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Thursday, March 26, 2026

युद्ध के दुष्प्रभावों से निपटने को तैयार भारत


जिन लोगों को आज से तीन दशक पहले की बातें याद हैं, उन्हें गैस एजेंसियों, सरकारी राशन और चीनी की दुकानों के आगे लगी कतारें भी याद होंगी. पश्चिम एशिया के युद्ध के साथ कुछ यादें ताज़ा हो गई हैं.

उसके पहले चीन युद्ध के बाद देश में खाद्य संकट पैदा हुआ था और हमें काफी समय तक अमेरिकी गेहूँ खाना पड़ा था. शायद वह काफी पुरानी बात हो गई, पर कोविड महामारी तो हाल की बात है, जब शहर-शहर गाँव-गाँव लॉकडाउन के कारण रोज़ी-रोज़गार पर तो संकट आया, आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता भी चुनौती बन गई.

पश्चिम एशिया की लड़ाई ने हमें एकबार फिर से चौंकाया है. आपदाएँ किसी भी वक्त आ सकती हैं, पर भारत की विशेषता है कि वह संकटों का सामना आसानी से कर लेता है. आपको समझना ही है, तो इस समय अपने पड़ोसी देशों की स्थिति पर एक बार नज़र ज़रूर डालें.

कहना मुश्किल है कि लड़ाई जल्द खत्म होगी या देर से होगी. इसलिए मानकर चलिए कि समस्याएँ नए रूप में भी आ सकती है. ऐसे में आपके धैर्य, अनुशासन और एकजुटता की सबसे बड़ी ज़रूरत है. भाईचारा बनाकर रखें. बेशक संकट आया है, तो दूर भी होगा.

प्रधानमंत्री का बयान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम एशिया में चल रही लड़ाई को लेकर संसद के दोनों सदनों में भारत के सामने खड़ी 'अप्रत्याशित चुनौतियों' का ज़िक्र करते हुए कहा है कि हम उनका सामना करने में समर्थ हैं. सच यह है कि देश अतीत में ऐसे संकटों का सफलतापूर्वक सामना कर चुका है.

अलबत्ता प्रधानमंत्री ने इस बात को रेखांकित किया कि इस टकराव का असर लंबे समय तक बने रहने की आशंका है. ऐसा शायद पहली बार हो रहा है कि महामारी और युद्ध का आगमन आगे-पीछे हुआ है. कोविड के दौरान भी सप्लाई चेन में संकट पैदा हुआ था और देश ने एकजुटता से उसका मुकाबला किया.

भारत में बड़ी मात्रा में कच्चा तेल, गैस और उर्वरक जैसी अनेक ज़रूरी चीजें होर्मुज़ जलसंधि मार्ग से आती हैं. युद्ध के बाद से ही वहाँ से जहाज़ों का आना-जाना बहुत चुनौतीपूर्ण हो गया है. बावजूद इसके, हमारी सरकार का प्रयास रहा है कि पेट्रोल-डीज़ल और गैस की सप्लाई बहुत ज़्यादा प्रभावित न हो.

एक करोड़ भारतीय

उन्होंने कहा, इस दौरान मैंने पश्चिम एशिया के देशों के नेताओं से दो राउंड बात की है. उन देशों के नेताओं ने भारतीयों की सुरक्षा का विश्वास दिलाया है. दुर्भाग्य से कुछ भारतीयों की मृत्यु हुई है. प्रभावित देशों में मौजूद भारतीय मिशन वहाँ मौज़ूद भारतीय पर्यटकों और वहाँ रह रहे लोगों के साथ 24 घंटे जुड़े हुए हैं और उनकी मदद कर रहे हैं.

पश्चिम एशिया के इन देशों में लगभग एक करोड़ भारतीय काम करते हैं. उनके जान माल की चिंता करना भी भारत सरकार की जिम्मेदारी बनती है. प्रधानमंत्री ने जानकारी दी कि युद्ध शुरू होने से लेकर अबतक 3 लाख 75 भारतीय सुरक्षित लौटे हैं.

ईरान से 1000 भारतीय सुरक्षित लौटे हैं. इनमें 700 से अधिक मेडिकल पढ़ाई करने वाले युवा हैं. इन देशों में सीबीएसई ने 10वीं और 12वीं की परीक्षा रद्द कर दी है.

तैयारी काम आई

उन्होंने कहा, ‘भारत के पास खनिज तेल के 53 लाख मीट्रिक टन का स्ट्रैटेजिक रिज़र्व है. अतिरिक्त 65 लाख मीट्रिक टन रिज़र्व बनाने पर काम हो रहा है. तेल कंपनियों के पास अलग रिज़र्व है.

संकट के इस समय में देश की एक और तैयारी भी बहुत काम आ रही है. पिछले 10 साल में इथेनॉल के उत्पादन और ब्लेंडिंग बढ़ी है. आज हम पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल ब्लेंडिंग कर रहे हैं. इससे साढ़े चार करोड़ बैरल कम तेल आयात करना पड़ रहा है.

इस बात पर बहुत कम लोगों का ध्यान जाता है कि दुनियाभर रेल लाइनों का सबसे ज्यादा विद्युतीकरण भारत में हुआ है. भारत की 99.2 प्रतिशत रेल लाइनें अब विद्युतीकृत हैं. इतना व्यापक विद्युतीकरण स्विट्ज़रलैंड के अलावा कहीं और नहीं हुआ है. चीन, अमेरिका और रूस में भी नहीं.

प्रधानमंत्री ने बताया इसके कारण हर साल 180 करोड़ लीटर डीज़ल की बचत हो रही है. मेट्रो का नेटवर्क 1100 किलोमीटर हो गया है. हमारे देश ने इलेक्ट्रिक मोबिलिटी पर बहुत अधिक बल दिया है. केंद्र ने राज्यों को 15 हज़ार इलेक्ट्रिक बसें दी हैं. वैकल्पिक ईंधन पर काम हो रहा है, उससे भारत का भविष्य और सुरक्षित होगा.

प्रधानमंत्री ने कहा कि देश में एलपीजी के घरेलू उपभोक्ताओं की ज़रूरतों को प्राथमिकता दी जाएगी. देश अपनी ज़रूरत का 60 फ़ीसदी एलपीजी उत्पादन करता है. देश में इसके उत्पादन को हमने बढ़ावा दिया है. पेट्रोल-डीज़ल की सप्लाई सुचारू रूप से जारी रहे, इस विषय पर काम जारी है.’

किसानों के हित

माना जा रहा है कि मौजूदा संघर्ष की वजह से उर्वरकों की सप्लाई पर भी असर पड़ेगा. पीएम किसानों को खाद की आपूर्ति को लेकर आश्वस्त किया. उन्होंने कहा, ‘देश में पर्याप्त खाद्यान्न है. खरीफ सीजन की ठीक से बुआई हो सके,  यह सरकार की प्राथमिकता है. हमारी सरकार ने दुनिया के संकट का बोझ किसानों पर नहीं पड़ने दिया.

कोरोना के दौरान भी सप्लाई चेन बाधित हुई थी. यूरिया की एक बोरी 3000 रुपये तक पहुँच गई लेकिन भारत ने 300 रुपये बोरी उपलब्ध कराई. बीते दस सालों में देश में छह यूरिया प्लांट शुरू किए गए हैं, जो 76 लाख मीट्रिक टन उत्पादन कर सकते हैं.

डीएपी का उत्पादन 50 लाख मीट्रिक टन बढ़ाया गया है. इसके अलावा किसानों को मेड इन इंडिया नैनो यूरिया का विकल्प दिया गया है. पीएम किसान योजना के तहत 22 लाख से ज़्यादा सोलर पंप दिए गए हैं.

संकटों का सामना

प्रधानमंत्री ने अतीत की अप्रत्याशित चुनौतियों और संकटों का ज़िक्र किया है, जो बताता है कि हमारा देश कई तरह के संकटों से जूझता रहा है. भारत को विदेशी आक्रमणों, भीषण अकालों, आंतरिक हिंसा,1991 के आर्थिक संकट और गरीबी व बेरोजगारी जैसी सामाजिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा है.

1962, 65 और 1971 के युद्धों के दौरान देश में व्यवस्था बनाए रखने और आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति बनाए रखने की चुनौतियों का सामना किया गया. साठ के दशक में देश में भयावह अनाज का संकट पैदा हुआ, जिसके बाद हमारे कृषि वैज्ञानिकों ने हरित-क्रांति के माध्यम से उस संकट का समाधान किया.

पुराने पाठकों को याद होगा कि अमेरिका से पीएल-480 के तहत आने वाले लाल रंग के गेहूँ को हमने किस तरह बर्दाश्त किया था. 1991 के आर्थिक संकट के दौरान भारत को अपनी कर्ज़ को चुकाने के लिए सोना गिरवी रखना पड़ा था. ऐसा विदेशी मुद्रा की भारी कमी के कारण हुआ था.

एक दूसरे तरह की चुनौती आतंकवाद की थी. साठ के दशक से शुरू हुई नक्सली हिंसा अब जाकर खत्म हुई है. इसके अलावा पंजाब और कश्मीर की हिंसा का भी देश ने सामना किया है.

प्रधानमंत्री ने अपने बयान में यह भी बताया कि क़ानून व्यवस्था सुनिश्चित करने वाली सभी एजेंसियों को अलर्ट पर रखा गया है. साइबर, कोस्टल और बॉर्डर सिक्योरिटी इसमें शामिल है. इसकी वजह यह है कि जब संकट आते हैं, तब कई तरफ से आते हैं.

युद्ध की स्थिति

पीएम मोदी ने कहा, ‘पश्चिम एशिया की हालत चिंताजनक है. इस संकट को तीन हफ्तों से अधिक हो रहा है. इस जंग से पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था पर और लोगों के जीवन पर असर पड़ रहा है.’

उन्होंने कहा, भारत के सामने इस युद्ध ने जो चुनौतियाँ खड़ी की हैं, वे चुनौतियाँ आर्थिक और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी हैं. इनके साथ मानवीय चुनौतियाँ भी हैं.

प्रधानमंत्री ने पश्चिम एशिया के मौजूदा हालात, ऊर्जा ढाँचों पर हमलों और होर्मुज़ जलसंधि में स्वतंत्र आवाजाही में बाधाओं का ज़िक्र किया. साथ ही उन्होंने देश के अंदर पेट्रोल, डीज़ल, गैस और उर्वरकों के स्टॉक और सप्लाई को लेकर भी जानकारी दी.

इस युद्ध का प्रभाव लंबे समय तक बने रहने की संभावना है. हमें बहुत सावधान और सतर्क रहना है, हालात का फ़ायदा उठाने वाले झूठ फैलाने का प्रयास करेंगे, उनसे बचने की ज़रूरत है. खासतौर से चोरबाज़ारी, जमाखोरी और अफवाहें फैलाने वालों पर कड़ी निगरानी और त्वरित कार्रवाई की ज़रूरत होगी.

आवाज़ द वॉयस में प्रकाशित

 

 


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