भारतीय राजनीति में महिला मतदाता (साइलेंट वोटर) सबसे निर्णायक वोट बैंक बनकर उभरी हैं, जिसके कारण राजनीतिक दल उन्हें आकर्षित करने के लिए पारंपरिक उपहारों से लेकर बड़े पैमाने पर नकदी हस्तांतरण योजनाओं की घोषणाएँ कर रहे हैं। अतीत में मंगलसूत्र, कन्यादान, टीवी और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसी मुफ्त वस्तुएँ महिलाओं को लुभाने के चुनावी रणनीतियों का एक बड़ा हिस्सा रही हैं, जो समय के साथ आर्थिक और सामाजिक रूप से विकसित होती जा रही हैं। क्या यह प्रवृत्ति रेवड़ी संस्कृति को बढ़ा रही है, या यह सामाजिक-विकास में मददगार है? मोदी, मुसलमान, मंगलसूत्र (हिंदू वैवाहिक प्रतीक), और यहाँ तक कि मटन और मछली भी चुनावी शब्दावली का हिस्सा बन चुके हैं। विरोधी दल अपनी दुर्दशा के लिए मीडिया, मार्केटिंग और मनी (तीन और 'एम') को कोस सकते हैं, वोटिंग मशीन को तो कोस ही रहे हं। सच्चाई यह है कि चुनावों में कम से कम एक 'एम' निर्णायक साबित हो रहा है। देश के चुनावी इतिहास में महिला वोट का महत्व बढ़ता जा रहा है।
हालाँकि कॉक्रोच आंदोलन के कारण देश का ध्यान जेन-ज़ी और युवा वर्ग की ओर गया है, पर चुनावी-राजनीति के विशेषज्ञ मानते हैं कि सभी दल महिला वोटरों को लुभाने से जुड़े कार्यक्रमों को वरीयता दे रहे हैं। उन्हें समझ में आ रहा है कि महिला वोटर एक ‘ब्लॉक’ है, जेन-ज़ी के बारे में फिलहाल कहना मुश्किल है कि वह ‘ब्लॉक’ के रूप में मतदान करेगा या नहीं। राजनीति-शास्त्रियों का कहना है कि जेन-ज़ी की भूमिका किसी के पक्ष में माहौल को बनाने या किसी के विरोध में माहौल बिगाड़ने में हो सकती है, पर जेन-ज़ी वोटर ब्लॉक नहीं है। इनमें से कुछ तो वोटर भी नहीं हैं।
अगले साल फरवरी-मार्च में पाँच राज्यों में विधानसभा चुनाव होंगे। इन राज्यों
के नाम हैं: गोवा, उत्तराखंड, पंजाब,
उत्तर
प्रदेश और मणिपुर। इन सभी
राज्यों में महिला वोटरों की भूमिका है। पिछले कुछ वर्षों के परिणाम बता रहे हैं
कि महिला वोटर का मन जीत लेने का मतलब है, पलड़ा अपने पक्ष में झुका लेना। शायद
इसीलिए केंद्र की मोदी सरकार बार-बार विधायिका में महिला आरक्षण को लेकर अपने
इरादों को व्यक्त करती रहती है। इन दिनों भी कयास है कि जैसे ही सरकार को लोकसभा
में यथेष्ट बहुमत मिलने का भरोसा होगा, संसद का विशेष अधिवेशन बुला लिया जाएगा।
लुभाने की होड़
महिलाओं को लुभाने की होड़ मुख्य रूप से कैश ट्रांसफर, मुफ्त सुविधाओं और कल्याणकारी योजनाओं के रूप में
तेज हुई है। महिला मतदाताओं की संख्या लगभग आधी है, उनका मतदान प्रतिशत कई राज्यों में पुरुषों से ज्यादा रहा है, और वे निर्णायक भूमिका निभाने लगी हैं। दलों ने इसे
समझकर ‘आधी आबादी’ को अलग वोट बैंक के रूप में टारगेट करना शुरू कर दिया। महिलाओं का मतदान
प्रतिशत लगातार बढ़ा है। कई विधानसभा चुनावों में वे पुरुषों से आगे निकल गईं
(जैसे बिहार 2025 में महिला मतदान
लगभग 71.6% बनाम पुरुष 62.8%)। योजनाओं का
सीधा फायदा महिलाओं के बैंक खातों में पहुँचता है, जिससे वे परिवार में आर्थिक फैसले करने में समर्थ होती हैं। चुनावी नतीजों ने
साबित किया है कि ये स्कीमें असरदार हैं—मध्य प्रदेश की लाड़ली बहना, महाराष्ट्र की लाडकी बहिन, झारखंड की मैया सम्मान जैसी योजनाओं को जीत का अहम
कारण माना गया।
राजनीतिक सूत्र बता रहे हैं कि केंद्र सरकार एक बार फिर पूरी तैयारी और रणनीति
के साथ महिला आरक्षण के लिए संशोधित बिल लाने की तैयारी में है। इस नए ड्राफ्ट में
ऐसी व्यवस्था रखने की कोशिश हो सकती है जिससे परिसीमन के बाद भी राज्यों की मौजूदा
सीटों की हिस्सेदारी पर ज्यादा फर्क न पड़े और क्षेत्रीय असंतुलन का कोई नया विवाद
खड़ा न हो। कांग्रेस और कई प्रमुख विपक्षी दल महिला आरक्षण के विरोध में नहीं हैं, बल्कि उनका असली विरोध परिसीमन के तरीके और उसकी
शर्तों से है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने सुझाव दिया है कि लोकसभा की
मौजूदा सीटों की संख्या को अगले 25 सालों के लिए और 'फ्रीज'
रखा
जाना चाहिए। अब आगे क्या होगा, यह पूरी तरह
सरकार की रणनीति पर निर्भर करता है। फिलहाल माना जा रहा है कि सरकार संसद का विशेष
सत्र तभी बुलाएगी जब उसे सदन में दो-तिहाई बहुमत का पूरा भरोसा हो जाएगा।
यूपी की पहल
जिन पाँच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, उनमें यूपी सबसे
ज्यादा महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है। आइए देखें कि हाल में इस राज्य में महिला
वोटरों को लुभाने के लिए किस प्रकार की घोषणाएँ हुई हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के
अनुसार, प्रदेश की योगी सरकार
महिलाओं को आत्मनिर्भर और आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के लिए 50,000 रुपये तक की वित्तीय सहायता देने वाली एक बड़ी
योजना पर विचार कर रही है। इसके तहत चुनाव से पहले 20,000 रुपये की पहली किस्त और
बाकी किस्तें बाद में दिए जाने का मॉडल प्रस्तावित है। यह खबर सूत्रों के हवाले से
ही मीडिया में आई है। सरकार या पार्टी की ओर से इस विषय पर किसी प्रकार की कोई बात
नहीं कही गई है।
राज्य सरकार ने हाल में 60 वर्ष या उससे अधिक उम्र की महिलाओं के लिए उत्तर
प्रदेश रोडवेज बसों में मुफ्त यात्रा की सुविधा शुरू की है, जिसके लिए आधार कार्ड या वोटर आईडी दिखाना जरूरी है।
राज्य में महिलाओं के लिए पहले से कुछ कार्यक्रम चल रहे हैं, जिनमें एक है मुख्यमंत्री
कन्या सुमंगला योजना। बालिकाओं के स्वास्थ्य, शिक्षा और उनके भविष्य को सुरक्षित करने के लिए इस योजना के तहत विभिन्न चरणों
में कुल 25,000 रुपये तक की सहायता
दी जाती है। इसके अलावा मिशन शक्ति अभियान के तहत महिलाओं की सुरक्षा, सम्मान और स्वावलंबन के लिए राज्य भर में आत्मरक्षा
प्रशिक्षण और जागरूकता कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं।
उत्तर प्रदेश में मौज़ूदा विधानसभा का कार्यकाल मई 2027 में खत्म हो रहा है।
चुनाव आयोग पहले ही यह पूरी तरह साफ कर चुका है कि जनगणना में हो रही देरी की वजह
से उत्तर प्रदेश के चुनाव नहीं टाले जाएँगे। फरवरी-मार्च 2027 में समय पर ही चुनाव
कराए जाएंगे। यूपी में भाजपा लगातार तीसरी बार अपनी सरकार बचाने की तैयारी में है।
समाजवादी पार्टी उसे मुख्य चुनौती दे रही है। ऐसे में महिला आरक्षण का एजेंडा
सिर्फ संसद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक बहुत
बड़ा चुनावी संदेश भी है। बीजेपी इसे 'नारी शक्ति' का मुद्दा बनाकर
महिला मतदाताओं के बीच अपनी पैठ मजबूत करना चाहती है।
पचास बनाम चालीस
महिलाओं के लिए चलाई जा रही आर्थिक सहायता योजना से जुड़ी खबरों को लेकर समाजवादी
पार्टी के सुप्रीमो अखिलेश यादव ने ट्विटर पर लिखा: ‘भाजपा के पास चुनाव जीतने के
लिए पैसे के सिवा कुछ नहीं बचा है। वह भी भाजपा का अवैध धन है, जिसे उत्तर प्रदेश की धार्मिक प्रवृत्ति वाली
महिलाएं कभी स्वीकार नहीं करेंगी।’ इससे पहले, मार्च 2026 में, उन्होंने नोएडा
के दादरी से चुनाव अभियान की शुरुआत करते हुए कहा था कि अगर सरकार बनाने का मौका
मिला, तो हमारी सरकार महिलाओं को 40,000 रुपये की वित्तीय सहायता प्रदान करेगी।
इंडी ब्लॉक से जुड़ी पार्टियों की सरकारें भी ऐसी योजनाएँ चला रही हैं। मसलन
झारखंड की महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के लिए ‘झारखंड
मुख्यमंत्री मैया सम्मान योजना’ के तहत 1,000 रुपये प्रति माह की आर्थिक सहायता सीधे बैंक खाते में दी जाती है।
इसके अलावा विधवा, परित्यक्ता या
निराश्रित महिलाओं को जीवनयापन के लिए ‘मुख्यमंत्री राज्य निराश्रित महिला
सम्मान पेंशन योजना’ के तहत 1,000 प्रति माह की पेंशन दी जाती है। पंजाब में सरकार
ने महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण के लिए ‘मुख्यमंत्री मावां-धीयां सत्कार
योजना’ शुरू की है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की
सरकार के समय अनेक योजनाएँ शुरू हुई थीं, वे अब भी चल रही हैं। कर्नाटक, तेलंगाना
और तमिलनाडु में इस किस्म की योजनाओं ने चुनाव जिताने में मदद की है।
महिलाओं के लिए इस तरह की नकद हस्तांतरण योजनाओं ने पहले भी भाजपा को मध्य
प्रदेश में विधानसभा चुनाव जीतने में मदद की है , जिसमें 2023 में उसकी 'लाडली बहना योजना'; 2024 में महाराष्ट्र में 'लाडकी बहन योजना'; और बिहार सरकार की 'मुख्यमंत्री
महिला रोजगार योजना' शामिल है, जिसे 2025 में शुरू किया गया था। इस योजना ने बिहार
चुनाव में सफलता प्राप्त करने में मदद की थी। दिल्ली में भी, भाजपा सरकार ने इस साल अगस्त से अपनी 'लक्ष्मी योजना' शुरू की है। महंगाई, बेरोजगारी और
घरेलू खर्च के दबाव में सीधे पैसे या मुफ्त सुविधाएं आकर्षक लगती हैं।
पृष्ठभूमि
महिला वोटरों को लुभाने की जो योजनाएँ घोषित की जाती रही हैं, उनका संक्षेप
में वर्गीकरण कुछ इस प्रकार किया जा सकता है:
पारंपरिक और सामाजिक कल्याण की वस्तुएं
(मंगलसूत्र और सोना)मंगलसूत्र और सोने के सिक्के: दक्षिण भारत, विशेषकर तमिलनाडु की राजनीति में यह बेहद लोकप्रिय
रहा है. जयललिता (Amma) के कार्यकाल में
विवाह सहायता के तहत 'थाली (मंगलसूत्र)
के लिए सोना' योजना शुरू की गई
थी. हाल ही में तमिलनाडु सरकार की अन्नान सीर योजना (Annan Seer Scheme) के तहत भी विवाहित
महिलाओं को 8 ग्राम सोने का सिक्का और सिल्क की साड़ी देने के लिए बड़ा बजट आवंटित
किया गया।
कर्नाटक और अन्य राज्य: विभिन्न चुनावों
के दौरान गरीबी रेखा से नीचे (BPL)
परिवारों
की महिलाओं के विवाह के समय विवाह मंगल योजना जैसे कार्यक्रमों के तहत मंगलसूत्र
देने के चुनावी वादे किए जाते रहे हैं।
मुख्यमंत्री कन्यादान: कन्या विवाह
योजनाएं ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को राहत देने के लिए लगभग हर
बड़े राज्य में सामूहिक विवाह योजनाएं चलाई जाती हैं। उदाहरण के लिए, मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री कन्यादान योजना या
छत्तीसगढ़ की कन्या विवाह योजना के तहत गरीब परिवारों की बेटियों की शादी के लिए ₹35,000 से ₹50,000 तक की
प्रत्यक्ष वित्तीय सहायता, घरेलू सामान और
शादी के खर्च दिए जाते हैं। (हालांकि हाल ही में छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में उपहार
में दिए गए मंगलसूत्र की गुणवत्ता को लेकर प्रशासनिक जांच और राजनीतिक विवाद भी
सामने आए हैं)।
इलेक्ट्रॉनिक्स और घरेलू उपकरण (टीवी, मिक्सर, स्मार्टफोन)फ्री
कलर टीवी और मिक्सर-ग्राइंडर: तमिलनाडु में DMK और AIADMK
दोनों
पार्टियों ने अपने चुनावी घोषणापत्रों में मुफ्त रंगीन टीवी, मिक्सर,
ग्राइंडर
और पंखे बांटकर महिला मतदाताओं के बड़े हिस्से को अपने पाले में किया था।
स्मार्टफोन और टैबलेट:
बदलते समय के साथ इलेक्ट्रॉनिक्स
उपहारों का रूप बदल गया है। अब चुनावी वादों में लड़कियों और गृहणियों को मुफ्त
स्मार्टफोन या इंटरनेट डेटा देने की घोषणाएं प्रमुखता से की जाती हैं (जैसे
कांग्रेस और भाजपा दोनों द्वारा विभिन्न राज्यों में डिजिटल कनेक्टिविटी बढ़ाने के
नाम पर किए गए वादे)।
आधुनिक बदलाव: प्रत्यक्ष नकद लाभ (Direct Cash Transfers)2024-2026 के चुनावी दौर में पार्टियों ने केवल भौतिक वस्तुएं देने के बजाय महिलाओं के बैंक खातों में सीधे पैसे भेजने की योजनाओं को 'गेमचेंजर' माना है।
निष्कर्ष
सीएसडीएस, लोकनीति और कुछ अन्य संस्थाओं के महिलाओं के वोटिंग व्यवहार को लेकर
किए गए सर्वेक्षणों का निष्कर्ष कुछ इस प्रकार है:
संक्षेप में, भारतीय राजनीति
में अब ‘महिला वोटर=कैश+मुफ्त सुविधा’ का फॉर्मूला लगभग सभी दलों ने अपना लिया है।
यह होड़ 2019-20 के बाद तेज हुई
और 2023-26 के विधानसभा चुनावों में
चरम पर पहुँच गई। आधी आबादी अब सिर्फ संख्या नहीं, बल्कि चुनावी गणित का केंद्र बन चुकी है।
शोध बताते हैं कि महिलाएँ योजनाओं को ‘वोट के बदले पैसे’ नहीं मानतीं। वे
इन्हें राज्य की जिम्मेदारी समझती हैं और साथ ही रोजगार, सुरक्षा और शिक्षा भी माँगती हैं।
पहले ज्यादातर महिलाएं परिवार (पति/परिवार के पुरुष) की सलाह पर वोट डालती
थीं। अब लगभग आधी महिलाएं खुद फैसला लेती हैं। फिर भी काफी महिलाएं मानती हैं कि
परिवार के राजनीतिक विचारों से मेल रखना जरूरी है।
राजनीतिक दल अब उन्हें ‘लाभार्थी’ के रूप में देखते हैं, लेकिन महिलाएँ खुद को सिर्फ लाभार्थी नहीं, बल्कि नागरिक मानती हैं। यही वजह है कि सिर्फ कैश ट्रांसफर लंबे समय तक पर्याप्त नहीं होगा—रोजगार, सुरक्षा और वास्तविक सशक्तीकरण की माँग आगे बढ़ेगी।
मुख्य तरीके (योजनाएं और वादे)
· सीधा कैश
ट्रांसफर (सबसे आम हथियार)
· मध्य प्रदेश:
लाड़ली बहना योजना (पहले1000 रु, फिर1250+
प्रतिमाह)।
· महाराष्ट्र:
मुख्यमंत्री माझी लाडकी बहिन (1500 प्रति माह)।
· झारखंड: मैया
सम्मान (1000 से बढ़ाकर 2500)।
· पश्चिम बंगाल:
लक्ष्मी भंडार / अन्नपूर्णा।
· कर्नाटक: गृह
लक्ष्मी (2000)।
· ओडिशा: सुभद्रा
योजना।
· दिल्ली: ‘आप’ की महिला सम्मान योजना (1000-2100)। बीजेपी/कांग्रेस ने भी 2500 तक के वादे किए।
· बिहार: चुनाव से
पहले महिलाओं के खातों में 10,000 की रकम।
· उत्तर प्रदेश (2027 चुनाव की तैयारी): सपा का सालाना 40,000 का वादा, भाजपा स्कूटी और अन्य सुविधाएं दे रही है।
मुफ्त बस यात्रा
· दिल्ली (आप का पिंक
टिकट), कर्नाटक (शक्ति योजना), तमिलनाडु (विदियाल पयणम), तेलंगाना, पंजाब, केरल, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल आदि में महिलाओं के लिए सरकारी बसों में मुफ्त या रियायती
यात्रा। इससे रोजमर्रा का खर्च कम होता है और गतिशीलता बढ़ती है।
अन्य सुविधाएं
· मुफ्त/रियायती
गैस सिलेंडर, स्कूटी/साइकिल
छात्राओं को, स्मार्टफोन, स्वास्थ्य कार्ड, मिड-डे मील रसोइयों को ज्यादा वेतन, स्वयं सहायता समूहों को मदद, लखपति दीदी जैसी
योजनाएँ। भाजपा ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’, उज्ज्वला जैसी पुरानी योजनाओं को भी याद दिलाती है।
राजनीतिक दलों की रणनीति
· सत्ताधारी दल
योजना लागू करके ‘वादा निभाने’ का श्रेय लेते हैं।
· विपक्ष ज्यादा
रकम या नई योजना का वादा करके काउंटर करते हैं। (जैसे दिल्ली में ‘आप’ ने 2100 तो बीजेपी/कांग्रेस ने 2500 का वादा किया। क्षेत्रीय दल (तृणमूल, डीएमके, झामुमो, सपा आदि) ने भी इसी
रास्ते को पकड़ा।
· चुनाव से ठीक
पहले धनराशि बढ़ाना या नई किस्त भेजना आम हो गया है।
नतीजे और आलोचना
· ये योजनाएं कई
जगहों पर महिलाओं का समर्थन जुटाने में सफल रहीं, लेकिन आलोचक कहते हैं: यह ‘रेवड़ी संस्कृति’ है और राज्य के खजाने पर बोझ
डालती है।
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| बीबीसी हिंदी से साभार |
महिलाओं का राजनीतिक प्रतिनिधित्व अभी कम है (लोकसभा में करीब 14% के आसपास)। सशक्तीकरण सिर्फ मतदाता के रूप में हो रहा है, प्रतिनिधियों के रूप में नहीं।
· कुछ विशेषज्ञों
के अनुसार महिलाएं हमेशा एक ‘ब्लॉक’ में वोट नहीं
करतीं; जाति, धर्म और स्थानीय मुद्दे भी मायने रखते हैं। अमीर/सवर्ण
महिलाएं ज्यादातर भाजपा की ओर झुकती हैं, जबकि गरीब, दलित, मुस्लिम महिलाएं अक्सर विपक्षी दलों को वोट देती
हैं।
संदर्भ
पारंपरिक और सामाजिक कल्याण की वस्तुएं
https://www.youtube.com/shorts/Xgu2apEO0rA
कर्नाटक और अन्य राज्य: https://translate.google.com/translate?u=https://hwnews.in/news/opinion/definitely-smarter-future-karnataka-elections/40277/&hl=hi&sl=en&tl=hi&client=sge
मुख्यमंत्री कन्यादान
https://narmadapuram.nic.in/en/scheme-category/mukhyamantri-kanyadan-yojna/
इलेक्ट्रॉनिक्स और घरेलू उपकरण
आधुनिक बदलाव: प्रत्यक्ष नकद लाभ


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