Sunday, June 14, 2026

'सभी मनुष्य समान हैं', इस वाक्य में क्या महिलाएं भी शामिल हैं?


न्यूयॉर्कटाइम्स में पारुल सहगल के लेख का हिंदी अनुवाद

5 नवंबर, 1872 को न्यूयॉर्क के रोचेस्टर में, 15 अमेरिकी महिलाओं ने अपराध करने के लिए अपने घर से निकलीं। उनकी 50 वर्षीय नेता को, जो अपनी शांत और अडिग निगाहों के लिए प्रसिद्ध थी, उसी महीने गिरफ्तार किया गया था। उसने अपने अपराध से इनकार नहीं किया। और अगले साल अपने मुकदमे में जज के सामने दिए बयान में, उसने अन्य महिलाओं से आह्वान किया, ‘ठीक वैसा ही करो जैसा मैंने किया है, मानव निर्मित, अन्यायपूर्ण और असंवैधानिक कानूनों के खिलाफ विद्रोह करो।’

मतदान करने के लिए सूज़न बी एंथनी की गिरफ्तारी ठीक उसी तरह हुई जैसा उन्होंने और उनकी साथी मताधिकार समर्थकों ने चाहा था, जिससे उनके आंदोलन को प्रचार मिला और यह बात उनके आंदोलन की परीक्षा साबित हुई। एंथनी ने मुकदमे से पहले भाषण देने के लिए कई जगहों का दौरा किया और घोषणा की कि अब धैर्य का समय समाप्त हो गया है। उन्होंने 14वें संशोधन का हवाला देते हुए अपने श्रोताओं से इसकी भाषा और तर्क का गहन अध्ययन करने का आग्रह किया। और फिर उन्होंने अपनी बात को बहुत ही सरल शब्दों में कहा।

1873 के भाषण में उन्होंने कहा: अब सिर्फ एक बात तय होनी बाकी रह गई है, क्या स्त्रियाँ व्यक्ति (इनसान) हैं​​​​​​? (The only question left to be settled, now, is: Are women persons?)

यह बात बहुत साफ और बहुत मजबूत है। खासकर आखिरी शब्द ध्यान खींचता है। एंथनी ने ‘लोगों’ की जगह ‘व्यक्तियों’ का इस्तेमाल किया है क्योंकि वह संविधान के सटीक शब्दों का प्रयोग कर रही थीं: ‘संयुक्त राज्य अमेरिका में जन्मे या प्राकृतिक रूप से नागरिकता प्राप्त सभी व्यक्ति’, जो इसके अधिकार क्षेत्र के अधीन हैं, संयुक्त राज्य अमेरिका और उस राज्य के नागरिक हैं जहाँ वे रहते हैं। कोई भी राज्य ऐसा कोई कानून नहीं बनाएगा या लागू नहीं करेगा जो संयुक्त राज्य अमेरिका के नागरिकों के विशेषाधिकारों या स्वतंत्रताओं को कम करे।’

यदि एंथनी जैसी महिलाएं व्यक्ति थीं, तो वे नागरिक भी थीं। और यदि वे नागरिक थीं, तो न्यूयॉर्क जैसे किसी भी राज्य के कानूनों को उनके विशेषाधिकारों या उन्मुक्तियों (Immunities) को, जैसे कि मतदान के अधिकार को, कम नहीं करना चाहिए।

एंथनी द्वारा प्रस्तुत किए जा रहे मामले में यह महत्वपूर्ण बिंदु था, जिसके के दूरगामी परिणाम होने थे।

महिलाओं के मताधिकार के लिए संघर्ष अमेरिकी इतिहास के सबसे लंबे और सबसे कठिन संघर्षों में से एक था। इसे शराब लॉबी के भयंकर विरोध का सामना करना पड़ा, जिन्हें डर था कि मताधिकार प्राप्त महिलाएं शराबबंदी के पक्ष में मतदान करेंगी; उद्योगपतियों को यह भी डर था कि वे बाल श्रम कानूनों के पक्ष में तर्क देंगी; और मताधिकार विरोधी महिलाओं के विशाल और शक्तिशाली समूह ने भी इसका विरोध किया।

क्या महिलाएं व्यक्ति हैं? एंथनी के मामले में न्यायाधीश ने स्वीकार किया कि वे नागरिक हैं, लेकिन उन्होंने फैसला सुनाया कि मतदान करना अमेरिकी नागरिकता के विशेषाधिकारों या उन्मुक्तियों में से एक नहीं है। उन्होंने जूरी को निर्देश दिया कि वे एंथनी को दोषी ठहराएँ।

फिर भी, इस फैसले से सवाल का पूरी तरह से समाधान नहीं हुआ।

मताधिकार आंदोलनकारियों ने इस पर विभिन्न दृष्टिकोणों से हमला किया। 20वीं सदी की शुरुआत में, उपन्यासकार एलिस ड्यूर मिलर ने मताधिकार पर एक व्यंग्यात्मक लेख और ‘क्या महिलाएं इंसान हैं?’ नामक एक पुस्तक प्रकाशित की।

1851 के एक प्रसिद्ध भाषण में, सोजर्नर ट्रुथ ने कहा: ‘मैंने खेत जोता है, फसल काटी है, भूसी उतारी है, लकड़ी काटी है और घास काटी है, क्या कोई पुरुष इससे अधिक कर सकता है? मैंने पुरुषों और महिलाओं की समानता के बारे में बहुत कुछ सुना है; मैं किसी भी पुरुष जितना भार उठा सकती हूँ और उतना ही खा भी सकती हूँ।’

मताधिकार आंदोलन सड़कों पर, सार्वजनिक विरोध प्रदर्शनों और भूख हड़तालों के माध्यम से, साथ ही अमेरिका के संस्थापक दस्तावेजों के गहन अध्ययन के माध्यम से भी आगे बढ़ा। मताधिकार समर्थकों ने यह समझने में महारत हासिल कर ली कि भाषा किस प्रकार सामाजिक पाखंडों को छिपाती है और उजागर भी करती है।

अपने मुकदमे से पहले दिए गए भाषणों में एंथनी ने इस बात पर ज़ोर दिया कि 1870 के संघीय प्रवर्तन अधिनियम में, जिसका उसने बड़े गर्व से उल्लंघन किया था, केवल पुल्लिंग सर्वनामों का प्रयोग किया गया था, जैसा कि उसके मामले से संबंधित मुद्रित प्रपत्रों में भी था। उसकी दोष-सिद्धि के रिकॉर्ड में हाथ से संशोधन करना होगा: अंग्रेजी के ‘he यानी वह’ के पहले ‘S’ लिखकर उसे ‘she वह’ बनाना होगा, इत्यादि। (The record of her conviction would have to be amended by hand: an “s” jotted beside “he” to make it into “she,” and so on.)

एक मुद्रित पृष्ठ का क्लोज-अप, जिस पर ‘he’ शब्द के
दो उदाहरणों को हाथ से बदलकर ‘
she’ किया गया।


एक मुद्रित पृष्ठ का क्लोज-अप, जिस पर ‘himself स्वयं’ शब्द को  काट दिया गया और उसके स्थान पर 

हस्तलिखित ‘herself स्वयं’ शब्द लिखा गया। 

स्रोत: अमेरिका क राष्ट्रीय अभिलेखागार फाउंडेशन

उन्होंने कहा, ‘मैं इस बात पर जोर देती हूं कि यदि सरकारी अधिकारी महिलाओं पर कर लगाने, जुर्माना लगाने, उन्हें कैद करने और फाँसी देने के लिए सर्वनामों में इस तरह से हेरफेर कर सकते हैं, तो महिलाएं भी सरकार में अपनी आवाज के अधिकार को सुरक्षित करने के लिए उनके साथ वही स्वतंत्रता ले सकती हैं।’

उन्होंने न्यूयॉर्क के टैक्स कानूनों का हवाला दिया जिनमें केवल ‘he वह’, ‘him उसे’ और ‘his उसका’ शब्दों का इस्तेमाल किया गया था, और क्या महिलाओं से टैक्स नहीं वसूले जाते थे? मताधिकार आंदोलन ने अमेरिकी-क्रांति के महान सिद्धांत, ‘प्रतिनिधित्व के बिना कराधान नहीं-no taxation without representation,’ को अपनाया और बताया कि अमेरिकी महिलाएँ अपने जीवन को नियंत्रित करने वाले कानूनों में कोई राय दिए बिना करों का भुगतान करती रही हैं।

इस तरह की पुनर्व्याख्या का शायद सबसे प्रसिद्ध उदाहरण 19 जुलाई, 1848 को देखने को मिला, जब एक समूह ‘महिलाओं की सामाजिक, नागरिक और धार्मिक स्थिति’ पर चर्चा करने के लिए एकत्रित हुआ, जिसे बाद में सेनेका फॉल्स सम्मेलन (Seneca Falls Convention) के नाम से जाना गया। एलिजाबेथ कैडी स्टैंटन और अन्य लोगों ने एक घोषणापत्र तैयार किया, जिसमें स्वतंत्रता की घोषणा के केंद्रीय तर्क को फिर से लिखा गया: ‘सभी पुरुष और महिलाएँ समान रूप से सृजित किए गए हैं-All men and women are created equal।’

महिला मताधिकार आंदोलनकारी उस समय इतिहास रचने के प्रति पूरी तरह सचेत थे। एंथनी और स्टैंटन ने व्यापक अभिलेखागार (आर्काइव) बनाए रखा, जो इतना बड़ा बो चुका था कि उसके बोझ से उनके घर की अटारी के ढहने का खतरा था, और उन्होंने अपनी रणनीतियों और विजयों का एक समकालीन विवरण तैयार किया, जो बढ़कर छह खंडों वाला ‘महिला मताधिकार का इतिहास’ बन गया, जिसका प्रकाशन 1881 और 1922 के बीच हुआ।

बीते एक सदी में, विद्वानों ने दिखाया है कि उस आधिकारिक विवरण में कितनी बातों को अनदेखा और अस्पष्ट किया गया था। इसने प्रतिद्वंद्वी नारीवादी गुटों और अश्वेत मताधिकार समर्थकों के योगदान की उपेक्षा की, और इस बात को भी नजरअंदाज किया कि कैसे दास प्रथा उन्मूलन से उपजा एक आंदोलन नस्लवाद में बदल गया, क्योंकि स्टैंटन ने श्वेत महिलाओं से पहले अश्वेत पुरुषों को वोट देने के अधिकार का पुरजोर विरोध किया था।

इस पूरे परिप्रेक्ष्य की एक और ज्यादा व्यापक और विस्तृत कथा भी बन सकती है। सेनेका फॉल्स को शुरुआती बिंदु मानने के बजाय, हम अन्य, पहले के महत्वपूर्ण पड़ावों को भी पहचान सकते हैं: उदाहरण के लिए, जब अश्वेत कार्यकर्ता मारिया डब्ल्यू स्टीवर्ट 1830 के दशक में अपने सार्वजनिक व्याख्यानों में मिश्रित श्रोताओं के सामने राजनीति और महिलाओं के अधिकारों पर बोलने वाली पहली अमेरिकी महिलाओं में से एक बनीं। हमें यह स्वीकार करना होगा कि 1920 में 19वें संशोधन के अनुसमर्थन ने मुख्य रूप से श्वेत महिलाओं को मताधिकार प्रदान किया। कई अश्वेत, आदिवासी और आप्रवासी महिलाओं को वर्षों या दशकों तक इससे वंचित रखा गया। उनके लिए, 1965 का मतदान अधिकार अधिनियम अधिक महत्वपूर्ण कानून था।

व्यापक परिप्रेक्ष्य हमें न केवल छिपे हुए विभाजनों को, बल्कि गहन निरंतरताओं को भी देखने का मौका देता है। मताधिकार आंदोलन का अन्य सामाजिक आंदोलनों, यहाँ तक कि वैश्विक आंदोलनों के साथ भी गहरा संबंध था। इसने कार्यकर्ताओं की तीन पीढ़ियों को पोषित किया। 1870 के दशक में एंथनी के सबसे लोकप्रिय भाषणों में से एक था ‘औरत को रोटी चाहिए, मतपत्र नहीं’, यह उनका श्रमिक-वर्ग की महिलाओं से अपील करने का तर्क था। उन्होंने विवाहित महिलाओं के लिए संपत्ति विरासत में पाने, तलाक के लिए याचिका दायर करने, अपने बच्चों की अभिरक्षा प्राप्त करने और सार्वजनिक रूप से बोलने के अधिकार की पैरवी की। एंथनी और अन्य लोगों के लिए, व्यक्तित्व की पहचान मत से नहीं, बल्कि उसके माध्यम से प्राप्त होती थी: सार्थक विकल्प चुनने की स्वतंत्रता और क्षमता।

मताधिकार आंदोलनकारियों ने अमेरिकी स्वतंत्रता की कहानी को फिर से पढ़ा,  संस्थापक दस्तावेजों का गहन अध्ययन किया और ‘व्यक्ति’ जैसे सरल शब्दों में निहित मान्यताओं पर बहस की। इतिहासकार अपना काम जारी रखे हुए हैं, दस्तावेजों और वृत्तांतों की सावधानीपूर्वक समीक्षा कर रहे हैं। इस युवा देश के लिए, संशोधन करने का दायित्व और अवसर हमारी सबसे स्थिर विरासत रही है, स्वयं संविधान की देन, जिसमें ‘एक अधिक परिपूर्ण संघ’ का प्रसिद्ध आह्वान है, जो याद दिलाता है कि हम हमेशा प्रगति की प्रक्रिया में हैं, निरंतर विकसित हो रहे हैं।

न्यूयॉर्क टाइम्स में पारुल सहगल का लेख मूल रूप में पढ़ें

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