलाव और यूक्रेन तथा ईरान-युद्ध से जुड़े घटनाक्रमों ने इसे और ज्यादा महत्त्व प्रदान किया है.

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्त्वपूर्ण है अमेरिका और चीन के रिश्तों में आ रहा बदलाव, जिसके पीछे भू-राजनीति नहीं है, बल्कि शुद्ध व्यावसायिक कारण हैं.

सवाल है कि कारोबारी हित-रक्षा और भू-राजनीतिक हितों में टकराव हुआ, तो क्या होगा? अलबत्ता इस घटनाक्रम में भारत के लिए भी कुछ संकेत हैं, जिनमें से कुछ की ओर विदेशमंत्री एस जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के अपने वक्तव्य में इशारा किया है.

वैश्विक अस्थिरता

यह सब ऐसे समय में हो रहा है, जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारी अस्थिरता जारी है. पिछले कुछ हफ्तों में रूस की तेल रिफाइनरियों पर यूक्रेनी हमले हुए हैं, रूस ने नाटो क्षेत्र में घुसपैठ की चेतावनी दी है, कृत्रिम मेधा (एआई) को लेकर दुनिया में दहशत और उम्मीदें दोनों एकसाथ पैदा हो रही हैं और पश्चिम एशिया में हमले बढ़े हैं. 

ऐसे में उम्मीद थी कि संरा महासभा में नेताओं के वक्तव्यों और चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग की अमेरिका-यात्रा के दौरान वैश्विक-संकटों के समाधान दिखाई पड़ेंगे. पर दोनों के परिणाम कम से कम विश्व-व्यवस्था के लिहाज से सार्थक नहीं रहे. अलबत्ता इस बीच रूस की ओर से यूक्रेन-युद्ध को रोकने की एक पेशकश ज़रूर सामने आई है.

पिछले हफ्ते रूस ने कहा कि यूक्रेन में साढ़े चार साल से चल रहे संघर्ष को समाप्त करने के प्रयासों पर चर्चा करने के लिए अमेरिका, रूस और यूक्रेन के बीच त्रिपक्षीय बैठक जल्द ही हो सकती है.

क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने कहा कि फिलहाल संभावित बैठक के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है. उन्होंने यह भी बताया कि रूस के राष्ट्रपति के विशेष दूत किरिल दिमित्रीव अमेरिका में हैं, जहां वे अमेरिकी वार्ताकारों से बातचीत कर रहे हैं और संभावित आर्थिक सहयोग के मुद्दे पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं.

शी-ट्रंप वार्ता

दिल्ली में हुए ब्रिक्स के शिखर सम्मेलन में विश्व-व्यवस्था को लेकर भारत का एक अलग नज़रिया सामने आया था, जिसमें महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा से अलग रहने की मनोकामना व्यक्त होती थी.

अब 24 सितंबर को अमेरिका और चीन के राष्ट्रपतियों की मुलाकात में कोई बड़ा समझौता भले ही नहीं हुआ हो, पर इतना ज़ाहिर जरूर हुआ कि दोनों तरफ से रिश्तों को सुधारने की पुरजोर कोशिश है.

अमेरिका के मध्यावधि चुनाव नज़दीक होने के कारण डॉनल्ड ट्रंप की इच्छा फिलहाल ऐसे कदमों तक सीमित रहेगी, जिनमें वे अपनी सफलताओं की गुलाबी तस्वीर पेश कर सकें.

चीन से अनुराग  

इस शिखर-वार्ता से चीन के प्रति डॉनल्ड ट्रंप के अतिशय अनुराग का पता ज़रूर लगा है. शी चिनफिंग का स्वागत करने के लिए वे खुद हवाई अड्डे पर गए, जो  सामान्य बात नहीं है.

आमतौर पर अमेरिकी राष्ट्रपति विदेशी मेहमानों का स्वागत करने हवाई अड्डे पर खुद नहीं जाते हैं. इसके पहले 1962 में जॉन एफ कैनेडी ब्रिटिश प्रधानमंत्री हैरल्ड मैकमिलन का स्वागत करने हवाई अड्डे पर गए थे.

तब से लगभग 65 वर्षों तक, किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति ने हवाई अड्डे पर जाकर विदेशी नेताओं का स्वागत नहीं किया. देखना होगा कि इससे दोनों देशों के रिश्तों पर असर पड़ेगा भी या नहीं. हाँ, इससे इतना ज़रूर लगता है कि चीन से रिश्ते बनाने के लिए ट्रंप साहब आकुल-व्याकुल हैं.

नतीजा कुछ नहीं

इतना होने के बावज़ूद दोनों नेताओं की शिखर-वार्ता के परिणाम बहुत उत्साहजनक नहीं रहे. टेक्नोलॉजी, ट्रेड और ताइवान इन तीनों ‘टी’ की दोस्ती नहीं हो पा रही है.  

दोनों ने ‘ट्रेड-वॉर’ पर लगे अपने विराम को, जो इस नवंबर में समाप्त होने वाला है, दो महीने के लिए बढ़ा दिया है. चीनी इसे ट्रंप के कार्यकाल के अंत तक चाहते थे. ऐसा नहीं हुआ है.

उसी समय चीन द्वारा दुर्लभ-पृथ्वी खनिजों के निर्यात पर लगाए गए प्रतिबंधों की अवधि भी समाप्त हो रही है. चीन के महत्वपूर्ण खनिजों पर अमेरिका अत्यधिक निर्भर है, और बीजिंग अपने उत्पादों के लिए अमेरिका में एक खुला बाजार चाहता है.

इसका मतलब है कि दोनों देशों को मूलभूत विवादों को सुलझाने की जल्दी नहीं है. अलबत्ता दोनों देशों के बीच एक संभावित हॉटलाइन और प्रगति रिपोर्ट साझा करने के लिए व्यापक समझौते की चर्चा हुई.

चीन के दबाव में फिलहाल अमेरिका ने ताइवान को रिकॉर्ड 14 अरब डॉलर के हथियारों की बिक्री रोक दी है. यह साफ नहीं है यह सौदा पूरा होगा या नहीं.

एआई के खतरे

कृत्रिम मेधा (एआई) की सुरक्षा को लेकर बातचीत की उम्मीदें थीं, पर यह विषय ही वार्ता के एजेंडा से हटा दिया गया.

यह बैठक एआई के खतरों से जुड़ी कुछ घटनाओं के बाद हुई थी. जून में एक ओपनएआई एजेंट ने ऑस्ट्रेलियाई सरकार की वैबसाइट पर अनाधिकृत रूप से प्रवेश कर लिया था. यह भी कि ओपनएआई एजेंटों ने अमेरिकी सरकार की वेबसाइटों में भी छेड़छाड़ की थी.

शिखर सम्मेलन के बाद ट्रंप ने दावा किया कि दोनों देश फिलहाल एआई के मामले में यथास्थिति बनाए रखना चाहते है. अलबत्ता शी ने कहा कि दोनों पक्षों को ‘एआई पर मानवीय नियंत्रण बनाए रखना चाहिए’.

तकनीक से भय

 

ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका में सरकारी प्रणालियों में एआई एजेंटों की घुसपैठ की घटनाएँ, पहली बार रिपोर्ट की गई हैं. इन मामलों में सरकारों की विफलता भयावह खतरे की ओर इशारा कर रही हैं.

सुरक्षा मानकों को मजबूत करने और अंतरराष्ट्रीय समन्वय की माँगें बढ़ रही हैं.  ऐसी तकनीक की सुरक्षा, जिसके एजेंट सेकंडों में सीमाएँ पार कर सकते हैं, अंतरराष्ट्रीय मानकों की ज़रूरत को रेखांकित कर रही हैं.

अत्याधुनिक एआई मॉडलों और सेमीकंडक्टरों के क्षेत्र में अमेरिकी भले ही सबसे आगे हैं, पर उसके नागरिकों के मन में इसे लेकर भय है.

सर्वेक्षणों से पता लगता है कि वे मानते ​​हैं कि यह तकनीक उन पर विपरीत प्रभाव डालेगी, जबकि चीनी नागरिकों के मन में भय नहीं है. वे मानते हैं कि यह तकनीक उन्हें जीवन में आगे बढ़ने में मदद करेगी.

तकनीकी इज़ारेदारी

एआई-सुरक्षा पर समझौते की बढ़ती माँगों के बावजूद, और अमेरिका की प्रमुख कंपनियों की चेतावनियों के बीच कि एआई के विकास की गति को धीमा करना चाहिए, दोनों देश भितरखाने इस तकनीक को नियंत्रित करने में लगे है.

ट्रंप का कहना है कि हम चीन के खिलाफ अस्तित्व की दौड़ में शामिल हैं और एआई में जो भी जीतेगा, वही विजयी होगा. चीन भी इस मामले में अपने  विकास की गति धीमी करने को तैयार नहीं है.

भारत सहित अन्य देशों की चिंता का विषय यह है कि अमेरिका और चीन हाथ मिलाकर दूसरे देशों के लिए एआई तकनीक से जुड़े नियम तैयार न कर दें.

दो प्रमुख शक्तियों के बीच रणनीतिक स्थिरता अन्य देशों के खिलाफ भेदभावपूर्ण तकनीकी नियंत्रण को जन्म दे सकती है. नाभिकीय शक्ति की बंदरबाँट का इतिहास भारत को सतर्क रहने के पर्याप्त कारण देता है.

टैरिफ का झमेला

इस शिखर सम्मेलन से कुछ ही दिन पहले, ट्रंप ने 'लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट' पर दस्तखत करके उसे कानून बना दिया है, जो रूसी ऊर्जा के शीर्ष खरीदारों, खासतौर से चीन और भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने की अनुमति देता है.

एक तरफ ट्रंप और शी दोनों एक-दूसरे को नए टैरिफ और व्यापार प्रतिबंधों से बचने की सलाह दे रहे हैं, जिसके बरक्स एक संदेह पैदा हो रहा है, कि अमेरिका और चीन हाथ मिलाएँगे, तो क्या तलवार भारत पर चलेगी?

ट्रंप को भारत आसान निशाना लगता है, क्योंकि उसके जवाबी विकल्प नहीं हैं. रूसी तेल की खरीद ही मुद्दा है, तो भारत निशान क्यों बने, जबकि चीन को छूट मिल रही है? पिछले साल जुलाई में ऐसा ही हुआ था.

पर्यवेक्षकों का अनुमान है कि अमेरिका का मकसद भारत पर गैर-बराबरी का व्यापार समझौता मानने के लिए दबाव बनाना है.

भारत-पाक टकराव

भारत की एक और फिक्र इन दोनों देशों के पाकिस्तान से रिश्तों को लेकर है. डॉनल्ड ट्रंप बार-बार कह रहे हैं कि मैंने भारत-पाकिस्तान की लड़ाई रुकवाई और भारत इससे इनकार करता रहा है. पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने संरा महासभा में एकबार फिर लड़ाई रुकवाने में ‘दख़ल’ देने का श्रेय ट्रंप को दिया.

संरा महासभा में लंबे अरसे से पाकिस्तान की ओर से कश्मीर का नाम लिया जाता है. इस साल भी लिया गया. तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगान ने भी कश्मीर का उल्लेख किया.

भारत ने शनिवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा में पाकिस्तान के बयान पर कड़ा जवाब दिया. विदेशमंत्री एस जयशंकर ने पाकिस्तान को ‘सीरियल प्रैक्टिसनर ऑफ टेरर’ बताया.

इसके पहले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने महासभा में कहा था कि भारत का सिंधु जल संधि को स्थगित रखना गैर-कानूनी है. उन्होंने धमकी दी कि अगर भारत सिंधु नदी के पानी को रोकेगा, तो इसे ‘युद्ध की कार्रवाई’ माना जाएगा.

पिछले शनिवार को विदेशमंत्री एस जयशंकर ने पाकिस्तान को जवाब देते हुए कहा, ‘हमें आतंकवाद के ख़िलाफ़ अपनी रक्षा करने का अधिकार है और हम इसका इस्तेमाल करेंगे.’

व्यापार का अस्त्र

उन्होंने संघर्षों से त्रस्त दुनिया में ‘हर चीज के शस्त्रीकरण’ की भी निंदा की, जिसमें यातायात अवरोधों से लेकर बाजार पहुँच को सीमित करना शामिल है, और ‘अत्यधिक प्रतिस्पर्धा की मानसिकता’ की ओर इशारा किया जो ‘संस्थानों को कमजोर कर रही है’.

उन्होंने कहा कि युद्ध के प्रभाव विश्व भर में महसूस किए जाते हैं. साथ ही उन्होंने कहा, ‘संघर्षों से दूर रहने वाले देशों को बिना किसी गलती के दंडित किया जा रहा है. सबसे अधिक प्रभावित देशों की बात अक्सर सबसे कम सुनी जाती है’.

आवाज़ द वॉयस में प्रकाशित

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