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Wednesday, June 3, 2026

डिजिटल क्रांति के बीच RBI का प्लास्टिक नोट लाने का फैसला


डिजिटल दौर में भी बढ़ती नकदी को संभालने और फटे नोटों के खर्च से बचने के लिए आरबीआई अब टिकाऊ और सुरक्षित पॉलीमर नोट लाने की तैयारी कर रहा है। इस विषय पर बिजनेस स्टैंडर्ड के संपादकीय में लिखा गया है कि:

 सरसरी तौर पर भले ही यह अनावश्यक लगे लेकिन यह निर्णय ध्यान देने लायक है। खासतौर पर तब जबकि भारत डिजिटल भुगतान में दुनिया में अग्रणी देश के रूप में उभरा है। लेकिन आंकड़े कुछ और ही कहते हैं। नकदी को अप्रासंगिक बनाने के बजाय भारत की डिजिटल भुगतान क्रांति के साथ-साथ मुद्रा के उपयोग में लगातार वृद्धि हुई है।

केंद्रीय बैंक के सामने चुनौती यह है कि मुद्रा के प्रवाह को अधिक कुशल, सुरक्षित और टिकाऊ बनाया जाए। रिजर्व बैंक की नवीनतम वार्षिक रिपोर्ट इस वास्तविकता को रेखांकित करती है। वर्ष 2025-26 में प्रचलित मुद्रा 11 फीसदी से अधिक बढ़ी, जो पिछले वर्ष की 5.8 फीसदी वृद्धि से लगभग दोगुनी है, जबकि इसी दौरान डिजिटल भुगतान भी तेजी से विस्तार करता रहा।

दूसरे शब्दों में कहें तो डिजिटल और नकद भुगतान एक-दूसरे का स्थान नहीं ले रहे है बल्कि साथ-साथ मौजूद हैं। इस बढ़ते मुद्रा भंडार का प्रबंधन लगातार महंगा होता जा रहा है। वर्ष 2024-25 में बैंक नोट छापने पर 6,300 करोड़ रुपये से अधिक की राशि खर्च हुई।

इसी समय लगभग 24 अरब घिसे-पिटे नोटों को प्रचलन से वापस लिया गया जो घिसी हुई मुद्रा को बदलने के परिचालन बोझ को उजागर करता है। छोटे मूल्य वर्ग के नोट जो बार-बार हाथ बदलते हैं वे खासतौर पर जल्दी खराब हो जाते हैं। ऐसे में यह उचित ही है कि रिजर्व बैंक 10 और 20 रुपये के नोटों के लिए एक प्रायोगिक परियोजना पर विचार कर रहा है। छोटे मूल्य वर्ग के नोटों का हिस्सा भी बढ़ाया जाना चाहिए।

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इसी विषय पर बिजनेस इंडिया का एक लेख 

बिजनेस स्टैंडर्ड ने बढ़ती आर्थिक स्थितियों और मौद्रिक नीति को लेकर लिखा है:

लगातार बदलती स्थितियों और परस्पर विरोधी उद्देश्यों के कारण यह स्पष्ट नहीं है कि पश्चिम एशिया में तनाव कितने समय तक बना रहेगा। ऐसे में यह कहना कठिन है कि होर्मुज स्ट्रेट कब खुलेगा।

ध्यान रहे कि यहां से वैश्विक कच्चे तेल के 20 फीसदी की आवाजाही होती है। बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें अब भी संघर्ष शुरू होने से पहले की तुलना में लगभग 40 फीसदी अधिक हैं। आर्थिक दृष्टि से तेल मूल्य का झटका मुद्रास्फीतिजनित मंदी की ओर ले जाता है जिसे संभालना कठिन होता है। चूंकि वैश्विक कीमतों का असर सीमित और विलंबित रहा है इसलिए यह अभी तक खुदरा मुद्रास्फीति दर में परिलक्षित नहीं हुआ है। अप्रैल में यह 3.5 फीसदी थी।

हालांकि, ऊंची तेल कीमतों ने थोक मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति दर में तेज वृद्धि की और अप्रैल में यह 8.3 फीसदी तक पहुंच गई। हाल ही में ईंधन की पंप कीमतों में वृद्धि संभवतः थोक मूल्य सूचकांक और खुदरा मुद्रास्फीति दर दोनों को और ऊपर धकेलेगी।

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