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Tuesday, March 10, 2026

कब और कैसे खत्म होगा ‘शह और मात’ का खेल?

 


पश्चिम एशिया में पहले से इस बात का इमकान था कि लड़ाई शुरू होने वाली है, पर आज कहना मुश्किल है कि वह कब और कैसे खत्म होगी. चौतरफा बयानबाज़ी से लगता है कि वह आसानी से तो खत्म नहीं होगी.

कुछ भरोसा बैकरूम-विमर्श पर है, जो किसी न किसी स्तर पर चल रहा है. इसमें चीन ने पहल की है. चीनी विदेशमंत्री वांग यी ने अपने 'ग्लोबल सिक्योरिटी इनीशिएटिव' के तहत मध्यस्थता की पेशकश की है.  

'ग्लोबल सिक्योरिटी इनीशिएटिव' चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग द्वारा अप्रैल 2022 में प्रस्तावित एक सुरक्षा अवधारणा है, जो अविभाज्य सुरक्षा के सिद्धांत पर आधारित है. इसका उद्देश्य पश्चिमी देशों, विशेषकर अमेरिका के नेतृत्व वाली व्यवस्था की जवाबी वैश्विक सुरक्षा का ढाँचा तैयार करना है.

गहरी दरारें

इसके पहले भी इस इलाके में 1991 और 2003 में लड़ाई हुई है, पर सही मानों में असली खाड़ी युद्ध इस बार ही हुआ है. फारस की खाड़ी से सटे सभी आठ देश, साथ ही आधा दर्जन से ज़्यादा दूसरे देश भी इसमें शामिल हैं.

लड़ाई रुकी भी, तो इस इलाके की शक्ल और भावनात्मक रिश्ते पहले जैसे नहीं रहेंगे. अब्राहमिक धर्मों और समाज की ऐतिहासिक दरारें और गहरी होंगी.

ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान ने शनिवार को कहा कि हम अब अपने पड़ोसी देशों को तब तक निशाना नहीं बनाएँगे, जब तक कि हमले उनके क्षेत्र से न किए जाएँ. बावज़ूद इसके हमले अभी ज़ारी हैं. शायद पेज़ेश्कियान की बात अपने देश में उतननहीं मानी जाती, जितनी हम समझते हैं.

ट्रंप की पहेलियाँ

राष्ट्रपति ट्रंप कई तरह की बातें कह रहे हैं. समझ में नहीं आ रहा है कि उनकी रणनीति क्या है. उन्होंने गुरुवार को समाचार एजेंसी रॉयटर्स से कहा कि ईरान के अगले नेता के चुनाव में अमेरिका की भागीदारी होनी चाहिए. और यह भी कि इराक में तैनात ईरानी कुर्द बल ईरान में घुसकर वहाँ के सुरक्षा बलों पर हमले शुरू करें, तो यह ‘बेहतरीन’ बात होगी.

इसके एक दिन बाद शुक्रवार को घोषणा की कि ईरान के ‘बिना शर्त समर्पण’ से कम पर हम नहीं मानेंगे. बमबारी के नौ दिन बाद भी, कम से कम सार्वजनिक रूप से तो ईरान इस बात के लिए तैयार नज़र नहीं है, बल्कि उसने इसके ठीक उलट काम किया है. लड़ाई को उन अरब देशों तक फैला दिया है, जहाँ अमेरिका के सैनिक अड्डे हैं.

ट्रंप चाहते क्या हैं? वे कब तक इस लड़ाई को जारी रखेंगे? वाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरलिन लेविट ने पत्रकारों से कहा, हमारी जीत हुई है या नहीं, इसका फैसला भी ट्रंप साहब ही करेंगे. ईरान, आत्मसमर्पण करे या न करे, जब साहब कहेंगे कि ऑपरेशन एपिक फ्यूरी का लक्ष्य हासिल, तो हासिल.  

पेज़ेश्कियान की घोषणा

हालाँकि ईरानी राष्ट्रपति पेज़ेश्कियान ने पड़ोसी देशों पर हमले न करने की बात कही है, पर शायद यह ईरानी नेतृत्व की सर्वसम्मत राय नहीं हैं. पहले उन्होंने अपने बयान में पड़ोसी देशों से माफी भी माँगी थी, पर कुछ समय बाद ज़ारी बयान से माफी शब्द हटा दिया गया.

पेज़ेश्कियान ‘सुधारवादी’ और मध्यमार्गी माने जाते हैं, पर सच यह है कि ईरान में बुनियादी फैसले राष्ट्रपति के स्तर पर नहीं होते. वहाँ वास्तविक शक्ति धार्मिक नेतृत्व के पास है.

इस दौरान ईरानी असेंबली ऑफ़ एक्सपर्ट्स ने अली खामनेई के पुत्र मोज़्तबा खामनेई को नए सर्वोच्च नेता के रूप में चुन लिया है. असेंबली ऑफ़ एक्सपर्ट्स88 सदस्यों वाली संस्था है, जो सुप्रीम लीडर का चयन करती है.

असेंबली ऑफ़ एक्सपर्ट्सका चयन गार्डियन कौंसिल (संरक्षक-परिषद) करती है, जिसके सदस्यों को खुद सर्वोच्च नेता आयतुल्ला अली खामनेई ने नामांकित किया था. वे इसके प्रमुख भी थे. भविष्य में नए आयतुल्ला इस भूमिका को निभाएँगे. 

यों भी इस समय राष्ट्रपति के मुकाबले ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव अली लारीजानी की बातों का वज़न ज्यादा है. आयतुल्ला खामनेई की हत्या के बाद इस लड़ाई का नेतृत्व लारीजानी के हाथों में आ गया है.   

ईरान अब अगर पड़ोसी देशों पर हमले रोकेगा, तो उससे इन देशों का भरोसा बढ़ेगा, पर वे रहेंगे तो अमेरिका और इसराइल के खेमे में. शायद ऐसा सोचते हुए ही हमले जारी रखने का फैसला हुआ है.

ट्रंप की घोषणाएँ

ट्रंप ने सोमवार शाम को आक्रामक रुख अपनाते हुए चेतावनी दी कि यदि ईरानी नेताओं ने दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति को बाधित करने की कोशिश की तो और भी आक्रामक कार्रवाई की जाएगी.

"हम उन पर इतनी जोरदार चोट करेंगे कि उनके लिए या उनकी मदद करने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए दुनिया के उस हिस्से से उबरना कभी संभव नहीं होगा," ट्रंप ने पत्रकारों से मुलाकात करते हुए कहा.

ट्रंप की घोषणाओं का सिर-पैर समझ में नहीं आ रहा है. करीब एक दर्जन फॉर्मूले सामने आए हैं. मोटे तौर पर जैसा वेनेज़ुएला में हुआ, वैसा हो जाए तो मोगांबो खुश. यानी कि मौजूदा शासन के ‘अंदर ही’ किसी नेता या नेताओं को सत्ता सौंपना.

रॉयटर्स के अनुसार ईरानी कुर्द मिलिशिया ने भी हाल में अमेरिका से इस बारे में परामर्श किया है. इराकी कुर्दिस्तान के अर्ध-स्वायत्त क्षेत्र में ईरानी कुर्द समूहों का गठबंधन, इस तरह के हमले को अंजाम देने के लिए प्रशिक्षण ले रहा है.

ट्रंप ने यह भी कहा कि मुझे पेट्रोल की बढ़ती कीमतों की चिंता नहीं है. यह सब खत्म होते ही कीमतें बहुत तेजी से गिरेंगी. और अगर बढ़ती भी हैं, तो बढ़ने दीजिए. लेकिन पेट्रोल की कीमतों में थोड़ी-बहुत बढ़ोतरी होने से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण यह है.’

ट्रंप ने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि ईरान आत्मसमर्पण करे, जिसके बाद हम ‘एक महान और स्वीकार्य नेता को चुनेंगे’. उन्होंने वादा किया कि अमेरिका और उसके सहयोगी ‘ईरान को विनाश के कगार से वापस लाने के लिए अथक प्रयास करेंगे.’

वे चाहते क्या हैं?

एक तरफ ट्रंप अपनी दादागीरी का प्रदर्शन कर रहे थे, वहीं कुछ ही घंटों बाद, उनकी प्रेस सचिव ने कहा कि आत्मसमर्पण ‘मूल रूप से’ तभी होगा जब ट्रंप कहेंगे कि युद्ध के उनके उद्देश्य पूरे हो गए हैं.

अभी तक कोई यह समझ नहीं पाया है कि ट्रंप के उद्देश्य क्या हैं. वे क्या चाहते हैं? पूरे हफ्ते के दौरान, ये उद्देश्य बदलते रहे. शुरुआती घंटों में, ट्रंप ने कहा कि हमले का लक्ष्य मौजूदा व्यवस्था को नष्ट करना है, ताकि ईरान के लोग अपने घरों से बाहर निकलें, विद्रोह करें और सरकार को उखाड़ फेंकें.

इसके बाद अगले कुछ दिनों में, विदेशमंत्री मार्को रूबियो और रक्षामंत्री पीट हैगसैथ दोनों ने सत्ता परिवर्तन पर जोर देने के बजाय कहा कि अमेरिका का इरादा केवल यह सुनिश्चित करना है कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम स्थायी रूप से नष्ट हो जाए. उसके पास इसराइल, पड़ोसी अरब देशों या शायद किसी दिन अमेरिका पर हमला करने की मिसाइल क्षमता न रहे.

हैगसैथ ने बुधवार को पत्रकारों से कहा, कोई ‘राष्ट्र निर्माण’ नहीं होगा. उन्होंने अफगानिस्तान और इराक में नई सरकारें बनाने के बुश प्रशासन की कोशिशों प्रयासों को तिरस्कार पूर्ण तरीके से खारिज कर दिया.

वेनेज़ुएला मॉडल

वेनेजुएला में अमेरिकी कार्रवाई के मॉडल का ट्रंप बार-बार हवाला दे रहे हैं, जहाँ निकोलस मादुरो को सत्ता से हटाकर उनकी उपराष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज़ को सत्ता सौंप दी गई और कहा गया कि जब तक वे अमेरिकी निर्देशों का पालन करेंगी, तब तक उनकी नौकरी चलती रहेगी.  

ट्रंप ने अब सीएनएन से कहा है कि मुझे इस बात में दिलचस्पी नहीं है कि ईरान में लोकतांत्रिक सरकार रहेगी या नहीं. मैं उदारवादी शिया धार्मिक नेताओं के साथ काम करने को भी तैयार हूँ.

जब वेनेजुएला में कार्रवाई चल रही थी, तब वे ईरान का नाम ले रहे थे. अब वे क्यूबा का ज़िक्र कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि उम्मीद है कि क्यूबा में भी जल्द सत्ता-परिवर्तन होगा. इससे उन तीन देशों में बदलाव का काम पूरा हो जाएगा, जो अमेरिका के शत्रु माने जाते हैं.

विजेता अमेरिका!

2016 के चुनाव अभियान के दौरान, ट्रंप ने इस बात पर अफसोस जताया था कि अमेरिका अब लड़ाइयों में जीतता नहीं है. वैसे ही जैसे दूसरे विश्व युद्ध में हिरोशिमा और नगासाकी पर परमाणु बम गिराए जाने के बाद जापान ने आत्मसमर्पण किया था.

पिछले साल जब उन्होंने एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर करके रक्षा विभाग का नाम अनौपचारिक रूप से बदलकर ‘युद्ध विभाग’ कर दिया था, तब उन्होंने कहा था, ‘हमने द्वितीय विश्व युद्ध जीता था.’ यह नाम अब पेंटागन के प्रवेश द्वार पर लिखा हुआ है. हाल में उन्होंने आगे कहा, ‘हम बहुत ताकतवर थे, लेकिन हमने कभी जीतने के लिए लड़ाई नहीं लड़ी.’

उधर बिन्यामिन नेतन्याहू कह रहे हैं कि इसराइल का लक्ष्य ‘केवल ईरान के सर्वोच्च नेता को हटाना नहीं, बल्कि पूरे शासन को ध्वस्त करना है.’ इससे यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि परमाणु कार्यक्रम फिर से शुरू न हो.

कहाँ हैं चीन और रूस?

ईरान फिलहाल अकेला ही लड़ाई का सामना कर रहा है. उसके संभावित सहयोगी रूस और चीन, निंदा और चिंता व्यक्त करने के अलावा प्रत्यक्ष रूप से कुछ भी नहीं कर रहे हैं. इसका मतलब यह नहीं है कि वे कुछ नहीं कर रहे हैं.

चीन की पहली दिलचस्पी अपनी अर्थव्यवस्था में है. उसे अभी तक लड़ाई का झटका नहीं लगा है. उसके पास कई महीनों के लिए तेल का पर्याप्त भंडार है.  ज़रूरत पड़ने पर वह रूस से मदद ले सकता है.

अलबत्ता चीन के गणित में यह बात तो होगी कि लंबे अंतराल में इसका असर क्या होगा. पश्चिम एशिया में उसके निवेश पर और उसकी वैश्विक महत्वाकांक्षाओं पर. चीन इस समय कई आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा है. जैसे कम घरेलू खपत, लंबे समय से चल रहा प्रॉपर्टी संकट और स्थानीय सरकारों पर भारी क़र्ज़.

पिछले गुरुवार को चीन ने अपने सालाना आर्थिक विकास लक्ष्य को घटाकर 1991 के बाद के सबसे निचले स्तर पर कर दिया. दूसरी तरफ वह अपने हाई-टेक अपग्रेड और अक्षय ऊर्जा उद्योगों के तेज़ विकास पर भी काम कर रहा है. उसे अपने भावी निर्यात की फिक्र है. यह लड़ाई उसकी योजनाओं को धक्का पहुँचाएगी.

अफ़्रीका के कई देशों को खाड़ी देशों से लगातार निवेश मिलता रहा है. निवेश रुका, तो उनकी संवृद्धि रुकेगी, जिससे चीन को नुकसान होगा, क्योंकि चीन ने इन देशों में बाजार तैयार कर रखे हैं. इस लड़ाई के लंबा चलने से चीन का वैश्विक निवेश और बाज़ार प्रभावित होगा.

आवाज़ द वॉयस में प्रकाशित

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