मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की बेरोजगार युवाओं/सक्रियतावादियों की तुलना ‘कॉक्रोच’ और ‘परजीवियों’ से करती अदालती टिप्पणी के जवाब में आम आदमी पार्टी के पूर्व कम्युनिकेशन स्ट्रैटजिस्ट और बोस्टन यूनिवर्सिटी के छात्र अभिजीत दीपके ने व्यंग्यात्मक ‘कॉक्रोच जनता पार्टी (सीजेपी)’ शुरू की। इसका नाम ही बीजेपी की पैरोडी है। यह जल्दी ही मीम से बड़े डिजिटल आंदोलन में बदल गया—इंस्टाग्राम पर करोड़ों फॉलोअर्स (बीजेपी/कांग्रेस हैंडल्स से ज्यादा), लाखों रजिस्ट्रेशन हो गए। यह बेरोजगारी, परीक्षा लीक (खासकर NEET), जवाबदेही और व्यवस्था से नाराजगी का प्रतीक बन गया।
इसके दवाब में जुलाई में 36-37 दिनों के जंतर-मंतर धरने, ‘संसद चलो’ मार्च और देशव्यापी प्रदर्शनों के बाद केंद्रीय
शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हो गया। मोदी सरकार (2014 के बाद) पर सार्वजनिक
दबाव से यह मंत्री का दुर्लभ इस्तीफा था। सरकार ने अन्य माँगों (मुआवजा, FIR वापसी, परीक्षा सुधारों पर बात) पर भी सहमति जताई, जिसके बाद CJP ने आंदोलन
स्थगित कर दिया।
इसके बाद सीजेपी ने अपनी राष्ट्रीय टीम घोषित कर दी, जिसके दीपके राष्ट्रीय
संयोजक हैं। इसने 15 अगस्त से ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान शुरू किया है, जिला-स्तरीय संगठन बनाने की योजना है, ‘क्या बोलती पब्लिक’ जैसा सुनने वाली यात्रा और ‘सीजन-2’ की घोषणा भी की गई है। इतना होने के
बावज़ूद यह ग्रुप औपचारिक पार्टी नहीं,
बल्कि युवा राजनीतिक आंदोलन/प्रेशर ग्रुप के रूप में आगे बढ़ रहा है।
पहली नज़र में साफ दिखाई पड़ता है कि बीजेपी ने इसे शुरू में गंभीरता से नहीं
लिया, पर बाद में इसे लेकर अफरा-तफरी में फैसले करना शुरू कर दिया। सवाल है कि यह
आंदोलन व्यवस्था-परिवर्तन के लिए है या बीजेपी को सत्ता से बाहर करने के लिए? व्यवस्था-परिवर्तन करना है, तो इस संगठन की व्यवस्था योजना
क्या है? सत्ता-परिवर्तन कराना है,
तो किस पार्टी के पक्ष में? क्या यह संगठन
बीजेपी से टक्कर ले सकता है? पहले एक नज़र
में दोनों की तुलनात्मक ताकतों पर नज़र डालें:
बीजेपी की मजबूती: चुनावी मशीनरी, संगठन (RSS), कल्याण योजनाएं, हिंदू राष्ट्रवाद और विपक्ष की कमजोरी या आपसी टकराव, अब भी
प्रमुख हैं। 2024 में बीजेपी को 37% वोट मिले थे; हाल के राज्य चुनावों में भी उसका असर दिखाई पड़ा है। CJP अभी चुनावी ताकत नहीं है—वह न तो पंजीकृत पार्टी है, न उसके पास राष्ट्रीय प्रतीक हैं, न बड़े पैमाने पर संगठन या काडर। हाँ, यह विचार का विषय
ज़रूर है कि उसके पास संसाधन कहाँ से आ रहे हैं? इस विषय में कोई जानकारी हासिल हो पाई, तो यह बीजेपी के पक्ष में होगा।
CJP की सीमाएं: व्यंग्य और
मुद्दा-आधारित (शिक्षा, युवा
बेरोजगारी) होने से व्यापक वैचारिक आधार या ग्रामीण/जातिगत गठबंधन बनाना मुश्किल
काम है। कई विश्लेषक कहते हैं कि गुस्सा अस्थायी हो सकता है; बीजेपी मांगों को को-ऑप्ट कर सकती है या दमन/अवहेलना कर
सकती है। विपक्ष इसे अपना मंच बनाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन CJP खुद स्वतंत्र
रहने पर जोर दे रहा है।
संभावनाएं: युवा (भारत की आबादी का बड़ा हिस्सा) असंतोष अगर स्थायी संगठन और स्थानीय मुद्दों में बदल जाए, तो शहरी/युवा वोट प्रभावित हो सकते हैं, खासकर अगर परीक्षा लीक, नौकरियां या संस्थागत विश्वसनीयता जैसे मुद्दे दोहराए जाएं। दक्षिण एशिया में Gen-Z आंदोलनों (बांग्लादेश, नेपाल आदि) ने सरकारें गिराईं—भारत में संस्थाएं मजबूत हैं, लेकिन सड़क दबाव ने पहली बार मंत्री गिराया। यह ‘बीजेपी के अजेय’ होने की छवि को चुनौती ज़रूर देता है। पर इसके आगे क्या?
राजनीति की दिशा
एक
महत्त्वपूर्ण दौर में भारतीय-राजनीति अराजक और हास्यास्पद स्थितियों के बीच से होकर गुज़र रही
है। जिन
वैचारिक-प्रश्नों पर संसद के भीतर बहस होनी चाहिए, वे सड़कों पर घिसट रहे हैं। संसद के मॉनसून सत्र के दौरान सत्तापक्ष और विपक्ष
के बीच जिस किस्म की रस्साकशी हुई है, उससे दो निष्कर्ष निकलते हैं। पहला, यह कि
यह 2029 के चुनाव की पेशबंदी है। और दूसरे यह सब अगले साल होने वाले सात महत्त्वपूर्ण
राज्यों के चुनाव की तैयारी है। अगले साल राष्ट्रपति का चुनाव भी होना है, जिसमें
एनडीए के प्रत्याशी की जीत की पूरी संभावना है, फिर भी कुछ सवाल हैं। क्या वर्तमान
राष्ट्रपति ही फिर से इस कुर्सी पर बैठेंगी या क्या हगा?
बहरहाल जिन राज्यों में चुनाव होना है, वे हैं, उत्तर प्रदेश, पंजाब,
उत्तराखंड, गोवा, हिमाचल, गुजरात और मणिपुर। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण है उत्तर
प्रदेश, जहाँ से दिल्ली की कुर्सी पाने का रास्ता बोकर गुज़रता है। इस राज्य को लेकर
रणनीतियाँ बनने लगी हैं। शेष छह राज्यों का महत्त्व कम नहीं है। मणिपुर भी अब
राष्ट्रीय राजनीति का केंद्रीय विषय बन चुका है। वस्तुतः इनमें से हरेक राज्य किसी
न किसी कारण से महत्त्वपूर्ण है, पर फिलहाल सवाल है कि क्या जेन-ज़ी या
कॉक्रोच-प्रकरण इन चुनावों पर असर डालेगा? इस आलेख का उद्देश्य अलग-अलग राज्यों में चुनाव की संभावनाओं का विश्लेषण
करना नहीं है, बल्कि यह समझना है कि हो क्या रहा है, क्या सामूहिक मन भाजपा-विरोधी
हो रहा है? क्या उल्टी गिनती शुरू हो
गई है?
इंस्टाग्राम-पीढ़ी का उदय
यह सच है कि नई पीढ़ी और उसकी सामूहिक-मानसिकता भाजपा से टकरा रही है, पर अभी
तक का अनुभव है कि ‘उल्टी गिनती’ जैसी बात करना जल्दबाज़ी है। बेशक एक नया वोटर सामने आ रहा
है, पर क्या वह केवल इसलिए भाजपा-विरोधी है, क्योंकि वह आँखें बंद करके अभिजीत
दीपके के सोशल मीडिया हैंडल को फॉलो करता है? वह समझदार है, तो कम से कम आँखें बंद करके काम नहीं करता होगा। हाँ, उसकी
वरीयताएँ बदली हैं। वह 2014 के चुनाव में औसतन आठ साल का था। उसके माता-पिता की
पीढ़ी ने भाजपा के सत्ता में आने का रास्ता खोला था। क्या तब के बच्चे इस राजनीतिक
विरासत के बोझ को उठाकर फेंक देंगे?
वॉट्सएप पीढ़ी ने मोदी के हिंदुत्व के उदय को हवा दी, तो क्या इंस्टाग्राम पीढ़ी उसे परास्त करेगी? ऐसे सवालों का जवाब देना आसान नहीं है। एक तो युवा मन का
सोच अच्छी तरह सामने नहीं आया है, दूसरे चुनाव की राजनीति काफी हद तक विरोधी दलों
की रणनीति पर निर्भर करती है। अभी तक तो वह विफल ही है। और यह भी कि बीजेपी केवल
हिंदुत्व के नारे के कारण सत्तानशीन नहीं हुई है।
कॉक्रोच राजनीति ने दिखा दिया कि सोशल मीडिया + युवा गुस्सा + हास्य/व्यंग्य के
सहारे सत्ता पर दबाव डाला जा सकता है और रियायतें मिल सकती हैं। लेकिन बीजेपी के
मूल सत्ता-समीकरण (संगठन, विचारधारा, कल्याण + ध्रुवीकरण) को उखाड़ने के लिए इसे लंबे समय तक
टिकाऊ संगठन, स्पष्ट एजेंडा और चुनावी
उपस्थिति बनानी होगी। फिलहाल यह एक शक्तिशाली प्रेशर ग्रुप और युवा आवाज है, जो भविष्य के चुनावों में विपक्ष या नए विकल्पों को मदद कर
सकता है—पूर्ण उखाड़ने वाला नहीं। स्थिति विकसित हो रही है; अगले अभियान और राज्य/स्थानीय प्रतिक्रियाएं तय करेंगी।
क्रोध और हताशा
लोकतांत्रिक समाजों में सरकार के विरुद्ध जनता के क्रोध, हताशा और असंतोष का छिटपुट प्रदर्शन एक सामान्य बात है।
लेकिन क्या ऐसे छिटपुट प्रदर्शन चुनावी नतीजों के साथ राजनीतिक लामबंदी में तब्दील
हो सकते हैं? परिस्थितियों के आधार पर
विरोध आंदोलन के बिल्कुल विपरीत परिणाम हो सकते हैं। जनता का क्रोध संगठित होकर
नाटकीय चुनावी नतीजों में तब्दील हो सकता है; वहीं, विरोध प्रदर्शन ऐसे गुस्से
को थोड़ी देर के लिए भड़का कर फिर उसे जज़्ब भी कर सकता है।
अभिजीत दीपके दलित समाज से आते हैं, इसलिए कुछ लोगों का अनुमान है कि यह
दलित-आंदोलन था। यह अर्ध सत्य है। कॉक्रोच-आंदोलन के पीछे मोटे तौर पर उत्तर भारत
के मध्यवर्ग के लोग थे। उनका जातीय या धार्मिक विश्लेषण कर पाना आसान नहीं है। उसे
भारत की आम जनता का आंदोलन, फिलहाल कहना सही नहीं होगा। हाँ, वह रोज़गार की
दिक्कतों और भरती की सरकारी प्रक्रिया में भ्रष्टाचार की भूमिका पर रोशनी ज़रूर
डालता है।
जंतर-मंतर
पर हुए कॉक्रोच-प्रदर्शन
ने नाटकीयता के नए मानक ज़रूर तय किए हैं। उसमें सोशल मीडिया का जमकर इस्तेमाल
हुआ है, आंदोलन की भाषा ने नए मापदंड गढ़े हैं। उसे पसंद किया गया या नहीं, इसका पहला
पता अगले साल लगेगा। इस आंदोलन के भी दो रंग थे। जंतर-मंतर के मुकाबले झारखंड के
आंदोलन को जेन-ज़ी का आंदोलन तो माना गया, पर वह कॉक्रोच आंदोलन नहीं था।
जंतर-मंतर वाले कार्यक्रम के पीछे कांग्रेस पार्टी की हाथ भी नहीं था, पर उसने खुद
को आंदोलन से दूर रखा, पर भी संसद के मॉनसून सत्र में इसके नाम पर शोर मचाया। दूसरी
तरफ बीजेपी ने पहले तो भँवें तरेरीं और फिर हथियार डाल दिए। किसान आंदोलन के बाद बीजेपी
ने दूसरी बार कमज़ोरी दिखाई है।
राजनीति से मोहभंग
मुख्यधारा
की राजनीति समता-मूलक समाज, न्याय, धर्मनिरपेक्षता और वैज्ञानिक-दृष्टिकोण जैसी
बातों को केवल बाहरी आवरण की तरह इस्तेमाल करते हुए, भाई-भतीजावाद, परिवारवाद,
क्रोनी-पूँजीवाद और संकीर्ण स्वार्थों से बुरी तरह ग्रस्त दिखाई पड़ रही है, वहीं
युवा-वर्ग कुंठित और भ्रमित है। पर सवाल है कि उनके
सहारे आंदोलन की नैया बहाने वाले कौन लोग हैं, और उनका इरादा क्या है?
सत्तर के दशक के बिहार और गुजरात आंदोलन और फिर एक दशक पहले अन्ना हजारे के अनशन और फिर निर्भया
मामले के समय नौजवानों की छटपटाहट व्यक्त हुई थी, पर यह भी स्पष्ट है कि नौजवान
कोई राजनीतिक वर्ग नहीं है। उसके भीतर भी वैसा ही विभाजन है। जैसा शेष समाज में है।
नौजवान की तात्कालिक पीड़ा रोज़गार, शिक्षा और परीक्षा प्रणाली और सरकारी दफ्तरों
के सामान्य भ्रष्टाचार को लेकर है, पर वह कुछ समय बाद खुद इस सिस्टम का हिस्सा
बनता है। इसे बदलने या उलटने का उसका इरादा नहीं है।
प्रश्नपत्र-लीक
मामले ने आकांक्षा, अवसर
और युवाओं को विफल करने वाली व्यवस्था के बारे में एक व्यापक बहस छेड़ दी है। वहीं राम मंदिर की अनियमितताओं, मतदाता
सूची के गहन संशोधन और नागरिकता के प्रश्न भी महत्त्वपूर्ण हो गए हैं। ऐसे समय में, खंडित विपक्ष अपनी कमजोरियों को संसद
में व्यक्त करता दिखाई पड़ रहा है।
आंदोलन की राजनीति
एक विपरीत दृष्टिकोण यह है कि यह विरोध प्रदर्शन कांग्रेस को ही नुकसान पहुँचा
सकता है। कॉक्रोच जनता पार्टी और कुछ नहीं, बुनियादी तौर पर आम आदमी है। उसके ही
घोषित लोगों ने इस आंदोलन को चलाया। हाल के वर्षों में आम आदमी पार्टी ने ही सबसे
ज्यादा नुकसान कांग्रेस का किया है। अगले साल पंजाब और गुजरात में चुनाव है, जहाँ
आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस की जड़ों काटने में कसर नहीं छोड़ी है।
कॉक्रोचों के आंदोलन को लेकर विरोधी दलों में भी एक राय नहीं थी। समाजवादी
पार्टी और वामपंथी दलों का मानना है कि प्रदर्शनकारियों का साथ देने से विपक्ष
का दायरा बढ़ सकता है, जबकि कांग्रेस
के भीतर इस बात पर मतभेद हैं कि प्रदर्शनकारियों का समर्थन करना फायदेमंद होगा या
नहीं।
2011 के केजरीवाल-अन्ना आंदोलन
ने कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के खिलाफ और नरेंद्र मोदी
के नेतृत्व वाली भाजपा के पक्ष में जनता के गुस्से को एकजुट किया। उस समय जनता के
गुस्से का सबसे ज्यादा असर कांग्रेस पर पड़ा था। अब, पार्टी को डर है कि सत्ताधारी भाजपा के खिलाफ जन प्रतिरोध, जो उसके अनुसार तेजी से बढ़ रहा है, बिना किसी स्पष्ट कार्यक्रम या संगठन के एक गैर-राजनीतिक
लामबंदी से बिखर सकता है। विपक्ष के जो लोग इस विरोध प्रदर्शन का फायदा उठाना
चाहते हैं, उनका मानना है कि
प्रदर्शनकारी सरकार को निशाना बना रहे हैं, और इस भावना को राजनीतिक रंग दिया जा सकता है और उनके साथ बेहतर समन्वय के
माध्यम से इसे और मजबूत किया जा सकता है।
आंदोलनों का असर
खुद को गैर-राजनीतिक घोषित करने वाले पिछले कुछ आंदोलनों पर ध्यान दें। नागरिकता
संशोधन अधिनियम के विरोध में 2019-20 में हुए प्रदर्शन, और किसान-कानून के विरोध प्रदर्शन 2020-21 में
हुए। ये दोनों ही मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के दौरान हुए थे और एक ही श्रेणी
में आते थे। इनसे पहले 2011 में अन्ना हजारे-अरविंद केजरीवाल का भ्रष्टाचार विरोधी
आंदोलन हुआ था, जिसके बाद 2012 में निर्भया
बलात्कार और हत्या के विरोध में प्रदर्शन हुए थे।
इन आंदोलनों की सामाजिक संरचना को सटीक रूप से समझना असंभव है, लेकिन कुछ प्रमुख विशेषताओं पर ध्यान दिया जा सकता है। किसानों
का विरोध प्रदर्शन मुख्य रूप से दिल्ली के आसपास के एक संकीर्ण क्षेत्र में
अपेक्षाकृत समृद्ध किसानों द्वारा संचालित था। नागरिकता कानून विरोधी प्रदर्शनों
को बड़े पैमाने पर मुस्लिम मुद्दा मान लिया गया। शहरी मध्यम वर्ग ने, जो खुद को राजनीति से दूर मानता है, अन्ना के आंदोलन और ‘विजय चौक पर भ्रष्टाचारियों को फाँसी
दो’ के आह्वान का समर्थन किया, लेकिन वह किसानों
के विरोध प्रदर्शनों के दौरान चुप रहा और संभवतः काफी हद तक सीएए-विरोधी आंदोलन के
खिलाफ हो गया।
किसानों ने सरकार को विवादास्पद कृषि कानूनों को वापस लेने के लिए मजबूर ज़रूर
किया, पर सीएए का विरोध-प्रदर्शन
फीका पड़ गया। यों भी मुसलमानों के आंदोलनों का लाभ कांग्रेस और सपा जैसी
पार्टियाँ लेने की कोशिश करती हैं, उसका विपरीत प्रभाव हिंदू-वोटर पर भी पड़ता है।
बहरहाल उन दोनों आंदोलनों का भविष्य के चुनावों पर खास असर नहीं पड़ा। पंजाब में
बीजेपी वैसे ही नहीं थी, पर दिल्ली और हरियाणा में वह सरकार बना ले गई। 2024 के
लोकसभा चुनाव में भी उसने सरकार तो बना ही ली। बेशक उत्तर प्रदेश में उसे धक्का
लगा, पर वह धक्का सपा की रणनीति के कारण लगा।
युवा बेचैन तो है
बाद के चुनावों में राष्ट्रीय स्तर पर दोनों विरोध प्रदर्शनों का राजनीतिक
प्रभाव सीमित रहा। ये प्रदर्शन उन क्षेत्रीय हितों का प्रतिनिधित्व करते थे
जिन्हें भाजपा 'अन्य' के रूप में अलग-थलग करके अपनी राजनीति को बढ़ावा दे सकती थी।
राजनीति से दूर रहने वाले मध्य-वर्ग की दिलचस्पी हरेक तरह की राजनीति को अवांछनीय घोषित करने में होती है, क्योंकि वह
खुद को राजनीति के साथ अच्छी तरह जोड़ नहीं पाया है। वह उन आंदोलनों से जरूर
जुड़ता है जो आमतौर पर शहरी प्रश्नों से जुड़ी शिकायतों को उठाते हैं। जैसे 2011
में महँगाई। प्रश्नपत्रों की लीक भी ऐसा ही विषय है। शहरों के निम्न मध्यवर्ग के
युवा की बेचैनी हाल में नोएडा के कामगारों और गिग वर्कर्स के आंदोलनों में देखने
को मिली।
आंदोलनकारी अपने सामने मौजूद खड़ी समस्याओं से उत्तेजित होते हैं। 2014 में
नरेंद्र मोदी को मिली जीत के पीछे युवा वर्ग और महिलाओं की भूमिका थी। बीजेपी की
सरकारों ने ग्रामीण महिलाओं के बीच लोकप्रिय होने का रास्ते खोज लिए हैं, पर शहरी
युवा, या गाँवों से बाहर निकल कर शहरों में तेजी से आ रहे युवा के लिए रास्ते नहीं
हैं। देखना होगा कि अगले दो वर्षों में केंद्र सरकार और राज्य सरकारें भी इस दिशा
में क्या करने वाली हैं।
बढ़ती निराशा
सीजेपी के प्रदर्शनकारी मूलतः हिंदी भाषी क्षेत्रों में भाजपा के गढ़ों से ही
आए थे। जनसंख्या में भारी वृद्धि, आर्थिक-गतिविधियों में कमी और इस इलाके में
पूँजी निवेश में कमी के कारण आशा से अधिक निराशा बढ़ रही है। यह एक ऐसा वर्ग है
जिसे आसानी से किसी खास समूह के रूप में वर्गीकृत करना आसान नहीं है। ज्यादा से
ज्यादा कहा जा सकता है कि वह मुख्य रूप से युवा, हिंदू-हिंदी समुदाय से ताल्लुक रखता है, जो इस मुद्दे पर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की संभावना को खत्म कर देता है।
देखना होगा कि क्या यह वर्ग बीजेपी की कोर-विचारधारा को क्षीण करेगा? फिलहाल ऐसा कहना मुश्किल है। भ्रष्टाचार विरोधी नारे
गुजरात नवनिर्माण आंदोलन (1974), जेपी आंदोलन
(1974) और अन्ना आंदोलन जैसे आंदोलनों के लिए एक आवरण मात्र थे, जिनमें विभिन्न हित समूहों ने कांग्रेस व्यवस्था को कमजोर
करने के लिए एकजुट होकर काम किया था। क्या इस समय ऐसी कोई अंतर्धारा है, जो बीजेपी
के विरुद्ध काम करे? राम मंदिर की
चंदा चोरी तक फिलहाल ऐसा नहीं कर रही है।
सवाल है कि जिस आंदोलन ने भाजपा और उसकी हिंदुत्ववादी राजनीति को सत्ता में
लाने में मदद की, उसे कमजोर भी
कर सकता है? कोई विरोध प्रदर्शन समाज के
किसी विशेष वर्ग या देश के किसी खास इलाके तक सीमित रहता है, तो भाजपा चिंतित नहीं होती। उसने 2014 के बाद से अपने कई
पुराने समर्थकों को खोया है, तो दूसरी जगहों पर नए समर्थक हासिल भी किए हैं। हिंदुत्व
की वैचारिक अपील बरकरार है, और कांग्रेस
तथा समाजवादी जैसी पार्टियों की गतिविधियाँ बीजेपी के पक्ष में उसे मजबूत ही कर
रही हैं। एक सवाल और है कि क्या पार्टी 2029 में अगले आम चुनाव से पहले लोकसभा का
नया परिसीमन करा लेगी? ऐसा हुआ, तो
उसका वोट-सीट अनुपात बढ़ जाएगा।
जिन राज्यों में चुनाव होने हैं
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समय |
राज्य |
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फरवरी-मार्च 2027 |
गोवा, उत्तराखंड, पंजाब, उत्तर प्रदेश, मणिपुर |
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नवंबर 2027 |
हिमाचल प्रदेश |
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दिसंबर 2027 |
गुजरात |
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