नई शिक्षा नीति के तहत स्कूलों में भाषाओं के अध्ययन से जुड़े कुछ सबसे महत्त्वपूर्ण सवाल उच्चतम न्यायालय के सामने उठे हैं। इनके पीछे दक्षिण में हिंदी बनाम विदेशी भाषा के मसले भी हैं। अभिभावकों की व्यावहारिक समस्याएँ, विद्यालयों के पास उपलब्ध संसाधनों और अध्यापकों की संख्या जैसे सवालों का पिटारा भी अब खुलेगा। सुप्रीम कोर्ट ने गत 27 मई को सीबीएसई की उस नीति को चुनौती देने वाली याचिका पर विचार करने पर सहमति जताई है, जिसमें 1 जुलाई से कक्षा 9 के छात्रों के लिए दो भारतीय मूल भाषाओं सहित तीन भाषाओं का अध्ययन अनिवार्य किया गया है।
हालाँकि मुख्य
न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और विपुल एम पंचोली के पीठ ने इस मामले
में कोई अंतरिम आदेश जारी नहीं किया है, पर उन्होंने केंद्र सरकार, सीबीएसई और एनसीईआरटी को नोटिस जारी करके दो
सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाब माँगा है। अदालत ने अलबत्ता यह कहा है कि बोर्ड का
तीसरी भाषा को शामिल करने का निर्णय सिद्धांत रूप में ‘प्रशंसनीय’ हो सकता है, लेकिन इसे वर्तमान शैक्षणिक वर्ष से लागू करने
में कुछ व्यावहारिक प्रश्न उठेंगे। शिक्षकों और पुस्तकों की कमी के मद्देनज़र इस
नीति को लागू करने की तार्किक और तथ्यात्मक चुनौतियों को लेकर अदालत अधिक चिंतित
है।
बहरहाल, न्यायालय 15 और 16 जुलाई को दलीलें सुनेगा। उसी समय इस आदेश को लागू किया जा रहा होगा। शैक्षिक-प्रश्न के अलावा यह राजनीतिक प्रश्न भी है। अपनी भाषा-नीति के अनुरूप डीएमके ने इस कदम का विरोध किया है, वहीं कांग्रेस ने बिना परामर्श के अधिसूचना जारी होने की आलोचना की है। दक्षिण भारत, खासतौर से तमिलनाडु में कहा जा रहा है कि सीबीएसई का यह आदेश हिंदी थोपने का प्रयास है। यह आदेश सीबीएसई बोर्ड के स्कूलों पर ही लागू होता है, जबकि राज्यों के बोर्डों के नियम अलग-अलग हैं। यदि यह ठीक से लागू हो गया, तो राज्यों में भी किसी न किसी रूप में दिखाई पड़ेगा।
कुछ समय पहले, सीबीएसई ने घोषणा की थी कि तीसरी भाषा की
अनिवार्यता को 2029-30 शैक्षणिक वर्ष तक स्थगित कर दिया जाएगा। पूछा
जा सकता है कि यह अचानक बदलाव क्यों? एनईपी 2020, जिसके तहत यह
आदेश लागू किया जा रहा है,
लचीलेपन का वादा करती है।
वह गारंटी देती है कि किसी भी छात्र या राज्य पर कोई भाषा थोपी नहीं जाएगी। दूसरी
तरफ अभिभावक और शिक्षक बोर्ड परीक्षाओं से ठीक पहले छात्रों पर बढ़ते दबाव को लेकर
चिंतित हैं। प्रशिक्षित भाषा शिक्षकों की कमी और उपयुक्त पाठ्य-पुस्तकों की
अनुपलब्धता भी चुनौतियाँ हैं।
इस आदेश के
विरोधी यह भी कहते हैं कि इससे विदेशी भाषा की पढ़ाई करने के इच्छुक छात्रों का
अहित होगा। कुछ छात्र पहले से ही फ्रेंच, जर्मन या जापानी
जैसी विदेशी भाषाओं का अध्ययन कर रहे हैं। वहीं इस नीति के समर्थक कहते हैं कि स्कूली
शिक्षा भारतीय भाषाओं से ऊपर विदेशी भाषाओं को रखना न तो तार्किक है और न ही
लाभकारी। विदेशी भाषाओं को वैकल्पिक विषयों के रूप में पढ़ाया जा सकता है। भारतीय
भाषाओं को बढ़ावा देना, विदेशी भाषाओं को हतोत्साहित करना नहीं है।
याचिकाकर्ताओं के
वकील कपिल सिब्बल ने अदालत में कहा कि यह मुद्दा संघवाद और भाषा के चयन से जुड़े
संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा है। भाषा व्यक्तिगत पसंद का विषय है और इसे थोपा नहीं
जा सकता। इसपर पीठ ने कहा कि इस तर्क को उलट कर यह कहा जा सकता है कि अधिक भाषाएँ
सीखना संघवाद की भावना को लाभ पहुँचाने का काम करेगा।
15 मई को जारी परिपत्र के अनुसार, विदेशी भाषा का चयन करने वाले छात्र दो भारतीय
मूल भाषाओं का अध्ययन करने के बाद केवल तीसरी भाषा के रूप में या एक अतिरिक्त चौथी
भाषा के रूप में ही ऐसा कर सकेंगे। यह नियम राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और स्कूल शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यक्रम
ढांचा 2023 का हिस्सा है। परिपत्र के अनुसार कक्षा 10 में तीसरी भाषा के लिए कोई बोर्ड परीक्षा नहीं
होगी। ‘आर3 (तीसरी भाषा) के सभी मूल्यांकन पूरी तरह से विद्यालय-आधारित और आंतरिक
होंगे। इसका विवरण सीबीएसई प्रमाणपत्र में परिलक्षित होगा।
इस नीति के
आलोचक मानते हैं कि हिंदी भाषी राज्यों ने तीन-भाषा नीति के प्रति उदासीन रुख
अपनाया है, जिनमें से ज्यादातर ने क्षेत्रीय भाषा के
बजाय संस्कृत को चुना है। उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान
में पहली भाषा अंग्रेजी,
दूसरी हिंदी और तीसरी भाषा
संस्कृत है।
मध्य प्रदेश
में अभी दो-भाषा नीति लागू है, जिसमें अंग्रेजी
पहली भाषा और हिंदी दूसरी भाषा है। झारखंड में तीसरी भाषा मुख्य रूप से संस्कृत है, हालांकि कुछ स्कूलों में संथाली जैसी क्षेत्रीय
भाषाएँ भी पढ़ाई जाती हैं। इसी प्रकार, छत्तीसगढ़ में
संस्कृत के साथ-साथ गोंडी जैसी क्षेत्रीय भाषा भी पढ़ाई जाती है। परेशानी उन
अभिभावकों को होती है, जो एक शहर से दूसरे शहर में जाते हैं और उन्हें अपनी
मन-पसंद की विदेशी भाषा पढ़ाने वाला स्कूल नहीं मिलता।
मोटे तौर पर
बहुसंख्यक गैर-हिंदी राज्यों में बच्चे अंग्रेजी और हिंदी के साथ तीसरी भाषा के
रूप में अपनी मातृभाषा सीखते हैं। राज्यों के बोर्ड और सीबीएसई बोर्ड के
पाठ्यक्रमों में टकराव होता है। यह दिक्कत केवल हिंदी क्षेत्रों में ही नहीं है।
दक्षिण में भी है, जहाँ बच्चों को तीसरी भाषा के रूप में तमिल, कन्नड़, मलयालम या
तेलुगु पढ़नी पड़ती है। इससे उन्हें दिक्कत होती है, जो कक्षा पाँच से जिस तीसरी
भाषा को पढ़ रहे होते हैं, उसे छोड़ना पड़ता है। यों पाँचवीं कक्षा तक भाषा का
मूल्यांकन भी नहीं होता। कुछ लोगों को लगता है कि संस्कृत या उर्दू पढ़ने से उनके
बच्चों का करिअर अच्छा नहीं होगा, विदेशी भाषा पढ़ने से होगा।
भाषा संबंधी
प्राथमिकताएं भी राज्यों के अनुसार भिन्न होती हैं। मध्य प्रदेश में अब तक केवल
दो-भाषा प्रणाली ही लागू है, जिसका पालन राज्य
बोर्ड और सीबीएसई दोनों स्कूलों द्वारा किया जाता है। अभिभावक इंतज़ार कर रहे हैं
कि क्या इस साल कोई बदलाव होगा। देश के बाहर सीबीएसई स्कूलों के साथ भी ऐसा ही है।
तीसरी भाषा के रूप में विदेशी भाषा का चयन किया जा सकता है, पर सभी स्कूलों में
सभी भाषाएँ उपलब्ध नहीं होतीं।
कुछ विशेषज्ञ
मानते हैं कि भाषाओं का बोझ गरीब तबके के बच्चों को पढ़ाई से विमुख करता है। उच्च-मध्यम
वर्गीय परिवार के बच्चे को मिलने वाले विशेषाधिकार सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले
बच्चों से बिलकुल अलग होते हैं। पोषण संबंधी अंतर ही चौंकाने वाला है। और यह
असमानता केवल शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में ही नहीं, बल्कि आदिवासी क्षेत्रों में भी स्पष्ट है।
मिड डे मील के
कारण बच्चों को स्कूल आने की प्रेरणा मिलती है, लेकिन विषयों का बोझ उन्हें
हतोत्साहित करता है। उनके अभिभावक अपने बच्चों के लिए ट्यूशन भी नहीं लगा सकते। पर
भाषा के सवाल अलग-अलग उम्र के बच्चों के लिए अलग होते हैं। पाँच-छह साल के बच्चे
और बारह-चौदह साल के बच्चे की सीखने की प्रवृत्ति अलग होती है। इसलिए यह
शिक्षा-मनोविज्ञान से जुड़ा विषय भी है।
सवाल है कि जो
बच्चे पहले से फ्रेंच, जर्मन और स्पेनिश भाषा पढ़ रहे हैं, वे
एक नई भारतीय भाषा को बिल्कुल नए सिरे से किस तरह से सीखेंगे? पर उन्हें विदेशी भाषा पढ़ने की हड़बड़ी क्यों है? वह तो पढ़ाई पूरी होने के बाद भी सीखी जा सकती
है। उन्हें पढ़ाने वाले अध्यापकों को अपनी नौकरी जाने का डर है, वहीं बहुत से
स्कूलों में इन भाषाओं को पढ़ने के इच्छुक छात्र हैं, पर अध्यापक नहीं हैं। ये
समस्याएँ शिक्षा की सामान्य समस्याओं से अलग नहीं हैं। अदालत के सामने इसके तमाम
पक्ष खुलकर सामने आएँगे।

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