डॉनल्ड ट्रंप की फुलझड़ियों, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बयानों और चीनी गतिविधियों को एक सतह पर रखकर विचार करें, तो भारत की विदेश-नीति को लेकर कुछ सवाल बनते हैं.
एक तरफ
गाहे-बगाहे ट्रंप के पहेली जैसे बयान सुनाई पड़ते हैं, वहीं अब रूसी राष्ट्रपति
व्लादिमीर पुतिन ने कहा है कि भारत को अमेरिका के दबाव में आना बंद करना चाहिए.
अमेरिका का सूर्यास्त और ब्रिक्स का सूर्योदय होने वाला है.
ईरान-युद्ध की
वजह से मिली छूट के कारण रूस से पेट्रोलियम की खरीद में वृद्धि हुई है, पर कहना
मुश्किल है कि आने वाले समय में अमेरिका इसे रोकने के लिए किस प्रकार के दबाव
डालेगा.
सवाल है कि
क्या वास्तव में अमेरिका के सूर्यास्त की घड़ी आ गई है? भारत क्या वास्तव में अमेरिका के दबाव में है? क्या अब हमारी दूरियाँ बढ़ने वाली हैं? ट्रंप कैसी पहेली बूझ रहे हैं? हमें वाइट हाउस
प्रशासन की ‘पल में तोला, पल में माशा’ नीति के प्रति सचेत रहना होगा.
देखना यह भी होगा कि ब्रिक्स के मंच पर भारत-रूस और चीन के सहयोग की नई संभावनाएँ क्या हैं? वस्तुतः भारत को इन सबके बीच से अपना रास्ता खुद खोजना होगा और स्वतंत्र-नीति का संचालन करना होगा. क्या ऐसा संभव है?
फिलहाल इतना कहा जा सकता है कि भारत किसी ध्रुवीकरण में शामिल नहीं होगा और उसके अमेरिका के साथ रिश्ते बने रहेंगे, जो इस समय भले ही कारोबारी लेन-देन तक सिमट गए हैं. दूसरी तरफ उसे न तो 'अमेरिकी-पिट्ठू' साबित किया जा सकता है और न उसके दबाव में.
अमेरिकी
दबाव
ट्रंप ने कहा
है कि वर्षों तक भारत ने अमेरिका का फ़ायदा उठाया है, पर अब उसका उल्टा हो रहा है.
अब अमेरिका भारत से पैसे बना रहा है. उनका यह बयान 1 से 4 जून तक दोनों देशों के बीच
ट्रेड डील पर चली बातचीत के बाद आया था.
ट्रंप ने कहा, नरेंद्र
मोदी मेरे अच्छे दोस्त हैं और उम्मीद है कि यह रिश्ता ट्रेड डील को 'फिनिश लाइन' पार करा देगा. पिछले महीने अमेरिकी विदेशमंत्री मार्को रूबियो की
भारत-यात्रा के दौरान कहा गया था कि ट्रेड डील पर बात अंतिम दौर में है. वाणिज्य
मंत्री पीयूष गोयल ने भी कहा, बातचीत के सभी पहलुओं को सुलझा लिया गया है.
उधर अमेरिकी
टीम जिस समय भारत में ही थी, वहाँ के ट्रेड रिप्रेज़ेंटेटिव ने व्यापार कानून की धारा
301 के तहत भारत समेत 60 देशों पर 10 से 12.5 फ़ीसदी तक अतिरिक्त टैरिफ़ लगाने का
प्रस्ताव पेश करके हालात को पेचीदा बना दिया है.
इन 60 देशों पर
आरोप है कि वे बँधुआ मजदूरी के सहारे बनाए गए सामान को अमेरिका भेज रहे हैं. इस
श्रेणी में चीन और भारत से लेकर सऊदी अरब, ऑस्ट्रेलिया, स्विट्जरलैंड, ब्रिटेन और अन्य कई देश शामिल हैं. छह अन्य, यूरोपीय संघ, कनाडा, इंडोनेशिया, मैक्सिको, इक्वाडोर और पाकिस्तान पर भी, यही आरोप है.
अमेरिका के कुल
आयात का 99.4 प्रतिशत हिस्सा इन्हीं देशों से आता है. इस प्रस्ताव को केवल भारत के
नज़रिए से नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि यह अमेरिका की आंतरिक-विसंगति को व्यक्त कर
रहा है.
वाणिज्य मंत्री
पीयूष गोयल ने रविवार को कहा कि हमें इसके बारे में चिंता करने की कोई ज़रूरत नहीं
लगती. ‘हम इससे निपट लेंगे.’ व्यापार समझौते पर चर्चा के लिए अमेरिकी
प्रतिनिधि जैमीसन ग्रीअर अगले दो हफ्तों में भारत का दौरा करेंगे. इससे पहले
उन्होंने संकेत दिया था कि जुलाई तक समझौता हो सकता है.
टूटता
रिश्ता
लगभग एक वर्ष
से, भारत और अमेरिका के विशेषज्ञ चेतावनी दे
रहे हैं कि बिगड़ते द्विपक्षीय संबंध उस साझेदारी को नुकसान पहुँचाएँगे, जिसे
पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन ने 21वीं सदी की सबसे
महत्वपूर्ण साझेदारी बताया था.
इन विशेषज्ञों का
तर्क है कि अमेरिका की हिंद-प्रशांत रणनीति का केंद्र भारत बना हुआ है और
भू-राजनीति, प्रौद्योगिकी और महत्वपूर्ण आपूर्ति
श्रृंखलाओं को सुरक्षित करने में चीन के साथ प्रतिस्पर्धा के लिए अपरिहार्य है.
सेंटर फॉर ए
न्यू अमेरिकन सिक्योरिटी की मार्च 2026 की एक रिपोर्ट
का शीर्षक है, ‘रिपेयरिंग द ब्रीच:
अमेरिका-भारत संबंधों को पटरी पर लाना.’ इसमें कहा गया है
कि 2025 की दूसरी छमाही में द्विपक्षीय संबंध ‘बुरी
तरह लड़खड़ा गए’ थे. इसमें भरोसा टूटने के प्रमुख कारणों को गिनाते हुए विश्वास को
फिर से स्थापित करने और सहयोग को गहरा करने के लिए तत्काल कदम उठाने की सिफारिश की
गई है.
भारत का
महत्त्व
हडसन
इंस्टीट्यूट के ‘न्यू इंडिया कॉन्फ्रेंस’ ने अमेरिकी हितों और हिंद-प्रशांत
क्षेत्र में शक्ति संतुलन के लिए भारत के महत्व को रेखांकित किया. आरएसएस के
महासचिव दत्तात्रेय होसबळे को आमंत्रित करके, इसने धार्मिक अल्पसंख्यकों के प्रति हिंदुत्ववादियों के व्यवहार पर चिंताओं
के बावजूद उनसे बातचीत करने की तत्परता का संकेत भी दिया.
यह चिंता भारत
में भी है. अनेक भारतीय विशेषज्ञ, अमेरिका के साथ रिश्तों को बनाए रखने के पक्ष में हैं. वे मानते हैं कि हिंद-प्रशांत
क्षेत्र को खुला रखने, लोकतंत्रों के बीच साझेदारी को बनाए रखने
और तकनीकी इनोवेशन, एआई, सेमीकंडक्टर, रक्षा और ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग इन रिश्तों
के लिए ज़रूरी है.
रूबियो की
यात्रा
23 से 16 मई तक
अमेरिकी विदेशमंत्री मार्को रूबियो की भारत-यात्रा से काफी उम्मीदें लगाई गई थीं,
पर खास प्रगति हुई नहीं. रूबियो ने एक ट्वीट में दावा किया कि भारत ने अगले पाँच
वर्षों में 500 अरब डॉलर के अमेरिकी उत्पाद खरीदने की
प्रतिबद्धता जताई है. इस दावे को भारतीय अधिकारियों ने सही नहीं बताया.
एक तो हरेक साल
100 अरब डॉलर के माल को जोड़कर पाँच साल में 500 अरब की संख्या निकाल ली गई है, पर
यह भी भ्रामक है. वस्तुतः यह व्य़ापार-वार्ता की एक संभावित शर्त है, जिसमें कहा
गया है कि यदि अमेरिका टैरिफ में रियायतें देगा, तब भारत यह खरीद कर पाएगा.
क्वाड विदेश
मंत्रियों के शिखर सम्मेलन में भी खास सफलता नहीं मिली. जब भारतीय प्रेस ने
आतंकवाद में पाकिस्तान की भूमिका से जुड़े सवाल पूछे, तो रूबियो ने इसका जवाब देने के बजाय ईरान संकट में
पाकिस्तानी भूमिका की तारीफ कर दी.
उन्होंने कहा, हमारा
एकमात्र मानदंड ‘अमेरिका फर्स्ट’ है. उस वक्त उनके बराबर खड़े भारत के विदेशमंत्री
एस जयशंकर ने कहा, और,
‘हमारी नीति 'इंडिया फर्स्ट' है.’
टैरिफ-एजेंडा
अमेरिकी सुप्रीम
कोर्ट द्वारा अंतरराष्ट्रीय आपातकालीन आर्थिक शक्ति अधिनियम के तहत लाई गई
पारस्परिक टैरिफ-नीति को रद्द करने के बाद, ट्रंप ने व्यापार अधिनियम की धारा 122 के तहत सभी व्यापारिक साझेदारों पर
10 प्रतिशत का शुल्क लगाया था.
यह टैरिफ भी अमेरिकी
संसद यदि इस टैरिफ की अवधि नहीं बढ़ाएगी, तो यह अधिकतम 150 दिनों के लिए ही लगाया
जा सकता है. यह अवधि 24 जुलाई को समाप्त हो रही है.
अमेरिकी
व्यापार प्रतिनिधि की पेशकश को आप वाइट हाउस के टैरिफ-एजेंडे का हिस्सा मानिए. बात
यहीं खत्म नहीं होने वाली है. टैरिफ की दीवार को मजबूत करने के प्रयास कई
क्षेत्रों में चल रहे हैं.
मार्च में 16
अर्थव्यवस्थाओं के, जिनमें भारत और चीन जैसे देश शामिल हैं, विनिर्माण क्षेत्रों में संरचनात्मक अतिरिक्त
क्षमता और उत्पादन के मुद्दे की एक और जाँच शुरू की गई है. इन सब से संकेत मिलता
है कि अदालती विफलता के बावजूद, ट्रंप के एजेंडे में
टैरिफ का मसला महत्त्वपूर्ण बना रहेगा.
भारतीय
अर्थव्यवस्था
ईरान-युद्ध के
कारण दुनिया में मचे आर्थिक घमासान के बीच भारत अपनी आर्थिक-रफ्तार बनाए रखने के
लिए कमर कस रहा है. 2025-26 के जीडीपी आँकड़े बता रहे हैं कि संवृद्धि 7.7 प्रतिशत
रही है, पर चिंता आने वाले समय की है.
इस सिलसिले में
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 6 जून को प्रधानमंत्री आर्थिक सलाहकार परिषद के
सदस्यों के साथ बेहद अहम बैठक की. सरकार ने रुपये की गिरावट रोकने और पूँजी निवेश
बढ़ाने के लिए कुछ बड़े उपाय शुरू किए हैं.
इस बैठक का एक
बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया पर केंद्रित रहा. उधर नीति आयोग ने एक खास ‘इम्पैक्ट
असेसमेंट रिपोर्ट’ में बताया है कि संकट लंबा खिंचा, तो हमारे व्यापार, छोटे उद्योगों, खेती-किसानी और बड़े औद्योगिक क्षेत्रों पर इसका क्या असर होगा.
पुतिन का
बयान
व्लादिमीर
पुतिन ने कहा है कि अमेरिका के साथ भारत की बढ़ती साझेदारी मॉस्को के साथ उसके
लंबे समय से चले आ रहे रिश्तों को कमज़ोर नहीं कर पाएगी. पुतिन ने सेंट पीटर्सबर्ग
में पीटीआई समेत ग्लोबल न्यूज़ एजेंसियों के पत्रकारों से बातचीत में कहा कि भारत, रूस का भरोसेमंद पार्टनर है.
उनका बयान ऐसे
समय आया है, जब आगामी 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाली ब्रिक्स की बैठक
में शामिल होने के लिए पुतिन भारत दौरे पर आने वाले हैं. एक साल के अंदर पुतिन का
यह दूसरा भारत-दौरा होगा.
बदले हुए
भू-राजनीतिक माहौल में भारत-रूस संबंधों को लेकर पुतिन ने कहा, हमें खुशी है कि भारत सभी देशों के साथ संबंध
विकसित कर रहा है. स्वाभाविक है कि वह अपने हितों के अनुरूप उन देशों से अपने
संबंध विकसित करता है, जिन्हें वह ज़रूरी समझता है.
इस दौरान
उन्होंने रूस-भारत-चीन (आरआईसी) फोरम का ज़िक्र भी किया. पर सच यह है कि भारत-चीन
तनाव के कारण यह फोरम कभी सक्रिय नहीं हो पाया. सवाल है कि क्या अब होगा?
भारत के चीन के
साथ रिश्तों में पाकिस्तान का मसला भी अड़ंगा पैदा करता है. पुतिन ने कहा, मुझे नहीं
लगता कि पाकिस्तान पर चीन का नियंत्रण है.
उनकी इस बात पर
भरोसा करने की ज़रूरत भी नहीं है, क्योंकि चीन-पाकिस्तान रिश्ते खुद अपनी मौज़ूदगी
को बताते हैं. बहरहाल चीन के साथ कारोबारी रिश्ते ज़रूर शक्ल लेंगे.
भारत-जापान
सहयोग
हिंद प्रशांत
क्षेत्र में अमेरिका की नीतियों में बदलाव से केवल भारत पर ही प्रभाव नहीं पड़ेगा.
जापान, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया, ताइवान, वियतनाम और फिलीपींस जैसे देश भी
प्रभावित होंगे.
जापान ने इस
बात के संकेत दिए हैं कि ताइवान के मसले से जापान पर सीधा असर पड़ेगा. जापान की
पहली महिला प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची संभवतः जुलाई में भारत आएँगी.
दोनों देशों के
बीच सुरक्षा एवं अर्थव्यवस्था सहित कई क्षेत्रों में सहयोग के ठोस उपायों पर चर्चा
होने की उम्मीद है. पिछले साल पीएम मोदी की जापान यात्रा के दौरान अगले दशक से
संबद्ध भारत-जापान संयुक्त दृष्टिकोण की घोषणा की गई थी.
हाल में सिंगापुर
में आयोजित वार्षिक शांगरी-ला संवाद में, जापान के
रक्षामंत्री शिंजीरो कोइज़ुमी ने अपनी नई सुरक्षा-नीति को स्पष्ट किया. वे रक्षा
व्यय और फौजी आधुनिकीकरण को बढ़ाने जा रहे हैं. इसके अलावा मित्र देशों के साथ
रक्षा सहयोग बढ़ाएँगे शस्त्र-निर्यात पर लगे प्रतिबंधों को हटाएँगे.

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