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Tuesday, October 6, 2026

भारत की ‘अनदेखी’ करके नहीं चलेगी विश्व-व्यवस्था


भारत और अमेरिका के व्यापारिक-रिश्तों को लेकर लंबे समय से चले आ रहे असमंजस के बाद अब यह साफ हो रहा है कि यह डील जल्द होने की उम्मीद नहीं है.

इसका मतलब यह है कि अमेरिका को भारत की चिंताओं का समाधान पहले करना होगा. ऐसा संभव नहीं है कि अमेरिका जब चाहे तब टैरिफ बढ़ाता रहे.  

इसके साथ ऐसे संकेत भी मिल रहे हैं कि अमेरिका और चीन दोनों के साथ भारत के रिश्तों में बुनियादी मोड़ आने वाला है. सबसे बड़ी बात यह है कि रूस के साथ अपने ऐतिहासिक रिश्तों की बदौलत यूक्रेन युद्ध को रुकवाने में भारत बड़ी भूमिका निभाने के लिए तैयार हो रहा है.

भारत-अमेरिका ट्रेड डील को लेकर अमेरिका के व्यापार प्रतिनिधि जैमीसन ग्रीअर ने कहा है कि बात जारी है, पर डील जल्द होने की आशा नहीं है.

यह बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के बीच गत 27 सितंबर को हुई फोन-वार्ता के बाद ज्यादा स्पष्ट हुई है.

अमेरिकी कोशिशें

उधर विदेशमंत्री एस जयशंकर ने ‘अकेली महाशक्ति’ बनने की अमेरिकी कोशिशों को लेकर कहा है कि वाशिंगटन की आमूल-चूल पुनर्व्यवस्था और चीन का उदय वैश्विक परिदृश्य को नया आकार दे रहा है. हमें तदनुरूप अपनी रणनीतियों को परिभाषित करना होगा.

62वें म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में उन्होंने कहा कि विश्व-व्यवस्था को अमेरिका-चीन की तीव्र प्रतिस्पर्धा, उभरती और मध्यम शक्तियों के बीच बढ़ती आत्मनिर्भरता और साझेदारियों में विविधता लाने तथा जोखिमों को कम करने के प्रयासों द्वारा परिभाषित किया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि वैश्विक-प्रतिस्पर्धा दो शक्तियों से परे तक फैली हुई है और इसने देशों को अपने पास मौजूद हर तरह के प्रभाव का हथियार के रूप में इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित किया है.

इस पृष्ठभूमि में, उभरती और मध्यम शक्तियों के पास एक-दूसरे के साथ ऐसे क्षेत्रों में सहयोग करने की जरूरत पैदा हुई, जहाँ उनके हित सीधे तौर पर टकराते नहीं है. बहरहाल हम अमेरिका और चीन दोनों के साथ काम करना जारी रखेंगे.

भारत की भूमिका

संकेत इस बात का भी है कि भारत ने वैश्विक-राजनीति में आगे बढ़कर बड़ी भूमिका निभाने का निश्चय भी किया है. इसका संकेत विदेशमंत्री एस जयशंकर की कुछ बातों से मिलता है. 

जयशंकर ने रविवार को खुलासा किया कि भारत फरवरी 2022 से चल रहे रूस-यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने के प्रयासों में ‘केवल पैरवी करने’ से आगे बढ़कर ‘थोड़ा और अधिक सक्रिय’ हो गया है.

उन्होंने कहा कि मॉस्को और कीव दोनों के साथ हमारी बातचीत चल रही है और काला सागर में जहाजों की सुरक्षा, अनाज और ऊर्जा निर्यात तथा ‘हमले की संभावना न होने’ के मामलों में भी हम ‘सहायक’ भूमिका निभाने की कोशिश कर रहे हैं.

नई दिल्ली में म्यूनिख नेताओं की बैठक में उनकी यह टिप्पणी यूक्रेन के विदेशमंत्री एंड्री सिबिहा के उस बयान के कुछ दिनों बाद आईं, जिसमें उन्होंने कहा था कि भारत ने पहली बार युद्ध समाप्त करने के लिए एक ‘व्यापक’ और ‘विस्तृत’ प्रस्ताव पेश किया है.

कीव में पत्रकारों से बात करते हुए, यूक्रेन की विदेशमंत्री सिबिहा ने कहा, ‘हमारे पास चार प्रस्ताव हैं. इनमें सबसे व्यापक भारत का प्रस्ताव है. पहली बार भारत ने इसमें भूमिका निभाने की इच्छा जताई है.’

रूस से रिश्ते

भारत अपने हितों की रक्षा के लिए असमंजस की स्थिति नहीं चाहता है. संभवतः भारत ने रूस के साथ अपने रिश्तों पर अडिग रहने का संकेत भी अमेरिका को दिया है.

जयशंकर ने कहा कि भारत और रूस के बीच 1950 के दशक से ही बहुत अच्छे संबंध रहे हैं और उस इतिहास को भुलाया नहीं जा सकता है.

‘हमारे लिए, रूस और उससे पहले सोवियत संघ एक ऐसा देश था जिसने कई मायनों में हमारा साथ दिया जब हमारी सुरक्षा, हमारी क्षेत्रीय अखंडता खतरे में थी.

ऐसे समय में जब, आप जानते हैं, दुनिया का ज्यादातर हिस्सा हमारे बगल में बैठे एक फौजी शासन का समर्थन करना पसंद करता था, रूस ने हमारा साथ दिया.

ट्रेड-डील

अमेरिका के व्यापार प्रतिनिधि जैमीसन ग्रीअर ने कहा है कि दोनों देश समझौते के काफी करीब पहुँच चुके हैं और उन मुद्दों की पहचान भी कर ली गई है, जिन पर अभी सहमति बननी बाकी है. वस्तुतः ये मुद्दे भारत के हितों से जुड़े हैं.

ग्रीअर ने अमेरिका के मिल्वौकी में जी20 व्यापार मंत्रियों की बैठक के दौरान भारत के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल से मुलाकात की. इसके बाद उन्होंने कहा कि गोयल के साथ बातचीत काफी सकारात्मक रही और दोनों देश ट्रेड डील को पूरा करने के लिए लगातार काम कर रहे हैं.

ग्रीअर ने कहा कि बातचीत अब अंतिम दौर में है, लेकिन फिलहाल किसी समझौते का ऐलान होने वाला नहीं है. दोनों देशों के अधिकारी अब भी बातचीत कर रहे हैं.

ट्रेड डील को लेकर यह बयान इसलिए अहम है क्योंकि पिछले कुछ महीनों से दोनों देशों की तरफ से संकेत मिल रहे थे कि समझौता लगभग तैयार है. पिछले हफ्ते ही पीयूष गोयल ने कहा था कि ट्रेड डील लगभग पूरी हो चुकी है.

ग्रीअर ने यह भी कहा कि पीएम मोदी और डॉनल्ड ट्रंप के बीच इस मुद्दे पर जल्द एक और बातचीत हो सकती है. गोयल और ग्रीअर की मुलाकात से एक दिन पहले ही मोदी और ट्रंप के बीच फोन पर बातचीत हुई थी.

टैरिफ का विवाद

भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों के बीच रूस से भारत की पेट्रोलियम खरीद का मुद्दा भी बना हुआ है. अमेरिकी संसद ने ऐसा कानून पारित किया है, जो राष्ट्रपति ट्रंप को रूस से ऊर्जा खरीदने को लेकर भारत पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने का अधिकार देता है.

हालांकि ट्रंप ने अभी इस टैरिफ की अंतिम दर और इसके दायरे को लेकर फैसला नहीं किया है. मोदी और ट्रंप की हाल की बातचीत और गोयल-ग्रीअर की मुलाकात इस कानून के पारित होने के बाद दोनों देशों के शीर्ष स्तर पर पहली बड़ी बातचीत थी.

ट्रेड डील में अमेरिका की तरफ से भारत को मिलने वाली टैरिफ राहत को लेकर स्थिति साफ नहीं होना अहम मुद्दा है. अमेरिकी अदालत के फैसले के बाद अमेरिका की तरफ से पहले दी जा रही टैरिफ पेशकश का आधार बदल गया है.

भारत और अमेरिका ने इस साल 7 फरवरी को समझौते के पहले हिस्से को लेकर एक संयुक्त बयान जारी किया था, जिसमें भारतीय सामान पर 18 फीसदी का कम पारस्परिक टैरिफ लगाने पर सहमति बनी थी. बाद में अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने रेसिप्रोकल टैरिफ के कानूनी आधार को खत्म कर दिया.

भारत-चीन

विदेशमंत्री एस जयशंकर ने 28 सितंबर को न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के उच्च स्तरीय सप्ताह के बाद एशिया सोसाइटी में कहा कि भारत और चीन के बीच संबंध आज से कुछ साल पहले की तुलना में ‘बेहतर’ हैं, और जैसे-जैसे सीमा संबंधी मुद्दे हल होते जाएंगे, संबंध सामान्य स्थिति में लौट आएँगे.

उन्होंने कहा, ‘रिश्ते इतनी बुरी तरह से पटरी से उतर गए थे. अब जैसे ही  इन्हें स्थिर किया गया, सुधार होना ही था. 2020 में जो हुआ और सीमा पर जो लंबा गतिरोध चला, उसका संबंधों पर बहुत बुरा असर पड़ा था.’

उन्होंने जो महत्त्वपूर्ण बात कही, वह यह है कि हम लंबे समय से बीजिंग को समझाते आ रहे थे, कि ‘हमारे बीच गतिरोध, हमारे संबंधों में गिरावट, वास्तव में हम दोनों में से किसी के लिए भी फायदेमंद नहीं है. बल्कि, इसका फायदा तीसरे पक्ष उठाएंगे.’

कौन है तीसरा पक्ष?

अनुमान लगाया जा सकता है कि उनका इशारा क्या है. तीसरा पक्ष या तो अमेरिका है या पाकिस्तान. भारत के चीन या अमेरिका के साथ रिश्तों में जब भी गिरावट आई, पाकिस्तान ने उसका फायदा उठाने की कोशिश की.

गत 24 सितंबर को वाशिंगटन में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग के बीच हुए 'जी2' शिखर सम्मेलन का जिक्र करते हुए, जयशंकर ने कहा कि हम आज एक बहुत अलग अमेरिका को स्वीकार करने की कोशिश कर रहे हैं.

सब अपने लिए सर्वोत्तम समाधान तलाश रहा है. हमारे सवाल है कि जोखिम को कैसे कम करें? विविधीकरण कैसे करें? नए साझेदार कौन हैं? मौजूदा साझेदारी से हमें अधिक लाभ कहाँ से मिल सकता है वगैरह?

अनदेखी स्वीकार नहीं

भारत में कई लोगों ने मान लिया था कि 21वीं सदी में वैश्विक वर्चस्व के लिए अमेरिका और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा के दौरान भारत ख़ुद को चीन के ख़िलाफ़ अमेरिका के लिए मज़बूत सहारे के तौर पर उपयोगी बना रहेगा.

भारत ने अपनी स्वतंत्र स्थिति बनाकर रखी है. कई विश्लेषकों का यह भी मानना है कि अगर अमेरिका भारत से सख़्ती से पेश आएगा तो उसके पास चीन के क़रीब जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है.

मोटे तौर पर इसका मतलब यह है कि भारत इस बात पर नज़रें रखेगा कि कौन सा देश हमारे हितों की अनदेखी कर रहा है.

आवाज़ द वॉयस में प्रकाशित

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