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Wednesday, June 3, 2026

डिजिटल क्रांति के बीच RBI का प्लास्टिक नोट लाने का फैसला


डिजिटल दौर में भी बढ़ती नकदी को संभालने और फटे नोटों के खर्च से बचने के लिए आरबीआई अब टिकाऊ और सुरक्षित पॉलीमर नोट लाने की तैयारी कर रहा है। इस विषय पर बिजनेस स्टैंडर्ड के संपादकीय में लिखा गया है कि:

 सरसरी तौर पर भले ही यह अनावश्यक लगे लेकिन यह निर्णय ध्यान देने लायक है। खासतौर पर तब जबकि भारत डिजिटल भुगतान में दुनिया में अग्रणी देश के रूप में उभरा है। लेकिन आंकड़े कुछ और ही कहते हैं। नकदी को अप्रासंगिक बनाने के बजाय भारत की डिजिटल भुगतान क्रांति के साथ-साथ मुद्रा के उपयोग में लगातार वृद्धि हुई है।

महँगाई और विदेशी-मुद्रा पलायन रोकने के भारतीय प्रयास

पश्चिम एशिया की लड़ाई का कोई हल नजर नहीं आ रहा है। होर्मुज जलसंधि मार्ग को, अमेरिका और ईरान दोनों ने बंद कर रखा है। इस रास्ते से भारत के 45-55 फीसदी खनिज तेल का आवागमन होता है। भारत के निर्यात पर भी असर पड़ा है। अर्थव्यवस्था पर दबाव नज़र आने लगा है। रुपये और शेयर बाजार की गिरावट ने भी चिंता का माहौल बनाया है।

लड़ाई शुरू होने के बाद से विदेशी मुद्रा भंडार में 38 अरब डॉलर की गिरावट और खनिज तेल की कीमतों के 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बने रहने के कारण बढ़ता दबाव नीति निर्माताओं के लिए चिंता का विषय है। हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नागरिकों से मितव्ययिता का आह्वान किया है, जिसके पीछे कारण है सोने का आयात और विदेश-यात्राओं पर विदेशी मुद्रा का खर्च।

खबर है कि इस तनाव के कारण भारत पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों और विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों को बचाने के लिए रिजर्व बैंक ने अपने सोने के भंडार का एक हिस्सा बेचा है। ब्लूमबर्ग इकोनॉमिक्स (BE) की एक रिपोर्ट में यह दावा किया गया है।

ब्लूमबर्ग इकोनॉमिक्स के वरिष्ठ भारत अर्थशास्त्री अभिषेक गुप्ता के अनुसार, RBI ने 22 मई को समाप्त हुए दो हफ्तों के भीतर लगभग 12 अरब डॉलर (करीब 1.14 लाख करोड़ रुपये) मूल्य का सोना बेचा है। इसी अवधि के दौरान केंद्रीय बैंक ने 7.5 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियां खरीदीं। हालांकि इस मामले पर अभी तक रिजर्व बैंक की तरफ से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।

अमेरिका-ईरान: कभी हाँ, कभी ना की राजनीति


अनुमान है कि अमेरिका और ईरान के बीच समझौता अब किसी भी क्षण हो सकता है. फिर भी दोनों ने अपने हाथ खींच रखे हैं. इसके पीछे दो कारण नज़र आते हैं.

एक तरफ अमेरिका चाहता है कि ईरान पर ज्यादा से ज्यादा दबाव बना ले, वहीं ईरान का नेतृत्व दो हिस्सों में बँटा हुआ है. वहाँ का अनुदार तबका छूट देना नहीं चाहता.

अमेरिका इसे और व्यापक आधार देना चाहता है, जिसमें इसराइल की समस्या का समाधान भी है. वह मुस्लिम देशों से इसराइल को मान्यता दिलाना चाहता है, जो इस लड़ाई की बुनियाद में है.

बहरहाल दोनों देशों की सहमतियों के बावज़ूद, समझौता अटका हुआ है. राष्ट्रपति ट्रंप ने शुक्रवार को वाइट हाउस के सिचुएशन रूम में अपने प्रमुख सलाहकारों के साथ बैठक की, लेकिन उन्होंने अंतिम फैसला टाल दिया.

इस कक्ष का इस्तेमाल बड़े संकटों से निपटने की रणनीति बनाने या चर्चा करने के लिए होता है. अभी स्पष्ट नहीं है कि समझौते की घोषणा कब होगी, होगी भी या नहीं.

ईरान के मुख्य वार्ताकार, जनरल मोहम्मद बग़ेर ग़ालिबफ़ ने दिन में  सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में कहा, तेहरान को वाशिंगटन पर भरोसा नहीं है. उनके किसी कदम के बिना, हम पहला कदम नहीं उठाएँगे.