दूसरे विश्वयुद्ध के बाद बांग्लादेश पहला ऐसा देश था, जो युद्ध के बाद नए देश के रूप में सामने आया था। इस देश के उदय ने भारतीय भूखंड के धार्मिक विभाजन को गलत साबित किया। पूर्वी पाकिस्तान हालांकि मुस्लिम-बहुत इलाका था, पर वह बंगाली था। यह बात शायद आज भी पाकिस्तान के सूत्रधारों को समझ में नहीं आती है। पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना को भी यह बात समझ में नहीं आई थी। उन्होंने 1948 में ढाका विवि में कहा कि किसी को संदेह नहीं रहना चाहिए, पाकिस्तान की राष्ट्रभाषा उर्दू होगी। उन्होंने उर्दू के साथ बांग्ला को भी देश की राष्ट्रभाषा बनाने की माँग करने वालों को इस भाषण से बांग्लादेश की नींव उसी दिन पड़ गई थी। यह सब अब इतिहास के पन्नों में दर्ज है, पर बांग्लादेश के पचास वर्ष पूरे होने पर भारतीय भूखंड के विभाजन की याद फिर से ताजा हो रही है।
दक्षिण एशिया में विभाजन की कड़वाहट अभी तक कायम
है, पर यह एकतरफा और एक-स्तरीय नहीं है। पाकिस्तान का सत्ता-प्रतिष्ठान
भारत-विरोधी है, फिर भी वहाँ जनता के कई तबके ‘भारत
में अपनापन’ भी देखते हैं। बांग्लादेश का सत्ता-प्रतिष्ठान
भारत-मित्र है, पर कट्टरपंथियों का एक तबका ‘भारत-विरोधी’ भी है। भारत में भी एक तबका बांग्लादेश
के नाम पर भड़कता है। उसकी नाराजगी ‘अवैध-प्रवेश’ को लेकर है या उन भारत-विरोधी
गतिविधियों के कारण जिनके पीछे सांप्रदायिक कट्टरपंथी हैं। पर भारतीय राजनीति,
मीडिया और अकादमिक जगत में बांग्लादेश के प्रति आपको कड़वाहट नहीं मिलेगी।
शायद इन्हीं वजहों से पड़ोसी देशों में भारत के सबसे अच्छे रिश्ते बांग्लादेश के
साथ हैं।
पचास साल का अनुभव है कि बांग्लादेश जब उदार होता है, तब भारत के करीब होता है। जब कट्टरपंथी होता है, तब भारत-विरोधी। शेख हसीना के नेतृत्व में अवामी लीग की सरकार के साथ भारत के अच्छे रिश्तों की वजह है 1971 की वह ‘विजय’ जिसे दोनों देश मिलकर मनाते हैं। वही ‘विजय’ कट्टरपंथियों के गले की फाँस है। पिछले 12 वर्षों में अवामी लीग की सरकार ने भारत के पूर्वोत्तर में चल रही देश-विरोधी गतिविधियों पर रोक लगाने में काफी मदद की है। भारत ने भी शेख हसीना के खिलाफ हो रही साजिशों को उजागर करने और उन्हें रोकने में मदद की है।
हमारी सेना के दो ‘ऑपरेशन विजय’ और एक ‘विजय
दिवस’ प्रसिद्ध है। एक 1961 के गोवा अभियान और दूसरे 1999 के करगिल अभियान को
‘ऑपरेशन विजय’ के रूप में याद किया जाता है। 19 दिसम्बर 1961 का ‘ऑपरेशन विजय’
गोवा अभियान के रूप में याद किया जाता है। भारतीय सेना की गौरव-गाथा से जुड़ा एक
ऐसा दिन भी है, जिसे केवल भारत ही नहीं हमारा पड़ोसी
बांग्लादेश भी ‘विजय दिवस’ के रूप में मनाता है। यह 16 दिसम्बर को 1971 के युद्ध
में पाकिस्तान पर भारत की जीत के कारण मनाया जाता है। भारतीय सेना के सामने
पाकिस्तान के 93,000 सैनिकों के आत्मसमर्पण के बाद वह युद्ध समाप्त हुआ और
बांग्लादेश के नाम से एक नए देश का जन्म हुआ।
हालांकि बांग्लादेश का ध्वज 23 मार्च, 1971 को ही फहरा दिया था, पर बंगबंधु
मुजीबुर्रहमान ने स्वतंत्रता की घोषणा 26 मार्च की मध्यरात्रि को की थी।
बांग्लादेश मुक्ति का वह संग्राम करीब नौ महीने तक चला और भारतीय सेना के
हस्तक्षेप के बाद अंततः 16 दिसम्बर, 1971 को
पाकिस्तानी सेना के आत्म समर्पण के साथ उस युद्ध का समापन हुआ। बांग्लादेश की
स्वतंत्रता पर भारत में वैसा ही जश्न मना था जैसा कोई देश अपने स्वतंत्रता दिवस पर
मनाता है। देश के कई राज्यों की विधानसभाओं ने उस मौके पर बांग्लादेश की
स्वतंत्रता के समर्थन में प्रस्ताव पास किए थे।
पाकिस्तानी अहंकार
सन 1962 के बाद भारतीय सेना का तेज विस्तार
हुआ। खासतौर से हिमालयी सीमा की सुरक्षा के लिहाज से। पर असली खतरा पश्चिमी सीमा
पर पाकिस्तान ने पैदा किया। एड़ी से चोटी तक अमेरिका से हासिल किए गए चमकदार पैटन
टैंकों और सैबर जेटों तथा दूसरे हथियारों से लैस पाकिस्तान को लगता था कि चीन से
युद्ध के बाद भारत का मनोबल टूट चुका है। अब हम उसे दबा लेंगे। सन 1965 के
अप्रैल-मई में पहले उसने कच्छ के रन में हमला बोला। फिर अगस्त में कश्मीर में
‘ऑपरेशन जिब्राल्टर’ शुरू किया। इसके बाद सितंबर में अखनूर-जम्मू इलाके में ऑपरेशन
‘ग्रैंड स्लैम’ छेड़ा।
उस युद्ध में भारतीय सेना ने पाकिस्तान को मात
दी, पर पाकिस्तानी इरादे खत्म नहीं हुए थे। 1965 की
लड़ाई के छह साल बाद पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल याह्या खां ने वैधानिक तरीके से
चुनी हुई शेख मुजीबुर्रहमान की अवामी लीग की सरकार नहीं बनने दी। पाकिस्तानी सेना
ने पूर्वी बंगाल की जनता पर जुल्म ढाने शुरू कर दिए। पाकिस्तान में 1970 के दौरान
चुनाव हुए थे, जिसमें पूर्वी पाकिस्तान में अवामी लीग
ने बहुसंख्यक सीटें जीती। इंसाफ का तकाज़ा था कि अवामी लीग को सरकार बनाने का मौका
मिलना चाहिए था, परन्तु याह्या खान इसके लिए तैयार नहीं
हुए।
पूर्वी बंगाल का जनांदोलन
भारत के साथ युद्ध की पृष्ठभूमि 1971 की शुरुआत
से ही बनने लगी थी। सैनिक तानाशाह याह्या ख़ां ने 25 मार्च को पूर्वी पाकिस्तान की
जन भावनाओं को सैनिक ताकत से कुचलने का आदेश दे दिया। अवामी लीग के प्रमुख शेख
मुजीबुर रहमान को गिरफ्तार कर लिया गया। लाखों शरणार्थी भारत में आने लगे। भारत के
प्रयासों के बावजूद शरणार्थियों की वापसी नहीं हो पाई। पाकिस्तानी सेना के
दुर्व्यवहार की खबरें आईं, तब भारत पर दबाव पड़ने लगा कि सैनिक
हस्तक्षेप किया जाए। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी अप्रैल में ही आक्रमण
चाहती थीं, पर सेनाध्यक्ष जनरल मानेकशॉ ने सलाह दी कि
मानसून आने वाला है। हमें इसके बाद कार्रवाई करनी चाहिए।
बरसात में पूर्वी पाकिस्तान में प्रवेश करना
खतरे से खाली नहीं था। पूर्वी बंगाल के मैदानी इलाके में नदियों का जाल है,
जिन्हें पार करने के लिए आवश्यक संसाधनों की जरूरत थी। दूसरी तरफ भारत
के पीछे अंतरराष्ट्रीय समर्थन भी नहीं था। अमेरिका के पाकिस्तान को समर्थन को
देखते हुए भारत ने 9 अगस्त 1971 को सोवियत संघ के रक्षा-समझौता किया। इसके साथ ही पूर्वी
बंगाल में पाकिस्तानी सेना के खिलाफ लड़ने के लिए मुक्ति वाहिनी तैयार हो रही थी,
जिसमें कुछ समय लगा।
पाकिस्तान के हौसले बढ़ते जा रहे थे। शायद उसे
अमेरिका की शह भी थी, क्योंकि इस युद्ध के दौरान अमेरिका ने
अपनी नौसेना के सातवें बेड़े को हिंद महासागर में भेजा था। पाकिस्तानी वायुसेना ने
3 दिसंबर 1971 को भारतीय वायुसेना के 11 स्टेशनों पर एक साथ हवाई हमले किए। इनमें
पठानकोट, श्रीनगर, अमृतसर,
जोधपुर, आगरा आदि शामिल थे। पाकिस्तानी
वायुसेना की योजना थी कि एकसाथ इतना जबर्दस्त हमला किया जाए कि भारतीय वायुसेना
पूरी तरह निष्क्रिय हो जाए। पर भारत ने उसी रोज जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी। भारतीय
वायुसेना ने पाकिस्तानी सीमा के भीतर जाकर हमले बोले। थलसेना ने पश्चिमी और पूर्वी
दोनों मोर्चों पर युद्ध शुरू कर दिया।
ऑपरेशन ट्रायडेंट
4 दिसंबर, 1971
को भारतीय प्रसिद्ध ‘ऑपरेशन ट्रायडेंट’ शुरू किया, जिसने
पाकिस्तानी नौसेना की कमर तोड़ दी। आईएनएस निपट, निर्घट
और वीर ने कुछ अन्य पोतों की मदद से बाण की शक्ल बनाते हुए आक्रमण किया था। उधर
भारतीय सेना ने पूर्वी बंगाल में प्रवेश कर लिया। 14 दिसंबर को भारतीय सेना ने एक
गुप्त संदेश को पकड़ा कि दोपहर ग्यारह बजे ढाका के गवर्नमेंट हाउस में एक
महत्वपूर्ण बैठक होने वाली है, जिसमें पाकिस्तानी प्रशासन बड़े
अधिकारी भाग लेने वाले हैं। भारतीय सेना ने तय किया कि इसी समय उस भवन पर बम गिराए
जाएं। बैठक के दौरान ही मिग 21 विमानों ने भवन पर बम गिराए, जिससे
मुख्य हॉल की छत ध्वस्त हो गई। गवर्नर अब्दुल मुतालेब मलिक ने काँपते हाथों से
अपना इस्तीफ़ा लिखा।
इस हमले से पाकिस्तानी सेना का मनोबल पूरी तरह
टूट गया और जनरल एएके नियाजी ने हथियार डालने का प्रस्ताव भेज दिया। 16 दिसंबर को
दोपहर के करीब 2:30 बजे समर्पण की प्रक्रिया शुरू हुई और लगभग 93,000 पाकिस्तानी
सैनिकों ने आत्मसमर्पण कर दिया। भारतीय सेना की पूर्वी कमान के जनरल ऑफिसर
कमांडिंग-इन-चीफ ले जन जेएस अरोड़ा और बांग्लादेश की सेना ने इतिहास के सबसे बड़े
आत्मसमर्पणों में से एक को स्वीकार किया। स्वतंत्रता के बाद भारतीय सेना ने जितने
भी युद्ध लड़े हैं, उनमें यह विजय अलग से स्वर्णाक्षरों में लिखी जाती है।
एनडीटीवी के इस वीडियो को भी देखें
ढाका की आमसभा में जिन्ना के मुख्य भाषण का पाठ
http://www.columbia.edu/itc/mealac/pritchett/00islamlinks/txt_jinnah_dacca_1948.html
जिन्ना का ढाका विवि का भाषण सुनें यहाँ
https://soundcloud.com/farazc21/muhammad-ali-jinnah-speech-at
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