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Wednesday, May 6, 2026

अमीरात के हटने से ‘ओपेक’ में दरार का अंदेशा


पश्चिम एशिया की लड़ाई और करवट लेती वैश्विक-व्यवस्था के दौर में यूएई का ओपेकको छोड़ना, इस बात का संकेत है कि पश्चिम एशिया में केवल तेल की राजनीति में ही नहीं, बल्कि भू-राजनीति में भी बदलाव आ रहा है.

इस परिघटना को खाड़ी देशों की आपसी प्रतिद्वंद्विता, सऊदी अरब के साथ बिगड़ते रिश्तों और अमेरिका-इसराइल की नीतियों के परिप्रेक्ष्य में भी पढ़ना होगा.

पहली नज़र में यह कदम अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के लिए फायदेमंद लगता है, जिन्हें मध्यावधि चुनाव से पहले तेल की कीमतों में कमी की सख्त जरूरत है. ऐसा तभी होगा, जब तेल के दाम गिरेंगे.

लंबे समय से ट्रंप के लिए ओपेकबड़ी समस्या रहा है; उन्होंने बार-बार तेल की कीमतों में वृद्धि के लिए इसे जिम्मेदार ठहराया है. ओपेक से अलग होकर अमीरात ट्रंप का प्रिय बन सकता है.

मोटे तौर पर, यह अमीरात की आत्मकेंद्रित विदेश-नीति की शुरुआत है.  ओपेक कई देशों के सामूहिक का प्रतिनिधि समूह है. अमीरात के फैसले से वह फौरन टूटेगा नहीं, पर कमज़ोर ज़रूर होगा.

इसके पहले भी कुछ देश इस समूह से हटे हैं, पर यूएई इसके सबसे महत्त्वपूर्ण भागीदारों में से एक है, जिसका असर होगा.

अमीरात की नाखुशी

समूह के सदस्यों के लिए मुकर्रर उत्पादन कोटा से अमीरात नाखुश था. वे चाहते हैं कि हमें जितना चाहें उतना खनिज तेल पंप करने की अनुमति होनी चाहिए. उन्हें लगता है कि तेल के कारोबार का अंत होने वाला है, इसलिए ज़रूरत इस बात की है कि ज्यादा से ज्यादा तेल बेचकर कमाई कर ली जाए और उससे भावी अर्थव्यवस्था की नींव डाली जाए.

बेशक इससे तेल के दामों में कमी आएगी, पर अब उत्पादन रोका, तो फँस जाएँगे, क्योंकि दुनिया तेजी से वैकल्पिक ऊर्जा-स्रोतों पर जा रही है और अचानक तेल की माँग डूब जाएगी.

यह उनका आर्थिक-दृष्टिकोण है, पर बात केवल इतनी ही नहीं है. संभवतः उनकी खुद को सऊदी अरब के बराबर रखने की इच्छा भी है. देखना होगा कि खाड़ी सहयोग परिषद यानी जीसीसी की एकता पर इसका क्या असर होगा.  

ओपेक एक स्थायी अंतरराष्ट्रीय-संगठन है जिसकी स्थापना 1960 में अपने सदस्य देशों की पेट्रोलियम नीतियों में समन्वय स्थापित करने और वैश्विक तेल बाजारों को स्थिर करने के लिए की गई थी.

ओपेक+ 2016 में बना विस्तारित समूह है, जिसमें ओपेक के साथ-साथ 10 अन्य प्रमुख तेल उत्पादक देश शामिल हैं. इनमें रूस प्रमुख है. दशकों से विश्व बाजार में खनिज तेल की कीमत को ओपेक नियंत्रित करता रहा है. सत्तर के दशक के तेल संकट के दौरान उसने वैश्विक ऊर्जा-नीति में भारी परिवर्तन करा दिए थे.

भारतीय नज़रिया

प्रश्न है भारत पर इसका असर क्या होगा? हमारे इन सभी देशों के साथ अच्छे रिश्ते हैं. पर अब भारत के उपभोक्ता इसे पेट्रोलियम की कीमतों में कमी की उम्मीद के साथ देख सकते हैं.

अमीरात के साथ भारत के दीर्घकालीन संबंध हैं, जो उसका तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार और चौथा सबसे बड़ा खनिज तेल का आपूर्तिकर्ता है. अंग्रेजी शासन के दौरान, खासतौर से 19वीं सदी से 1971 तक, शेख-राज्य स्वतंत्र राष्ट्र नहीं, बल्कि ब्रिटिश संरक्षित राज्य थे. उन्हें तब ‘ट्रूसियल स्टेट्स’ या 'ट्रूसियल ओमान' कहा जाता था.

स्वतंत्रता के बाद से, अमीरात में भारतीयों को बड़ी संख्या में रोज़गार मिला है.  यहाँ की कुल जनसंख्या में अमीराती आबादी केवल 10 प्रतिशत से थोड़ी अधिक है. समृद्ध गैर-अमीरातियों में लगभग आधे भारतीय हैं.

अमीरात ने हाल में भारत के साथ अपने रक्षा-संबंधों को भी मजबूत किया है. अमीरात के बढ़ते उत्पादन से यदि तेल की कीमतें गिरेंगी, तो भारत फुजइराह बंदरगाह से कम दरों पर आपूर्ति का लाभ उठा सकता है.

भारतीय रिफाइनरियों के पास अमीराती तेल के प्रसंस्करण की तकनीक है. उनका अमीरात के साथ दीर्घकालिक अनुबंध हो सकता है. अमीरात में भारतीय रुपये की माँग भी है. इस इलाके में भारतीय नकद अंतरण का यूपीआई एप चलता है.

सऊदी अरब से मतभेद

अमीरात और सऊदी अरब के बीच मतभेद भी पुराने हैं. सऊदी अरब ने 1970 के दशक में ब्रिटेन से स्वतंत्र हुए अमीरात को तब तक मान्यता नहीं दी, जब तक उसने कुछ विवादित क्षेत्रों को सौंप नहीं दिया.

दोनों देशों के तौर-तरीके भी अलग-अलग हैं. सऊदी अरब, भले ही राजशाही है, पर वह धीमी गति से चलता है. उसके विशाल शाही परिवार के भीतर फैसले आमराय से होते हैं, जबकि यूएई चुस्त और तेज फैसले करता है.

ऊर्जा-परिवर्तन की आने वाली आँधी को समझते हुए यूएई अपनी अर्थव्यवस्था में बदलाव कर रहा है. वह तेल से होने वाले मुनाफे को तेजी से बढ़ाकर अपनी अर्थव्यवस्था में निवेश करना चाहता है, ताकि पेट्रोलियमोत्तर परिस्थितियों का सामना किया जा सके.

विदेश-नीति में भी, दोनों के मतभेद बढ़ रहे हैं. यमन में, ईरान समर्थित हूतियों के खिलाफ सहयोग करने वाले इन दोनों देशों ने हाल में अपने-अपने समर्थित समूहों के माध्यम से छाया-युद्ध लड़ा.

यमन में, सऊदी अरब वैश्विक मान्यता प्राप्त सरकार का समर्थन करता है और इस्लामी समूह अल-इस्लाह के साथ मिलकर काम करता है, जबकि अमीरात अलगाववादी अल-मजलिस अल-इंतकाली अल-जानुबी का समर्थक है, जिसे सदर्न ट्रांज़ीशनल कौंसिल या एसटीसी कहते हैं.

सूडान में भी, दोनों देश एक-दूसरे के विरोधी खेमों में खड़े हैं. अमीरात, लीबिया में प्रभाव जमाने के लिए भी सक्रिय है, जो तेल और गैस के लिए फारस की खाड़ी का एक उभरता हुआ विकल्प है.

2021 में, मतभेद चरम पर पहुँच गए जब अमीरात ने ओपेक के फैसलों पर कड़ी आपत्ति जताई थी. तब आम सहमति बनी और अमीरात को समूह में बनाए रखने के लिए तेल का बड़ा हिस्सा दिया गया.

ईरान युद्ध के दौरान अमीरात ने ईरान के प्रति आक्रामक रुख अपनाया, जबकि सऊदी रुख अपेक्षाकृत नरम रहा. ईरान ने युद्ध के दौरान अमीरात पर 2,200 से अधिक ड्रोन और मिसाइलें दागी थीं.

अमेरिका की दिलचस्पी

लड़ाई खत्म होने के बाद अमीरात की आर्थिक रिकवरी में अमेरिका मदद कर सकता है. 22 अप्रैल को ट्रंप के वित्तमंत्री स्कॉट बेसेंट ने कहा था कि अमीरात की अर्थव्यवस्था को वित्तीय सहायता देने पर अमेरिका विचार कर रहा है.

अमीरात के कार्टल से निकलने के बाद कीमतों को नियंत्रित करने में ओपेक की ताकत और कम हो जाएगी. अमेरिका, कनाडा, ब्राजील और नॉर्वे जैसे स्वतंत्र उत्पादकों के कारण वह पहले से ही कमजोर होने लगी है. 

पश्चिमी देश 1973 के अरब-इसराइल युद्ध के दौरान ओपेकके 'तेल हथियार' को भूले नहीं हैं. फिर भी ओपेक का तत्काल विघटन नहीं होगा. उधर रूस का कहना है कि वह ओपेक+ में बना रहेगा.

कुछ पर्यवेक्षक मानते हैं कि 2016 के बाद से ओपेक छोड़ने वाले पाँचवें सदस्य और अब तक के सबसे बड़े उत्पादक, यूएई का बाहर निकलना ओपेक के अंत की शुरुआत कर सकता है.

इंडोनेशिया ने 2016 में और कतर ने 2019 में इसे छोड़ा. अंगोला और इक्वाडोर जैसे अन्य सदस्य भी हाल के वर्षों में अलग हुए हैं. वेनेजुएला जैसे कुछ अन्य सदस्य भी शायद अब ऐसा करें.

टूटता एकाधिकार

सत्तर के दशक की तुलना में आज वैश्विक तेल बाजार में ओपेक का महत्व काफी कम हो गया है. उस समय, ओपेक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बिकने वाले कुल तेल का लगभग 85 प्रतिशत नियंत्रित करता था, लेकिन अब यह हिस्सा लगभग 40 प्रतिशत रह गया है, जो अमीरात के हट जाने के बाद और कम हो जाएगा.

वैश्विक अर्थव्यवस्था में तेल का महत्व अब उतना नहीं है जितना सत्तर के दशक में था. यह अब तेजी से कम हो रहा है. फिलहाल वह कीमतों को ऊँचे स्तर पर रख सकता है, पर उसका एकाधिकार टूट रहा है.  

पिछले दो दशकों में अमेरिका में बढ़ते उत्पादन ने वैश्विक उत्पादन में ओपेक की हिस्सेदारी को पहले ही कम कर दिया है, जिससे कीमतों पर उसका नियंत्रण कमजोर हो गया है.

वैकल्पिक ऊर्जा

दुनिया के देश खनिज तेल की माँग को कम कर रहे हैं. चीन ने विद्युतीकरण पर भारी निवेश किया है, जिसके सहारे उसे पेट्रोलियम के दबाव को काफी हद तक कम करने में मदद मिली है. कारों, ट्रकों और रेलवे के विद्युतीकरण के विस्तार ने उसकी दैनिक तेल की माँग को लगभग दस लाख बैरल तक कम कर दिया है.

इस दौरान भारत ने भी अपनी रेल लाइनों का 99.9 फीसदी विद्युतीकरण करके रेलवे की डीजल की माँग को लगभग समाप्त कर दिया है. बिजली के लिए नाभिकीय-ऊर्जा की ओर तेजी से कदम बढ़ाए हैं.

कीमतें रुकेंगी?

होर्मुज जलडमरूमध्य के माध्यम से तेल निर्यात फिर से शुरू हुआ, तो सऊदी अरब को कीमतों को ऊँचे स्तर पर बनाए रखने के लिए अपने उत्पादन में और कमी करनी होगी. उसके पास ब्लॉक के सभी सदस्यों में सबसे अधिक अतिरिक्त उत्पादन क्षमता है.

उधर होर्मुज जलडमरूमध्य में दोतरफा नाकाबंदी है, जिसकी वजह से तेल, गैस, पेट्रोल, प्लास्टिक की कीमतें बढ़ रही हैं. यूएई ने नाकाबंदी के बाद की स्थितियों के आधार पर फैसला किया है, जब कीमतें गिरेंगी. .

उत्पादन बढ़ेगा!

अमीरात में 113 अरब बैरल तेल और गैस के भंडार हैं, जो विश्व में छठे सबसे बड़े भंडार हैं. ये लगभग पूरी तरह से अबू धाबी में हैं. यूएई की तेल उत्पादन-क्षमता को बढ़ाकर प्रतिदिन पचास लाख बैरल करने के लिए 2023-27 के दौरान 150 अरब डॉलर का निवेश-कार्यक्रम चल रही है.  

ओपेक के साथ उसका कोटा 34.5 लाख बैरल प्रति दिन तक सीमित था, जिससे उसकी लगभग 15 लाख बैरल प्रति दिन की अतिरिक्त क्षमता अप्रयुक्त रह जाती. अमीरात की नाराजगी का यह एक मुख्य कारण है.

सऊदी अरब की तरह यूएई ने भी तेल-आधारित अर्थव्यवस्था के बाद की हाईटेक-अर्थव्यवस्था के लिए महत्वाकांक्षी योजना बनाई है, जिसमें एआई और डेटा केंद्रों में भारी निवेश की आवश्यकता है, जिसे पाने के लिए तेल-राजस्व को बढ़ाने का दबाव है.

पेट्रोल-युग का अंत

ओपेक के पूर्व शीर्ष अधिकारी और सऊदी अरब के पूर्व तेल मंत्री शेख यामानी ने कभी कहा था, जिस तरह पाषाण युग का अंत पृथ्वी पर पत्थरों के समाप्त होने के कारण नहीं हुआ था, उसी प्रकार तेल युग के अंत के लिए भी तेल के अंत की ज़रूरत नहीं होगी.’ दुनिया तेजी से वैकल्पिक-स्रोतों को खोज रही है.

अमीराती रणनीतिकार मानते हैं कि वैश्विक माँग ‘पीक ऑयल’ के करीब पहुँच रही है, जिसके बाद खनिज तेल की ज़रूरत और मूल्य में गिरावट शुरू हो जाएगी. वे ‘पीक ऑयल’ से पहले जितना संभव हो उतना तेल बेचना चाहते हैं.

उनका कहना है कि ईरान-युद्ध ने तेल की कीमतों में अनियंत्रित वृद्धि करके, माँग को कमज़ोर और वैकल्पिक ऊर्जा-रूपांतरण को तेज किया है, जिससे ‘पीक ऑयल’ और नज़दीक आ रहा है. अब शेष बचे समय में यूएई वर्तमान ऊँची कीमतों का लाभ उठाना चाहता है, क्योंकि इसके बाद कीमतें गिरेंगी.

खाड़ी में होड़

होर्मुज जलडमरूमध्य के बाहर 1.5 एमबीपीडी (मिलियन बैरल पर डे) की क्षमता वाली अबू धाबी (हबशान)-फुजइराह तेल पाइपलाइन पहले से ही चालू है, जिससे यूएई को ऐसा करने में फायदा होगा. उसे उम्मीद है कि होर्मुज पर लगे दो अवरोध हटने के बाद खाड़ी निर्यातकों के बीच, बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए होड़ मच जाएगी.

पूरी दुनिया इस समय भले ही खनिज तेल की कीमत को 100 डॉलर के ऊपर देख रही है, पर लड़ाई खत्म होने के बाद उनके 50 डॉलर तक गिरने के आसार हैं.

साल के अंत में होने वाले अमेरिकी मध्यावधि चुनावों से पहले होर्मुज समस्या का समाधान हो गया, तो तेल-बाजार का परिदृश्य नाटकीय रूप से बदल जाएगा.

आवाज़ द वॉयस में प्रकाशित

 

 

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