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Friday, May 1, 2026

चुनाव, गरीबी और 'रेवड़ी-चर्चा!'

बीबीसी से कीर्तीश भट्ट का कार्टून साभार

पाँच राज्यों में चुनाव-परिणाम क्या आएँगे, इसे लेकर अटकलें लगाना मीडिया और नेताओं का शगल है। खाली बैठे लोगों को बहसबाजी के लिए विषय मिल जाते हैं। एक अरसे से मैंने इन बहसों से बचना शुरू कर दिया है। मुझे लगता है कि इनके चक्कर में जाने-अनजाने कुछ महत्त्वपूर्ण बातों की अनदेखी हो जाती है। बहरहाल, दो बातों ने मुझे इन चुनावों के साथ संदर्भ जोड़ने को प्रेरित किया है। एक, खातों में सीधे नकद धनराशि का जाना और दूसरे देश में अलग-अलग जगहों पर असंगठित कामगारों की नाराज़गी।  

यह नाराज़गी केवल नोएडा में ही नहीं है। नोएडा की परिघटना सनसनी के रूप में सामने आई, इसलिए उसे मीडिया में जगह मिल गई। इसमें शामिल कर्मचारी स्मार्टफोन, इलेक्ट्रॉनिक्स और उनसे जुड़ी कंपनियों से जुड़े हैं। इन कंपनियों को 'मेक इन इंडिया' पहल के तहत प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेटिव्स दिए गए हैं। इन्होंने करोड़ों अरबों का मुनाफा भी कमाया है। राज्य सरकारों ने इन आंदोलनों को शांत करने के लिएगाजर और छड़ी दोनों का इस्तेमाल किया। पुलिस कार्रवाई भी की और वेतन में वृद्धि करके रियायतें भी दी हैं।

नोएडा की परिघटना ने देश का ध्यान इस नई समस्या की ओर खींचा है। इसके पहले ज़ोमैटो, स्विगी, ब्लिंकिट और ई-बिजनेस समूहों के माल को घर-घर पहुँचाने वाले गिग वर्कर्स की समस्याएँ सामने आईं। ऐसे ही समस्याएँ ओला, ऊबर और रैपिडो वगैरह के लिए काम करने वालों की हैं। ये शहरी गरीब हैं। भारत में लंबे अरसे तक गरीबी को हम गाँवों में तलाशते रहे, पर धीरे-धीरे वह शहरों में आती जा रही है, इसे आप बढ़ता शहरीकरण कह सकते हैं।

शहरी गरीब

बेशक ये वैसे नितांत गरीब नहीं हैं, जिन्हें गरीबी की रेखा के नीचे रखा जाता है, पर ये भी गरीब हैं। कोविड-काल में प्रवासी मज़दूरों के रूप में इनकी व्यथा दिखाई और सुनाई पड़ी थी। उसके बाद से किसी न किसी रूप में बार-बार सामने आ रही है। ये कामगार गैर-वाजिब बातें नहीं कर रहे हैं। एक मजदूर परिवार को शहरों में रहने के लिए अब किराए पर 5,000-6,000 रुपये, खाने पर 8,000-10,000 रुपये और पेट्रोल पर 3,000-4,000 रुपये खर्च करने पड़ते हैं। बिजली, परिवहन, फोन, स्कूल फीस या दवाइयों के खर्च के बिना ही यह कुल खर्च 20,000 रुपये हो जाता है। वे केवल गुजारे लायक आय की माँग कर रहे हैं।

ऊर्जा-आत्मनिर्भरता की राह में बड़ा कदम


भारत ने अपने परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम में हाल में एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। तमिलनाडु के कल्पक्कम में स्वदेशी डिजाइन से निर्मित प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (पीएफबीआर) ने 6 अप्रैल को सफलतापूर्वक अपनी प्रथम क्रिटिकैलिटी प्राप्त की, जो नाभिकीय चेन रिएक्शन की शुरुआत है। यह प्रोटोटाइप एफबीआर 500 मेगावॉट विद्युत (एमडब्लूई) रिएक्टर है, जिसे भारतीय नाभिकीय विद्युत निगम लिमिटेड (भाविनी) ने तमिलनाडु के कल्पक्कम नाभिकीय परिसर में निर्मित किया है।

यह तकनीक नाभिकीय ऊर्जा में यूरेनियम पर निर्भरता कम करेगी। इस उपलब्धि के साथ, भारत अपने तीन-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के दूसरे चरण में प्रवेश कर गया है, जिसकी परिकल्पना डॉ होमी जहाँगीर भाभा ने की थी। वैश्विक स्तर पर भी यह महत्त्वपूर्ण परिघटना है। इसके पूर्ण संचालन में आने के बाद, रूस के बाद भारत, फास्ट ब्रीडर रिएक्टर का संचालन करने वाला, दुनिया का दूसरा देश बन जाएगा।

ईरान-युद्ध के आर्थिक दुष्प्रभावों के साथ, दुनिया भर के देश ऊर्जा सुरक्षा की तलाश में हैं। ज्यादातर देश कोयले और पेट्रोलियम के रूप में फॉसिल फ्यूल के सहारे हैं, पर अब उनके खत्म होने का समय है। वैसे भी उनके पर्यावरणीय दुष्प्रभाव को देखते हुए विकल्पों की तलाश चल रही है। पनबिजली, सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा जैसे विकल्पों की तुलना में नाभिकीय ऊर्जा सबसे आगे है, क्योंकि बड़े स्तर पर वही जरूरत पूरी कर सकती है। उसके साथ भविष्य के तकनीकी विकास भी जुड़े हैं, जो नए विकल्पों को खोलेंगे।

अमेरिका के वैज्ञानिकों ने हाल में संलयन (फ्यूज़न) ऊर्जा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त घोषणा की है। व्यावसायिक रूप से इस पद्धति से बिजली बनाने में अभी कई दशक लगेंगे, पर भविष्य में यह ऊर्जा का विश्वसनीय स्रोत साबित होगा। यह बिजली भी परमाणु के नाभिकीय में छिपे ऊर्जा स्रोत पर आधारित होगी, पर अभी प्रचलित विखंडन पर आधारित नाभिकीय ऊर्जा से एकदम अलग और सुरक्षित होगी।