मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के विरोध में हाल में दिल्ली में इंडी गठबंधन और कॉक्रोच जनता पार्टी के आंदोलनों को देखते हुए एक बात साफ हो गई है कि आंदोलनकारियों की योजना अब 2029 के लोकसभा चुनाव तक किसी न किसी रूप में लगातार आंदोलन चलाने की है। यह बड़ा संकल्प है? क्या वे ऐसा कर पाएँगे? महत्त्वपूर्ण यह नहीं है कि ज्ञानेश कुमार रहेंगे या जाएँगे। महत्त्वपूर्ण यह है कि आंदोलनकारी अपनी ताकत को कब तक बनाए रखेंगे और भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार किस तरह से उसका सामना करेगी?
फिलहाल इन
आंदोलनों के असर को अगले छह महीने में होने वाले पाँच राज्यों के विधानसभा चुनावों
के संदर्भ में देखना होगा। चुनावों को प्रभावित करने में ये आंदोलन विफल रहे, तो
फिर उनका उसके आगे चलना निरर्थक हो जाएगा। सफल हुए तो उनकी रणनीति सफल साबित होगी।
इसलिए परीक्षा अगले छह महीनों में ही होनी है। उसके पहले राहुल गांधी के ‘वोट चोरी आंदोलन’ की न्यायिक समीक्षा पर भी नज़र रखनी होगी, जो सुप्रीम कोर्ट में चलेगी।
उन्होंने इस मामले को इतना ज्यादा तूल दिया है कि देश में ही नहीं विदेश में भी
लोगों की निगाहें इस मामले पर हैं।
हाल में भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा ने इन प्रदर्शनों को लेकर सत्तारूढ़ पार्टी की प्रतिक्रिया को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि जंतर-मंतर ‘लगभग चार वर्ग किलोमीटर का इलाका’ है, जबकि भारत 32,87,000 वर्ग किलोमीटर का है। जंतर-मंतर की कहानी पूरे भारत की कहानी नहीं है। उनके अनुसार ये विरोध प्रदर्शन विफल रहे और उन्होंने सिविल सोसायटी के प्रदर्शनकारियों और विपक्षी नेताओं को ‘अराजकतावादी’ करार दिया। बहरहाल पात्रा ने इस बयान के माध्यम से कुछ मूलभूत प्रश्नों को उठाया है, देश की राजनीति के बड़े फलक को संबोधित कर रहे हैं।
प्रश्न है कि क्या
इन विरोध प्रदर्शनों को इसलिए ज़्यादा महत्त्व दिया जा रहा है, क्योंकि ये दिल्ली
में हो रहे हैं, जो देश की राजधानी है? क्या इसीलिए दिल्ली का मीडिया जिस बात को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहा है, उसका शेष
भारत की बात छोड़ सेंट्रल दिल्ली के बाहर ही कोई खास असर नहीं है? क्या विरोधी राजनीति ने इसके सहारे
कुछ ज्यादा ही उम्मीदें लगा रखी हैं? विरोधी का मतलब क्या है? क्या सारी विरोध ताकतें इस मामले में एक हैं?
वस्तुतः ऐसा नहीं
है। दिल्ली में दो शक्तियों के आंदोलन चल रहे हैं। एक कॉक्रोचों का और दूसरा
कांग्रेस के नेतृत्व में इंडी गठबंधन का। दोनों के बीच प्रतिस्पर्धा है, बल्कि कई
क्षेत्रों में कहा जा रहा है कि केंद्र सरकार कॉक्रोचों को बढ़ावा दे रही है, ताकि
उसकी विरोधी ताकतें बँट जाएँ। उधर इंडी गठबंधन के भीतर माना जा रहा है कि राहुल
गांधी चुनाव आयोग के खिलाफ आक्रामक आंदोलन चलाकर अपनी ऊर्जा का अपव्यय कर रहे हैं।
इसके सहारे वे चुनाव जीत नहीं पाएँगे।
उनकी अपनी पार्टी
के भीतर ऐसी राय है। वे मानते हैं कि जनमत किस ओर झुकेगा, यह चुनाव जीत से ही तय होता है। राहुल इस दृष्टिकोण
का खंडन करते हुए मानते हैं कि अगर मतदाता सूची की सफाई पर विवाद होता है तो चुनाव
जीत को निर्णायक कारक नहीं माना जा सकता। तब फिर आप क्या करेंगे? थोड़ी देर के लिए ज्ञानेश कुमार हट
भी जाएँ, तो क्या कांग्रेस फिर से देश की सत्ता में आ जाएगी?
अहम सवाल अभी बना
हुआ है। अगले साल की शुरुआत में होने वाले चुनावों में भाग लेने वाले राज्यों में
बढ़ती सड़क राजनीति का जमीनी जनमत पर कितना असर पड़ेगा? भाजपा यदि उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और गोवा जीत ले
और पंजाब में अकाली दल के साथ मिलकर पुरानी स्थिति में थोड़ा सा भी सुधार कर लेगी,
तो ‘वोट चोरी’ के आंदोलन की ताकत अपना आप कम हो जाएगी। भाजपा ने पश्चिम बंगाल में हुए दोनों उपचुनाव
जीत लिए हैं। महत्त्वपूर्ण आंदोलन नहीं, चुनाव परिणाम हैं। चुनाव जीतने के लिए ही
आंदोलन चलाए जा रहे हैं।
दूसरी तरफ शायद राहुल
गांधी को लगता है कि जिस तरह से तमिलनाडु में दलपति विजय ने अपनी फिल्मों के
प्रशंसक नौजवानों के सहारे सत्ता हासिल की, वे भी उसी तरह सफल हो जाएँगे। शायद वे
आंशिक रूप से सही हों, पर चुनाव जिताने वाली संगठनात्मक ताकत क्या उनके पास है? इस सवाल का जवाब छह महीने से लेकर
एक साल के भीतर उत्तर प्रदेश, पंजाब, गुजरात, गोवा, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और
मणिपुर में मिलेगा। अब कुछ दूसरी बातों पर ध्यान दें। राहुल गांधी ने अदाणी-अंबानी
विरोध के क्रम में अमेरिका के एलोन मस्क को भारत आने का निमंत्रण दे डाला। क्या
खामोश बैठे वोटर ने उनकी बात पर ध्यान नहीं दिया होगा?
अब एक और खबर पर
ध्यान दें। देश की खुफिया एजेंसियों ने 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले
पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (आईएसआई) द्वारा उत्तर
प्रदेश, पंजाब और मणिपुर में
अस्थिरता पैदा करने की साजिश को लेकर चेतावनी दी है। अगले साल फरवरी-मार्च में
उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, मणिपुर और गोवा में विधानसभा चुनाव होने हैं। उसके
बाद साल के अंत में गुजरात और हिमाचल में चुनाव होंगे।
इंटेलिजेंस ब्यूरो
के एक अधिकारी के अनुसार, आईएसआई
की गतिविधियों में उत्तर प्रदेश में आतंकी हमलों और जासूसी गतिविधियों को बढ़ावा
देना, पंजाब में हथियारों एवं
ड्रग्स की तस्करी तथा छिटपुट ग्रेनेड हमलों और मणिपुर में व्यापक अशांति भड़काने
के साजिश शामिल हैं। पंजाब में आईएसआई समर्थित नेटवर्क को बड़ी मात्रा में हथियार
और ड्रग्स पहुंचाने का निर्देश दिए जाने की बात सामने आई है। ध्यान दें कि दिल्ली
में सीजेपी के आंदोलन में शामिल होने के लिए पंजाब से भी काफी जत्थे आए हैं। ये
खबरें किस हद तक सही हैं, इसे छोड़ दें, महत्त्वपूर्ण यह है कि इन बातों पर यूपी
का खामोश वोटर ध्यान देता है। बीजेपी उसे यह भी बताने में सफल होती है कि समाजवादी
पार्टी ने सीजेपी के साथ संपर्क स्थापित किया है।
भाजपा ने उत्तर
प्रदेश में अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकतों में से एक को विकसित करने में वर्षों
बिताए हैं: एक ऐसा नेटवर्क जो चुनाव प्रचार से कहीं अधिक व्यापक है। इसके
कार्यकर्ता गाँवों, मोहल्लों
और मतदान केंद्रों में मौजूद हैं। इसकी कल्याणकारी योजनाओं ने लाखों लाभार्थियों
के साथ सीधा संपर्क स्थापित किया है। इसका संदेश लखनऊ से उत्तर प्रदेश के किसी भी
गाँव तक असाधारण गति से पहुंच सकता है।
मुद्दा अब सिर्फ
यह नहीं है कि भाजपा मतदाताओं तक पहुँच सकती है या नहीं। मुद्दा यह है कि गाँवों
और मोहल्लों में पार्टी का संदेश पहुँचाने वाले लोग क्या अब भी मानते हैं कि
पार्टी और प्रशासन उनकी बात सुन रहे हैं? यह सवाल सत्ता-विरोधी लहर पर चल रही बहस से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण
साबित हो सकता है। पार्टी-कार्यकर्ता के लिए, नागरिक की समस्या को सामने लाने की क्षमता उसकी
राजनीतिक शक्ति का एक हिस्सा है। यूपी की लड़ाई भाजपा और उसके विरोधियों दोनों के
लिए महत्त्वपूर्ण है। उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ ने सख्त-प्रशासक की छवि
बनाई है। क्या जनता ऐसा मानती है? यही देखना है। अलबत्ता जनता अराजकता पसंद नहीं है।
दूसरी तरफ मतदाता
को सरकारी लाभ मिल सकता है, फिर
भी वह स्थानीय प्रशासन से असंतुष्ट रह सकता है। भाजपा का संगठन केवल चुनावी मशीन
नहीं है। यह सूचना प्रणाली भी है। बूथ कार्यकर्ता, स्थानीय पदाधिकारी और निर्वाचित प्रतिनिधि ही वे लोग
हैं जो जानते हैं कि असंतोष कहाँ पनप रहा है, कौन सा स्थानीय मुद्दा राजनीतिक रूप से जोर पकड़ रहा
है, कौन सा अधिकारी लोगों की
पहुँच से बाहर है और सरकार का कौन सा वादा अपनी विश्वसनीयता खोने लगा है।
भाजपा के लिए उत्तर
प्रदेश बहुत अधिक महत्त्वपूर्ण राज्य है। 13 वर्षों तक सत्ता में रहने के बाद, अगर पार्टी इस राज्य को खो देती है और
चुनौतियाँ बढ़ेंगी और 2029 के
चुनावों के लिए उसकी गति धीमी पड़ सकती है। दूसरी तरफ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ
की लगातार तीसरी जीत उन्हें अजेय बना देगी। तब वे 2029 का चुनाव जिताने में मददगार
होंगे।
स्पष्ट है कि
विधानसभा चुनाव में आदित्यनाथ का राजनीतिक भविष्य दांव पर लगा है। हिंदुत्व के
प्रति उनके लगाव ने शायद उन्हें मुख्यमंत्री पद तक पहुंचाया हो। लेकिन अब बहुत कुछ
उस ‘सुशासन’ मॉडल पर निर्भर करता है जिसका वे अगले स्तर तक पहुँचने के लिए
ज़ोर-शोर से प्रचार कर रहे हैं। क्या राज्य की जनता उनपर यकीन करती है? यह चुनाव परिणाम बताएँगे, पर यदि ये
परिणाम बीजेपी के पक्ष में गए, तो यकीनन इन आंदोलनों का असर खत्म हो जाएगा।
2024 के लोकसभा
चुनावों ने यूपी में बीजेपी को धक्का पहुँचाया था। प्रदेश में भाजपा की सीटों की
संख्या 2019 में 62 से घटकर 2024 में 33 रह गई। इन परिणामों के कई कारण थे,
लेकिन इनसे एक महत्त्वपूर्ण बात
स्पष्ट हुई: मोदी के लिए समर्थन का अर्थ यह नहीं है कि हर उम्मीदवार के लिए भी
समर्थन हो। पार्टी के आंतरिक आकलन पर हालिया रिपोर्ट के अनुसार, उसके 100 से अधिक मौजूदा विधायकों को ज़मीनी
स्तर पर सत्ता-विरोधी लहर का सामना करना पड़ रहा है। पार्टी न केवल व्यक्तिगत
उम्मीदवारों की जाँच कर रही है, बल्कि निर्वाचन क्षेत्र स्तर पर मिली प्रतिक्रिया, संगठनात्मक प्रदर्शन और स्थानीय स्तर पर व्याप्त
मतभेदों का भी विश्लेषण कर रही है।
बीजेपी अब बदलाव
के मोड में है। इसका अनुमान राज्य से भाजपा की राज्यसभा सूची से लगता है। एक बड़े
कदम के तहत, पार्टी ने राज्य
के सभी आठ राज्यसभा सांसदों को बदल दिया है, जिनमें केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी
भी शामिल हैं, जो कभी एक
प्रतिष्ठित राजनयिक थे।
राज्य में बीजेपी
के विरुद्ध सबसे बड़ी ताकत समाजवादी पार्टी है। उसे बीजेपी के अंतर्विरोधों का लाभ
लेना है। राज्य में जाति, सामाजिक-कल्याण,
रोजगार और हिंदुत्व के मुद्दों पर
मतदान होगा। इन सब मामलों में विपरीत कारणों का लाभ सपा और कांग्रेस उठाना
चाहेंगी, पर क्या उनके आपसी अंतर्विरोध नहीं हैं? सवाल यह भी है कि दिल्ली
में कॉक्रोचों, किसानों, छात्रों, हिंदुत्व समर्थकों और विरोधियों तथा महिलाओं के विरोध प्रदर्शन क्या ‘अव्यवस्था’
और ‘अराजकता’ की अभिव्यक्ति है या लोगों की चुप्पी तोड़ने का एक तरीका?
उत्तर प्रदेश
विधानसभा चुनावों की निकटता के मद्देनजर सपा और कॉक्रोच जनता पार्टी (सीजेपी) के
बीच बैठक के बाद अटकलों का एक और सिलसिला शुरू हुआ है। सितंबर की शुरुआत में सपा
अध्यक्ष अखिलेश यादव और सीजेपी नेता आशुतोष रांका के बीच लखनऊ में करीब 90 मिनट की
एक महत्वपूर्ण बैठक हुई थी, जिसमें दोनों दलों के बीच सहयोग को लेकर चर्चा हुई। अखिलेश यादव ने स्पष्ट
किया है कि समाजवादी पार्टी सीजेपी के आंदोलनों और प्रदर्शनों को नैतिक समर्थन
देती है। व्यावहारिक रूप से सीजेपी आम आदमी पार्टी का मुखौटा है।
सपा और कांग्रेस
दोनों इस बात को जानते होंगे। क्या वे एक और राजनीतिक ताकत को जगह देना चाहते हैं? या वे सिर्फ संभावनाओं को तोल रहे
हैं। सीजेपी यूपी में ताकत नहीं है, पर ताकत बनना चाहती है। आम आदमी पार्टी के नाम
पर अरविंद केजरीवाल ने यूपी, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में प्रवेश की
कोशिश की, जिसमें वे खास सफल नहीं हुए। गुजरात में सफल हुए, जिसके कारण कांग्रेस
की ताकत घट गई। यूपी में उन्हें जगह मिली, तो किसे कमज़ोर करेंगे? ऐसे बहुत से सवाल हैं और अनेक बातें रहस्य के घेरे में हैं।

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