जंतर-मंतर पर सोनल वांगचुक के अनशन, संसद-भवन मार्च और उसके बाद हुई हिंसा ने अंततः इस आंदोलन के राजनीतिक चेहरे पर पड़ी नकाब हटा दी है। बेशक इस आंदोलन के समर्थकों में बड़ी संख्या किशोरों और उनके अभिभावकों की है, जिनका प्रतियोगी परीक्षाओं से भरोसा टूट रहा है। पर इस आंदोलन को चलाने वाली ताकत कहीं और से काम कर रही है। इसमें देश के विरोधी दल भी शामिल हैं, और बुनियादी तौर पर आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता हैं, जिनके पुराने नाम की साख अब काफी कम हो चुकी है। किशोरों के प्रति सहानुभूति से ज्यादा इस आंदोलन के पीछे सत्ता-प्राप्ति की उनकी मनोकामना है। जनता के मसलों को लेकर आंदोलन चलाना उनका वैधानिक अधिकार है, ज्यादा बड़ा सवाल है कि ‘संपूर्ण-व्यवस्था’ में उनकी भूमिका क्या है।
पहली नज़र में
ऐसा लगता है कि सरकार करीब-करीब उसी रास्ते पर जा रही है, जिसपर 2013 में केंद्र
सरकार गई थी। एनडीए सरकार जो समाधान पेश कर रही है, वह है कड़ी सजा। आधिकारिक
सूत्रों के अनुसार, केंद्रीय मंत्रिमंडल ने शुक्रवार को एक मसौदा विधेयक को मंजूरी
दे दी, जिसमें 10 साल तक की कैद, 10 करोड़ रुपये तक का जुर्माना, त्वरित अदालतों के लिए वैधानिक समर्थन और मामलों
की जाँच और मुकदमे के लिए पाँच महीने की समय सीमा का प्रावधान है।
इसके कुछ घंटों
बाद, इंस्टाग्राम पर एक पोस्ट में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार आधी रात को
प्रसारित अपने वीडियो पर मिली प्रतिक्रियाओं और सकारात्मक सुझावों के लिए सभी को
धन्यवाद दिया, जिसमें उन्होंने सरकार के फैसले की घोषणा
की थी। उन्होंने कहा, ‘धन्यवाद दोस्तो। मुझे आधी रात को आप लोगों से बात करने का
मौका मिला। मेरे वीडियो पर आपकी प्रतिक्रिया और आपके सकारात्मक सुझावों के लिए आप
सभी का धन्यवाद। आपका प्यार ऐसे ही बरसता रहेगा; हमारे रिश्ते और भी मजबूत होते जाएँगे। धन्यवाद, धन्यवाद दोस्तो’।
दोस्त क्या चाहते
हैं?
अब 13 साल पीछे
चलें। 2012 के निर्भया कांड के बाद भारी जनाक्रोश के बीच केंद्र सरकार ने क्रिमिनल
लॉ (अमेंडमेंट) एक्ट, 2013 पास करा दिया। यह वह कानून है, जिसे
जल्दबाज़ी में राजनीतिक व सामाजिक दबाव के तहत पारित गैंगरेप कानून के रूप में
मुख्य रूप से याद किया जाता है। इस कानून में गैंगरेप के लिए न्यूनतम 20 साल से
लेकर उम्रकैद (शेष प्राकृतिक जीवन) तक की अनिवार्य सजा का प्रावधान किया गया। अदालतों
से विशेष कारणों का हवाला देकर न्यूनतम सजा से कम देने का अधिकार छीन लिया गया
वगैरह।
कानूनी
विशेषज्ञों का मानना था कि संसद ने बिना किसी व्यापक व शांत-चित्त सार्वजनिक
विमर्श के इसे अत्यधिक दबाव में पारित किया। कानून केवल सजा को कठोर बनाने पर
केंद्रित था, जबकि पुलिस जाँच में सुधार, फॉरेंसिक क्षमता और त्वरित न्याय की प्रणाली पर
पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। परिणाम सामने है, न बलात्कार कम हुए और न गैंगरेप।
पेपर लीक की सजा बढ़ाने का लाभ क्या होगा, यह बाद में पता लगेगा, पर सवाल है कि ‘कॉक्रोच-आंदोलन’ में शामिल लोग किस उम्मीद से आए हैं? मुझे नहीं लगता कि सामूहिक रूप से कोई एक उम्मीद है। इसके नेताओं के बारे में मुझे ज्यादा जानकारी नहीं है, पर राजनीतिक दलों के नेताओं के इरादे साफ हैं। वे विरोध करते हुए नज़र आना चाहते हैं। जनता के मन में भी गुस्सा है, वह उसे व्यक्त करना चाहती है।
राजनीतिक-विसंगतियाँ
सोनम वांगचुक ने 23 जुलाई
की आधी रात के बाद अपना अनशन ख़त्म करके आंदोलन के सामने दुविधा पैदा कर दी है।
अनशन खत्म होने के बाद कॉक्रोच जनता पार्टी के जनक अभिजीत दीपके ने अपने वीडियो
संदेश में इस बात पर खुशी जताई, साथ में यह भी कहा कि धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा
होने तक प्रदर्शन जारी रहेगा। औपचारिक रूप से अनशन वापस लेने के समर्थन करने के
बावज़ूद आंदोलन के भीतर से निराशा के स्वर भी सुनाई पड़े हैं, और ‘सोनम गुप्ता’ वाले मीम नए रूप में दिखाई पड़े हैं। दूसरी तरफ वांगचुक को सफाई देनी पड़ी
है कि मैंने सरकार के साथ कोई सौदेबाज़ी नहीं की है। अब
कॉक्रोच-आंदोलन के समांतर कांग्रेस पार्टी का आंदोलन भी चल निकला है।
आंदोलन का फायदा लेने की कोशिश में कांग्रेस, आम
आदमी पार्टी और कुछ दूसरे दल आपस में गुत्थम-गुत्था हैं। राहुल गांधी ने अचानक
तेजी पकड़ी है। बीजेपी को भी घबराहट तो हुई ही है, अन्यथा नरेंद्र मोदी सीधे
युवाओं को संबोधित करने के लिए सामने नहीं आते। इससे पहले मंगलवार को एनडीए के
सांसदों की बैठक में प्रधानमंत्री ने सांसदों से युवाओं तक पहुँचने और उनकी
चिंताओं को सुनने की अपील की थी। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया था कि प्रश्नपत्र
लीक जैसी अनियमितताओं में शामिल लोगों को सख़्त से सख़्त सज़ा मिलनी चाहिए। पर
उन्होंने आंदोलनकारियों की माँगों को लेकर कुछ नहीं कहा है।
इस्तीफा, नो इस्तीफा!
मंत्री का इस्तीफ़ा राजनीतिक मसला है। धर्मेंद्र
प्रधान इस्तीफा देंगे या उनसे लिया जाएगा, तो संदेश जाएगा कि सरकार नाकारा है। मोदी
सरकार के लिए नैतिकता से ज़्यादा महत्वपूर्ण यह है कि इस्तीफ़ों का चुनावी असर
क्या होगा। वे अपने समर्थकों के मूड को भी भाँप रहे हैं। एक मज़बूत समर्थक वर्ग
मोदी पर अब भी पूरा भरोसा करता है। वह अपने नेता को कमज़ोर पड़ते हुए नहीं देखना
चाहता। जब तक उसका दबाव बीजेपी की चुनावी जीत की क्षमता को प्रभावित नहीं करेगा, तब
तक लगता नहीं कि सरकार झुकेगी।
क्या इस समस्या का कोई सर्व-स्वीकृत हल निकलेगा? इस राजनीतिक घटनाक्रम के बीच एक सवाल शिद्दत से उठ रहा है कि धर्मेंद्र
प्रधान को हटाना भी भला क्या मुश्किल काम है? आंदोलन का
समाधान होता हो, तो हटाने में दिक्कत क्या है? हो
सकता है कि धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दे दें, पर इससे क्या समस्या का समाधान हो
जाएगा? कॉक्रोच आंदोलन की कुछ और माँगें भी इसके
साथ जुड़ गई हैं। इससे पहले भी मोदी सरकार के कई मंत्रियों
के इस्तीफ़े की माँग उठ चुकी है। बीजेपी ने अब तक इन माँगों की अनसुनी की है।
सरकार की ओर से जेपी नड्डा प्रदर्शनकारियों के इन विषयों पर बातचीत कर रहे
हैं। यानी प्रदर्शनकारियों और सरकार के बीच संवाद के दरवाज़े खुले हुए हैं। इसका
असर संसद के मॉनसून सत्र पर पड़ रहा है। पिछले कुछ वर्षों से देखने में आ रहा है कि
संसद का सत्र शुरू होते ही कुछ ऐसी परिस्थिति बनती है, जिससे गतिरोध पैदा हो जाता
है। इससे वे प्रश्न पीछे चले जाते हैं, जो सदन में उठने वाले थे।
अबतक केवल राज्यमंत्री एमजे अकबर ने नैतिक
ज़िम्मेदारी के आधार पर इस्तीफा दिया है, पर वह निजी मामला था, धर्मेंद्र प्रधान
का मामला राजनीतिक है। कोरोना मामले में हर्षवर्धन, एपस्टीन फाइल मामले में हरदीप
पुरी, किसान आंदोलन में नरेंद्र सिंह तोमर और रेल दुर्घटनाओं को लेकर अश्विनी
वैष्णव के इस्तीफ़े माँगे गए। इनमें से किसी ने भी फौरन इस्तीफ़ा नहीं दिया। इस
सरकार ने अब तक केवल किसान आंदोलन के मामले में अपना रुख बदला है।
संसद नहीं, सड़क
राजनीतिक
कार्यकर्ता योगेंद्र यादव ने बुधवार 21 जुलाई को विरोध की राजनीति में बुनियादी
बदलाव की वकालत करते हुए कहा कि भारत का लोकतांत्रिक परिदृश्य इस हद तक बदल चुका
है कि विपक्षी दल अब केवल संसद और चुनावों के भरोसे नहीं रह सकते। लोकतंत्र की
रक्षा के लिए उन्हें सड़कों पर शांतिपूर्ण जनांदोलन खड़े करने होंगे। विदर अपोजीशन
: फ्रॉम इलेक्टोरल पॉलिटिक्स टू पॉलिटिक्स ऑफ रेसिस्टेंस’ विषय पर एमपी वीरेंद्र
कुमार स्मृति व्याख्यान देते हुए यादव ने कहा कि विपक्ष को ‘चुनावी राजनीति से
प्रतिरोध की राजनीति’ की ओर बढ़ना होगा।
उनकी इस राय में
आंदोलन के पहले वाला ‘शांतिपूर्ण’ विशेषण बचाव कर रहा है, अन्यथा यह खतरनाक विचार है। वे क्या सारे दलों को चुनावों
का बहिष्कार करने की सलाह दे रहे हैं, जैसा जयप्रकाश नारायण ने भी एकबार किया था? इस विचार के समांतर ‘जिंदा कौमों’ वाला नारा है, जो पाँच साल इंतज़ार नहीं
करतीं। सच यह है कि कौमों को अपने जिंदा होने को साबित करने के लिए वैचारिक-तरीकों
को इस्तेमाल करना चाहिए। थोड़ी देर के लिए इस आंदोलन के बारे में ही विचार करें।
क्या जनता के बीच इसे लेकर कोई राय-मशविरा हुआ था? पूरी-समोसों,
पानी की बोतलों, कोल्ड ड्रिंक, आने-जाने और रहने की व्यवस्था की योजना तो ज़रूर
किसी न किसी स्तर पर बनी होगी, क्योंकि हमारी राजनीति उसमें पटु है, पर जनता की
राय किसी ने नहीं पूछी होगी। बेशक लोगों को उकसाया, भड़काया जा सकता है। जाति,
धर्म, संप्रदाय, भाषा, क्षेत्र वगैरह-वगैरह के नाम पर।
उनका मतलब क्या
है, यह कुछ समय बाद ही स्पष्ट होगा, पर एक महत्त्वपूर्ण दौर में भारतीय-राजनीति
अराजक और हास्यास्पद स्थिति को प्राप्त करती नज़र आ रही है। जिन वैचारिक-प्रश्नों
पर संसद के भीतर बहस होनी चाहिए, वे सड़कों पर लिथड़े पड़े हैं। चूँकि पूरे देश
में आंदोलन चल निकला है, इसलिए इसकी पूर्णाहुति की प्रतीक्षा करनी होगी। इस गहमागहमी के साथ लगता है कि ‘कॉक्रोच राजनीति’ का एक अध्याय
पूरा हो गया है। आप पूछ सकते हैं कि अभिजीत दीपके और उनकी कॉक्रोच जनता पार्टी अब क्या करेगी? आम आदमी पार्टी की तरह क्या यह कोई नया राजनीतिक
दल है? या उसकी ही शाखा है? ऐसा है, तो क्या यह किसी राजनीतिक-गठबंधन का
हिस्सा बनेगा? क्या कांग्रेस पार्टी इसका स्वागत करेगी? क्या भाजपा इन्हें भी अपने आप में शामिल कर लेगी? क्या इस आंदोलन का
आने वाले वर्षों में चुनावों पर असर पड़ेगा? क्या यह आंदोलन दो साल पहले बांग्लादेश और नेपाल जैसे आंदोलनों के तर्ज पर
है?
सवाल-दर-सवाल
ऐसे तमाम
सवालों के जवाब अभी किसी के पास नहीं हैं, पर अब खोजे जाएँगे। यह देखना भी ज़रूरी है कि जंतर-मंतर पर कौन लोग एकत्र हुए हैं? वे कई तरह के लोग हैं। नीट-यूजी परीक्षा से
प्रभावित या उनकी तरह ही दूसरी प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठने वाले युवा, इनमें थे।
एक भीड़ उन लोगों की भी थी, जो आमतौर पर तमाशा देखते हैं। या
किसी खास पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ता थे। ऐसे लोग भी थे, जिनके इरादे आपराधिक थे।
26 जनवरी 2021 को किसान आंदोलन
के बहाने कुछ लोगों ने लालकिले पर हमला बोल दिया था। क्या सरकार को ऐसा ही कोई
अंदेशा था? ढपली बजाकर ‘आज़ादी’ के गीत गाने वालों की मनोकामना अन्याय,
असमानता, गरीबी और पिछड़ेपन से आज़ादी के है। अच्छी बात है, पर कैसे होगा यह सब?
मुख्यधारा की
राजनीति भी समता-मूलक समाज, न्याय, धर्मनिरपेक्षता और वैज्ञानिक-दृष्टिकोण जैसी
बातों को केवल बाहरी आवरण की तरह इस्तेमाल करते हुए, भाई-भतीजावाद, परिवारवाद,
क्रोनी-पूँजीवाद और संकीर्ण स्वार्थों से ग्रस्त है। युवा-वर्ग कुंठित और भ्रमित है।
शायद कॉक्रोच-राजनीति उसी व्यावहारिक राजनीति का विद्रूप है।
राजनीति का चरित्र
भारतीय राजनीति में लंबे समय तक गरीब तबके से
उठकर ऊपर आए लोगों का भी प्रतिनिधित्व होता था, पर धीरे-धीरे उसपर जन्मना
विशेषाधिकार-प्राप्त लोगों का कब्ज़ा हो गया है। इस दौरान प्रधानमंत्री और उनके
मंत्रियों की चुप्पी से लगने लगा है कि उन्होंने खामोश रहने को अपनी रणनीति बनाया
है। उनका और उनके समर्थकों का आरोप है कि इन आंदोलनकारियों का एजेंडा
राष्ट्र-द्रोह है। इन्हें विदेशी समर्थन प्राप्त है। वे शाहीन बाग की महिलाओं की
तरह हैं। वे खालिस्तान-समर्थक हैं। ये टूलकिट के सहारे काम करते हैं। हो सकता है
कि ऐसा हो, पर जंतर-मंतर पर आए युवा किसी टूलकिट को जेब में रखकर आए नहीं लगते थे।
उन्हें कौन समझाएगा? कुछ महीने पहले नोएडा में काम करने वाले
युवाओं ने आंदोलन चलाया। हो सकता है कि उन्हें भड़काने वालों की कोई भूमिका रही
हो, पर उनकी बातें बनावटी नहीं थीं।
वर्तमान सत्ताधारी राजनीति की रणनीति असहमति
जताने वालों के खिलाफ बदनामी का अभियान चलाने की है। यह नकारात्मक तरीका है। सही
तरीका है कि समस्या का समाधान किया जाए और जो परेशान हैं, उन्हें संतुष्ट किया
जाए। समाधान कमेटियाँ बनाने से भी नहीं मिलेगा। आखिर परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक
क्यों हो जा रहे हैं? परेशान नौजवान कहाँ जाएँ?
देश को तीन क्षेत्रों में रूपांतरकारी काम
चाहिए। शिक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य और
न्याय। लगता है देश तीनों से विमुख हो रहा है। इन तीनों दरवाजों पर साधारण
व्यक्ति को ठोकरें मिलती हैं। क्यों? कॉक्रोच जनता
पार्टी कुछ नहीं है। एक मामूली से सोशल मीडिया संदेश के सहारे वह खड़ी हो गई है,
तो कैसे? वस्तुतः उसके पीछे कोई गहरी योजना नहीं
है, बल्कि आम आदमी की पीड़ा है, जो इतना भ्रमित है कि किसी भी विकल्प के पीछे
भागने को तैयार है।

No comments:
Post a Comment