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Tuesday, July 7, 2026

भारत-पाक रिश्तों में ‘अमन’ की आशा-निराशा के मोड़


भारत-पाकिस्तान के रिश्तों को लेकर हाल के दो घटनाक्रमों ने ध्यान खींचा है. एक, दोनों देशों के 117 नागरिकों की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शहबाज़ शरीफ के नाम लिखी गई खुली चिट्ठी. दूसरे, दोनों देशों के कुछ लोगों के बीच कोलंबो में हुए संवाद की खबर, जिसे 'ट्रैक-2 वार्ता' बताया जा रहा है. 

इस संवाद को लेकर कई तरह के कयास हैं. वहीं भारत सरकार ने किसी वार्ता में शामिल होने की खबरों का जोरदार खंडन किया है. विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने कहा है कि इस तरह की चर्चा से सरकार का कोई लेना-देना नहीं है.

जिस बैठक को ट्रैक-2 कहा जा रहा है, वस्तुतः वह आईआईएस-एनईएसए ट्रैक 1.5 साउथ एशिया सिक्योरिटी डायलॉग की सालाना बैठक का 10वाँ संस्करण था. इससे पिछली बैठक पिछले साल जुलाई में हुई थी, ऑपरेशन सिंदूर के सिर्फ़ दो महीने बाद.

डिप्लोमैटिक भाषा में ट्रैक-1, ट्रैक-2 और ट्रैक-1.5 के अलग-अलग अर्थ होते हैं. ट्रैक-1 आधिकारिक वार्ता होती है, ट्रैक 1.5 में वरिष्ठ सरकारी अधिकारी और ग़ैर-सरकारी प्रतिभागी दोनों शामिल होते हैं और ट्रैक-2 प्रभावशाली, लेकिन ग़ैर-सरकारी व्यक्तियों के बीच होता है. पर तीनों 'बैकचैनल' डिप्लोमेसी नहीं हैं.

सुधरते-बिगड़ते रिश्ते

उन्नीसवीं सदी के अंत में अटल बिहारी वाजपेयी की लाहौर-यात्रा के बाद से लेकर 2015 तक, कई तरह के उतार-चढ़ाव के बावज़ूद दोनों देशों के लोग एक-दूसरे के यहाँ आते-जाते रहे. सांस्कृतिक और खेल आदान-प्रदान होते रहे. बसें और रेलगाड़ियाँ यात्रियों को ले जाती रहीं. दोनों देशों के दो मीडिया हाउसों द्वारा प्रायोजित अमन की आशा भी चली.

इस किस्म के अनौपचारिक संवाद विचारों को पुष्ट और स्पष्ट करने के अलावा जनमत तैयार भी करते हैं. सिविल सोसाइटी का हस्तक्षेप सरकारी नीतियों का मार्गदर्शन भी करता है.

भू-राजनीति और तार्किक दृष्टि से भी, दोनों देशों के बीच सार्थक बातचीत से व्यापार और सांस्कृतिक संबंधों को फिर से शुरू करने के लिए एक उपयुक्त तंत्र विकसित हो सकता है, जो दक्षिण एशिया में सुख-समृद्धि के दरवाजे खोलेगा. यह बात पहली नज़र में आकर्षक है, पर इसके पेचोख़म कम नहीं हैं.

संवाद की वकालत

कोलंबो वार्ता की खबर के साथ दोनों देशों के 117 व्यक्तियों की अपील ने जोरदार तरीके से ध्यान खींचा. दोनों बातों में सीधा रिश्ता नहीं है, पर एक ही समय में दोनों का सुर्खियों में आना बताता है कि कहीं कुछ चल रहा है.

यह सब ऐसे समय में हुआ, जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शीर्ष नेता मोहन भागवत, दत्तात्रेय होसबळे और सुनील आंबेकर भारत-पाकिस्तान के बीच लोगों के आपसी संवाद की वकालत कर रहे हैं. ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या ये घटनाएँ आपस में जुड़ी हुई हैं.

होसबळे अपने संगठन की ओर से यह कहने वाले पहले नेता हैं कि भारत को पाकिस्तान के लिए अपने दरवाज़े पूरी तरह बंद नहीं करने चाहिए, उन्होंने यह टिप्पणी अमेरिका दौरे के तुरंत बाद की थी. इस दौरे में वे और आरएसएस की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य राम माधव, अमेरिका के एक थिंकटैंक में बोलने के लिए आमंत्रित किए गए थे.

अनेक किंतु-परंतु

बेशक, कोई भी तर्कसंगत मन इस इलाके में शांति और सहयोग की आवश्यकता और करीब 11 साल से रिश्तों को खराब करने वाली विषाक्तता के अंत से सहमत होगा, फिर भी इसके साथ कई तरह के किंतु-परंतु जुड़े हैं.

ज्यादातर बातें इतिहास के अलग-अलग मोड़ों की देन हैं. अब पहल किसकी ओर से होगी. अगस्त, 2019 में जब भारत ने जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी बनाया, तब पाकिस्तान सरकार ने नई दिल्ली से अपने उच्चायुक्त को वापस बुला लिया और दोनों देशों के बीच व्यापारिक-रिश्ते पूरी तरह तोड़ने की घोषणा की.

उसके बाद जब भी राजनयिक-व्यापारिक संबंधों को सुधारने की बात हुई किसी न किसी किस्म का अड़ंगा लग गया. पिछले साल अप्रेल में हुए पहलगाम हत्याकांड के बाद भारत ने दोनों देशों के बीच सिंधु जल संधि को निलंबित कर दिया.

1960 में हुई इस संधि के पीछे भारत की मंशा दोनों देशों के बीच दोस्ताना रिश्तों को कायम करने की ही थी. भारत की मंशा थी कि पाकिस्तान के मन में यह डर नहीं रहे कि कभी पानी बंद भी किया जा सकता है.

यह संधि पाकिस्तान की ज़रूरत थी, भारत की नहीं. भारत ने वह संधि ही नहीं की, बल्कि रिश्तों को सुधारने का वह सबसे बड़ा मोड़ था, भारत की सदाशयता का उदाहरण.

पाकिस्तानी मंशा

अब पाकिस्तान की मंशा पर नज़र डालें. उस संधि के बाद क्या हुआ? 1962 के चीन युद्ध के बाद पाकिस्तान को लगा कि भारत की स्थिति कमज़ोर हो रही है. उसने 1963 में शक्सगम घाटी की 5,189 किमी जमीन चीन को तोहफे में दे दी.

1960 जल संधि की क्या यही भावना थी? उधर चीन ने लद्दाख के अक्साई चिन पर पहले ही कब्ज़ा कर रखा था. इस तरह से पाकिस्तान ने एक तीर से दो शिकार कर लिए.

इतना ही नहीं काफी नहीं था. अगस्त 1965 में पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर में 'ऑपरेशन जिब्राल्टर' नामक खुफिया अभियान चलाया. इसमें हजारों पाकिस्तानी सैनिकों ने कश्मीरी वेशभूषा में घुसपैठ की, जिसका मुख्य उद्देश्य स्थानीय लोगों को भड़का कर भारत के खिलाफ विद्रोह पैदा करना था.

वह अभियान विफल हुआ, और अंततः 1965 के पूर्ण युद्ध का कारण बना. इसके बाद 1999 में करगिल हुआ और 2008 में मुंबई हमला. दिसंबर 2015 में जब दोनों देशों के बीच सचिव स्तर की बातचीत तय हो गई, तो जनवरी 2016 के पहले हफ्ते में ही पठानकोट पर हमला हुआ.

चिट्ठी के पीछे क्या है?

एक भारतीय थिंकटैंक सेंटर फॉर पीस एंड प्रोग्रेस की पहल पर दोनों प्रधानमंत्रियों को लिखी गई चिट्ठी में भारत के 61 और पाकिस्तान के 56 प्रमुख व्यक्तियों के दस्तखत हैं.

इस चिट्ठी में दोनों देशों के उच्चायुक्तों की बहाली, वीज़ा सेवाओं की बहाली और हवाई क्षेत्र को फिर से खोलने के अलावा संवाद और सामान्य द्विपक्षीय संबंधों को बहाल करने का अनुरोध और लंबे समय से चल रही शत्रुता को समाप्त करने का आग्रह किया गया, जो लाखों युवाओं को अवसरों, समृद्धि और एक सुरक्षित भविष्य से वंचित कर रही है.

पत्र में व्यापार और यात्रा के लिए अटारी-वाघा भूमि सीमा को फिर से खोलने, श्रीनगर-मुजफ्फराबाद बस सेवा को फिर से शुरू करने और अन्य सीमा पार संपर्कों को कायम करने की माँग भी की गई है.

विश्वास बढ़ाने के उपायों के रूप में करतारपुर साहिब कॉरिडोर को फिर से खोलने, पाकिस्तान की नीलम घाटी में शारदा पीठ तक पहुँच प्रदान करने और सीमा के दोनों ओर धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत स्थलों की यात्रा को आसान बनाने का भी आग्रह किया गया है.

जम्मू-कश्मीर सहित सभी लंबित मुद्दों पर व्यापक द्विपक्षीय संवाद फिर से शुरू करने, 2004 और 2007 के बीच हुए समझौतों की रूपरेखा की समीक्षा करने, विसैन्यीकरण और तनाव कम करने की दिशा में काम करने और दोनों देशों की वैध सुरक्षा चिंताओं को दूर करने का आह्वान भी किया गया है.

भारत का रुख

यह अपील ऐसे समय में की गई है जब भारत ने बार-बार कहा है कि पाकिस्तान के प्रति उसका दृष्टिकोण अपरिवर्तित है. और आतंकवाद और बातचीत और व्यापार साथ-साथ नहीं चल सकते. द्विपक्षीय संबंधों में सुधार सीमा पार आतंकवाद के अंत पर निर्भर करेगा.

हाल में पाकिस्तानी अखबार डॉन ने अपने संपादकीय में लिखा है, एक समय पाकिस्तानी कट्टरपंथ भारत से रिश्ते सुधरने के खिलाफ था. आज, भारतीय व्यवस्था के कट्टरपंथी तत्व पाकिस्तान के साथ दोस्ती के खिलाफ हैं.

पाकिस्तानी पत्रकार नजम सेठी ने एक टीवी कार्यक्रम में कहा कि चिट्ठी और कोलंबो-वार्ता आपस में जुड़े हैं, और इसके पीछे भारत सरकार की सहमति है. उनके अनुसार चिट्ठी में तमाम बातें हैं, पर सिंधु जलसंधि का ज़िक्र नहीं है, जो इस समय बहुत प्रासंगिक है.

पाकिस्तान के साथ बातचीत नहीं करने की भारतीय नीति अनायास नहीं बनी है, उसका भी इतिहास है. इसे केवल देश की वर्तमान सरकार की नीतियों और नज़रियों का परिणाम नहीं मानना चाहिए. भारत की कश्मीर और पाकिस्तान-नीति में निरंतरता रही है.

भारतीय दृष्टि से दोनों देशों के बीच संबंधों का सामान्यीकरण तभी हो सकता है, जब पाकिस्तान सरकार, कश्मीर-समस्या के हिंसक समाधान की अपनी रणनीति को त्यागे.  

कोलंबो सम्मेलन

उधर गत 27 जून को भारत के एक अंग्रेज़ी अख़बार ने रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें बताया गया कि लंदन स्थित एक थिंकटैंक ने कोलंबो में क्षेत्रीय सुरक्षा सम्मेलन आयोजित किया था, जिसमें भारतीय और पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडलों ने ट्रैक-2 वार्ता में हिस्सा लिया.

इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फ़ॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज़ (आईआईएसएस) के सुरक्षा सम्मेलन में भारत, मालदीव, श्रीलंका, पाकिस्तान और ब्रिटेन समेत कई देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए थे.

अखबार ने अपने सूत्रों के हवाले से लिखा कि भारतीय और पाकिस्तानी प्रतिनिधियों के बीच हिल्टन कोलंबो में डेढ़ दिन तक अलग-अलग दौर की बातचीत हुई थी.

भारत के प्रतिनिधिमंडल में राम माधव शामिल थे, जो 2014 से 2020 तक भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के राष्ट्रीय महासचिव रह चुके हैं और इस समय नई दिल्ली स्थित थिंक टैंक इंडिया फ़ाउंडेशन के अध्यक्ष हैं.

कौन सा ट्रैक?

खबर छपने के बाद राम माधव ने एक्स पर लिखा था, 'यह किसी तरह का ट्रैक-2 संवाद नहीं था. यह आईआईएसएस का सालाना साउथ एशिया डायलॉग था, जिसमें भारत, श्रीलंका, अमेरिका, ब्रिटेन, अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के लोगों ने हिस्सा लिया.

उन्होंने लिखा, अतीत में इस सालाना संवाद में अधिकारी भी शामिल होते रहे हैं. इतने सारे देशों के साथ कोई ट्रैक-2 वार्ता नहीं होती. भारतीय सेना के पूर्व प्रमुख जनरल एमएम नरवणे भी प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा थे. उनके अलावा दोनों देशों के कुछ पूर्व डिप्लोमैट भी थे.

अनौपचारिक-वार्ताएँ किसी न किसी स्तर पर चलती ही रहती हैं. मान सकते हैं कि सम्मेलन के मौके पर दोनों देशों के कुछ प्रतिष्ठित व्यक्तियों के बीच बातचीत हुई, पर इन सब बातों का महत्त्व तभी है, जब उनका कोई सार्थक परिणाम सामने आए.

आवाज़ द वॉयस में प्रकाशित

 

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