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Saturday, May 9, 2026

टीवीके यानी ‘स्टार्टअप’ राजनीतिक विकल्प


तमिलनाडु विधानसभा के चुनाव-परिणामों ने देश में एक नए राजनीतिक 'स्टार्टअप' का नाम जोड़ा है। अभिनेता से राजनेता बने विजय की पार्टी टीवीके का चुनावी पदार्पण बेहद शानदार रहा है। 'स्टार्टअप' शब्द बिजनेस से आया है।  तेजी से बढ़ने वाली कंपनियों को यह नाम दिया जाता है और एक अरब डॉलर से ऊपर का कारोबार करने वाली कंपनी को 'यूनिकॉर्न' कहते हैं। माना जा रहा है कि टीवीके ने रातों-रात भारतीय राजनीति में 'यूनिकॉर्न' बनकर दिखाया है।

तमिलगा वेट्री कषगम (टीवीके) ने अपने पहले ही चुनावी मुकाबले के बाद तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी), आम आदमी पार्टी (आप), असम गण परिषद (एजीपी) और वाईएसआर कांग्रेस (वाईएसआरसीपी) जैसी पार्टियों के नक्शे-कदम सफलता हासिल की है। वह बेशक पहले ही राउंड में यूनीकॉर्नबनकर उभरी है, पर पर्यवेक्षक मानते हैं कि उसे अभी कठोर परीक्षा से गुजरना होगा। अभी यह सेमीफ़ाइनल जैसा लगता है। शायद साल-दो साल, नई सरकार आए या फिर से चुनाव कराने पड़ें।

टीवीके के पीछे नौजवानों की ताकत है, जिसे जेन-ज़ी माना जा रहा है। हाल में नेपाल में भी नए नेता जीतकर आए हैं। उस सरकार की स्थिरता को लेकर भी संदेह है। सोशल मीडिया के ज़रिए चुनाव जीतना एक बात है, लेकिन सत्ता के खेल को खेलना दूसरी बात है। इस पीढ़ी को घोषणापत्र पढ़ना, आर्थिक मुद्दों का अध्ययन करना या नेताओं की जवाबदेही का मतलब भी समझना होगा। परंपरागत राजनीति में भी युवा ही आगे आते हैं। पर समाधान झटपट नहीं मिलते और सिनेमा को नायकों की तरह, खासतौर से नहीं।

तमिलनाडु में सिनेमा और राजनीति का गहरा संबंध रहा है। अन्नादुरै, एमजीआर, करुणानिधि और जयललिता जैसे सिनेकर्मी अपनी फिल्मी लोकप्रियता के दम पर मुख्यमंत्री बने। पर वे स्पष्ट एजेंडा और दीर्घकालिक रणनीतियों वाले राजनीतिक नेताओं के रूप में परिपक्व हुए। पहली नज़र में लग सकता है कि इतिहास खुद को दोहरा रहा है, एक और अभिनेता राजनीति में प्रवेश कर रहा है। लेकिन जब हम गहराई से पड़ताल करते हैं, तो पता लगता है कि विजय के पीछे युवाओं का अंधाधुंध समर्थन, भोलापन है। राजनीतिक-परिपक्वता नहीं।  

राज्य के मतदाता सत्ता-विरोधी लहरों पर सवार हैं। दशकों से वे द्रमुक और अद्रमुक दोनों को रोटेट करके नियंत्रित रखते आए हैं। मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में जयललिता के निधन के बाद, नेतृत्व के अभाव और पार्टी की अंदरूनी खींचतान के कारण अद्रमुक पृष्ठभूमि में चली गई है। इस शून्य के कारण संभवतः टीवीके का उदय हुआ है।

टीवीके संगठित प्रशंसक क्लब है। इसके ज्यादातर कार्यकर्ता विजय के प्रशंसक हैं, जो फिल्मों के रिलीज पर खुशी मनाने के आदी हैं, नीतियों पर बहस करने के नहीं। डीएमके, एआईएडीएमके, सीपीआई, सीपीआई-एम, वीसीके आदि जैसी सभी प्रमुख कार्यकर्ता-आधारित पार्टियों के विपरीत, जो राजनीतिक शिक्षा पर जोर देती हैं।

भारत में राजनीतिक स्टार्टअप को मोटे तौर पर तीन श्रेणियों में रख सकते हैं। 1. किसी आंदोलन से उत्पन्न, 2. किसी पारिवारिक नाम, व्यक्तित्व या वंश के इर्द-गिर्द निर्मित, और 3. किसी सामाजिक या धार्मिक समूह या विशिष्ट विचारधारा के इर्द-गिर्द विकसित। आंध्र में अस्सी के दशक में एनटी रामाराव के नेतृत्व में तेलुगु देशम को और दिल्ली में आम आदमी पार्टी को काफी सफलता मिली, पर दोनों मौकों पर जनता को विकल्पों की जबर्दस्त जरूरत थी।

1977 में जनता पार्टी भी राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा ही स्टार्टअप था। 1967 में जब देश में गठबंधन सरकारों का दौर शुरू हुआ, तब भी वह विकल्प खोजने का प्रयास था। टीडीपी ने अपने गठन के एक साल बाद, 1983 में आंध्र प्रदेश विधानसभा चुनावों में भारी बहुमत से जीत हासिल की थी और 201 सीटें जीती थीं। आम आदमी पार्टी ने 2013 के अपने पहले चुनाव के बाद कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाई थी। एजीपी ने 1985 में अपने गठन के तुरंत बाद असम आंदोलन से जुड़े स्वतंत्र प्रतिनिधियों के समर्थन से सरकार बनाई थी।

1977 में जनता पार्टी ने तो 'यूनिकॉर्न' के रूप में ही शुरुआत की थी, पर वह अपने अंतर्विरोधों को संभाल नहीं पाई और देखते ही देखते अनेक दलों में विभाजित हो गई। यह भी सच है कि बहुत कम राजनीतिक स्टार्टअप 'यूनिकॉर्न' बन पाए हैं। कुछ को समय लगा, जबकि कुछ विफल हो गए। पिछले साल बिहार में जन सुराज पार्टी के साथ ऐसा ही हुआ। अभिनेता से राजनेता बने कमल हासन की मक्काल नीधि मय्यम भी ऐसी ही एक पार्टी है।

बिहार में पुष्पम प्रिया चौधरी के नेतृत्व वाली प्लूरल्स पार्टी जैसी कई छोटी-छोटी नवगठित पार्टियाँ हैं। वहीं, जीतन राम माँझी का हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (धर्मनिरपेक्ष) और उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक मोर्चा जैसी छोटी पार्टियाँ भी हैं, जिनकी महत्वाकांक्षाएं सीमित हैं और वे कुछ खास क्षेत्रों तक ही सीमित हैं।

उत्तर प्रदेश में निषाद पार्टी, पीस पार्टी, अपना दल (सोनेलाल) और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (एसबीएसपी) जैसी पार्टियाँ हैं, पर ज्यादातर सीमित जातीय क्षेत्र होने के कारण बड़े स्तर पर जगह नहीं बना पाईं। इस किस्म के प्रयासों की संख्या बहुत बड़ी है। यहाँ कुछ के नाम ही दिए जा रहे हैं।

देश के राजनीतिक परिदृश्य पर नजर डालें तो छह राष्ट्रीय पार्टियाँ हैं। निर्वाचन आयोग के अनुसार, मई 2026 तक इनमें भारतीय जनता पार्टी, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी), बहुजन समाज पार्टी, नेशनल पीपुल्स पार्टी और आम आदमी पार्टी इस श्रेणी में शामिल हैं। इन्हें राष्ट्रीय स्तर की मान्यता उनके चुनावी प्रदर्शन के आधार पर मिली है।

जहाँ कांग्रेस का उदय स्वतंत्रता आंदोलन से हुआ, वहीं भाजपा, माकपा, बसपा और आप का उदय उनकी राजनीतिक गतिविधियों के सहारे हुआ। एनपीपी मुख्यतः मेघालय की पार्टी है, जिसका गठन पीए संगमा ने 2013 में किया था। टीवीके की तुलना 1982 में आंध्र प्रदेश में उभरी तेलुगु देशम से की जा सकती है, जिसके पीछे फिल्म अभिनेता एनटी रामाराव की लोकप्रियता थी।

1972 में एमजी रामचंद्रन  द्वारा स्थापित अन्ना द्रमुक वस्तुतः द्रमुक से टूटकर उसके ही विकल्प के रूप में बनी थी। एमजीआर के बाद इसे जयललिता जैसा चमत्कारिक नेतृत्व मिला। इस तथ्य पर भी ध्यान दें कि तमिलनाडु की द्रविड़-राजनीति में सिनेमा के कलाकारों की जबर्दस्त भूमिका रही है।

पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस, ओडिशा की बीजू जनता दल और तेलंगाना की एआईएमआईएम जैसी पार्टियां जो क्षेत्रीय स्तर पर शक्तिशाली बनकर उभरी हैं, उन्हें या तो किसी ऐसे जाने-माने राजनीतिक नेता के नेतृत्व में सफलता मिली है, जिन्होंने मूल पार्टी से अलग होकर पार्टी बनाई (ममता बनर्जी), या फिर पारिवारिक साख (नवीन पटनायक और असदुद्दीन ओवैसी) के कारण। हालांकि एआईएमआईएम का गठन काफी पहले हुआ था, लेकिन ओवैसी के नेतृत्व में इसे लोकप्रियता मिली।

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी, बिहार के राष्ट्रीय जनता दल और कर्नाटक के जनता दल (समाजवादी) के पीछे समाजवाद और जय प्रकाश नारायण के आंदोलनों की पृष्ठभूमि ज़रूर है, पर वे अब पारिवारिक साख पर केंद्रित हैं। लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास), एनसीपी (एसपी), शिवसेना (यूबीटी) जैसी अन्य पार्टियाँ भी कमोबेश ऐसी ही पार्टियाँ हैं।

तमिलनाडु में विदुथलाई चिरुथाइगल काट्ची (वीसीके) दलितों की सुरक्षा के लिए एक आंदोलन के इर्द-गिर्द बनी थी और तमिलनाडु में इसे सीमित सफलता मिली है। पार्टियों की संख्या बढ़ते जाना, लोकतंत्र में गलत तो नहीं है, पर तब तक निरर्थक है, जब तक उसका कोई वैचारिक अर्थ न हो। विरोध या विकल्पों की राजनीति भी ज़रूरी है, पर तभी जब विकल्प ठोस हों। 

दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित

 

 

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