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Monday, April 6, 2026

पाँच राज्यों के चुनाव: एनडीए और ‘इंडिया’ दोनों की परीक्षा

यों तो हरेक चुनाव महत्त्वपूर्ण होता है, पर पाँच राज्यों के आगामी विधानसभा चुनाव कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी की भावी राजनीति के लिहाज से बेहद महत्त्वपूर्ण साबित होने वाले हैं। असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल में कांग्रेस की प्रासंगिकता की एक और परीक्षा होंगी, वहीं बंगाल में बीजेपी की संगठन-क्षमता की परीक्षा होगी। क्या वह तृणमूल कांग्रेस के चक्रव्यूह को इस बार भेद पाएगी? पार्टी के सामने तमिलनाडु और केरल के प्रवेशद्वार को पार करने की परीक्षा भी है। 

2024 के लोकसभा चुनावों में विरोधी इंडिया गठबंधन के मन में एक आस जागी थी। उस आस की भी परीक्षा इन चुनावों में होगी। 2024 के बाद छह में से चार राज्यों में बीजेपी के हाथों शिकस्त खाने के बाद, कांग्रेस के नेतृत्व वाले विरोधी दलों के पास नई रणनीति बनाने और नए राजनीतिक मुहावरे गढ़ने का मौका है। कांग्रेस के लिए अब करो या मरो की स्थिति है।

संसद में विपक्षी गठबंधन की तीसरी और चौथी सबसे बड़ी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और डीएमके को अपनी ताकत को साबित करने का मौका भी अब मिलेगा। वहीं ठंडे पड़ते वाममोर्चे को केरल में कुछ अभूतपूर्व कर दिखाने और बंगाल में कम से कम  हाज़िरी लगाने का एक मौका और मिलेगा। बंगाल और केरल में विरोधी गठबंधन के अंतर्विरोध भी दिखाई पड़ेंगे। बंगाल में जहाँ टीएमसी, कांग्रेस और वामपंथी दल अकेले चुनाव लड़ रहे हैं, और केरल में, जहाँ कांग्रेस और वामपंथी दल आमने-सामने हैं।

कांग्रेस

2024 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को 2014 के बाद के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के रूप में 99 सीटें मिली थीं। इससे उम्मीद जागी थी कि कांग्रेस का पुनरुत्थान हो सकता है। उसके बाद से पार्टी एक भी राज्य का चुनाव नहीं जीत पाई है। हरियाणा और दिल्ली में उसे भाजपा के हाथों हार का सामना करना पड़ा और महाराष्ट्र और बिहार में भाजपा नीत गठबंधन के हाथों।

जिन पाँच राज्यों में चुनाव हो रहे हैं, उनमें केरल और असम में कांग्रेस के लिए बहुत कुछ दाँव पर है। दोनों राज्यों में वह लगातार दो बार चुनाव हारी है। केरल में 2021 में, वामपंथी दलों ने राज्य की उस परंपरा को तोड़ दिया, जिसके तहत हर पाँच साल में सत्ताधारी सरकार को सत्ता से बेदखल कर दिया जाता था। लोकसभा चुनावों में जबर्दस्त जीत और केरल में हाल में हुए स्थानीय निकाय चुनावों में अभूतपूर्व विजय ने कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चे में नई उम्मीदें जगाई हैं। कांग्रेस के मन में यह भरोसा पैदा हुआ है कि वह वाम लोकतांत्रिक मोर्चे को लगातार तीसरी बार सत्ता में आने से रोक सकती है। तमिलनाडु में कांग्रेस-डीएमके के साथ गठबंधन जारी है, पर काफी खींचतान के बाद कांग्रेस को 28 सीटें मिली हैं, जो पिछली बार से तीन ज्यादा  हैं।

केरल की तरह असम में भी कांग्रेस लगातार दो चुनाव हार चुकी है। नव नियुक्त राज्य कांग्रेस अध्यक्ष गौरव गोगोई की भी परीक्षा होगी, जो लंबे समय से मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के निशाने पर रहे हैं। कांग्रेस की उम्मीदें इस बात पर टिकी हैं कि पिछली बार पार्टी को लगभग 30 प्रतिशत वोट मिले थे। बंगाल में इस बार कांग्रेस अकेले चुनाव लड़ रही है। बावज़ूद इसके कि 2021 में उसे एक भी सीट नहीं मिली और उसका वोट शेयर मात्र 3 प्रतिशत रह गया।

भारतीय जनता पार्टी

राष्ट्रीय स्तर पर भी भाजपा के लिए ये चुनाव महत्त्वपूर्ण समय में हो रहे हैं। मोदी सरकार मई में अपने तीसरे कार्यकाल के दो साल पूरे कर लेगी। पार्टी नेताओं का मानना ​​है कि सत्ता-विरोधी लहर पर नज़र रखनी होगी। 2024 के लोकसभा चुनाव ने अपराजेय भाजपा को गठबंधन चातुर्य को जबर्दस्त धक्का पहुँचाया था। केंद्र में सरकार ज़रूर बन गई, पर पार्टी के कुछ अंतर्विरोध जरूर सामने आ गए।

पार्टी को सबसे बड़ा झटका उत्तर प्रदेश में झटका लगा था, जहाँ से उसे कम से कम 2014 की 62 की संख्या को छू लेने का अनुमान था, पर ऐसा हुआ नहीं। कुल 80 क्षेत्रों में से उसे केवल 33 में विजय मिली। समाजवादी पार्टी ने राज्य में 37 सीटों पर जीत हासिल करके भाजपा को दूसरे स्थान पर धकेल दिया। उत्तर प्रदेश के अलावा राजस्थान, बिहार, झारखंड और पंजाब में भी उसने सीटें खोईं। कुल मिलाकर पूरे देश में करीब 60 सीटों का उसे जो नुकसान हुआ था, उनमें से 46 सीटें उसने उत्तर भारत में गँवाई।

बंगाल में वह 2019 के स्तर को भी छू नहीं पाई, तब उसे 18 सीटें मिली थीं। इससे दो बातें साफ हुई हैं। एक, उत्तर प्रदेश में उसकी सोशल इंजीनियरी में कोई कमी रह गई थी। दूसरे, बंगाल में उसके पास मजबूत संगठन नहीं है। वह ममता बनर्जी की आक्रामकता का मुकाबला करने में असमर्थ रही है। इन पाँच राज्यों के परिणाम अगले साल उत्तर प्रदेश में होने वाले चुनाव की पृष्ठभूमि तैयार करेंगे, जो दिल्ली का प्रवेशद्वार है।

फिलहाल उसका लक्ष्य असम में अपनी पकड़ बनाए रखना, बंगाल जीतना और दक्षिण में अपना विस्तार करना है। इसे हासिल करने के लिए उसे कांग्रेस के क्रमशः पराभव को और तेज करना होगा। 2024 के बाद बीजेपी के विजय रथ को केवल दो जगह अटकना पड़ा। एक, झारखंड में और दूसरे जम्मू-कश्मीर में। इन दोनों राज्यों के गठबंधनों में कांग्रेस की भूमिका गौण रही।

असम में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा के शासन का रिकॉर्ड, कल्याणकारी योजनाओं, अवसंरचना विकास और मजबूत कानून व्यवस्था की छवि का हवाला देता है। ध्रुवीकरण राज्य में भाजपा की रणनीति का केंद्रीय तत्व है। सरमा अक्सर धार्मिक, जातीय और उप-क्षेत्रीय पहचानों का आह्वान करते हैं। बंगाली मूल के मुसलमानों को लेकर उन्होंने स्थानीय असमिया समुदायों की भावनाओं का दोहन किया है।

पश्चिम बंगाल में भाजपा टीएमसी सरकार के कथित भ्रष्टाचार, सत्ता विरोधी लहर और पूरे बंगाल में हिंदू एकजुटता की संभावना जैसे मुद्दों के इर्द-गिर्द चुनाव को केंद्रित करने की कोशिश कर रही है। यह भी साफ है कि अब लड़ाई दोतरफा है। तृणमूल बनाम भाजपा। दोनों पक्ष पहचान और सांस्कृतिक मुद्दों को उठा रहे हैं। टीएमसी जहाँ खुद को ‘बाहरी लोगों’ के खिलाफ बंगाली क्षेत्रीय गौरव के रक्षक के रूप में पेश कर रही है, वहीं भाजपा व्यापक बंगाली-हिंदू पहचान के सहारे हिंदुत्व को बंगाली सांस्कृतिक प्रतीकों से जोड़ रही है।

असम

असम में 2001 के बाद से लगातार 15 साल तक कांग्रेस सत्ता में रही, पर 2016 के बाद से वह विपक्ष में है। 2016 के चुनाव में किसी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला था, पर 60 सीटें जीतकर भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़े दल के रूप में उभरी। तब से राज्य पर बीजेपी का कब्जा है। अलबत्ता इस बार परिसीमन के बाद पहली बार हो रहे विधानसभा चुनाव में बदले हुए सियासी नक्शे की पहली बड़ी परीक्षा है। कुछ विश्लेषक मानते हैं कि राज्य में 40 से 50 सीटों के समीकरण बदल सकते हैं। असम की जनसंख्या में मुसलमानों की संख्या लगभग 34 प्रतिशत है। यदि मुस्लिम मतदाता कांग्रेस के समर्थन में एकजुट होंगे, तो मुकाबला काफी कड़ा हो सकता है।

2021 में बीजेपी ने कुल 93 सीटों पर चुनाव लड़ा था और 60 सीटों पर जीत दर्ज की थी। उसके नेतृत्व वाले एनडीए ने कुल 126 सीटों में से 75 सीटों पर विजय प्राप्त की थी। 2016 के मुकाबले एनडीए को 2021 में 11 सीटों का घाटा हुआ था। 2016 में 60 सीटों पर जीत हासिल कर राज्य में बीजेपी पहली बार सत्ता में आई थी। कांग्रेस ने पिछले चुनाव में 95 सीटों पर अपने प्रत्याशी खड़े किए थे, पर उसे केवल 29 सीटें ही मिलीं। कांग्रेस के नेतृत्व वाले महाजोट गठबंधन ने अलबत्ता 50 सीटों पर जीत दर्ज की थी।

पिछली बार कांग्रेस के साथ गठबंधन में रहे मौलाना बद्रुद्दीन अजमल की पार्टी ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) ने 20 में से 16 सीटों पर जीत हासिल की थी, पर इस बार कांग्रेस पार्टी ने विधानसभा चुनावों के लिए एआईयूडीएफ के साथ गठबंधन की संभावना को ख़ारिज कर दिया है। भाजपा ने इस बार कुछ पुराने चेहरों पर भरोसा जताने के साथ-साथ नए प्रयोगों और बदले हुए सियासी समीकरणों का सहारा भी लिया है। उसने 89 सीटों पर खुद लड़ने का फैसला किया है, और 37 सीटें सहयोगी दलों को दी हैं। असम गण परिषद को 26 और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट को 11 सीटें मिली हैं। पिछले चुनाव में एजीपी के लिए बीजेपी ने 22 सीटें छोड़ी थीं, जिसमें एजीपी ने केवल 9 सीटों पर ही जीत दर्ज की।

बोडोलैंड टैरिटोरियल रीजन (बीटीआर) में विधानसभा की कुल 15 सीटें हैं जहाँ इस बार बीजेपी ने बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (बीपीएफ़) के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का एलान किया है। पिछली बार उसने यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरल (यूपीपीएल) के साथ मिलकर लड़ा था। पिछले साल सितंबर तक बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद (बीटीसी) का शासन यूपीपीएल के पास था, लेकिन इसी दौरान हुए चुनाव में बीपीएफ़ ने यूपीपीएल को मात देते हुए बीटीसी फिर से अपने हाथों में ले ली है। यहाँ बीटीसी का शासन जिस पार्टी के पास होता है प्रदेश की सरकार में बैठी पार्टी उसी से हाथ मिलाती है।

मुख्यमंत्री सरमा जालुकबारी से ही चुनाव लड़ रहे हैं, जो उनका गढ़ माना जाता है। वे 2001 से इस सीट पर लगातार जीतते आए हैं। दूसरी तरफ, कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष और लोकसभा में डिप्टी लीडर गौरव गोगोई जोरहाट से लड़ रहे हैं। बीजेपी ने यहाँ से वरिष्ठ नेता, पूर्व स्पीकर और मौजूदा विधायक हितेंद्र नाथ गोस्वामी को उतारा है। यह मुकाबला हाई-प्रोफाइल टकरावों में एक होगा। असम की एक और प्रतिष्ठित सीट है दिसपुर, जहाँ से कांग्रेस छोड़कर आए वरिष्ठ नेता प्रद्युत बोरदोलोई को बीजेपी ने टिकट दिया है। बीजेपी ने कई मौजूदा विधायकों को टिकट नहीं दिया है, जो पार्टी की नई रणनीति है। वह एंटी-इनकंबैंसी से बचने और नए चेहरों को मौका देने पर फोकस कर रही है।

कांग्रेस ने इस बार के चुनाव के लिए 'असम सोनमिलितो मोर्चा' बनाया है, जिसमें कांग्रेस के अलावा रायजोर दल, असम जातीय परिषद (एजेपी), सीपीआई (एम), ऑल पार्टी हिल लीडर्स कॉन्फ्रेंस (एपीएचएलसी) और सीपीआई (एमएल) शामिल हैं। कांग्रेस 87 सीटों पर लड़ेगी, रायजोर को 11 सीटें दी गई हैं और दो पर दोस्ताना मुकाबला होगा। एजेपी ने 10 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा की है, जबकि सीपीआई (एम) और एपीएचएलसी दो-दो सीटों पर चुनाव लड़ेंगी।

सरकार की अरुणोदय स्कीम के तहत क़रीब 40 लाख महिलाओं को 3,600 करोड़ रुपए देने की बात बेहद चर्चा में है। असम सरकार ने हाल में यह रकम अरुणोदय-3 योजना के तहत ट्रांसफ़र कर दी, जिसमें प्रत्येक महिला लाभार्थी के बैंक खाते में सीधे 9 हज़ार रुपये डालने की बात कही गई है। चुनाव से ठीक पहले महिला वोटरों को साधने वाला बीजेपी का यह दाँव उसे फायदा पहुँचा सकता है। महिलाओं, छात्रों और चाय बागानों में काम करने वालों के लिए कैश ट्रांसफ़र स्कीम बीजेपी के लिए फ़ायदेमंद साबित हो सकती है, लेकिन कई और बड़े मुद्दे हैं जिनमें बीजेपी को चुनौती मिलेगी।

राज्य के प्रसिद्ध गायक जुबिन गर्ग की मौत का मामला भी बड़ा चुनावी मुद्दा बनता दिखाई पड़ रहा है। विरोधी दल मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा और उनके परिवार पर भ्रष्टाचार के आरोपों को ज़ोर-शोर से उठा रहे हैं। प्रियंका गांधी ने पिछले असम के दौरे पर बीजेपी सरकार के ख़िलाफ़ ‘पीपुल्स चार्जशीट’ नामक एक दस्तावेज़ जारी किया था। इस आरोप पत्रमें भ्रष्टाचार समेत ‘सिंडिकेट राज’ को संस्थागत बनाने और मूल निवासियों की ज़मीन कॉरपोरेट घरानों को देने के आरोप लगाए गए हैं। कांग्रेस जहाँ इन मुद्दों को लेकर मुख्यमंत्री और बीजेपी को घेरने की कोशिश कर रही है, वहीं सीएम सरमा कांग्रेस नेता गौरव गोगोई को सार्वजनिक तौर पर 'पाकिस्तानी एजेंट' बता रहे हैं।

पश्चिम बंगाल

पाँचों राज्यों में पश्चिम बंगाल, भाजपा के लिए सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक लक्ष्य बना हुआ है। वैचारिक और रणनीतिक दृष्टि से, पार्टी बंगाल को एक महत्त्वपूर्ण मोर्चे के रूप में देखती है। राज्य में भाजपा का उदय उल्लेखनीय रहा है। 2011 के विधानसभा चुनावों में, पार्टी को केवल 4% वोट मिले थे और उसे एक भी सीट नहीं मिली थी। अब यह टीएमसी के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी के रूप में उभरी है। यानी कि कांग्रेस और वाममोर्चे को उसने काफी पीछे धकेल दिया है। वाममोर्चा बंगाल में अपनी प्रासंगिकता और अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है, जिस राज्य पर इसने 34 वर्षों तक शासन किया और अब जहाँ इसका कोई सांसद या विधायक नहीं है। इस बार भी वामपंथी दलों ने बंगाल में अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया है, जबकि हाल के वर्षों में कांग्रेस के साथ उनका चुनावी समझौता था।

अब इस राज्य की कहानी भाजपा बनाम तृणमूल है। हाल में एक रैली में गृहमंत्री अमित शाह ने कहा, हालाँकि भाजपा और उसके एनडीए सहयोगी 21 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में सत्ता में हैं, लेकिन यह ‘पर्याप्त नहीं है’। उन्होंने कहा, ‘जब बंगाल में भाजपा की सरकार बनेगी, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी कार्यकर्ताओं के चेहरे पर मुस्कान होगी।’

ममता बनर्जी को मजबूत कल्याणकारी कार्यक्रमों और अल्पसंख्यकों के मजबूत समर्थन आधार का लाभ प्राप्त है। पिछले तीन विधानसभा चुनावों में तृणमूल ने शानदार जीत हासिल की है और एक बार वह फिर भाजपा की मजबूत मशीनरी के सामने खड़ी है। 2019 के लोकसभा चुनावों के बाद से राज्य और उसकी राजनीति में काफी उथल-पुथल मची हुई है, जब भाजपा ने 42 में से 18 सीटें जीतकर 40.64 प्रतिशत वोट शेयर के साथ केंद्रीय सत्ता में वापसी की थी। इसी वजह से 2021 के विधानसभा चुनाव बेहद महत्त्वपूर्ण हो गए थे।

ममता बनर्जी अगर अपनी पार्टी को फिर से जीत दिलाती हैं, तो वह पश्चिम बंगाल की पहली ऐसी मुख्यमंत्री बन सकती हैं, जिन्होंने अपनी पार्टी को लगातार चार विधानसभा चुनाव जीते हैं। 2021 के विधानसभा चुनाव में टीएमसी ने भाजपा को करारी शिकस्त दी और 294 में से 215 सीटें जीतकर 48.02 प्रतिशत मत हासिल किए। भाजपा को सिर्फ 77 सीटें मिलीं, लेकिन उसका मत प्रतिशत 37.97 हो गया। राज्य में वह दूसरे नंबर की पार्टी बन गई। 2024 के लोकसभा चुनावों ने टीएमसी को और भी मजबूत बनाया। उसने 28 सीटों पर जीत हासिल की और भाजपा की सीटों की संख्या 18 से घटकर 12 रह गई।

फिलहाल टीएमसी आत्मविश्वास से भरी नज़र आ रही है। उसे भरोसा है कि सरकार की कल्याणकारी योजनाएँ एक बार फिर कमाल करेंगी। ममता बनर्जी के भीतर छिपी जुझारू प्रवृत्ति ने एसआईआर के खिलाफ आक्रामक अभियान चलाया है। उसकी असली ताकत हैं, राज्य के 30 प्रतिशत से अधिक मुस्लिम मतदाता, जो वाममोर्चे और कांग्रेस के विफल हो जाने के बाद अब पूरी तरह उसके के साथ हैं। वे भाजपा को रोकने की अपनी रणनीति के तहत टीएमसी का पुरजोर समर्थन करेंगे। ममता बनर्जी मानती हैं कि सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के कारण भाजपा विरोधी वोट वामपंथी दलों और कांग्रेस में बँटने के बजाय उनके पक्ष में एकजुट हो जाएँगे।

ममता सरकार को कोलकाता के आरजी कर अस्पताल बलात्कार कांड और शेख शाहजहाँ प्रकरण जैसी विवादों का सामना करना पड़ा है। फिर भी, उसके पक्ष में दो कारक काम कर रहे हैं: भाजपा के बारे में यह धारणा कि वह ‘बंगाली’ पार्टी नहीं है और लक्ष्मी भंडार जैसी कल्याणकारी योजनाओं की लोकप्रियता, जो ग्रामीण महिलाओं को नकद सहायता प्रदान करती है। बेरोज़गार युवाओं के लिए 'बांग्लार युवा साथी' के तहत प्रति माह 1500 रुपए की वित्तीय सहायता देना, राज्य के कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को मिलने वाले महंगाई भत्ते का भुगतान करने का फ़ैसला लेना, पुरोहितों और मुअज्जिनों के मानदेय में बढ़ोतरी करने जैसे कदम तृणमूल के मददगार साबित हो सकते हैं।

तमिलनाडु

2021 में तमिलनाडु की सत्ता में एमके स्टालिन के नेतृत्व में डीएमके की वापसी ने एआईएडीएमके के एक दशक के शासन का अंत किया। इसके पहले राज्य में जे जयललिता और एम करुणानिधि की प्रतिस्पर्धा चलती थी। पूर्व मुख्यमंत्री और अद्रमुक के नेता ओ पन्नीरसेल्वम को हाल में डीएमके अपने साथ लाने में कामयाब रही है। डीएमके ने हाल में घोषित तमिलनाडु सुनिश्चित पेंशन योजना सहित शासन और कल्याण पर ध्यान केंद्रित किया है, वहीं उसका विरोधी खेमा अभी तक अस्थिर  है। अद्रमुक में आंतरिक कलह है। वहीं अभिनेता से राजनेता बने विजय की तमिलगा वेट्री कज़गम (टीवीके) ने हाशिए पर पड़े नेताओं को अपनी ओर आकर्षित करना शुरू कर दिया है। क्या वे राज्य को नया नेतृत्व देने वाले हैं?

अभिनेता विजय के राजनीति में प्रवेश और उनकी पार्टी टीवीके द्वारा डीएमके और भाजपा के खिलाफ चलाए जा रहे ज़ोरदार अभियान ने अनिश्चितता और अनिश्चितता का माहौल पैदा कर दिया है। सवाल है कि विजय किसके वोट बैंक में सेंध लगाएँगे? अगर वे सभी पार्टियों के वोट काटेंगे, तो किसे फायदा होगा और किसे नुकसान? और अगर वे डीएमके विरोधी वोटों को बाँटेंगे, तो क्या त्रिकोणीय चुनावी मुकाबले में एमके स्टालिन को फायदा होगा?

एमके स्टालिन के नेतृत्व में डीएमके ने कांग्रेस, सीपीआई, सीपीआई(एम), एमडीएमके, विदुथलाई चिरुथाइगल काची (वीसीके), आईयूएमएल और अन्य दलों के साथ अपने नौ साल पुराने गठबंधन को बरकरार रखा है। यह गठबंधन मुख्य रूप से भाजपा के वैचारिक विरोध के कारण एक साथ जुड़ा है। इस धर्मनिरपेक्ष प्रगतिशील गठबंधन में अब 20 से अधिक दल शामिल हैं।

2021 में, डीएमके 10 साल बाद तमिलनाडु में सत्ता में वापस लौटी थी। राज्य में अद्रमुक की कमजोर स्थिति को देखते हुए, द्रमुक कुछ समय पहले तक आश्वस्त थी कि 2026 में भी उसकी ही वापसी होगी। उसके नेतृत्व वाले गठबंधन ने पिछले लोकसभा चुनावों में सभी सीटें जीतकर शानदार सफलता हासिल की थी, पर तब से राजनीतिक परिदृश्य में बदलाव आया है। अद्रमुक ने अपने आंतरिक मामलों को काफी हद तक सुलझा लिया है और अंबुमणि रामदास के नेतृत्व वाली पट्टाली मक्काल काची (पीएमके) और टीटीवी दिनाकरन की अम्मा मक्काल मुन्नेत्र कज़गम (एएमएमके) को गठबंधन में शामिल करके अपने आधार का विस्तार कर लिया है।

डीएमके को सत्ता से बेदखल करने के उद्देश्य से, गृहमंत्री अमित शाह अनिच्छुक अद्रमुक को एनडीए में वापस लेकर आए और भरोसा दिलाया कि चुनाव पलानीसामी के नेतृत्व में लड़ा जाएगा। इसके बाद टीटीवी दिनाकरन की अम्मा मक्काल मुन्नेत्र कज़गम (एएमएमके) को गठबंधन में शामिल करने के लिए राजी किया। एनडीए का विस्तार तो हुआ है, लेकिन इसके भीतर अभी विसंगतियाँ हैं। तमिलनाडु में कभी एनडीए की सरकार नहीं बनी, बावजूद इसके, एनडीए ने डीएमके के खिलाफ जमकर मोर्चा खोल रखा है।

सीमान की नाम तमिलार काची (एनटीके) की मजबूत उपस्थिति भी, 234 विधानसभा सीटों के लिए होने वाले इस चतुष्कोणीय मुकाबले को और भी रोमांचक बना रही है। यह पार्टी एक दशक से थोड़े ही समय में चुनाव आयोग द्वारा मान्यता प्राप्त राज्य पार्टी बन गई है। इसने सभी 234 निर्वाचन क्षेत्रों में उम्मीदवार उतारे हैं, जिनमें से आधी महिला उम्मीदवार हैं।

पुदुच्चेरी

केंद्र शासित पुदुच्चेरी में दिल्ली की तरह विधानसभा है। हालाँकि इसके सदस्यों की संख्या मात्र 30 है, फिर भी इस प्रदेश का राजनीतिक महत्व कहीं अधिक है। 2021 में यहाँ एनडीए ने सरकार बनाई थी, जिसमें भाजपा से जुड़े मनोनीत सदस्यों का महत्वपूर्ण योगदान रहा। सामान्यतः यहाँ की राजनीति तमिलनाडु से प्रभावित रहती है, पर भारतीय जनता पार्टी ने यहाँ अपने पैर जमा लिए हैं।

केरलम

राज्य में एलडीएफ (वाममोर्चा) बनाम यूडीएफ (कांग्रेस नीच मोर्चे) के बीच लड़ाई चलती है। आमतौर पर हरेक चुनाव में सरकार बदलती रही है, पर 2021 के चुनाव ने राज्य के राजनीतिक इतिहास को नया रूप दिया, जब माकपा के नेतृत्व वाले वाममोर्चे ने लगातार दूसरी बार सत्ता में वापसी की, जो 1977 के बाद केरल में एक अभूतपूर्व उपलब्धि थी। एलडीएफ ने 140 में से 99 सीटें जीतकर 2016 की तुलना में अपनी स्थिति में सुधार किया, जबकि कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चे (यूडीएफ) की सीटें घटकर 41 रह गईं। भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए ने अपनी एकमात्र सीट गँवा दी, जिससे केरल में उसकी चुनावी पकड़ कमजोर हुई।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) अब वस्तुतः केरल कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) बन चुकी है। बंगाल अब सीपीएम की प्राथमिकताओं में ऊपर नहीं है, केरल है। यह पार्टी अब केरल में अपनी पूरी ताकत लगा रही है। 2024 के लोकसभा चुनाव उसके लिए करारी हार साबित हुए। वामपंथी दल 20 सीटों में से सिर्फ एक ही सीट जीत सके। हाल में हुए स्थानीय निकाय चुनावों ने मोर्चे को एक और झटका दिया है। मुख्यमंत्री पिनरायी विजयन की लोकप्रियता अब कम होती जा रही है, लेकिन पार्टी ने अभी उन्हें वाममोर्चे का नेतृत्व सौंप रखा है। इस बार वामपंथी दल केरल में हारे, तो यह भी अलग तरह का इतिहास होगा। 1977 के बाद यह पहली बार होगा कि देश के किसी राज्य में वामपंथी दल सत्ता में नहीं होंगे।

केरल भाजपा के लिए एक चुनौतीपूर्ण क्षेत्र बना हुआ है, हालांकि पार्टी ने हाल ही में प्रगति के कुछ संकेत दिखाए हैं। 2024 के लोकसभा चुनावों में, अभिनेता सुरेश गोपी ने भाजपा के टिकट पर त्रिशूर सीट जीती, जिसे व्यापक रूप से राज्य की सांस्कृतिक राजधानी माना जाता है। इसके बाद, पार्टी ने तिरुवनंतपुरम नगर निगम चुनावों में भी शानदार प्रदर्शन किया और राज्य की राजधानी में महापौर का पद भी हासिल किया।

भाजपा द्वारा सात ईसाई उम्मीदवारों को मैदान में उतारना, राज्य में ईसाई समुदाय को लुभाने की पार्टी की रणनीति को दर्शाता है, जो पारंपरिक रूप से कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चे (यूडीएफ) के समर्थक रहे हैं। भाजपा ने ईसाई वोटों पर बड़ा दाँव लगाया है। अपनी रणनीति के तहत वह ईसाई समुदाय से जुड़े मुद्दों को उठा रही है, जिसमें मुनंबम भूमि मामले में समुदाय को समर्थन देना भी शामिल है।

 

पाँचों राज्य एक नज़र में

 

राज्य

कुल सीटें

2021 में सीटें और मत प्रतिशत

इस बार के मुख्य दल

असम

126

भाजपा+ 75 (34.51%)

कांग्रेस+ 50 (43.68%)

पूर्वोत्तर लोकतांत्रिक गठबंधन (भाजपा, एजीपी, बीपीएफ़)

असम सोनमिलितो मोर्चा (कांग्रेस, रायजोर, एजेपी, माकपा, एपीएचएलसी, जेएमएम, माकपा-माले)

पश्चिम बंगाल

294

तृणमूल+ 216 (48.46)

भाजपा+ 77 (38)

संयुक्त मोर्चा 01(10)

तृणमूल, भारतीय गोरखा प्रजातांत्रिक मोर्चा

बीजेपी

कांग्रेस

वाममोर्चा

तमिलनाडु

234

द्रमुक+ (कांग्रेस 18) कुल 133 (45.38)

अद्रमुक+(बीजेपी 4)

कुल 75 (39.71)

द्रमुक+ (कांग्रेस शामिल)

अद्रमुक+ (बीजेपी शामिल)

नाम तमिलार काची (एनटीके)

विजय की तमिलगा वेट्री कज़गम (टीवीके)

पुदुच्चेरी

30

एनडीए 16 (53.3)

यूपीए 08 (30)

अन्य 06 (16.7)

एनडीए

यूपीए

केरल

140

वाममोर्चा 99 (45.45)

कांग्रेस+ 41 (39.47)

बीजेपी 0 (11.30)

वाममोर्चा

कांग्रेस+

बीजेपी

 

 

 

 

 

भारत वार्ता में प्रकाशित

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