हिंदी की लोकप्रिय लेखिका गौरा पंत शिवानी ने अपनी आत्मकथा ‘सुनहु तात यह अकथ कहानी’ में एक जगह अल्मोड़ा की होली का बड़ा सुंदर विवरण दिया है, गौर करें:
होली आती तो अल्मोड़ा के छोटे से बाजार की
शोभा ही द्विगुणित हो जाती…. पहाड़ की होली का तब अपना ही जादू था। आमल की एकादशी
से होली की बैठकें लगतीं। मोट के दन (कालीन), उन
पर बिछती दुग्ध-धवल चादरें, सफेद
गिलाफ चढ़ा गाव-तकिया, उनका सहारा लिए लखनऊ की अम्बरी तम्बाकू की
सुगन्धित धूम्र-रेखा से हुक्के का कश खचते
प्रतिष्ठित व्यक्ति। थोड़ी ही देर में थाल के थाल जम्बू हुँके आलू और गोझे परिवेशित
होते,
पीतल के चमचमाते गिलासों में मसाले डली अदरक की चाय। फिर आरभ्भ
होती बैठक होली
अपनों बीरन मोहे दे री ननदिया
मैं होली खेलन जाऊँ वृन्दावन।
या
जाय पड़ईं पी के अंक
चाहे कलंक लगै री़
तबले पर संगत करते कुमाऊँ के अल्लारक्खा, दाम
दा,
हारमोनियम पर पहाड़ के जलगाँवकर, कांति
दा;
और रसीले कंठ का माधुर्य बिखेरते वे संगीत रसिक गायक, जिन्होंने
न कभी विधिवत संगीत की शिक्षा पाई, न किसी गुरु का गंडा ही
बाँधा। स्वयं विधाता ने जिनके कंठ में प्रतिभा को खूँटे की गाय-सा
बाँधकर रख दिया था। न कह अश्लील प्रलाप, न छींटाकशी; वह
मधुर स्वरलहरी, सम पार आती, तो
वाह-वाह की साधुध्वनि छज्जे को गुंजायमान करती
सड़क तक चली जाती।
राह चलते लोग ठिठककर खड़े हो जाते, ‘‘कौन गा रहा है यह? भवानी शाह या बद्रिया?’’
स्त्रियों का प्रवेश उस होली बैठक में निषिद्ध
था। उनकी बैठकें अलग ही जमतीं। ठीक होली के दिन हमें घर के दो पुराने नौकरों के
साथ,
हमारे पितामह अल्मोड़ा के सीमान्त पर बने बड़ी बहन के खाली बँगले
में भेज देते। कभी कठोर पितामह के प्रति हमारा अबोध हृदय विद्रोह कर उठता, ‘भला
यह भी कोई बात हुई? घर के लड़कों पर कोई प्रतिबन्ध नहीं और घर
की पुत्रियों को जहाँ चाहा, गाय-सा
हाँक दिया।’ फिर बड़ा होने पर एक बार होली का हुड़दंग
देखा तो समझ में आ गया कि पितामह हमें क्यों
उस अरण्य में निष्कासित करते थे। बहुत तड़के ही अबीर-गुलाल
बिखेरती उन रंगीले होल्यारों की टोली के उस दिन सौ खून माफ रहते। उनके गाने की
प्रथम पंक्ति में मोहल्ले की प्रत्येक किशोरी का नाम गुँथा रहता। प्रथम पंक्ति सदा
एक ही रहती
चलो-चलो ए दुनिया वालो
दिल्ली में दरबार है।
फिर उस दरबार में गिन-गिनकर
उन सबकी काल्पनिक हाजिरी ली जाती, जिन्हें दूर से ही देखकर, उनके
मन को कभी विकार की उद्दाम तरंगों ने उद्वेलित किया होगा। यद्यपि अन्य प्रदेशों की
तुलना में पहाड़ की होली, तब भी मर्यादा-मंडित रहती
थी,
किन्तु एक यही दिन तो है जिस दिन भारतीय मनुष्य का रुग्ण मन, मनचाही
कुलाटें ले अपने विकार-ग्रस्त चित्त को स्वयं तरोताजा कर लेता है। होली का वह भय, अभी
भी हमारे मन से नहीं गया। न जाने कब, कौन गाने के विवेकहीन अंतरे
में हमारा नाम न गूँथ दे!

सब रंग समय के साथ घुल से गए हैं | अब तो बस लाल रंग छा गया है इंद्रधनुष के रंगों में | यादों में है बहुत कुछ पर त्यौहार कहें या कोई भी सामाजिक कार्यक्रम वो रंगत अब कहां ?
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