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Tuesday, June 30, 2026

भारत-अमेरिका ट्रेड-डील के आसार और वैश्विक-विखंडन

इलस्ट्रेशन द प्रिंट से साभार

अमेरिका के विदेशमंत्री मार्को रूबियो ने कहा है कि राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप अगले साल के शुरू में भारत का दौरा कर सकते हैं. उन्होंने यह भी कहा कि दोनों देशों के बीच व्यापार-समझौता होने के करीब है.  

फ्रांस में हुए जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान 17 जून को ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच 16 महीनों में हुई पहली मुलाकात से रिश्तों में जमी बर्फ कुछ पिघलती नज़र आ रही है.

पिछले हफ्ते अमेरिकी व्यापार प्रमुख जैमीसन ग्रीअर की भारत यात्रा के बाद भी संकेत मिले हैं कि व्यापार-वार्ता के लिए बातचीत लगभग पूरी हो चुकी है, और बहुत जल्द ही समझौता हो जाएगा.

भारत उन कुछ देशों में शामिल है, जिनके साथ अमेरिका ने अभी तक व्यापार समझौता नहीं किया है. इसके पहले यूरोपीय संघ, जापान, दक्षिण कोरिया और कई आसियान देशों सहित लगभग एक दर्जन व्यापारिक साझेदारों के साथ वह समझौते कर चुका है.

हिंद महासागर

आर्थिक-दृष्टि से ट्रेड-डील महत्त्वपूर्ण है, पर भू-राजनीति के लिहाज से दोनों देशों के बीच दूरी बढ़ी है. हाल में अमेरिका ने अपनी सेना की हिंद-प्रशांत कमांड के नाम से हिंद शब्द हटाकर उसे वापस यूएस पैसिफिक कमांड कर दिया है.

प्रशांत और एशिया में अमेरिकी हितों की रक्षा करने वाली यह अमेरिका की सबसे बड़ी और सबसे पुरानी एकीकृत सैन्य कमान है, जिसका कार्यक्षेत्र अमेरिका के पश्चिमी तट से लेकर भारत की पश्चिमी सीमा तक फैला हुआ है.

अमेरिकी योजनाओं का आभास भारत को है. भारत आज से नहीं, बल्कि अस्सी के दशक से अपनी इस भूमिका को समझता है. इसका संकेत प्रधानमंत्री मोदी की सेशेल्स-यात्रा और वहाँ हुए समझौतों में देखा जा सकता है. भारत ने 1986 में सेशेल्स में और 1988 में मालदीव में सरकारों के तख्तापलट की कोशिशों को नाकाम किया था.

पश्चिम एशिया के टकराव और अमेरिका की रणनीति के बरक्स, भारत पर हिंद महासागर की सुरक्षा की जिम्मेदारी कुछ और बढ़ गई है. पिछले दो दशक में अमेरिका ने भारत को इस इलाके की धुरी माना था, जो शायद किसी न किसी रूप में उसे अब भी मानना होगा.

2006 में जब से अमेरिका ने भारत से रिश्तों को बेहतर बनाना शुरू किया है, वहाँ के विशेषज्ञों के एक तबके ने कहना शुरू किया है कि भारत अंततः हमारा प्रतिस्पर्धी है, और उसका उदय, चीन की तरह एक नए प्रतिस्पर्धी का उदय साबित होगा.

वस्तुतः भारत ने भी, सरकार चाहे जिसकी भी रही हो, कभी अमेरिका के पिट्ठू की तरह का बर्ताव नहीं किया, जैसा कि पाकिस्तान करता है.

राष्ट्रपति ट्रंप और उनका प्रशासन औपचारिक शब्दावली में भारत के महत्त्व को रेखांकित करता ज़रूर है, पर पिछले दो दशकों से चले आ रहे दोनों देशों के प्रगाढ़-संबंधों में अब मोड़ आ रहा है. फिलहाल वे भारत को बाज़ार मानकर ही चल रहे हैं. 

भारतीय दृष्टिकोण

स्वाभाविक रूप से भारतीय विदेश-नीति में भी तदनुरूप बदलाव आएगा. जैसा कि विदेशमंत्री एस जयशंकर ने दक्षिण कोरिया में आयोजित 'जेजू फोरम फॉर पीस एंड प्रॉस्पैरिटी 2026' में कहा कि वैश्विक विखंडन (फ्रैगमेंटेशन) वैश्विक-संबंधों की एक स्थायी वास्तविकता है.

उन्होंने कहा कि यह विखंडन, नकारात्मक होने के बजाय भारत जैसे विकासशील देशों के लिए एक बड़ा अवसर है. इससे कुछ चुनींदा देशों का प्रभुत्व कम होगा और बहुध्रुवीयता (मल्टीपोलैरिटी) का विस्तार होगा.

जिस तरह चीन ने तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावज़ूद अपनी स्वायत्तता को हासिल किया है, उसी तरह भारत को भी अपने लिए जगह बनानी होगी.

बेशक ट्रंप का अगले साल भारत आना महत्त्वपूर्ण है, पर उसके पहले इस साल सितंबर में चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत-यात्रा अब उससे ज्यादा महत्त्वपूर्ण साबित हो सकती है. ट्रंप अब भारतीय जनता के प्रिय-पात्र नहीं हैं. 

भारत की ब्रिक्स में सक्रियता इस दौरान बढ़ रही है, जिसके और बढ़ते जाने की आशा है. दूसरी तरफ ब्रिक्स की गतिविधियाँ ट्रंप को नापसंद हैं. हमें इन सभी घटनाओं को उनके अंतर्विरोधों के साथ पढ़ना चाहिए.

बढ़ती कटुता

पिछले डेढ़ साल में व्यापार, रूसी तेल और ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अमेरिकी मध्यस्थता के दावों को लेकर भारत-अमेरिका संबंधों में कटुता पैदा हुई है.  अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो की मई में हुई भारत-यात्रा और कुछ दूसरे प्रयासों के बावजूद, भरोसा बढ़ा नहीं है.   

भारत अकेला ऐसा देश नहीं है, जिसे डॉनल्ड ट्रंप को डील करने में दिक्कतों का सामना करना पड़ा है. इटली और कनाडा के साथ यह कड़वाहट काफी आगे बढ़ चुकी है.

चूँकि अमेरिका भारत का सबसे बड़ा आर्थिक साझेदार है, न केवल व्यापार में, बल्कि निवेश, प्रौद्योगिकी और उच्च शिक्षा में भी, इसलिए दोनों देशों के संबंध महत्त्वपूर्ण हैं. फिलहाल राष्ट्रपति ट्रंप के शेष बचे ढाई वर्षों में उनकी नीतियों के साथ भारत को सामंजस्य बिठाना होगा.  

व्यापार संतुलन

अमेरिका के साथ भारत का निर्यात अधिशेष (सरप्लस) छह महीनों से लागू भारी अमेरिकी टैरिफ के कारण घट रहा है. वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के अनुसार, भारत का निर्यात अधिशेष मई 2025 में 5.02 अरब डॉलर से घटकर इस वर्ष मई में 2.94 अरब डॉलर रह गया है, जो 40 फीसदी से ज्यादा की गिरावट है.

घटता व्यापार अधिशेष भारत के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि भारत अपने दस शीर्ष व्यापारिक साझेदारों में से नौ के साथ व्यापार घाटे का सामना कर रहा है. अमेरिका एकमात्र ऐसा प्रमुख देश है, जहाँ उसका निर्यात, आयात से ज्यादा है.

पिछले एक दशक में अमेरिकी बाजार पर भारत की निर्भरता बढ़ी है. इस समय  भारत के कुल निर्यात में अमेरिका का हिस्सा लगभग 20 प्रतिशत है, जबकि 2010-2011 में यह 10 फीसदी था.

रुपये की गिरावट

भारत में पूँजी-निवेश में कमी के कारण रुपये की कीमत में तेजी से गिरावट हो रही है. इस साल फरवरी अमेरिका के साथ हुए अंतरिम व्यापार समझौते के बाद वैश्विक निवेशकों की भावना में सुधार आया था, पर उसी महीने के अंत में पश्चिम एशिया युद्ध शुरू होते ही विदेशी पूँजी भारी मात्रा में भारत से बाहर निकल गई: मार्च में 13.6 अरब डॉलर और अप्रैल में 7.56 अरब डॉलर.

अमेरिका के साथ हम न तो खुले टकराव का जोखिम उठा सकते हैं और न बहुत विनम्रता हमारे काम आएगी. भारत को अपने हितों की रक्षा करने के लिए व्यावहारिक रास्ता अपनाना होगा.

जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले साल फरवरी में ट्रंप से मुलाकात की थी, तब दोनों पक्षों ने टैरिफ कम करने के उद्देश्य से एक व्यापार समझौते की चर्चा की और 500 अरब डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार लक्ष्य निर्धारित किया.

टैरिफ का हथियार

इसके बाद के महीनों में द्विपक्षीय संबंधों में और गिरावट आई, जिसका मुख्य कारण भारी टैरिफ और ऑपरेशन सिंदूर के दौरान युद्धविराम कराने के ट्रंप के दावे थे.

सबसे खराब दौर तब आया जब अमेरिका ने अगस्त में भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगा दिया. 25 प्रतिशत अमेरिकी उत्पादों पर भारतीय टैरिफ के जवाब में था और बाकी रूसी तेल खरीदने पर. अमेरिका ने अंततः प्रतिबंधों में छूट दे दी.

सितंबर में, ट्रंप ने एच1-बी वीज़ा का वार्षिक शुल्क बढ़ाकर 100,000 डॉलर कर दिया, जिससे अमेरिका में भारतीय पेशेवरों को नियुक्त करना बेहद महँगा हो गया. एक अमेरिकी अदालत ने इस शुल्क को रद्द कर दिया है, जिसे लेकर प्रशासन सर्वोच्च न्यायालय में अपील करेगा.

इस साल फरवरी में, दोनों देश ऐसे ढाँचे पर सहमत हो गए जिससे व्यापार समझौता हो. तब तक, रूस से भारत का आयात भी कम हो गया था, जो इस बात का संकेत था कि भारत प्रतिबंधों का पालन कर रहा है.

पश्चिम एशिया

इसी दौरान भारत ने गज़ा में संघर्ष विराम और यूक्रेन-युद्ध समाप्त कराने के ट्रंप के प्रयासों का स्वागत किया. फरवरी के अंत में ईरान का युद्ध छिड़ गया. इस दौरान होर्मुज मार्ग बंद होने से खनिज तेल की आपूर्ति में कमी, कीमतों में वृद्धि और मुद्रास्फीति ने भारत की अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित किया.

मई में, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो द्विपक्षीय संबंधों को हुए नुकसान की भरपाई करने के प्रयास में दिल्ली पहुँचे. हाल में खाड़ी में अमेरिकी नौसेना द्वारा तीन भारतीय नाविकों की हत्या ने और अधिक तनाव पैदा कर दिया, जिसपर रूबियो की टिप्पणी ने भारत में नाराज़गी बढ़ाई.

इस किस्म की बातों से मर्माहत होने के बजाय हमें देखना चाहिए कि भारत की राह अब किधर से होकर जा रही है. इस कड़वाहट को फ्रांस के एवियन में हुई ट्रंप-मोदी बैठक ने माहौल को कुछ सुधारा. बहरहाल अब देखना होगा कि ट्रेड-डील कैसा और कब होता है. 

जी7 का एवियन सम्मेलन

एवियन में आयोजित जी7 शिखर सम्मेलन में नरेंद्र मोदी की भागीदारी केवल ट्रंप के साथ वार्ता के लिहाज से नहीं, बल्कि विकसित देशों के साथ संपर्क बनाने के लिहाज से महत्त्वपूर्ण थी.

इस मंच पर भारत की यह 13वीं उपस्थिति थी और 2019 के बाद से मोदी की लगातार सातवीं. संयोगवश, इस समूह के साथ भारत की सहभागिता की शुरुआत एवियन में ही हुई थी, जब 2003 में फ्रांस के राष्ट्रपति याक शिराक ने अटल बिहारी वाजपेयी को आमंत्रित किया था. यह संपर्क 2005 से 2009 के बीच मनमोहन सिंह के साथ जारी रहा.

भारत का नियमित रूप से आमंत्रित किया जाना, 1990 के दशक से देश के आर्थिक परिवर्तन और अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में इसकी बढ़ती महत्ता के कारण गहरे होते आपसी संबंधों को दर्शाता है.

भू-राजनीति

भारतीय पर्यवेक्षकों का आकलन है कि चीन को काबू में करने के लिए ट्रंप, अब क्वॉड जैसे किसी साझेदार की ज़रूरत महसूस नहीं करते. उन्होंने चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग से सीधे संपर्क साधा है, और जी2 (अमेरिका और चीन) की अवधारणा का आविष्कार किया है.

भारत की दिलचस्पी भी फिलहाल ट्रेड डील में है, क्योंकि वह भारत के उद्योग-व्यापार के लिए महत्त्वपूर्ण है. ट्रंप से पंगा लेने का फिलहाल कोई मतलब नहीं है, पर भारत भी चीन के साथ अपने रिश्तों को पुनर्परिभाषित करेगा.  

भारत के विदेश-मंत्रालय ने इस बात को काफी पहले ही समझ लिया है. जैसे-जैसे अमेरिका के विकल्प कम हो रहे हैं, भारत ने यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, जापान, सिंगापुर, खाड़ी समेत अन्य देशों में पूँजी, प्रौद्योगिकी और भारतीय छात्रों, श्रमिकों और पेशेवरों के लिए गंतव्य की तलाश शुरू कर दी है.

आज, जी7 भारतीय निर्यात का प्रमुख गंतव्य है, जो देश के कुल माल का लगभग एक तिहाई हिस्सा ग्रहण करता है. भारत के ज्यादातर सेवा निर्यात भी जी7 देशों को ही जाते हैं. बढ़ते अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण भारतीय पेशेवरों और छात्रों के पलायन का भी यह मुख्य ठिकाना है.

सशक्त बहुपक्षवाद

इन स्थितियों में विदेशमंत्री एस जयशंकर के बयान को पढ़ना चाहिए, जो उन्होंने ‘जेजू फोरम फॉर पीस ऐंड प्रॉस्पैरिटी 2026’ में दिया है. उन्होंने कहा कि तेजी से बँट रही दुनिया में एक सशक्त बहुपक्षवाद की जरूरत है. जयशंकर ने कहा, दुनिया नियम-कायदे बरकरार रखने के लिए केवल कुछ ही देशों का मुँह नहीं ताक सकती. बिखराव का मतलब है कम दबदबा, अधिक जगह और अधिक लोकतांत्रिक व्यवस्था.

जयशंकर ने कहा कि भारत को जरूरी खनिज हासिल करने में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. इसके साथ ही संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के कुछ स्थायी सदस्य अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन कर रहे हैं.

दुनिया हमेशा से कुछ हद तक एकीकृत और कुछ हद तक बँटी हुई रही है मगर पहले जोड़ने और बाँटने वाली ताकतें काफी हद तक सीधी-सादी थीं और उनके बीच की लकीरें स्पष्ट खींची हुई थीं. अब ऐसा नहीं है. हमें इसी दुनिया में रहते हुए अपने लिए जगह बनानी है.

आवाज़ द वॉयस में प्रकाशित

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