Monday, March 28, 2022

भारत ने झटका, चीनी ‘दोस्ती’ का हाथ


दो साल की तल्ख़ियों, टकरावों और हिंसक घटनाओं के बाद चीन ने भारत की ओर फिर से दोस्ती का हाथ बढ़ाया है। दोस्ती मतलब फिर से उच्च स्तर पर द्विपक्षीय संवाद का सिलसिला। इसकी पहली झलक 25 मार्च को चीनी विदेशमंत्री वांग यी की अघोषित दिल्ली-यात्रा में देखने को मिली। दिल्ली में उन्हें वैसी गर्मजोशी नहीं मिली, जिसकी उम्मीद लेकर शायद वे आए थे। भारत ने उनसे साफ कहा कि पहले लद्दाख के गतिरोध को दूर करें। इतना ही नहीं वे चाहते थे कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से उनकी मुलाकात हो, जिसे शालीनता से ठुकरा दिया गया। इन दोनों कड़वी बातों से चीन ने क्या निष्कर्ष निकाला, पता नहीं, पर भारत का रुख स्पष्ट हो गया है।

दिल्ली आने के पहले वांग यी पाकिस्तान और अफगानिस्तान भी गए थे। पाकिस्तान में ओआईसी विदेशमंत्रियों के सम्मेलन में उन्होंने कश्मीर को लेकर पाकिस्तानी-दृष्टिकोण की ताईद करके उन्होंने भारत को झटका दिया है। पाकिस्तान ने इस सम्मेलन का इस्तेमाल कश्मीर के सवाल को उठाने के लिए ही किया था। उसमें चीन को शामिल करना भी दूरगामी रणनीति का हिस्सा है। अगस्त 2018 में जब भारत ने जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी किया था, तब से चीन पाकिस्तानी-दृष्टिकोण का खुलकर समर्थन कर रहा है। चीन ने उस मामले को सुरक्षा-परिषद में उठाने की कोशिश भी की थी, जिसमें उसे सफलता नहीं मिली।

कश्मीर का मसला

पाकिस्तान में हुए ओआईसी के सम्मेलन में वांग यी ने कहा, कश्मीर के मुद्दे पर हम कई इस्लामी दोस्तों की आवाज़ सुन रहे हैं, चीन की भी इसे लेकर यही इच्छा है। कश्मीर समेत दूसरे विवादों के समाधान के लिए इस्लामी देशों के प्रयासों का चीन समर्थन जारी रखेगा। उनके इस वक्तव्य की भारत ने भर्त्सना की और कहा कि कश्मीर हमारा आंतरिक मामला है, जिसे लेकर कोई बात कहने का चीन को अधिकार नहीं है।

इमरान ने हर तरह के कार्ड को खेला


पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने रविवार को राजधानी इस्लामाबाद की  रैली में अपने हर कार्ड को खेल लिया। इसमें उन्होंने अपने खिलाफ विदेशी साजिश का हवाला दिया, भुट्टो की मौत के लिए नवाज शरीफ को जिम्मेदार ठहराकर पीपीपी और पीएमएल-एन के बीच मतभेद पैदा करने की कोशिश की, बार-बार दीन का नाम लेकर धर्म का जमकर इस्तेमाल किया और अपने विरोधियों को भ्रष्ट और बेईमान साबित करने की पूरी कोशिश की। आज दिन में संसद में उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव रखा जाएगा, जिसपर विचार के बाद संभव है कि 3 या 4 अप्रेल को इसपर मतदान हो।

उन्होंने कहा, "मैं अपने दिल की बात रखना चाहता हूं और मैं चाहता हूं कि आप ख़ामोशी से मुझे सुने। मैंने आपको अच्छाई का साथ देने के लिए बुलाया है। हमारे पाकिस्तान की बुनियाद इस्लामी कल्याणकारी राज्य की विचारधारा पर पड़ी थी। हमें अपने देश को रियासत-ए-मदीना के आधार पर बनाना है।" उन्होंने  कहा, "मुझसे लोग पूछते हैं कि आप दीन को सियासत के लिए क्यों इस्तेमाल करते हैं, तो मैं अपने दिल की बात कहूंगा कि आज से पच्चीस साल पहले जब मैंने अपनी पार्टी बनाई थी तो मैं सिर्फ़ इसलिए सियासत में आया तो मेरा एक मक़सद था कि मेरा मुल्क जिस नज़रिए के तहत बना था। जब तक हम अपने नज़रिए पर नहीं खड़े होंगे, हम एक राष्ट्र नहीं बन पाएंगे।"

इमरान ने कहा, "ब्रिटेन में फ्री मेडिकल इलाज मिलता है, फ्री शिक्षा मिलती है, बेरोज़गारों को फ़ायदे मिलते हैं और लोगों को फ्री क़ानूनी सलाह भी दी जाती है। हमारे पैगंबर ने रियासत-ए-मदीना में ऐसा ही निज़ाम बनाया था जहां राज्य लोगों का खयाल रखता था।"

सेना पर टिप्पणी

इमरान ने उन्होंने परोक्ष रूप से सेना की भूमिका पर भी टिप्पणी की। वे जबर्दस्त भीड़ को जमा करने में कामयाब हुए, जिससे साबित यह भी होता है कि उन्होंने हार मान ली है और अब आने वाले वक्त की राजनीति का संकेत दे रहे हैं, जो उन्होंने नवाज़ शरीफ के कार्यकाल में अपनाई थी। यानी कि वे अब विरोध में बैठकर आंदोलन का सहारा लेंगे।

इमरान ने अपनी इस रैली का नाम अम्र बिन मारूफ़ रखा है, जिसका मतलब होता है अच्छाई के साथ आओ। इस्लामाबाद के परेड ग्राउंड में अपने समर्थकों की भारी भीड़ को संबोधित करते हुए इमरान ख़ान ने कहा, मेरे ख़िलाफ़ बाहर से साज़िश की जा रही है और मैं  किसी की ग़ुलामी स्वीकार नहीं करूँगा। यह बात वे पिछले दो-तीन हफ्तों से कह रहे हैं। जब यूरोपियन यूनियन के राजदूतों ने यूक्रेन के मामले में समर्थन माँगते हुए पत्र लिखा, तब उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि हम किसी के गुलाम नहीं हैं। अमेरिका को लेकर भी वे यह बात बार-बार कह रहे हैं। उन्होंने कहा, "हमारे देश को हमारे पुराने नेताओं की करतूतों की वजह से धमकियां मिलती रही हैं। हमारे देश में अपने लोगों की मदद से लोगों तब्दील किया जाता रहा।"

इमरान ख़ान ने कहा, "ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो ने जब देश की विदेश नीति को आज़ाद करने की कोशिश की तो फजलुर्रहमान और नवाज़ शरीफ़ की पार्टियों ने अभियान चलाया जिसकी वजह से उन्हें फाँसी दे दी गई। आज उसी भुट्टो के दामाद और उनके नवासे दोनों कुर्सी के लालच में अपने नाना की क़ुर्बानी को भुलाकर उसके क़ातिलों के साथ बैठे हुए हैं।"

इमरान ने कहा, "मेरे ख़िलाफ़ साज़िश बाहर से की जा रही है, बाहर से हमारी विदेश नीति को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है। ये जो आज क़ातिल और मक़तूल इकट्ठा हो गए हैं, इन्हें इकट्ठा करने वालों का भी हमें पता है।"

Sunday, March 27, 2022

हार के कगार पर इमरान खान


पाकिस्तान के राजनीतिक-संग्राम में इमरान खान करीब-करीब हार चुके हैं, पर वे हार मानने को तैयार नहीं हैं। हालांकि 25 मार्च से संसद का सत्र शुरू हो चुका है, पर अविश्वास प्रस्ताव विचारार्थ नहीं रखा जा सका, क्योंकि एक सांसद का निधन हो जाने के कारण शोक में सदन स्थगित हो गया। अब सोमवार को प्रस्ताव रखा जाएगा। उसके बाद कम से कम तीन दिन की बहस के बाद ही मतदान होने की सम्भावना है, पर सम्भव यह है कि आज इस्लामाबाद में होने वाली रैली में वे अपने इस्तीफे की घोषणा कर दें। इसके पहले बुधवार को उन्होंने दावा किया था कि मेरे पास अपने विरोधियों को ‘
हैरत में डालने वाला तुरुप का पत्ता है। 

गत 23 मार्च को पाकिस्तान-दिवस मनाया, जिसमें पहली बार 57 इस्लामिक देशों के विदेशमंत्रियों के अलावा चीन के विदेशमंत्री वांग यी भी शामिल हुए। उनके पास कौन सी जादू कि पुड़िया है, जिससे वे अपने विरोधियों को हैरत में डालेंगे? नम्बर-गेम वे हार चुके हैं। हो सकता है कि इस दौरान सुप्रीम कोर्ट की कोई रूलिंग आ जाए या समय से पहले चुनाव की घोषणा हो जाए, जिसका संकेत गृहमंत्री शेख रशीद ने दिया है। इमरान जीते या हारे, पाकिस्तान अब एक बड़े बदलाव के द्वार पर खड़ा है।   

नेशनल असेंबली के अध्यक्ष असद कैसर ने प्रधानमंत्री इमरान-सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पर विचार करने के लिए 25 मार्च को सदन का सत्र बुलाया है। उधर इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआईसी) के 48वें शिखर सम्मेलन का पाकिस्तान में समापन हुआ है। इसमें भाग लेने के लिए 57 देशों के विदेशमंत्री पाकिस्तान आए हैं। चीन के विदेशमंत्री वांग यी इसमें शामिल हुए हैं, जिन्हें पाकिस्तान ने विशेष अतिथि के रूप में आमंत्रित किया है। इस मौके पर उनकी उपस्थिति भी महत्वपूर्ण है। पाकिस्तान के अलावा वे अफगानिस्तान भी गए। इसके बाद वे भारत भी आए, जिसका आधिकारिक कार्यक्रम पहले से घोषित नहीं किया गया था। 

सांस्कृतिक-शंखनाद से उभरते सवाल


उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के शपथ-ग्रहण के दौरान एक ऐसा दृश्य पैदा हुआ, जैसा अतीत में कभी नहीं हुआ था। शपथ-ग्रहण के पहले भाजपा कार्यकर्ताओं ने प्रदेश के हजारों मंदिरों में हवन-पूजन किया। काशी, मथुरा, अयोध्या और प्रयागराज स्थित मठों-अखाड़ों में रहने वाले साधु-संतों ने मंगलाचरण पाठ किया। चौक-चौराहों पर बैनर-होर्डिंग लगे थे। सवा चार बजे योगी आदित्यनाथ के माइक संभालते ही कई मंदिरों में आरती शुरू हुई, शंख-नाद हुआ, घंटे घड़ियाल बजाए गए। शहरों, कस्बों और गाँवों में भाजपा कार्यकर्ता जय श्रीराम के नारे लगाते हुए डीजे पर डांस कर रहे थे। उल्लास की इस अभिव्यक्ति का क्या अर्थ लगाया जाए? क्या यह हमारी प्राचीन संस्कृति का विजयोत्सव है, राजनीतिक हिन्दुत्व की अभिव्यक्ति है, सोशल इंजीनियरी की नई परिभाषा है या भारतीय जनता पार्टी का घोषणापत्र है?

चुनाव-पूर्व मोर्चाबंदी

इन बातों पर टिप्पणी करने के पहले याद यह भी रखना होगा कि उत्तर प्रदेश के इस चुनाव में खुलकर कहा जा रहा था कि मुस्लिम वोटर बीजेपी के खिलाफ पूरी तरह एकताबद्धहै। वह टैक्टिकल वोटिंग करेगा वगैरह। देश-विदेश के सेक्युलर-पर्यवेक्षक भी कह रहे थे। ऐसे निष्कर्षों की प्रतिक्रिया या बैकलैश को ध्यान में रखे बगैर। प्रदेश के नए मंत्रिमंडल पर नजर डालें, जिसमें विभिन्न जातियों को सावधानी से प्रतिनिधित्व दिया गया है। यह बीजेपी की सामाजिक-इंजीनियरी है। किसी टिप्पणीकार ने माना कि बीजेपी ने मंडल, कमंडल और भूमंडल का जो सांस्कृतिक-सामाजिक-राजनीतिक सूत्र तैयार किया है, उसकी काट आसान नहीं है। सवाल है कि क्या इसे उन तमाम छोटे-छोटे पिछड़े सामाजिक-वर्गों के उभार के रूप में देखें, जो राजनीतिक-हिन्दुत्व के ध्वज के नीचे एक हो रहे हैं?  ऐसे तमाम सवालों पर हमें ठंडे दिमाग से विचार करना चाहिए।   

विभाजन से पहले

इन प्रश्नों का उत्तर खोजने के लिए हमें हजारों साल पीछे जाना पड़ेगा, पर इस आलेख का दायरा उतना व्यापक नहीं है। स्वातंत्र्योत्तर भारत की कुछ परिघटनाओं की छाया इन बातों पर जरूर है। सबसे बड़ा कारक है देश का विभाजन। देश ने उदारवादी बहुल-संस्कृति समाज और सेक्युलरवाद को पूरे विश्वास के साथ स्वीकार किया है। पर इस विचार के अंतर्विरोध बार-बार उभरे हैं। यह बात हमें शाहबानो, राम मंदिर, ट्रिपल तलाक और हिजाब से लेकर कश्मीर-फाइल्स तक बार-बार दिखाई पड़ी है। अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण शुरू होने के बाद तीन तरह की प्रतिक्रियाएं दिखाई और सुनाई पड़ीं हैं। सबसे आगे है मंदिर समर्थकों का विजय-रथ, उसके पीछे है लिबरल-सेक्युलरवादियों की निराश सेना, जिन्हें लगता है कि हार्डकोर-हिन्दुत्व के पहियों के नीचे देश की बहुलवादी, उदार संस्कृति ने दम तोड़ दिया है। इन दोनों के बीच मौन-बहुमत खड़ा है, जो खुद को कट्टरवाद का विरोधी मानता है, पर राम मंदिर को कट्टरता का प्रतीक भी नहीं मानता।

मुसलमानों की भूमिका

भारतीय राष्ट्र-राज्य में मुसलमानों की भूमिका को लेकर विमर्श की क्षीण-धारा भी है, पर उसे ठीक से सामने आने नहीं दिया गया। देश में सामासिक-संस्कृति की धारा भी बहती है। रसखान, रहीम, जायसी, नज़ीर अकबराबादी से लेकर बड़े गुलाम अली खां, नौशाद, राही मासूम रज़ा और एपीजे अब्दुल कलाम जैसे मुसलमानों का हिन्दू समाज आदर करता है। योगी सरकार में केवल एक मुसलमान मंत्री है। ऐसा क्यों? चुनाव में बीजेपी मुसलमानों को तभी खड़ा करेगी, जब वे उसे वोट देंगे। उसने मान लिया है कि हमें मुसलमान वोट नहीं चाहिए। उसे मुसलमान-विरोधी साबित करने के पीछे भी राजनीति है। वोटरों के ध्रुवीकरण की शुरुआत कहाँ से हुई है, इसपर विचार करने की जरूरत है। यह विमर्श एकतरफा नहीं हो सकता। भारतीय समाज में तमाम अंतर्विरोध हैं, टकराहटें हैं, पर विविधताओं को जोड़कर चलने की सामर्थ्य भी है। बीजेपी इस विशेषता को खत्म नहीं कर पाएगी।

एकता की जरूरत

हिन्दू हो या मुसलमान जिन्दगी की जद्दो-जहद में दोनों के सामने खड़े सवाल एक जैसे हैं। उन सवालों के हल हमारी एकता में निहित हैं, टकरावों में नहीं। राम मंदिर मामले में अदालत ने अपने निर्णय में एक जगह कहा है कि भारतीय संविधान धर्मों के बीच भेदभाव नहीं करता। अब नागरिक के रूप में हमारा कर्तव्य बनता है कि हम इस बात को पुख्ता करें। मंदिर निर्माण भारत के राष्ट्र निर्माण का एक पड़ाव है। बड़ा सवाल है कि भारत की उदार और समन्वयवादी संस्कृति का क्या हुआ? कांग्रेसी नीतियों की आलोचना करते हुए राम मनोहर लोहिया ने लिखा है, आजादी के इन वर्षों में मुसलमानों को हिन्दुओं के निकट लाने का कोई प्रयत्न नहीं किया गया। अंततः राजनीति वही सफल मानी जाएगी, जो इन्हें तोड़े नहीं, जोड़े। वोट की राजनीति प्रकारांतर से समाज को तोड़ने का काम करती है। उसकी इस दुष्प्रवृत्ति पर विचार करने की जरूरत भी है।

Wednesday, March 23, 2022

संकट में इमरान, पाक-राजनीति में घमासान

कार्टून फ्राइडे टाइम्स से साभार
पाकिस्तान में इमरान सरकार के सामने परेशानियों के पहाड़ खड़े हो गए हैं। उनके खिलाफ संसद में अविश्वास-प्रस्ताव रखा गया है। उनके विरोधी एकजुट होकर उन्हें हर कीमत पर अपदस्थ करना चाहते हैं। शायद सेना भी ने भी उनकी पीठ पर से हाथ हटा लिया है। पूरे आसार हैं कि संसद में रखे गए अविश्वास प्रस्ताव में वे हार जाएंगे। इमरान सरकार को अभी तीन साल आठ महीने हुए हैं। लगता है कि पाँच साल का पूरा कार्यकाल इसके नसीब में भी नहीं है। विडंबना है कि पाकिस्तान में किसी भी चुने हुए प्रधानमंत्री ने अपना कार्यकाल पूरा नहीं किया है।  

इमरान खान की हार या जीत से ज्यादा महत्वपूर्ण है, पाकिस्तानी व्यवस्था का भविष्य। यह केवल वहाँ की आंतरिक राजनीति का मसला नहीं है, बल्कि विदेश-नीति में भी बड़े बदलावों का संकेत मिल रहा है। इमरान जीते या हारे, कुछ बड़े बदलाव जरूर होंगे। बदलते वैश्विक-परिदृश्य में यह बदलाव बेहद महत्वपूर्ण साबित होगा। 

अविश्वास-प्रस्ताव

बताया जा रहा है कि 28 मार्च को अविश्वास-प्रस्ताव पर मतदान हो सकता है। इमरान खान की पार्टी तहरीके इंसाफ ने उसके एक दिन पहले 27 मार्च को इस्लामाबाद में विशाल रैली निकालने का एलान किया है। उसी रोज विरोधी ‘पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट’ की विशाल रैली भी इस्लामाबाद में प्रवेश करेगी। क्या दोनों रैलियों में आमने-सामने की भिड़ंत होगी? देश में विस्फोटक स्थिति बन रही है।

पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नून और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के करीब 100 सांसदों ने 8 मार्च को नेशनल असेंबली सचिवालय को अविश्वास प्रस्ताव दिया था। सांविधानिक व्यवस्था के तहत यह सत्र 22 मार्च या उससे पहले शुरू हो जाना चाहिए था, पर 22 मार्च से संसद भवन में इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआईसी) का 48वाँ शिखर सम्मेलन शुरू हुआ है, इस वजह से अविश्वास-प्रस्ताव पर विचार पीछे खिसका दिया गया है।