Friday, March 6, 2026

औद्योगिक-आत्मनिर्भरता के प्रवेशद्वार पर भारत

भारत ने हाल में कुछ ऐसे औद्योगिक क्षेत्रों में प्रवेश किया है, जो अपेक्षाकृत नए हैं और जिनमें भारी पूँजी निवेश की ज़रूरत होती है। ये क्षेत्र हैं: आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स, अक्षय ऊर्जा और रक्षा उत्पादन। इसके अलावा हमारा परंपरागत वस्त्र और परिधान-उद्योग, ऑटोमोबाइल्स, फार्मा और सॉफ्टवेयर उद्योग पहले से ज्यादा मजबूती के साथ अपने कदम बढ़ा रहा है। इन बातों का सकल परिणाम है: नई पूंजी+ नई तकनीक=औद्योगिक गुणवत्ता में सुधार। हमारे वस्त्र, ऑटो पार्ट्स, औषधियाँ, केमिकल ज़्यादा प्रतिस्पर्धी बनेंगे। इससे निर्यात-आधारित उद्योगों को सीधा फ़ायदा मिलेगा। नतीजा: उत्पादन बढ़ेगा, रोज़गार बढ़ेगा, उद्योगों का विस्तार होगा।

इस प्रक्रिया को बढ़ावा देने के लिए हमें दो स्तरों पर काम करने की ज़रूरत है। एक स्तर छोटे और मध्यम दर्जे के उद्योगों का है, जो बड़ी संख्या में रोज़गार उपलब्ध कराते हैं और आम उपभोग की वस्तुएँ तैयार करते हैं। ऐसे उद्योग भी तभी सफल होंगे, जब हमारे पास नवीनतम उच्चस्तरीय तकनीक होगी। साथ ही हमें ऐसे सामाजिक विकास की ज़रूरत है, जो बड़ी संख्या में लोगों की समृद्धि का कारण बने। जब लोगों के पास पैसा होगा, तभी वे अपनी ज़रूरत की चीज़ें खरीदेंगे। जब उनका उपभोग बढ़ेगा, तब औद्योगिक विकास भी होगा।

भारी उद्योगों की भूमिका

हमने ऊपर जिन उद्योगों का ज़िक्र किया है, उनमें से ज्यादातर भारी उद्योगों की श्रेणी में आते हैं। भारी उद्योगों से आशय उन बड़े पैमाने के विनिर्माण उद्यमों से है, जिनमें भारी मात्रा में पूँजी, जटिल मशीनरी और कच्चे माल का उपयोग होता है। ये उद्योग, जैसे इस्पात, भारी इंजीनियरिंग, मशीनरी, सीमेंट, पोत और विमान निर्माण और ऑटोमोबाइल आदि बुनियादी ढाँचे के विकास, अन्य उद्योगों के लिए मशीनें बनाने और अर्थव्यवस्था के सुदृढ़ीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

ये भारी उद्योग अत्यधिक पूँजी प्रधान होते हैं और इनमें विशाल कारखाने, भारी मशीनरी व उपकरण शामिल होते हैं। इनमें मुख्यतः कच्चे माल (जैसे- लोहा, कोयला, खनिज) को परिष्कृत कर धातु, मशीनरी और अन्य भारी वस्तुओं का उत्पादन करते हैं। इनमें भारी इंजीनियरिंग उद्योग, मशीन टूल उद्योग, भारी विद्युत उपकरण, ऑटोमोबाइल उद्योग, इस्पात संयंत्र, पोत और विमान निर्माण और पेट्रोकेमिकल इकाइयाँ शामिल हैं।

इन्हें देश के आर्थिक-विकास की रीढ़ माना जाता है और ये भारी संख्या में रोजगार के अवसर भी प्रदान करते हैं। ये राष्ट्र की भौतिक और तकनीकी नींव को मजबूत करने के लिए भारी मात्रा में स्टील, मशीनें, और परिवहन के साधन जैसे जहाज, ऑटोमोबाइल वगैरह बनाते हैं। देश को आत्मनिर्भर बनाने में इन उद्योगों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण और आधारभूत है। ये उद्योग पूंजीगत वस्तुओं का उत्पादन करते हैं, जो अन्य सभी क्षेत्रों जैसे कृषि, बुनियादी ढांचा, रक्षा, विनिर्माण और सेवाओं की नींव रखते हैं। भारी उद्योगों में मुख्य रूप से ऑटोमोबाइल, भारी इंजीनियरिंग, मशीन टूल्स, हैवी इलेक्ट्रिकल उपकरण, स्पेशलिटी स्टील, जहाज निर्माण, रेलवे इक्विपमेंट और उन्नत बैटरी आदि शामिल हैं।

आयात प्रतिस्थापन

ये भारी उद्योग घरेलू स्तर पर मशीनरी, उपकरण और कच्चा माल उपलब्ध कराकर विदेशी-आयात पर निर्भरता कम करते हैं। उदाहरण के लिए, स्पेशलिटी स्टील और ऑटोमोबाइल सेक्टर में आयात कम हो रहा है। इससे विदेशी मुद्रा की बचत होती है और आपूर्ति शृंखला मजबूत बनती है। देश में छोटे और मझोले उद्योगों के लिए भी मशीनरी और आवश्यक उपकरण उपलब्ध कराने में ये मदद करते हैं। भारत सरकार अब प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (स्कीम) के तहत इन्हें प्रोत्साहन देकर करोड़ों रोज़गार सृजित करने का कार्य कर रही है। भारत अब ऑटोमोबाइल और हैवी इंजीनियरिंग उत्पादों का निर्यातक बन रहा है। ऱक्षा क्षेत्र में भारत अब पोत निर्माण में पूरी तरह आत्मनिर्भर है और अब हाईटेक लड़ाकू विमानों के क्षेत्र में भी तेजी से विकास कर रहा है। भारत में रक्षा उत्पादन 1.5 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो चुका है। भारत ने वित्त वर्ष 2024-25 में 1.54 लाख करोड़ रुपये से अधिक के रिकॉर्ड रक्षा उत्पादन के साथ आत्मनिर्भरता में बड़ी उपलब्धि हासिल की है, जो 2014-15 के मुकाबले 174 प्रतिशत अधिक है। 'मेक इन इंडिया' के तहत निजी भागीदारी (23 प्रतिशत) और सार्वजनिक क्षेत्र (77 प्रतिशत) के सहयोग से, रक्षा निर्यात भी रिकॉर्ड 23,622 करोड़ रुपये तक पहुँच गया है, जिसमें 100 से अधिक देशों को भारत निर्मित रक्षा उपकरण बेचे जा रहे हैं।

भारत अब तीसरा सबसे बड़ा ऑटोमोबाइल बाजार है (जापान को पीछे छोड़कर) और इलेक्ट्रिक वाहनों में तेजी से आगे बढ़ रहा है। ये सभी कदम जो आत्मनिर्भर भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने का आधार बनेंगे। कुल मिलाकर सुखी और समृद्ध देश को बनाने के लिए हमें नए आत्मनिर्भर भारतका निर्माण करना होगा। यह हमारे स्वदेशीकरण का मूलमंत्र है। निश्चित रूप से भारत इस दिशा में बढ़ रहा है, और जल्द ही उसके परिणाम भी दिखाई पड़ेंगे, पर उसके पहले हमें स्वतंत्रता-प्राप्ति के समय की परिस्थितियों और अपनी विवशताओं पर भी एक नज़र डालनी चाहिए।

1947 का भारत

स्वतंत्रता के समय भारत के स्वदेशी उद्योगों की स्थिति काफ़ी कमजोर और असंतुलित हो चुकी थी। यह हालत अचानक नहीं बनी, बल्कि लगभग सैकड़ों  साल की औपनिवेशिक नीतियों का नतीजा थी। उस समय हमारे परंपरागत उद्योग लगभग नष्ट हो चुके थे। ब्रिटिश शासन से पहले भारत दुनिया के बड़े औद्योगिक उत्पादकों में था, खासकर: सूती और रेशमी कपड़े, हस्तशिल्प, धातु-काम, जहाज़ निर्माण वगैरह में। अंग्रेज़ी सरकार की नीतियों ने भारतीय माल पर भारी कर लगाकर और ब्रिटेन के मशीन-निर्मित माल को खुली छूट देकर स्वदेशी उद्योगों की कमर तोड़ दी। परिणाम यह हुआ कि ढाका का मलमल, बनारस की बुनाई, कारीगरों के हुनर—सब लगभग खत्म हो गए। इसे इतिहास में वि-औद्योगीकरण या डी-इंडस्ट्रियलाइज़ेशन कहते हैं।

औद्योगिक आधार

1947 तक हमारे पास कुछ आधुनिक स्वदेशी उद्योग ज़रूर थे, लेकिन उनकी संख्या और दायरा छोटा था: मुंबई और अहमदाबाद वगैरह में कुछ कपड़ा मिलें थीं, बंगाल में जूट उद्योग था, जमशेदपुर में टाटा आयरन एंड स्टील था, सीमेंट, चीनी और काग़ज़ के कुछ कारखाने थे। पर भारी उद्योग बहुत कम थे। मशीनें और तकनीक ज़्यादातर आयातित थीं, उत्पादन घरेलू ज़रूरतों से कम था। उद्योग मुख्यतः उन्हीं इलाक़ों में थे जहाँ अंग्रेज़ों को फ़ायदा था: बंदरगाह के शहर थे मुंबई, कोलकाता और मद्रास। देश का बड़ा हिस्सा औद्योगिक रूप से पिछड़ा ही रहा।

भारतीय पूँजीपति वर्ग का जन्म हो रहा था, पर वह भी सीमित था। कुछ स्वदेशी घराने थे, जिन्होंने स्वदेशी उद्योगों की नींव रखी, लेकिन: पूँजी की कमी, सरकारी संरक्षण का अभाव और ब्रिटिश कंपनियों की प्रतिस्पर्धा ने इनके विकास को रोक रखा था। देश की अर्थव्यवस्था कच्चे माल के निर्यात पर निर्भर थी। तैयार औद्योगिक माल का हम आयात करते थे। कम शब्दों में कहें, तो भारत औद्योगिक राष्ट्र नहीं, औपनिवेशिक सप्लायर था।

आज़ादी के बाद भारत ने पंचवर्षीय योजनाओं, सार्वजनिक क्षेत्र और भारी उद्योगों पर ज़ोर दिया। शुरुआती वर्षों में राज्य-प्रेरित तीव्र औद्योगीकरण पर जोर दिया गया, लेकिन बाद में आर्थिक सुधारों, वैश्विक चुनौतियों और नीतिगत बदलावों ने इसकी दिशा प्रभावित की। कुल मिलाकर, विकास की गति शुरुआत में तेज रही, मध्य में मंद पड़ी, और 1990 के दशक से फिर तेज हुई। विकास के इन प्रमुख चरणों को इस तरह से समझें:

1.शुरुआती चरण: योजना अवधि और भारी उद्योगों का आधार (1947-1965): स्वतंत्रता के तुरंत बाद, भारत ने मिश्रित अर्थव्यवस्था अपनाई, जहाँ सार्वजनिक क्षेत्र को भारी उद्योगों के विकास की जिम्मेदारी सौंपी गई। प्रथम पंचवर्षीय योजना (1951-1956) ने आधारभूत संरचना पर ध्यान दिया, लेकिन द्वितीय योजना (1956-1961) में पीसी महालनबीस मॉडल के तहत भारी उद्योगों को प्राथमिकता मिली। इस मॉडल ने पूँजी-आधारित उद्योगों (जैसे लोहा-इस्पात, कोयला और भारी इंजीनियरिंग) पर जोर दिया, ताकि देश आत्मनिर्भर बने और उपभोक्ता वस्तुओं पर निर्भरता कम हो।

इस नीति की प्रमुख उपलब्धियां और चुनौतियाँ: सार्वजनिक क्षेत्र में बड़े प्लांट स्थापित हुए, जैसे भिलाई, राउरकेला और दुर्गापुर स्टील प्लांट। 1950 के दशक में औद्योगिक उत्पादन में मध्यम वृद्धि हुई, और विनिर्माण का जीडीपी में हिस्सा 7 प्रतिशत से बढ़कर 15.9 प्रतिशत तक पहुँचा। पूँजी की कमी, लंबी अवधि की परियोजनाएं और विदेशी सहायता पर निर्भरता के कारण लागत अधिक हुई। 1960 के दशक की शुरुआत में कृषि संकट और दो युद्धों (1962, 1965) ने गति को प्रभावित किया।

2. मध्य चरण: मंदी और सुधार की शुरुआत (1966-1990): साठ के दशक के मध्य से भारी उद्योगों की वृद्धि धीमी पड़ गई। लाइसेंस-परमिट राज (लाइसेंसिंग सिस्टम) ने निजी क्षेत्र को बाधित किया, जबकि सार्वजनिक क्षेत्र में अक्षमताएं बढ़ीं। पाँचवीं योजना (1974-1979) में विकास और पुनर्वितरण पर जोर दिया गया। 1980 के दशक में हल्के उदारीकरण (जैसे नरसिम्हन समिति की सिफारिशें) से निजी निवेश बढ़ा, और भारी उद्योगों में वृद्धि पुनः तेज हुई। स्टील और रसायन जैसे क्षेत्रों में उत्पादकता में सुधार हुआ। दूसरी तरफ विदेशी मुद्रा संकट, उच्च मुद्रास्फीति और क्षेत्रीय असमानताओं ने गति को रोका। औद्योगिक विकास दर औसतन 0.55 प्रतिशत प्रति वर्ष रही, और जीडीपी में भारत का वैश्विक हिस्सा 16 प्रतिशत से घटकर 4 प्रतिशत हो गया।

3. उदारीकरण और वैश्वीकरण (1991 से अब तक): 1991 के आर्थिक सुधारों ने भारी उद्योगों की गति को नई दिशा दी। लाइसेंसिंग हटाई गई, व्यापार और विदेशी निवेश खोले गए, और निजी क्षेत्र को प्रोत्साहन मिला। नब्बे के दशक में उत्पादकता में वृद्धि हुई, भारी उद्योगों की संरचना में बदलाव आया। 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद मंदी आने लगी। 2014 के बाद 'मेक इन इंडिया' जैसी पहलों से स्टील और इंजीनियरिंग क्षेत्रों में निवेश बढ़ा है। अब भारत वैश्विक स्तर पर स्टील उत्पादन में दूसरा स्थान हासिल करने में सफल हुआ है। इस दौरान कई चुनौतियाँ भी आईं। खासतौर से कृषि में श्रमिकों का काम हुआ, फिर महामारी 2020 ने नई समस्याएँ खड़ी कर दीं। बहरहाल 2022 के बाद से रिकवरी चल रही है, जिससे उम्मीदें बढ़ रही हैं।

हमारा विकास हुआ है, पर चीन और दक्षिण कोरिया जैसी निरंतरता नहीं है। इस बात को सब मानते हैं कि भारत के पास क्षमता है, पर तकनीक और स्केल में अभी कमी है।

स्वर्णिम भारत

अतीत में भारत लंबे समय तक दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल था। यह कोई राष्ट्रवादी दावा नहीं, बल्कि इतिहासकारों और आर्थिक अध्ययनों से निकला निष्कर्ष है। ईसा की पहली शताब्दी से 1700 तक भारत की विश्व के जीडीपी में 25 से 33 प्रतिशत तक हिस्सेदारी रही। उस समय भारत और चीन वैश्विक अर्थव्यवस्था के केंद्र थे। इसका कारण था उस समय के संदर्भ में हमारी कृषि प्रणाली उन्नत थी और विश्व-प्रसिद्ध उद्योग हमारे पास थे, जिनमें सूती-रेशमी वस्त्र, इस्पात, मसाले और हस्तशिल्प शामिल थे। हमारे पास मज़बूत व्यापार नेटवर्क था, जो रोमन साम्राज्य से लेकर दक्षिण-पूर्व एशिया तक फैला हुआ था। जिस समय दुनिया में औद्योगिक क्रांति हुई, भारत अंग्रेजों के अधीन था, जिन्होंने भारतीय उद्योगों का आधुनिकीकरण नहीं होने दिया। यह औद्योगिक क्रांति यूरोप तक सीमित रह गई, भारत में नहीं हो पाई।

आत्मनिर्भर भारत

हाल के वर्षों में भारत का सारा ज़ोर आत्मनिर्भरता पर केंद्रित है। इसका आशय है पराश्रय से मुक्ति। आज का पुनरुत्थान ऐतिहासिक निरंतरता का एक चरण है। यूके, यूरोपियन यूनियन और अमेरिका के साथ हाल में हुए व्यापार और औद्योगिक समझौतों और दीर्घकालीन साझेदारियों का भारत के औद्योगिक विकास पर असर काफ़ी बहुआयामी होगा। अमेरिका, यूके और ईयू की कंपनियाँ भारत को अब सिर्फ़ बाज़ार नहीं, बल्कि मैन्युफैक्चरिंग और सप्लाई-चेन हब के रूप में देख रही हैं। इसके साथ ही भारत अब अफ्रीका, दक्षिण पूर्व एशिया और लैटिन अमेरिका के विकासशील देशों के औद्योगिक-विकास में बड़ी भूमिका निभाने के लिए मैदान में उतर रहा है।

औद्योगिक और तकनीकी विकास भी अपने आप नहीं हो जाता। उसके लिए शैक्षिक और वैज्ञानिक विकास की जरूरत होगी, जो सीधे सामाजिक विकास से जुड़ा कार्य है। इसके लिए हमारे आर्थिक-विकास को समावेशी बनाने की जरूरत भी होगी। यानी प्रत्येक नागरिक को समर्थ बनाने की जरूरत है, जो पूरे राष्ट्र को समर्थ बनाए। बहरहाल इन समझौतों का असर हमें अगले कुछ वर्षों में नज़र आने लगेगा।

उद्योग और तकनीक

हाल में हुए समझौतों में आर्थिक और व्यापारिक हितों के साथ-साथ रक्षा उद्योग और प्रौद्योगिकी भी शामिल है। सेमी कंडक्टर, आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस, साइबर तकनीक, एयरोस्पेस और स्पेस जैसे कुछ नए कार्यक्रम हमारी औद्योगिक-संस्कृति में प्रवेश कर रहे हैं।

कुल मिलाकर तस्वीर कैसी है?

✔️ लंबे दौर में सकारात्मक बदलाव होंगे।

✔️ भारत का उद्योग ज़्यादा आधुनिक, प्रतिस्पर्धी और ग्लोबल-इंटीग्रेटेड होगा।

✔️ मेक इन इंडियाको अंतरराष्ट्रीय समर्थन मिलेगा।

हम बहुत जल्द अपने अंतरिक्ष-यात्रियों के साथ भारतीय गगनयान की सफलता का समारोह मनाएँगे, भारत का स्पेस स्टेशन भी अंतरिक्ष में दिखाई पड़ेगा। बहुत जल्द हम अपने ही बनाए यात्री विमानों पर और अपनी बनाई बुलेट-ट्रेनों पर यात्राएँ करेंगे। भारत धीरे-धीरे लो-कॉस्ट मैन्युफैक्चरर से हाई-वैल्यू प्रोड्यूसर बनेगा। वैश्विक सप्लाई-चेन में भारतीय छोटे और मझोले उद्योग भी जुड़ेंगे।

हिंदी विवेक में प्रकाशित

No comments:

Post a Comment