अशांत बलोचिस्तान में मस्तुंग के पास गुरुवार 16 जुलाई को सुरक्षा काफिले पर हुए हमले में 45 पाकिस्तानी सैनिकों के मारे जाने की खबर है. बलोचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) ने इस हमले की जिम्मेदारी ली है, जो दो सप्ताह से भी कम समय में सुरक्षा-कर्मियों पर तीसरा बड़ा हमला है.
उपरोक्त जानकारी ‘बलोचिस्तान पोस्ट’ ने दी है, हालाँकि पाकिस्तानी सेना ने हमले की पुष्टि की, लेकिन मरने
वालों की संख्या नहीं बताई. बीएलए के प्र
वक्ता जियंद बलोच ने बताया कि मीडिया को
बयान जारी करते समय भी बीएलए के लड़ाकों और पाकिस्तानी सेना के बीच लड़ाई जारी थी,
और हताहतों की संख्या बढ़ सकती है.
आर्थिक-गिरावट और आंतरिक-संघर्षों के कारण पाकिस्तान, गंभीर अस्थिरता का सामना कर रहा है. बलोचिस्तान में विद्रोह और पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) में हो रहे प्रदर्शनों से देश की अखंडता को खतरा पैदा हो गया है. सवाल है कि क्या पाकिस्तान फिर से टूटेगा?
भारत पर
तोहमत
पाकिस्तानी सेना, इन हमलों के पीछे भारत का हाथ
बता रही है, इसलिए यह अंदेशा भी पैदा होता है कि अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए
कहीं वह भारत के साथ संक्षिप्त-युद्ध छेड़ने की कोशिश न करे.
यह स्पष्ट है कि पाकिस्तान के अस्थिर होने या
उसकी अखंडता पर खतरा पैदा होने के किसी भी गणित से भारत को फायदा नहीं होगा. पाकिस्तान
अपनी बोई फसल काट रहा है.
16 दिसम्बर 2014 को जब पेशावर के आर्मी पब्लिक
स्कूल पर आतंकवादी हमले में करीब डेढ़ सौ बच्चों की मौत हुई थी, तब शायद वहाँ के नागरिकों को पहला झटका लगा था. खूनी विचारधारा ने उनके
बच्चों की जान लेनी शुरू कर दी थी.
अस्थिर-पाकिस्तान, पूरे इलाके को अस्थिर करेगा,
पर वहाँ की फौज-केंद्रित सत्ता ज़रूर भारत के लिए नुकसानदेह है. पाकिस्तान के काफी
बुद्धिजीवी, दबाव में या किसी और वजह से फौज की सत्ता को सिर झुकाकर स्वीकार करते
हैं, पर स्वतंत्र पर्यवेक्षक मानते हैं कि निरंकुश तानाशाही इस बर्बादी के पीछे
है.
वस्तुतः इस इलाके में कट्टरता की आँधियों को
रोकने और आर्थिक-सहयोग और प्रगति की राह पर जाने की जरूरत है. वह सेना के बस की
बात नहीं.
दबाव में पाकिस्तान
इस हफ्ते ज़ियारत जिले के मांगी डैम इलाके में
हुए समन्वित हमलों के बाद पाकिस्तानी सेना ने ‘ऑपरेशन शाबान’ शुरू किया है, जिसका परिणाम है खून-खराबा.
बलोच बगावत से जुड़े मीर यार बलोच ने दावा किया है
कि बलोचिस्तान का 85 प्रतिशत हिस्सा पाकिस्तानी सेना के नियंत्रण
से बाहर हो चुका है और विद्रोही-सेना साल के अंत तक पाकिस्तानी सैनिकों को खदेड़
कर बाहर कर देगी.
हाल में जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम फजल के प्रमुख मौलाना फज़लुर रहमान ने कहा कि बलोचिस्तान तो हाथ
से गया. राजनीतिक हल्कों में कहा जा रहा है कि कश्मीर भी हाथ से चला गया, तो हमारे
अस्तित्व का संकट पैदा हो जाएगा.
पीओके में
आंदोलन
देश की सर्वेसर्वा पाकिस्तानी सेना एक तरफ
पश्चिम एशिया की लड़ाई में मध्यस्थ बनकर अपने आप को अमेरिका की नज़रों में ऊँचा
साबित करना चाहती है, वहीं वह देश के भीतर पैदा हो रही टूटन उसे चुनौती दे रही है.
पीओके में
प्रतिबंधित जम्मू कश्मीर जॉइंट अवामी ऐक्शन कमेटी के तत्वावधान में रावलकोट से
मुज़फ़्फ़राबाद तक गत 15 जुलाई को ‘लॉन्ग मार्च’ का ऐलान किया गया था, जिसे कुछ आश्वासन मिलने के
बाद 21 जुलाई तक के लिए स्थगित कर दिया गया है.
पीओके के
आंदोलनकारी अब खुलेआम कह रहे हैं कि पाकिस्तान ने हमारा शोषण किया है. उसका कश्मीर
पर अवैध कब्ज़ा है. गत 8 जून को सेना की गोलीबारी में कम से
कम 11 नागरिकों की मौत के बाद लाखों लोग सरकार के विरोध में सड़क पर उतरे हुए हैं.
पीओके सरकार ने जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (जेएएसी) को प्रतिबंधित संगठन घोषित कर दिया है और संगठन की कोर कमेटी के 31
सदस्यों और अन्य प्रमुख नेताओं को आतंकवाद विरोधी अधिनियम, 2014 की अनुसूची 1 में शामिल किया है.
सरकार कह रही है कि हम बातचीत से हल निकालना
चाहते हैं, पर लोग सवाल कर रहे हैं कि जेएएसी को बैन करने के बाद, सरकार किससे बात
कर रही है, प्रतिबंधित संगठन से?’
आज़ादी-आज़ादी!
आंदोलन की
शुरुआत बिजली बिलों और गेहूँ (आटे) पर सब्सिडी की माँग को लेकर हुई थी, जो अब बढ़कर पाकिस्तान से पूर्ण स्वतंत्रता, पाकिस्तानी सेना के अत्याचारों के विरोध और
मूलभूत नागरिक अधिकारों की 38-सूत्री माँगों में बदल चुकी है.
इसके पहले भी इस इलाके में आंदोलन होते रहे हैं,
पर ‘आज़ादी’ जैसा शब्द पहले सुनाई नहीं पड़ा. इस चार्टर में गेहूँ के आटे की कीमतों को
गिलगित-बल्तिस्तान के बराबर लाने, चीनी, खाद्य तेल (घी) और अन्य आवश्यक वस्तुओं पर सरकारी
सब्सिडी देने और किसानों को रियायती उर्वरक और बीज के रूप में विशेष सहायता प्रदान
करने की माँग है.
जेएएसी ने
पीओके विधानसभा में कश्मीरी शरणार्थियों के लिए 12 सीटों का आरक्षण समाप्त करने की
माँग की है, जिसे स्थानीय लोग इस्लामाबाद के राजनीतिक
हस्तक्षेप के रूप में देखते हैं.
पीओके के उच्चतम न्यायालय ने 7 जून को इस मामले
पर सरकारी संदर्भ पर कहा है, ‘शरणार्थियों की 12 सीटों को समाप्त करने के लिए
आवश्यक संवैधानिक संशोधन पर निर्णय चुनाव के बाद गठित नई कश्मीर विधानसभा ही कर
सकती है.’
पीओके में चुनाव इस महीने 27 जुलाई को हो रहा
है, जिसके बाद नई विधानसभा का गठन होगा.
पाकिस्तान
की ‘शाहरग’!
पाकिस्तान के सत्ताधारियों ने जनता को ‘कश्मीर
बनेगा पाकिस्तान’ का सब्ज़बाग़ दिखा कर फायदा उठाया. वे कहते हैं, कश्मीर हमारी शाहरग (गले की महाधमनी) है, जिसके कट
जाने पर इंसान मर जाता है, पर वे कश्मीर के सपने को पूरा करके दिखा नहीं पाए.
पिछले साल कश्मीर एकजुटता दिवस के अवसर पर रक्षा
बलों के प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर ने कहा, ‘पूरा कश्मीर
एक दिन आज़ाद होगा और पाकिस्तान का हिस्सा होगा.’ पर यह आंदोलन कुछ और कह रहा है.
इस आंदोलन में पाकिस्तान के पंजाब-केंद्रित
सत्ताधारियों के प्रति नाराज़गी दिखाई पड़ रही है.
1955 की बग़ावत
उस दौरान इस इलाके के लोगों ने अपनी एक फौज भी
बना ली थी, जिसे ‘आज़ाद फौज’ कहा गया. उन्होंने अपनी सरकार
भी बना ली थी. फरवरी, 1955 में पुंछ के इस इलाके में
पाकिस्तान के विरुद्ध बगावत हुई थी.
मीरपुर के सुधान या सुधोज़ई-पठानों की ‘आज़ादी’
की वह महत्वाकांक्षा थी. पर वह सफल नहीं हुई और 1956 में सेना की मदद से उसे दबा
दिया गया. इससे इतनी बात जरूर समझ में आती है कि मीरपुरी समुदाय के भीतर
स्वायत्तता की कामना है.
इस इलाके के लोग हालाँकि मुसलमान हैं, पर वे कश्मीर की घाटी के निवासियों से सांस्कृतिक रूप से फर्क हैं. इनकी संस्कृति
पश्तूनों से मिलती है.
गिलगित-बल्तिस्तान को 1947-48 में ही
जम्मू-कश्मीर से अलग करके देखा जाने लगा. फिर 2018 में एक संवैधानिक-संशोधन के बाद
‘पीओके’ को पाकिस्तान के एक सूबे का दर्जा दे दिया गया है.
2005 का भूकंप
2005 में इस क्षेत्र में आए भीषण भूकंप के बाद,
ह्यूमन राइट्स वॉच (एचआरडब्लू) ने 2006 में एक रिपोर्ट तैयार की थी.
उससे संकेत मिलता है कि पाकिस्तानी सेना को इस इलाके में नापसंद किया जाता है.
पाकिस्तानी सेना ने पीओके में जो आतंकवादी इंफ्रास्ट्रक्चर
बनाया है और युवाओं को बंदूक उठाने और
जम्मू-कश्मीर में छद्म युद्ध लड़ने के लिए लुभाया है, उसे भी नापसंद किया जाता है.
विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे संयुक्त अवामी
एक्शन कमेटी (जेएएसी) के नेता सरदार अमन खान ने कहा, ‘यह
पाकिस्तानी सेना है, जिसने कश्मीरियों के हाथों में बंदूकें दीं…आज, वे हमें आतंकवादी बता रहे हैं!’
बलोचिस्तान
पाकिस्तान के नजरिए से ज्यादा खतरनाक खबरें बलोचिस्तान
से आ रही हैं. देश का फौजी नेतृत्व दबाव में है, क्योंकि उसे
एक तरफ विद्रोहियों के हमलों का, और दूसरी तरफ सी-पैक की सुरक्षा
को लेकर चीन के दबाव का और तीसरे देश के भीतर बढ़ते विरोध का सामना करना पड़ रहा
है.
मीर यार बलोच ने 13 जुलाई की शाम की गई अपनी
सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा, बलोचिस्तान ने अपनी आजादी का ऐलान कर दिया है. नए देश
ने अपने राष्ट्रगान के तौर पर ‘मा चुकेन बलोचानी’ को अपनाया
है. अपना राष्ट्रीय झंडा और अपनी मुद्रा बलोची फालुस शुरू की है.
हम अपने सुरक्षा बलों के ज़रिए बलोचिस्तान राज्य
का प्रशासन चला रहे हैं. हमारे पास भले ही लड़ाकू विमान, अटैक
हेलीकॉप्टर, टैंक, मिसाइल या भारी
तोपखाने ना हों लेकिन अपनी ज़मीन पर हमारा नियंत्रण है.
हाल के हफ्तों में, पाकिस्तानी
सेना ने ‘ऑपरेशन शाबान’ शुरू किया है, जिसमें बीएलए और
टीटीपी दोनों को निशाना बनाया गया है. इसमें हवाई हमले और जमीनी अभियान शामिल हैं.
तोहमत भारत पर
पाकिस्तान, अपने आंतरिक-असंतोष के पीछे भारत का
हाथ बताता है. पाकिस्तान के
गृह मंत्रालय ने 2025 में अधिसूचना जारी कर सभी सरकारी एजेंसियों को निर्देश दिया
था कि वे बलोचिस्तान के आतंकवादी समूहों को ‘फितना अल-हिंदुस्तान’ संबोधित करें.
'फितना' एक अरबी शब्द है, जिसका अर्थ 'विद्रोह' या 'अराजकता' होता है. पाकिस्तान सरकार इन संगठनों पर भारत की
खुफिया एजेंसी 'रॉ' के इशारे पर काम करने और बलोचिस्तान में अशांति फैलाने का आरोप लगाती है.
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि
हरीश पर्वतनेनी ने कहा, ‘पाकिस्तान सरकार ने अपनी एजेंसियों
को अपनी सीमाओं के भीतर के समूहों को 'फितना अल-हिंदुस्तान'
कहना शुरू करने का निर्देश दिया है. यह पाकिस्तान की डीप-स्टेट द्वारा
संचालित नफरत की संगठित फैक्ट्री का परिणाम है, जिसका
उद्देश्य अपने नागरिकों को भारत के साथ स्थायी शत्रुता की स्थिति में रखना है.’
पर्वतनेनी ने कहा, ‘नरसंहार
को सैन्य अभियान का नाम देने से अपराधी बरी नहीं हो जाता. नागरिकों की हत्या करना,
उन्हें अपंग करना और अनाथ करना आतंकवाद विरोधी कार्रवाई नहीं है.’
संरा में झटका
उधर पाकिस्तान और चीन को संयुक्त राष्ट्र में झटका लगा है, जब बलोचिस्तान
लिबरेशन आर्मी (बीएलए) और मजीद ब्रिगेड पर प्रतिबंध लगाने के उनके प्रस्ताव को
अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन ने रोक दिया.
सुरक्षा परिषद की 1267 प्रतिबंध समिति में
प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ सका. पाकिस्तान और चीन ने पिछले साल सितंबर में सुरक्षा
परिषद की '1267 अल कायदा प्रतिबंध समिति' के सामने यह साझा अर्जी लगाई थी.
विस्मय की बात है कि अमेरिका ने खुद बीएलए और
मजीद ब्रिगेड को अपनी घरेलू सूची में विदेशी आतंकी संगठन घोषित कर रखा है.
पाकिस्तानी ने चूँकि चीन के साथ मिलकर प्रस्ताव पेश किया था, शायद इसीलिए अमेरिका
ने उसका विरोध किया. इसके दीर्घकालीन निहितार्थ कुछ समय बाद ही समझ में आएँगे.
आतंकवादी कौन?
ऐसा ही आरोप पाकिस्तानी सत्ता-प्रतिष्ठान अपने आलोचकों, विरोधी नेताओं और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के खिलाफ लगाता है. उसने उन्हें
‘फित्ना-अल-हिंदुस्तान’ का नाम दिया है.
हजारों प्रदर्शनकारियों को संबोधित करते हुए, सरदार अमन खान ने कहा कि अस्पतालों, रोटियों, नौकरियों और बुनियादी अधिकारों की माँग करने वाली निहत्थी आबादी को
पाकिस्तानी सेना और इस्लामाबाद शासन ‘आतंकवादी’ बता रहा है.
उन्होंने कहा, बलोचिस्तान के लोगों से पूछिए
कि आतंकवादी कौन हैं. वे सेना की ओर इशारा करेंगे. खैबर पख्तूनख्वा के लोगों से
पूछिए. वे भी यही कहेंगे. सिंध और पंजाब से पूछिए, और ‘पीओके’ के लोग भी खुलकर कह रहे हैं: असली आतंकी वर्दीधारी हैं.

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