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Tuesday, March 3, 2026

ईरानी आपदा पर चीन की चुप्पी

 

इकोनॉमिस्ट से साभार

ईरान के सुप्रीमो आयतुल्ला अली खामनेई की हत्या की चीन ने निंदा की है, पर उसने अमेरिका का उतना कड़ा विरोध नहीं किया है, जिसकी उम्मीद की जा रही थी। इसके पीछे के कारणों को विशेषज्ञों ने समझने की कोशिश भी की है।

हांगकांग के अखबार साउथ चायना मॉर्निंग पोस्ट ने लिखा है कि चीन ने ईरान में अपने एक चीनी नागरिक की मौत और देश से अपने 3,000 नागरिकों को निकालने की पुष्टि की और शनिवार को रूस के साथ मिलकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की आपातकालीन बैठक बुलाई और सैन्य कार्रवाई की निंदा की। सोमवार को रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव के साथ फोन कॉल में, चीन के शीर्ष राजनयिक वांग यी ने ईरान के सुप्रीमो आयतुल्ला अली खामनेई की हत्या की निंदा करते हुए इसे अस्वीकार्य बताया।

इस प्रकार के शाब्दिक विरोध के अलावा, चीन ने ईरान के लिए किसी प्रकार की ठोस मदद की पेशकश से परहेज किया है, ठीक वैसे ही जैसे उसने तब किया था जब इसराइल ने पिछले साल जून में ईरान के सैन्य और परमाणु स्थलों पर हमले किए थे।

बीजिंग की प्रतिक्रिया राजनयिक समर्थन देने और प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप से बचने की उसकी पुरानी रणनीति के अनुरूप है, जैसा कि उसने जनवरी में वेनेजुएला के नेता निकोलस मादुरो के अमेरिकी अपहरण के समय भी किया था। लेकिन हमलों से एक दिन पहले प्रकाशित चैटम हाउस के एसोसिएट फैलो अहमद अबूदूह के एक विश्लेषण के अनुसार, अमेरिका-ईरान विवाद में चीन के राजनयिक संयम को चीनी अविश्वसनीयता या उदासीनता के रूप में नहीं समझा जाना चाहिए

अल्मोड़ा की होली


हिंदी की लोकप्रिय लेखिका गौरा पंत शिवानी ने अपनी आत्मकथा
सुनहु तात यह अकथ कहानी में एक जगह अल्मोड़ा की होली का बड़ा सुंदर विवरण दिया है, गौर करें:

होली आती तो अल्मोड़ा के छोटे से बाजार की शोभा ही द्विगुणित हो जाती…. पहाड़ की होली का तब अपना ही जादू था। आमल की एकादशी से होली की बैठकें लगतीं। मोट के दन (कालीन), उन पर बिछती दुग्ध-धवल चादरें, सफेद गिलाफ चढ़ा गाव-तकिया, उनका सहारा लिए लखनऊ की अम्बरी तम्बाकू की सुगन्धित धूम्र-रेखा से हुक्के का कश खचते प्रतिष्ठित व्यक्ति। थोड़ी ही देर में थाल के थाल जम्बू हुँके आलू और गोझे परिवेशित होते, पीतल के चमचमाते गिलासों में मसाले डली अदरक की चाय। फिर आरभ्भ होती बैठक होली

अपनों बीरन मोहे दे री ननदिया

मैं होली खेलन जाऊँ वृन्दावन।

           या

जाय पड़ईं पी के अंक

चाहे कलंक लगै री़

तबले पर संगत करते कुमाऊँ के अल्लारक्खा, दाम दा, हारमोनियम पर पहाड़ के जलगाँवकर, कांति दा; और रसीले कंठ का माधुर्य बिखेरते वे संगीत रसिक गायक, जिन्होंने न कभी विधिवत संगीत की शिक्षा पाई, न किसी गुरु का गंडा ही बाँधा। स्वयं विधाता ने जिनके कंठ में प्रतिभा को खूँटे की गाय-सा बाँधकर रख दिया था। न कह अश्लील प्रलाप, न छींटाकशी; वह मधुर स्वरलहरी, सम पार आती, तो वाह-वाह की साधुध्वनि छज्जे को गुंजायमान करती सड़क तक चली जाती।

राह चलते लोग ठिठककर खड़े हो जाते, ‘‘कौन गा रहा है यह? भवानी शाह या बद्रिया?’’

भारत की सतरंगी-संस्कृति का पर्व होली

रंगों की बौछार से कड़वाहटों को भुलाने का मौका

होली रंगों का त्योहार है, पर केवल रंग उड़ाने या मौज मस्ती तक सीमित नहीं है। अवध के इलाके में परंपरा है कि होली के बाद सब एक-दूसरे के गले मिलते हैं। यह क्रम करीब एक पखवाड़े तक चलता है। हरेक परिवार अपने पड़ोस के हरेक घर में होली मिलने जाता है। पड़ोसी उनके घर आते हैं। यह क्रम एक पखवाड़े से ज्यादा समय तक चलता है। ऐसी परंपराएँ होली को सामाजिक मेलजोल का सबसे बड़ा त्योहार बनाती हैं। पूरे देश में ऐसा ही कुछ किसी न किसी रूप में और किसी न किसी परंपरा के साथ होता है।

यह कई दिन चलने वाली गतिविधि है, जो चार महीनों की ठंडक के कारण जड़ीभूत निष्क्रियता को तोड़ने का काम करती है। पूरे देश के अलग-अलग हिस्सों में इससे जुड़ी रोचक परंपराएँ हैं, जो केवल रंग बिखरने से ही नहीं जुड़ी है। इसके साथ खान-पान, संगीत, दस्तकारी और लोक कलाओं की जबर्दस्त परंपराएँ जुड़ी हुई हैं। होली के रंग ऊँच-नीच, अमीर-गरीब, जाति और धर्म के बंधनों को तोड़कर, वैर-भाव भूलकर सभी को समान धरातल पर लाते हैं। यह पर्व सामाजिक सद्भाव और दोस्ताना समाज की स्थापना करता है।  

वसंत पंचमी से ही फाग और धमार का गाना प्रारंभ हो जाता है। प्रकृति भी इस समय खिली हुई होती है। सरसों के पीले फूल धरती को रंग देते हैं। गेहूँ की बालियाँ निकल आती हैं। आम पर बौर फूलने लगते हैं। किसान खुश होकर गीत गाते हैं। यह त्योहार सभी पृष्ठभूमि के लोगों को एक साथ लाता है, जाति, पंथ और उम्र की बाधाओं को पार करते हुए एकता और समुदाय की भावना को बढ़ावा देता है। क्षमा और मेल-मिलाप को प्रोत्साहित करता है। खुशी की बेलाग अभिव्यक्ति और कड़वाहटों को भुलाने का दिन।

सबसे पुराना त्योहार

जब हम इसके इतिहास पर जाते हैं, तब पता लगता है कि यह देश के सबसे पुराने त्योहारों में से एक है। इतिहासकारों के अनुसार आर्यों में इस पर्व का प्रचलन था। विंध्य क्षेत्र के रामगढ़ से प्राप्त ईसा से 300 वर्ष पुराने एक अभिलेख में होली मनाए जाने का उल्लेख मिलता है। जैमिनी के पूर्व मीमांसा-सूत्र और कथा गाहय-सूत्र, नारद पुराण और भविष्य पुराण में भी इसका उल्लेख मिलता है। सातवीं शताब्दी के राजा हर्ष ने अपनी रचना 'रत्नावली' में होलिकोत्सव का उल्लेख किया है।