ब्रिक्स समूह का दिल्ली शिखर-सम्मेलन जिस मापदंड पर सफल रहा है, वह है ‘नई दिल्ली घोषणा’, जो सर्वानुमति से जारी हो गई. इससे संकेत मिलता है कि ब्रिक्स का काफी समय भू-राजनीति की विसंगतियों को दूर करने में लगा है.
सम्मेलन में ईरान और संयुक्त अरब अमीरात की उपस्थिति के बावज़ूद पश्चिम एशिया
की लड़ाई से संदर्भ में कोई अड़चन नहीं आई. यह डिप्लोमेटिक सफलता है, क्योंकि इसे लेकर
कई तरह के अंदेशे थे.
अंतिम घोषणापत्र उस संतुलन को दर्शाता है, जिसमें पश्चिम एशिया में चल रहे युद्धों और तनावों को संबोधित किया गया है, लेकिन किसी एक देश को सीधे तौर पर जिम्मेदार नहीं माना
गया है.
सम्मेलन के समांतर चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग की भारत-यात्रा और नरेंद्र मोदी
के साथ उनकी वार्ता को भी इन उपलब्धियों में शामिल किया जाएगा, पर वह अपने आप में
अलग और विषद विषय है.
भारत ने लगातार अपनी गैर-पश्चिमी पहचान पर बल दिया है. इसकी जटिलता को समझना आसान नहीं है. पश्चिम के राजनीतिक और मानवीय-मूल्यों को भारत भी स्वीकार करता है, लेकिन वह अमेरिका और यूरोप की भू-राजनीति का अनिवार्य हिस्साा बनने से इनकार करता है.
भारत ने इस सम्मेलन के मार्फत यह संदेश भी दुनिया को दिया है कि हम ब्रिक्स को
पश्चिम-विरोधी समूह नहीं मानते हैं. और यह भी कि गैर-पश्चिमी होना, पश्चिम-विरोध
का पर्याय नहीं है.
इस बुनियादी विचार के आधार पर ही हम ग्लोबल साउथ का नेतृत्व करना चाहते हैं.
स्वतंत्रता के बाद देश ने महाशक्तियों से असंलग्नता की जो नीति अपनाई है, यह उसकी
ही निरंतरता है.
व्यवस्था-परिवर्तन
आर्थिक मोर्चे पर ब्रिक्स ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक और अन्य संस्थानों में सुधार की माँग की
है. इन संस्थानों में विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं का प्रतिनिधित्व, पारदर्शिता और निर्णय लेने में उनकी भूमिका बढ़ाने
पर जोर दिया गया.
ब्रिक्स ने आईएमएफ़ में कोटा सुधार और विश्व बैंक में विकासशील देशों की
हिस्सेदारी बढ़ाने का भी समर्थन किया. ब्रिक्स देशों ने विश्व व्यापार संगठन में
सुधार और एक खुले, पारदर्शी, निष्पक्ष, समावेशी और नियम-आधारित बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था को मजबूत करने की
प्रतिबद्धता जताई.
बहुपक्षीय विसंगतियाँ
वैश्विक राजनीति में उथल-पुथल के दौर में ब्रिक्स और लगभग हर बहुपक्षीय मंच को
लेकर अलग-अलग राय हैं. एक नज़रिया कहता है कि ये मंच महाशक्तियों के वर्चस्व का
विस्तार करने की कोशिशें हैं.
‘डॉलर-मुक्ति’ और बहुध्रुवीयता की इसकी बड़ी महत्वाकांक्षाओं के कारण इसके
आलोचकों ने इसे ‘पश्चिम-विरोधी’ प्रयास के रूप में चित्रित किया है. ऐसे में सवाल
पैदा होता है कि ब्रिक्स क्या रूस और चीन का जवाबी मंच है?
समूह के कुछ प्रमुख सदस्य और विस्तारित सदस्य भी ऐसा विचार रखते हैं, पर भारत
का विचार तीसरे रास्ते का है. भारत की उपस्थिति इसे एक अलग नज़रिया प्रदान करती
है. नई दिल्ली घोषणा के अनुसार डिप्लोमेसी और सहयोग, महाशक्तियों के हितों से बँधा
हुआ नहीं होना चाहिए.
अमेरिकी-संदर्भ
पश्चिम एशिया से हटकर देखें, तो घोषणापत्र उन मुद्दों पर केंद्रित है जो आज के
दौर की बयानबाजी से परे हैं. यह दस्तावेज़ ‘एकतरफा दंडात्मक उपायों’, ‘एकतरफा प्रतिबंधों’, ‘एकतरफा नाकाबंदी’ पर केंद्रित हैं.
इस दृष्टि से यह डॉनल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका की ज्यादतियों पर
टिप्पणी और उनका विरोध है. उसका संदेश स्पष्ट है: आवश्यक वस्तुओं, विशेष रूप से हाइड्रोकार्बन, की आपूर्ति शृंखलाओं और समुद्री व्यापार मार्गों का
हथियार के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए.
ट्रंप ने इस समूह पर जमकर हमला किया है और इसे ‘अमेरिका-विरोधी’ बताया है, फिर भी यह समूह ऐसे ‘अन्यायपूर्ण एकतरफा संरक्षणवादी
उपायों’ से प्रभावित एक सामूहिक इकाई के रूप में अपनी भूमिका को स्वीकार करता है.
अमेरिका-विरोधी नहीं
ब्रिक्स समूह के भीतर, भारत और ब्राजील
इस बात के प्रबल विरोधी हैं कि यह समूह पश्चिम-विरोधी गठबंधन न बन जाए. भारत और
ब्राजील उस अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को कमजोर नहीं करना चाहते जिसमें वे बड़ी
भूमिका, अधिक व्यापार, प्रौद्योगिकी और निवेश तक पहुँच और अधिक राजनयिक
प्रतिष्ठा चाहते हैं.
भारत जानता है कि टकराव के बावजूद, मॉस्को और बीजिंग अब भी अमेरिका के साथ एक नए संतुलन पर बातचीत करने में रुचि
रखते हैं. दोनों पश्चिम के साथ रणनीतिक प्रतिस्पर्धा में हैं, लेकिन दोनों पश्चिमी मंच पर प्रतिष्ठा, प्रभाव और रसूख पाना चाहते हैं.
आगामी 24 सितंबर को अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप और शी चिनफिंग वाइट हाउस में
आमने-सामने बातचीत करेंगे, जिससे विश्व के ऊर्जा परिवर्तन की
स्थिति और ऊर्जा प्रभुत्व के लिए भू-आर्थिक प्रतिस्पर्धा के मैदानों में
महत्वपूर्ण बदलाव आ सकते हैं.
रूस-चीन और अमेरिका
चीन का असामान्य रूप से काफी बड़ा व्यापारिक प्रतिनिधिमंडल अमेरिका जाने वाला
है. इस एजेंडा में ताइवान, राष्ट्रीय रक्षा, व्यापार,
शुल्क और महत्वपूर्ण खनिज एवं ऊर्जा सहित कई संवेदनशील मुद्दे शामिल
हैं.
व्लादिमीर पुतिन के ट्रंप के साथ व्यक्तिगत संबंध हैं. भारत भी अमेरिका से
टकराव नहीं चाहता, बल्कि उसके साथ व्यापार समझौते को मजबूत करना चाहता है और यूरोप
के साथ अधिक व्यापार करना चाहता है.
पश्चिम एशिया के कई देश अमेरिका के सहयोगी हैं. पश्चिमी-विरोधी ध्रुव के केंद्र
में ईरान भी है, जहाँ उसकी राष्ट्रीय-विचारधारा
और हालिया इतिहास अमेरिकी शक्ति के प्रतिरोध को उसकी विदेश नीति का केंद्रीय बिंदु
बनाते हैं.
दूसरे छोर पर वे देश हैं जिनके पश्चिम के साथ गहरे आर्थिक, सुरक्षा और संस्थागत संबंध हैं, फिर भी वे अधिक स्वायत्तता प्राप्त करने का प्रयास
कर रहे हैं. सुरक्षा के मामले में मिस्र, अमेरिका से जुड़ा है; संयुक्त अरब अमीरात के अमेरिका और यूरोप के साथ
व्यापक कारोबारी हैं.
छवि में बदलाव
नए सदस्यों के शामिल होने से ब्रिक्स की पश्चिम-विरोधी छवि कुछ और बदली है. मिस्र
के अमेरिका के साथ पहले से ही अच्छे रिश्ते हैं.
अमेरिका और इसराइल के विरोध में ईरान की अलग पहचान है. ब्रिक्स ने उसे वैधता
प्रदान की है और उसे अलग-थलग करने के अमेरिकी प्रयासों का मुकाबला करने का माध्यम
बना है.
इसके बावज़ूद ईरान की घरेलू बहस में अमेरिका के साथ सुलह के पक्षधर और विरोधी आमने-सामने
हैं. वहाँ के राष्ट्रपति पेज़ेश्कियान अपेक्षाकृत उदार विचारों वाले हैं और पश्चिम
से संवाद के समर्थक हैं.
इंडोनेशिया की ‘स्वतंत्र और सक्रिय’ डिप्लोमेसी प्रमुख शक्तियों के बीच अपनी
गुंजाइश बनाए रखने के लिए बनाई गई है. वे स्वायत्तता, चीन के साथ घनिष्ठ संबंध और ग्लोबल साउथ के लिए एक
मजबूत आवाज चाहते हैं, लेकिन किसी
एकीकृत पश्चिमी-विरोधी खेमे की सदस्यता नहीं.
डीडॉलराइज़ेशन!
दुनिया में डॉलर का प्रभाव मामूली तौर पर कम ज़रूर हो रहा है, लेकिन उसका प्रभुत्व बरकरार है. ब्रिक्स ने कभी
औपचारिक रूप से डॉलर के खिलाफ युद्ध की घोषणा नहीं की है. हाँ, डॉलर पर निर्भरता
कम करने के लिए बयान अक्सर आते रहते हैं.
इन बयानों के बावज़ूद वास्तविक स्थिति कहीं ज्यादा जटिल है. भारत का रुख
स्पष्ट है: वह ब्रिक्स देशों की साझा मुद्रा या डॉलर को सीधे चुनौती देने के बजाय
द्विपक्षीय स्थानीय मुद्रा व्यापार और परस्पर सुगम सीमा पार भुगतान प्रणालियों का
पक्षधर है.
अंतरराष्ट्रीय वित्त-व्यवस्था में डॉलर काफी गहराई तक अपनी जड़ें जमाए हुए है.
बैंक फॉर इंटरनेशनल सैटलमेंट्स की रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल 2025 में सभी विदेशी मुद्रा व्यापारों में
डॉलर की भागीदारी 89.2 प्रतिशत थी,
जबकि
चीनी रनमिनबी की हिस्सेदारी मात्र 8.5 प्रतिशत थी.
आईएमएफ के नवीनतम सीओएफआर आँकड़ों से पता लगता है कि 2026 की पहली तिमाही में
वैश्विक विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर का हिस्सा 57.13 प्रतिशत था, जो पिछली तिमाही के 56.42 प्रतिशत से अधिक है.
विनिमय दर में उतार-चढ़ाव इन आँकड़ों को जटिल बना देता है, लेकिन व्यापक रुझान
गिरावट के बजाय नरमी का संकेत देता है.
एकीकृत मुद्रा
हालांकि एकीकृत ब्रिक्स मुद्रा के बारे में अटकलें वर्षों से चल रही हैं, लेकिन घोषणापत्र में इस विषय से पूरी तरह परहेज किया
गया. घोषणापत्र सदस्य
देशों के बीच भुगतान प्रणालियों को जोड़ने पर ध्यान केंद्रित करता है, जो अच्छा विचार है.
भारत की यूपीआई प्रणाली में इस क्षेत्र में अपार संभावनाएँ हैं. एआई क्षमता
निर्माण और डिजिटल लचीलेपन पर केंद्रित प्रयासों पर भी भारत की छाप दिखाई पड़ती
है. सदस्यों के लिए अपनी मुद्राओं में व्यापार निपटान और निवेश को बढ़ावा देना
आसान बनाना ताकि सीमा पार भुगतान तेज़, सस्ता और सुरक्षित हो सके.
घोषणा में राष्ट्रीय प्राथमिकताओं का सम्मान करते हुए ब्रिक्स की स्थानीय
मुद्राओं के उपयोग को बढ़ावा देने पर हुई चर्चाओं को स्वीकार किया गया और यह माना
गया कि ‘कोई एक तरीका सभी के लिए उपयुक्त नहीं है’.
भारत की सफलता
इस आयोजन को भारत की सफलता के रूप में देखा जा रहा है, वहीं इसके समांतर
भारत-चीन रिश्तों में आ रहा बदलाव भी महत्त्वपूर्ण है. खासतौर से चीनी राष्ट्रपति
शी चिनफिंग की भारत-यात्रा को पर्यवेक्षक महत्त्वपूर्ण मान रहे हैं.
घोषणा में भारत से जुड़े कई विशिष्ट परिणाम भी शामिल हैं. खासतौर से सीमा पार
आतंकवाद पर कठोर भाषा का इस्तेमाल और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, स्वास्थ्य और वित्त
को शामिल करते हुए नए सहयोग तंत्र को स्थापित करना शामिल है.
घोषणापत्र में आतंकवाद के ‘सभी रूपों और अभिव्यक्तियों’ से लड़ने की
प्रतिबद्धता व्यक्त की गई है. भारत के लिए यह डिप्लोमेटिक जीत है. इसमें विशेष रूप
से जम्मू और कश्मीर के पहलगाम में अप्रैल 2025 में हुए आतंकवादी हमले की ‘कड़ी
शब्दों में’ निंदा की गई है.
इस घोषणापत्र में आतंकवादियों की सीमा पार आवाजाही, आतंकवाद के वित्तपोषण और सुरक्षित ठिकानों को भी
विशेष रूप से रेखांकित किया गया है,
साथ
ही आतंकवाद के प्रति शून्य सहिष्णुता व्यक्त की गई है और आतंकवाद का मुकाबला करने
में दोहरे मापदंडों को खारिज किया गया है.
भारत लंबे समय से सीमा पार आतंकवाद को एक अलग सुरक्षा चुनौती के रूप में
अंतरराष्ट्रीय मान्यता दिलाने की मांग करता रहा है. यह भाषा विशेष रूप से
महत्वपूर्ण है क्योंकि ब्रिक्स सर्वसम्मति से कार्य करता है और इसमें चीन भी शामिल
है, जिसका संयुक्त राष्ट्र
में पाकिस्तान स्थित आतंकवादियों पर रुख कई बार भारत से भिन्न रहा है.
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