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| 15 सितंबर 2020 को वाइट हाउस में हुए समझौते के समय की तस्वीर |
अब्राहम समझौते को पश्चिम एशिया में ऐतिहासिक शांति पहल के रूप में प्रस्तुत किया गया था। वास्तव में, वे अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के पहले दौर में किए गए समझौते थे, जिसके तहत कुछ अरब देशों ने फलस्तीनी मुद्दे को हल किए बिना इसराइल के साथ संबंधों को सामान्य कर लिया । अब ट्रंप फिर से समझौतों का विस्तार करने के इच्छुक दिखाई देते हैं। वे वर्तमान क्षेत्रीय-अस्थिरता का इस्तेमाल करते एक बड़ा समझौता करना चाहते हैं, जो पश्चिम एशिया की एक मूल समस्या को संबोधित करता है।
क्या वे इसमें सफल होंगे? हालाँकि कुछ देश इसमें शामिल हो चुके हैं, पर
शेष मुस्लिम देशों के लिए इसे स्वीकार करना बहुत मुश्किल
होगा। पर इसमें सऊदी अरब शामिल हुआ, तो पाकिस्तान जैसे देश के लिए मुसीबत खड़ी हो
जाएगी। पाकिस्तानी दृष्टिकोण रहा है कि इसराइल को तब तक मान्यता नहीं दी जा सकती जब
तक कि फलस्तीनियों के लिए एक उचित समाधान और
एक स्वतंत्र फलस्तीनी राज्य के निर्माण पर स्पष्टता नहीं होती है।
उधर इसराइल ने इस समस्या के वास्तविक समाधान की ओर
बढ़ने की बहुत कम इच्छा दिखाई है। उसके कब्जे वाले क्षेत्र में यहूदी बस्तियों का विस्तार
जारी है। गज़ा का इलाका बमबारी से तबाह हो गया है। जॉर्डन नदी के पश्चिमी किनारे में
हिंसा जारी है। ऐसी परिस्थितियों में ट्रंप की नए सिरे से रुचि इसराइली लॉबी के प्रभाव
को दर्शाती है। सरकारें रणनीतिक कारणों से इस किस्म की डिप्लोमेसी में शामिल हो
सकती हैं, पर आम लोग फलस्तीनी समस्या को पश्चिम एशिया में न्यायपूर्ण समझौते के रूप
में देखना चाहते हैं।
अब्राहम समझौते क्या हैं?
राष्ट्रपति ट्रंप ने सोमवार 25 मई को पश्चिम एशियाई
देशों से अब्राहम समझौते में शामिल होने का आह्वान किया। अब्राहम समझौते अमेरिका
की मध्यस्थता से इसराइल और कई अन्य देशों के बीच हुए सामान्यीकरण समझौते हैं,
जिन्हें उन्होंने अपने पहले कार्यकाल की सबसे महत्वपूर्ण राजनयिक
उपलब्धियों में से एक बताया था।
ट्रंप ने अब सोशल मीडिया पर कहा कि अगर और देश इस समझौते में शामिल होते हैं तो मध्य पूर्व में सहयोग और भी मजबूत होगा, और उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि ईरान भी उनमें से एक हो सकता है। उन्होंने एक अलग पोस्ट में इस आह्वान को दोहराते हुए कहा कि उन्होंने सऊदी अरब, कतर और पाकिस्तान से आग्रह किया है कि वे समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए ‘तैयार, इच्छुक और समर्थ’ हों। पिछले साल नवंबर में, कजाकिस्तान भी इसमें शामिल हो गया। उसके इसराइल के साथ पहले से ही पूर्ण राजनयिक संबंध थे।
अगर ज़्यादा देश इस समझौते पर हस्ताक्षर करेंगे,
तो अमेरिका की आंतरिक राजनीति में, ईरान के कुछ कट्टर विरोधियों को शांत किया जा
सकता है, जिन्होंने शांति समझौते की कोशिश करने के लिए ट्रंप
की आलोचना की है। दक्षिण कैरोलिना के रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने हाल में
ईरान के साथ शांति समझौते पर सहमति जताने के बारे में कई चेतावनियाँ जारी की हैं, लेकिन उन्होंने सऊदी अरब और अन्य अरब देशों के
बीच संबंधों को सामान्य बनाने की संभावना का स्वागत किया। उन्होंने कहा, ‘यह ऐतिहासिक होगा और इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण समझौतों में से एक होगा।’
उन्होंने आगे कहा, ‘पूरा लक्ष्य हमेशा से ईरान को अलग-थलग
करना रहा है।’
विश्लेषकों का कहना है कि ऐसा कुछ जल्द होने की
संभावना नहीं है, और ईरान पर हमला करके अमेरिका और इसराइल
द्वारा शुरू किए गए युद्ध को समाप्त करने से सऊदी अरब और अन्य देशों को भी समझौतों
में शामिल होने के लिए तैयार कर पाने की संभावना नहीं है।
कुछ जानने योग्य बातें
2020 में वाइट हाउस के लॉन में हस्ताक्षरित,
अब्राहम एकॉर्ड के नाम से प्रसिद्ध इस समझौते ने इसराइल और खाड़ी के
दो अरब देशों, बहरीन और संयुक्त अरब अमीरात के बीच राजनयिक
संबंध स्थापित किए। इसके तुरंत बाद मोरक्को के साथ भी इसी तरह का समझौता हुआ। तब
तक, केवल मिस्र और जॉर्डन ही ऐसे अरब देश थे जिन्होंने
औपचारिक रूप से इसराइल को मान्यता दी थी। बाकी ज्यादातर देशों ने फलस्तीनी राज्य के गठन तक इसराइल को
मान्यता न देने का निश्चय किया था।
राजनयिक संबंधों के अभाव के कारण इसराइल के
नागरिक उन देशों की यात्रा नहीं कर सकते हैं, और अरब नागरिक
इसराइल की। इसने व्यापार और सुरक्षा सहयोग को भी रोका है, जो गुप्त रूप फिर भी
चलता है। अब्राहम समझौते पर सहमति बनने के पहले तक, कई अरब
देशों में, जिनमें अमीरात भी शामिल थे, इसराइल को सीधे फोन कॉल करना भी प्रतिबंधित था। ट्रंप ने इन समझौतों को
अपने पहले कार्यकाल की विदेश-नीति की सबसे बड़ी उपलब्धि बताया था, और उन्हें
अमेरिकी सांसदों का द्विदलीय समर्थन प्राप्त हुआ है।
क्या प्रभाव पड़ा?
अब्राहम समझौते ने इस पर हस्ताक्षर करने वाले
देशों के बीच व्यापार, सुरक्षा सहयोग और पर्यटन के विस्तार
का अवसर पैदा किया है। इसराइली पर्यटक और निवेशक अमीरात के सबसे बड़े शहर दुबई में
उमड़ पड़े हैं, और प्रौद्योगिकी और ऊर्जा कंपनियों ने नए
समझौते किए हैं। 2024 में, दोनों देशों के बीच व्यापार 3 अरब
डॉलर से अधिक हो गया, और नियमित उड़ानें अमीरात और तेल अवीव
के बीच यात्रियों को ले जाने लगीं हैं।
मोरक्को में इसराइली पर्यटकों की संख्या में भी भारी वृद्धि देखी गई है।
और समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए प्रोत्साहन को और आकर्षक बनाने के लिए,
अमेरिका ने विवादित पश्चिमी सहारा क्षेत्र को मोरक्को के संप्रभु
हिस्से के रूप में मान्यता देने पर सहमति व्यक्त की है। बहरीन में इसका प्रभाव
अपेक्षाकृत कम रहा, और खाड़ी देशों में समझौतों के खिलाफ
विरोध प्रदर्शन एक नियमित परिघटना बन गई है।
इन समझौतों से इसराइल-फलस्तीनी संघर्ष को
सुलझाने में कोई मदद नहीं मिली है। अरब नेताओं का लंबे समय से चला आ रहा लक्ष्य है,
वेस्ट बैंक और गज़ा में फलस्तीनी राज्य। उसकी संभावनाएँ धूमिल दिखाई
देती हैं, भले ही हाल में कई यूरोपीय देशों ने फलस्तीनी
राज्य को मान्यता दी हो।
क्या यह शांति समझौता है?
अब्राहम समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद से
लगभग छह वर्षों में, ट्रंप और इसराइल के प्रधान मंत्री बिन्यामिन
नेतन्याहू ने इन समझौतों को ‘शांति समझौता’ बताया है। समझौतों की घोषणा के समय नेतन्याहू
ने वाइट हाउस की बालकनी से कहा, ‘आज हमने जो शांति स्थापित
की है, उसके सुफल अपार होंगे…अंततः, इससे
अरब-इसराइल संघर्ष हमेशा के लिए समाप्त हो सकता है।’
इस क्षेत्र के विद्वानों का कहना है कि यह महज लफ्फाज़ी
है, जो इस तथ्य को झुठलाती है कि इसराइल और यूएई या बहरीन के
बीच कभी कोई युद्ध नहीं हुआ है। मोरक्को अरब-इसराइल संघर्षों से काफी हद तक दूर
रहा है, सिवाय 1973 के युद्ध में एक सांकेतिक सेना भेजने के।
असल में, इन समझौतों ने इसराइल और फलस्तीनियों के बीच के
केंद्रीय संघर्ष को दरकिनार कर दिया, और उन पक्षों के बीच
सद्भाव की घोषणा की जो आपस में लड़ नहीं रहे थे।
क्या और देश इसमें शामिल होंगे?
अमेरिकी और इसराइली अधिकारियों ने अक्सर अन्य
देशों से समझौतों पर हस्ताक्षर करने की अपनी इच्छा और अपेक्षा व्यक्त की है। लेकिन
वर्षों तक वे इस लक्ष्य को हासिल करने में असमर्थ रहे। समझौतों के समर्थकों के लिए
सबसे बड़ा इनाम सऊदी अरब होगा, जो शक्तिशाली और तेल-समृद्ध
साम्राज्य है, लेकिन सऊदी अरब को इसराइल को मान्यता देने के लिए मनाने के वर्षों
के प्रयास विफल रहे हैं।
जो बाइडेन प्रशासन ने भी इस मामले में कोशिश की
थी, जिसमें कहा गया था कि समझौता करने वाले देश को अमेरिका महत्वपूर्ण लाभ प्रदान
करेगा। विश्लेषकों का कहना है कि गज़ा में युद्ध के दौरान इसराइल के आचरण और फलस्तीनी
नागरिकों की भारी पीड़ा ने अरब देशों के लिए समझौतों में शामिल होना बहुत मुश्किल
बना दिया है। सऊदी अधिकारियों ने बार-बार कहा है कि फलस्तीनी राज्य की स्थापना के
बिना इसराइल को मान्यता देने में वे असमर्थ होंगे।

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