Thursday, January 15, 2026

ईरान में क्या सत्ता-परिवर्तन होगा, क्रूर दमन का सामना कर पाएगी जनता?


ईरान एकबार फिर से बड़े बदलाव के मुहाने पर खड़ा है। वहाँ चल रहे आंदोलन और हिंसा के बाद स्थितियाँ चाहे, जिस दिशा में जाएँ, राज-व्यवस्था वैसी ही नहीं रहेगी, जैसी अभी तक चल रही थी। 1979 में, ईरान के लोग तीन बड़े  आदर्शों को लेकर खड़े हुए थे: आज़ाद राज व्यवस्था, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, और सामाजिक न्याय। उस क्रांति को फ्रांस की राज्यक्रांति और रूस की बोल्शेविक क्रांति और चीन की कम्युनिस्ट क्रांति के बाद विश्व की सबसे महान क्रांतियों में गिना जाता है।

ईरान में एक तरफ जनता का जबर्दस्त विरोध-प्रदर्शन चल रहा है, वहीं सरकार ने भयानक दमन शुरू कर दिया है, जिसमें तीन हजार से ज्यादा लोगों के मरने की खबरें आ रही हैं। यह संख्या दिनों-दिन बढ़ती जा रही है, क्योंकि सरकार ने सैनिकों को खुला आदेश दिया है कि वे देखते ही गोली मारें। इतना ही नहीं अब गिरफ्तार किए गए आंदोलनकारियों को फाँसी देने की बातें भी कही जा रही हैं, जिसे लेकर ट्रंप ने कहा है कि फाँसी दी गई, तो हम हमला कर देंगे।

सितंबर 2022 में महिलाओं के लिए देश के ड्रेस कोड का उल्लंघन करने के आरोप में गिरफ्तार ईरानी-कुर्द महिला महसा अमिनी की हिरासत में मौत के बाद बड़े पैमाने पर प्रदर्शनों के दमन के लिए इसी किस्म की सख्ती का सहारा लिया गया था। पर क्या अब वह सख्ती काम करेगी। खबरें हैं कि लोगों के मन से अब डर निकल गया है।

प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि सरकारी बलों को घरों की छतों पर तैनात किया गया है, जहाँ से वे निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर ऑटोमेटिक हथियारों से अंधाधुंध गोलीबारी कर रहे हैं। जो लोग अब भी ईरान की धार्मिक सरकार का समर्थन करते हैं और जो लोग सड़कों पर इसके पतन का आह्वान कर रहे हैं, वे मानते हैं कि ऐसी क्रूरता उन्होंने पहले कभी नहीं देखी।

सरकार ने पूरे देश में पूरी तरह से संचार प्रतिबंध लगा दिया है। ईरानी अधिकारियों ने इंटरनेट, अंतरराष्ट्रीय फ़ोन लाइनें और बीच-बीच में घरेलू मोबाइल फ़ोन कनेक्शन भी बंद कर दिए हैं। देश से बाहर आ रहे वीडियो और कभी-कभार सैटेलाइट इंटरनेट कनेक्शन पाने वाले कुछ ईरानियों के संदेश रक्तपात की विनाशकारी तस्वीर पेश कर रहे हैं।

धार्मिक-सत्ता का पतन होगा?

सवाल है कि इस आंदोलन की परिणति क्या होगी? क्या आंदोलनकारियों की जीत होगी? या सरकारी दमन के भय के कारण वे दब जाएँगे? सरकार ने बड़े स्तर पर अपने समर्थकों की भीड़ जमा करके रैलियाँ निकालनी शुरू की हैं। खबरें मिल रही हैं कि आंदोलनकारियों ने इन रैलियों और सरकारी दमन से घबराना बंद कर दिया है। प्रश्न है कि क्या अमेरिका इस दमन को रोकने के लिए हस्तक्षेप करेगा? क्या ईरान में सत्ता परिवर्तन होगा? सत्ता परिवर्तन होगा, तो उसके बाद की व्यवस्था कैसी होगी? क्या वैसी ही अराजकता पैदा नहीं होगी, जैसी इराक, लीबिया और अफगानिस्तान में हो गई है?

क्रूरता के सहारे इन विरोध प्रदर्शनों को दबाने में सरकार कामयाब हो भी जाए, तो उसके पास आम ईरानियों के जीवन स्तर में सुधार करने और महिलाओं के बीच जन्म लेते विरोध का कोई व्यावहारिक समाधान नहीं है। यही स्थिति कमोबेश पश्चिम एशिया के कुछ और देशों में आए, तो हैरत नहीं होगी।

वर्षों के अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों, कुशासन और भ्रष्टाचार, व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर प्रतिबंधों को लेकर लंबे समय से चली आ रही नाराजगी और पश्चिम के साथ लंबे समय से चले आ रहे संघर्ष के बोझ ने ईरान को बहुत नुकसान पहुँचाया है। पिछले कई वर्षों से देश की महिलाएँ जबरन हिजाब पहनने और सांस्कृतिक-धार्मिक पुलिस के अत्याचारों का विरोध करती रहीं हैं।

सर्वोच्च सत्ता अब भी बीमार 86 वर्षीय सर्वोच्च नेता आयतुल्ला खामनेई के हाथों में है। वे अपने सबसे वफादार बलों से घिरे हुए हैं, जिनमें इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कोर भी शामिल है, जिसका अब ईरान की अर्थव्यवस्था, राजनीति और सुरक्षा पर महत्वपूर्ण प्रभाव है।

विरोध प्रदर्शन की नवीनतम लहर, जो तेहरान के ग्रैंड बाज़ार में हड़तालों और सभाओं के साथ शुरू हुई, विशेष प्रतीकात्मक महत्व रखती है। बाज़ार न केवल राजधानी का आर्थिक केंद्र है, बल्कि ऐतिहासिक रूप से 1979 की क्रांति और इस्लामिक गणराज्य का समर्थन करने वाले पारंपरिक गढ़ों में से एक रहा है। वहां विरोध प्रदर्शन शुरू होने से संकेत मिलता है कि कभी शासन की रीढ़ समझे जाने वाले सामाजिक समूह भी अब असहमति की कतार में शामिल हो गए हैं। यह आंदोलन तेजी से क्षेत्रीय और आर्थिक मांगों से आगे बढ़ गया और बड़े शहरों और छोटे शहरों दोनों में स्पष्ट राजनीतिक नारों के साथ देशव्यापी विरोध प्रदर्शन में बदल गया।

कैसा बदलाव?

दूसरी तरफ आंदोलन की सबसे बड़ी समस्या यह है कि उसका कोई केंद्रीय नेतृत्व नहीं है। इस दौरान पुरानी राजशाही के पक्ष में भी नारे लगे हैं। राष्ट्रपति ट्रंप से ईरान में हस्तक्षेप करने का आह्वान करने वालों में निर्वासित पूर्व युवराज रज़ा पहलवी भी शामिल हैं, जिनके पिता को 1979 की इस्लामी क्रांति में ईरान के शाह के पद से हटा दिया गया था।

समझदार लोगों का मानना ​​है कि परिवर्तन तभी आ सकता है जब वह शांतिपूर्ण हो और देश के भीतर से ही हो। लोगों में बदलाव की प्रबल इच्छा है, पर कैसा बदलाव? कुछ लोग परिचित या पुराने प्रतीकों की ओर लौट रहे हैं, जो उन्हें आशा के प्रतीक प्रतीत होते हैं। इस बीच, शेर और सूर्य वाले ईरान के क्रांति-पूर्व ध्वज एक बार फिर सड़कों पर दिखाई देने लगे हैं। पहलवी ने बार-बार इस बात पर ज़ोर दिया है कि वे ईरान में राजशाही को बहाल नहीं करना चाहते। उनका दावा है कि वे एक ऐसे परिवर्तन का नेतृत्व करना चाहते हैं जो ईरान को लोकतंत्र की ओर ले जाए।

दो हफ्ते पहले, जब देश की मुद्रा के तीव्र अवमूल्यन के विरोध में लोग सड़कों पर उतरे थे, तब अधिकारियों ने उनकी शिकायतों को जायज़ माना था, पर अब वे उन्हें आतंकवादी बता रहे हैं। पिछले दो हफ्तों में, शहरों के बाज़ारों और विश्वविद्यालयों में छोटे-छोटे प्रदर्शन एक बड़े जनांदोलन में बदल गए हैं।

मौजूदा संकट केवल देश के भीतर हो रहे विरोध प्रदर्शनों तक ही सीमित नहीं है। बाहरी दबाव ने भी इसे और जटिल बना दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप बार-बार फौजी कार्रवाई की धमकी दे रहे हैं। सात महीने पहले, अमेरिका ने ईरान और इसराइल के बीच 12 दिनों के युद्ध में ईरान के प्रमुख परमाणु केंद्रों पर हमला किया था। ऐसा संघर्ष जिसने स्पष्ट रूप से ईरानी शासन को कमजोर कर दिया है।

महंगाई से शुरुआत

28 दिसंबर को, तेहरान में आयातित इलेक्ट्रॉनिक सामान बेचने वाले व्यापारी देश की करेंसी के अचानक और तेज़ अवमूल्यन से हैरान रह गए। उन्होंने अपनी दुकानें बंद कर दीं और हड़ताल पर चले गए, और बाज़ार के अन्य व्यापारियों से भी उनका साथ देने का आह्वान किया। सरकार की शुरुआती प्रतिक्रिया त्वरित और समझौते वाली थी। राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान ने व्यापारियों से बातचीत करने का वादा किया।

ईरान में मुद्रास्फीति लगभग 50 प्रतिशत तक पहुँच चुकी है। मुद्रा के अवमूल्यन ने आम लोगों के जीवन को बुरी तरह प्रभावित किया है। सरकार ने भी जनता की माँगों को तर्कसंगत माना। आम लोगों की तकलीफों को कम करने के लिए हर किसी के बैंक खाते में लगभग सात डॉलर का नया मासिक भत्ता जमा किया गया, लेकिन इससे समस्या का समाधान नहीं हुआ। वस्तुओं की कीमतें और बढ़ गईं और विरोध प्रदर्शनों की लहर और तेज़ हो गई।

विरोध प्रदर्शनों के तीन सप्ताह से भी कम समय बाद, तमाम शहरों में लोग सड़कों पर उतरने लगे हैं। छोटे और पिछड़े प्रांतीय कस्बों से लेकर बड़े शहरों तक, आर्थिक और राजनीतिक बदलाव की माँगें सुनाई देने लगीं।

इंटरनेट की भूमिका

ईरान के लोग इसके पहले भी फोन और इंटरनेट सेवाएँ बंद होने का सामना करते रहे हैं। 2019 में विरोध प्रदर्शनों के दौरान और 2022 में प्रदर्शनों की एक और बड़ी लहर के दौरान इंटरनेट काट दिया गया था। लेकिन इसबार की गोलीबारी और ब्लैकआउट पहले के मुकाबले कहीं खौफनाक हैं। इसकी वजह से ईरानियों को एक-दूसरे के साथ संवाद करने और सरकार की ओर से खूनी कार्रवाई की खबरें बाहरी दुनिया तक पहुँचाने में दिक्कतें हो रही हैं।

गत 12 जनवरी से ईरान सरकार ने अपने पक्ष में भी बड़े जुलूसों का आयोजन करना शुरू कर दिया है। उन्हें लगता है कि इस जवाबी प्रदर्शनों और सैनिकों की अंधाधुंध गोलीबारी से लोग डर जाएँगे। पश्चिमी मीडिया के अनुसार गोलीबारी से एक हजार से ज्यादा लोगों की मौत हुई है। सरकारी टेलीविजन ने लाशों की तस्वीरें प्रसारित कीं हैं। घटनास्थल से रिपोर्ट कर पाना अब संभव नहीं है, क्योंकि ईरान ने देश से बाहर जाने वाली सूचनाओं पर पूरी रोक लगा दी है।

स्टारलिंक

ईरान सरकार एक घरेलू इंटरनेट नेटवर्क संचालित करती है, जिसके तहत वह अपने इस्तेमाल की कुछ सेवाओं को बनाए रख सकती है, ताकि देश ऐसे  ब्लैकआउट के दौरान भी एनालॉग युग में न डूबे। एलन मस्क के स्पेसएक्स स्टारलिंक टर्मिनल पर ईरान में पाबंदी है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इन्हें बड़ी संख्या में चोरी-छिपे देश में लाया गया है। माना जाता है कि ऐसे हजारों टर्मिनल प्रचलन में हैं। 9 जनवरी को, इंटरनेट बंद होने के बाद भी, ईरान से बड़ी संख्या में चित्र और वीडियो बाहर आए हैं।

एलन मस्क की कंपनी स्टारलिंक ने ईरान के लोगों के लिए सैटेलाइट इंटरनेट सेवाएं मुफ़्त कर दी हैं। स्टारलिंक को जाम करना काफी कठिन है क्योंकि एक जैमर को प्रत्येक ग्राउंड टर्मिनल और अंतरिक्ष में एक उपग्रह के साथ उसके व्यक्तिगत कनेक्शन को बाधित करना होगा। डॉनल्ड ट्रंप ने चेतावनी दी है कि ईरान प्रदर्शनकारियों की हत्या करेगा, तो हम हस्तक्षेप करेंगे। अब वह इस बात पर विचार कर रहा है कि हिंसा का जवाब कैसे दिया जाए। 11 जनवरी को अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि हम संभव हुआ, तो  इंटरनेट को चालू करवाएँगे। एक विकल्प है आक्रामक साइबर ऑपरेशन।

1979 की क्रांति

1979 की ईरानी क्रांति ने पहलवी राजवंश का अंत किया और आयतुल्ला खुमैनी को नए धर्मतंत्र का प्रमुख बनाया। वहाँ सर्वोच्च नेता धार्मिक इमाम होते हैं, पर शासन एक निर्वाचित राष्ट्रपति चलाता है। पश्चिम एशिया के अन्य देशों के मुकाबले ईरानी जनता, ज्यादा सुशिक्षित, जागरूक और अनुशासित है। ईरान दुनिया की प्राचीनतम सभ्यताओं में एक है। उस क्रांति का उद्देश्य अमेरिकी प्रभुत्व को समाप्त करना, राजनीतिक और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी देना और संपदा  के वितरण के लिए एक निष्पक्ष प्रणाली स्थापित करना था।

उस क्रांति के 47 वर्षों के बाद, ईरान के बहुत से नागरिक नई व्यवस्था को उन आदर्शों के वाहक के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक विफलता के रूप में देखते हैं। नए ईरान ने अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ शुरू से ही रंजिश मोल ले ली। अपने नाभिकीय-कार्यक्रम के कारण वह विवादों में घिर गया और  फिर इराक, लेबनॉन, सीरिया और फलस्तीन में पैर फँसा दिए। इससे उसकी अर्थव्यवस्था पर भी विपरीत प्रभाव पड़ा।

दूसरे विश्व युद्ध के बाद से ईरानी नागरिक पश्चिमी जीवन शैली के करीब चले गए थे। 1979 की ईरानी क्रांति ने हजारों साल पुरानी राजशाही को खत्म किया था, जिसके बाद यहाँ एक लोकतांत्रिक गणराज्य का जन्म हुआ। ईरान के अंतिम बादशाह शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी अमेरिका और इसराइल के करीबी सहयोगी थे। तख्त पर उनकी वापसी भी अमेरिका और ब्रिटेन की मदद से हुई थी, जिन्होंने 1953 में ईरान के लोकतांत्रिक पद्धति से चुने गए प्रधानमंत्री मुहम्मद मुसद्देक़ का तख्ता-पलट कराया था।

इस क्रिया की प्रतिक्रिया होनी थी। जनता के मन में विरोध ने जन्म ले लिया था। परिणाम यह हुआ कि ईरान में इस्लामिक-क्रांति ने जन्म लिया, जिसके कारण 1979 में आयतुल्ला खुमैनी की वापसी हुई। शाह के खिलाफ उस क्रांति में वामपंथियों का एक तबका भी उनके साथ था, पर आयतुल्ला खुमैनी के शासन ने उनका क्रूर दमन कर दिया।

नई व्यवस्था में अचानक बड़ा मोड़ आया। लोगों की राजनीतिक और नागरिक स्वतंत्रताएँ गंभीर रूप से कम हो गईं। लोगों की जीवनशैली और व्यक्तिगत पसंद भी निगरानी और दमन की शिकार हो गई। सामाजिक न्याय संरचनात्मक और प्रणालीगत भ्रष्टाचार का शिकार हो गया है। सत्ता के उच्चतम स्तर से लेकर नौकरशाही की सबसे निचली परत तक उससे प्रभावित हुई।

शाह 1941 से सत्ता में थे लेकिन उन्हें निरंतर धार्मिक नेताओं के विरोध का सामना करना पड़ता था। इससे निपटने के लिए शाह ने इस्लाम की भूमिका को कम करने, इस्लाम से पहले की ईरानी सभ्यता की उपलब्धियाँ गिनाने और ईरान को एक आधुनिक राष्ट्र बनाने के लिए कई क़दम उठाए जिससे धार्मिक नेता और नाराज़ हो गए और उन्हें अमेरिका का पिट्ठू कहने लगे। आयतुल्ला खुमैनी को देश छोड़ना पड़ा।

असंतोष बढ़ा और साथ ही शाह का दमन चक्र भी। दिसंबर 1978 में कोई बीस लाख लोग शाह के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करने शाहयाद चौक में जमा हुए, पर सेना ने उनपर कार्रवाई करने से इनकार कर दिया। तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ शापोर बख़्तियार के कहने पर 16 जनवरी 1979 को शाह और उनकी पत्नी ईरान छोड़कर चले गए। प्रधानमंत्री ने सभी राजनीतिक बंदियों को रिहा कर दिया और आयतुल्ला खुमैनी को ईरान आने दिया। प्रधानमंत्री चुनाव कराना चाहते थे लेकिन आयतुल्ला ने उनकी चलने नहीं दी और अपनी अंतरिम सरकार का गठन कर लिया।

1979 की ईरानी क्रांति में वामपंथियों ने भी शाह के निरंकुश शासन के खिलाफ एकजुट विपक्ष का हिस्सा बनकर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसमें मार्क्सवादी और वामपंथी इस्लामी समूह शामिल थे। क्रांति के बाद आयतुल्ला खुमैनी के नेतृत्व में वामपंथियों को दबा दिया गया। उनके नेताओं और कार्यकर्ताओं को हाशिए पर धकेल दिया, जिसके बाद धार्मिक सत्तावादी शासन स्थापित हुआ।

राजव्यवस्था का सिद्धांत

ईरान की वर्तमान राजव्यवस्था का सिद्धांत है ‘विलायत-ए-फ़कीह।’ यानी फ़कीह (इस्लामी न्यायविद) का संरक्षण। विलायत अल-फ़कीह का सिद्धांत शिया वैचारिक-आधारशिला से जुड़ा है। मौजूदा वली-ए-फ़कीह (संरक्षक न्यायविद-गार्डियन ज्यूरिस्‍ट) आयतुल्ला अली खामनेई हैं। राष्ट्रपति पद पर व्यक्ति दो बार से ज्यादा काम नहीं कर सकता है, पर सुप्रीम लीडर के कार्यकाल की कोई सीमा नहीं हैं। उनका चुनाव विशेषज्ञों की एक सभा करती है, जिसके सदस्यों का चुनाव आठ साल के लिए मतदाता करते हैं। इस चुनाव में खड़े होने के लिए भी गार्डियन कौंसिल की अनुमति लेनी होती है। 

2016 में हुए चुनाव में 801 व्यक्तियों ने आवेदन किया था, जिनमें से 166 को अनुमति मिली थी। 1979 की क्रांति के बाद से देश में केवल दो सुप्रीम लीडर हुए हैं। पहले थे खुमैनी (जिनका 1989 में निधन हो गया) और दूसरे हैं वर्तमान खामनेई। ईरान की संसद क़ानून बनाती है और वह राष्ट्रपति की शक्तियों पर रोक भी लगा सकती है। वहीं, नए क़ानून को मंज़ूरी देने का काम गार्डियन कौंसिल का होता है। यह कौंसिल क़ानून या किसी प्रस्ताव को वीटो भी कर सकती है।

ईरानी व्यवस्था में मूल-नीतियों में राष्ट्रपति बदलाव नहीं कर सकते। अतीत में, खात्मी और हसन रूहानी जैसे सुधारवादी राजनेता परिवर्तन के वायदों पर भारी जनादेश हासिल कर चुके हैं, पर वे धार्मिक नेताओं द्वारा नियंत्रित प्रणाली को खोलने की दिशा में कुछ खास कर नहीं पाए।

दो चुनौतियाँ

देश के सामने अब तीन चुनौतियाँ हैं। पहली और सबसे बड़ी आंदोलन का दमन करना। वह दमन करने में सफल हो भी जाए, तो प्रशासनिक और सामाजिक-प्रणाली को भीतर से सुधारना और दूसरे आर्थिक संकटों से निजात पाना। आर्थिक-संकट काफी हद तक पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण हैं। आप इन प्रतिबंधों की कितनी भी आलोचना करें, पर वे वास्तविक हैं। उन्हें खत्म कराने की कोशिशें करनी होंगी। इसके लिए अमेरिका से रिश्ते सुधारने होंगे। इसकी कोशिश भी की जा रही हैं, पर इसमें देर हो चुकी है।

इन सभी मामलों में ईरान में अंतिम निर्णय करने का अधिकार आयतुल्ला अली खामनेई और उनके निकटतम सहयोगियों के हाथ में ही है। 1979 में आयतुल्ला रूहोल्ला खुमैनी के नेतृत्व में हुई क्रांति के बाद स्थापित व्यवस्था में सर्वोच्च धार्मिक नेता ही राष्ट्राध्यक्ष होते हैं। राष्ट्रपति उनकी अनुमति लेकर ही काम कर सकते हैं। 

 

 

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