Thursday, May 9, 2019

कैसे रुकेगा,‘तू चोर, तू चोर!’


राजनीतिक बयानबाज़ी मर्यादा रेखाओं को पार कर रही है। राफेल विमान के सौदे से जुड़े एक आदेश के संदर्भ में राहुल गांधी को अपने बयान ‘चौकीदार चोर है’ पर सुप्रीम कोर्ट से बिना किसी शर्त के माफी माँगनी पड़ी है। इस आशय का हलफनामा दाखिल करते हुए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से प्रार्थना की है कि अब अवमानना के इस मामले को बंद कर देना चाहिए। अदालत राफेल मामले पर अपने 14 दिसम्बर, 2019 के आदेश पर पुनर्विचार की अर्जी पर भी विचार कर रही है। अब 10 मई को पता लगेगा कि अदालत का रुख क्या है। अपने माफीनामे में राहुल ने कहा है कि अदालत का अपमान करने की उनकी कोई मंशा नहीं थी। भूल से यह गलती हो गई।

इस चुनाव में कांग्रेस ने ‘चौकीदार चोर है’ को अपना प्रमुख राजनीतिक नारा बनाया है। यह नारा राफेल सौदे से जोड़कर कांग्रेस ने दिया है। अब बीजेपी ने इसपर पलटवार करते हुए ‘खानदान चोर है’ का नारा दिया है। चुनाव के अब केवल दो दौर शेष हैं। इधर झारखंड की एक रैली में मोदी ने राहुल गांधी को संबोधित करते हुए कहा, 'आपके पिताजी को आपके राज-दरबारियों ने मिस्टर क्लीन बना दिया था, लेकिन देखते ही देखते भ्रष्टाचारी नंबर वन के रूप में उनका जीवन-काल समाप्त हो गया।' कांग्रेस के नारे 'चौकीदार चोर है' के जवाब में यह सीधी चोट है।

सुप्रीम कोर्ट में राहुल गांधी की माफी का मतलब यह नहीं है कि कांग्रेस पार्टी 'चौकीदार चोर है' के नारे से हट गई है। राहुल के वकील अभिषेक सिंघवी का कहना है कि यह पार्टी का राजनीतिक नारा है। और पार्टी उसपर कायम है। यह बात उन्होंने हलफनामे में भी कही है। पर अब बीजेपी ने जब राजीव गांधी को भी घेरे में ले लिया है, तब सवाल उठाए जा रहे हैं कि क्या दिवंगत व्यक्ति को लेकर इस प्रकार की राजनीति उचित है? बीजेपी का कहना है कि हम केवल वास्तविक स्थिति को बयान कर रहे हैं, इसमें गलत क्या है?

Monday, May 6, 2019

मिट्टी के लड्डू और पत्थर के रसगुल्ले यानी मोदी और उनके विरोधियों के रिश्ते


पिछले पाँच साल में ही नहीं, सन 2002 के बाद की उनकी सक्रिय राजनीति के 17 वर्षों में नरेन्द्र मोदी और उनके प्रतिस्पर्धियों के रिश्ते हमेशा कटुतापूर्ण रहे हैं। राजनीति में रिश्तों के दो धरातल होते हैं। एक प्रकट राजनीति में और दूसरा आपसी कार्य-व्यवहार में। प्रकट राजनीति में तो उनके रिश्तों की कड़वाहट जग-जाहिर है। यह बात ज्यादातर राजनेताओं पर, खासतौर से ताकतवर नेताओं पर लागू होती है। नेहरू, इंदिरा, राजीव, नरसिंह राव, अटल बिहारी और मनमोहन सिंह सबसे नाराज लोग भी थे। फिर भी उस दौर का कार्य-व्यवहार इतना कड़वा नहीं था। मोदी और उनके प्रतिस्पर्धियों के असामान्य रूप से कड़वे हैं। मोदी भी अपने प्रतिस्पर्धियों को किसी भी हद तक जाकर परास्त करने में यकीन करते हैं। यह भी सच है कि सन 2007 के बाद उनपर जिस स्तर के राजनीतिक हमले हुए हैं, वैसे शायद ही किसी दूसरे राजनेता पर हुए होंगे। शायद इन हमलों ने उन्हें इतना कड़वा बना दिया है।  
विवेचन का विषय हो सकता है कि मोदी का व्यक्तित्व ऐसा क्यों है?   और उनके विरोधी उनसे इस हद तक नाराज क्यों हैं? उनकी वैचारिक कट्टरता का क्या इसमें हाथ है या अस्तित्व-रक्षा की मजबूरी? यह बात उनके अपने दल के भीतर बैठे प्रतिस्पर्धियों पर भी लागू होती है। राजनेताओं के अपने ही दल में प्रतिस्पर्धी होते हैं, पर जिस स्तर पर मोदी ने अपने दुश्मन बनाए हैं, वह भी बेमिसाल है।

Sunday, May 5, 2019

इस हिंसक 'माओवाद' का जवाब है लोकतंत्र

गढ़चिरौली में महाराष्ट्र पुलिस के सी-60 कमांडो दस्ते की क्विक रेस्पांस टीम (क्यूआरटी) के 16 सदस्यों की 1 मई को हुई मौत के बाद दो तरह के सवाल मन में आते हैं। पहला रणनीतिक चूक के बाबत है। हम बार-बार एक तरह की गलती क्यों कर रहे हैं? दूसरा सवाल हिंसक माओवादी राजनीति को लेकर है। आतंकियों ने पहले सड़क निर्माण में लगे ठेकेदार के तीन दर्जन वाहनों में आग लगाई। इसकी सूचना मिलने पर क्यूआरटी दस्ता एक प्राइवेट बस से घटनास्थल की ओर रवाना हुआ, तो रास्ते में आईईडी लगाकर बस को उड़ा दिया। इस तरह से उन्होंने कमांडो दस्ते को अपने जाल में फँसाया।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार पिछले एक महीने में गढ़चिरौली में हो रही गतिविधियों के बारे में 13 अलर्ट जारी हुए थे। पिछले साल 22 अप्रैल को इसी इलाके में पुलिस के कमांडो दस्ते में 40 आतंकियों को ठिकाने लगाया था। आतंकी इस साल बदले की कार्रवाई कर रहे थे और इस बात की जानकारी राज्य पुलिस को थी। सामान्यतः कमांडो दस्ते को एक ही वाहन में नहीं भेजा जाता। वे ज्यादातर पैदल मार्च करते हुए जाते हैं, ताकि उनपर घात लगाकर हमला न हो सके। इस बार वे प्राइवेट बस में जा रहे थे, जिसकी जानकारी केवल पुलिस को थी। सम्भव है कि स्थानीय लोगों ने इसे देखा हो और आतंकियों को जानकारी दी हो। जो भी है, यह स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर की अनदेखी है, जिसका भारी खामियाजा देना पड़ा।

Saturday, May 4, 2019

चुनाव के सफल संचालन से माओवाद हारेगा

लोकसभा चुनाव के दौरान माओवादी हिंसा के राजनीतिक निहितार्थ हैं. बिहार, उड़ीसा, बंगाल, आंध्र, छत्तीसगढ़, आंध्र, तेलंगाना और महाराष्ट्र के कई इलाके उस लाल गलियारे में पड़ते हैं, जहाँ माओवादी प्रभाव है. माओवादी इस लोकतांत्रिक गतिविधि को विफल करना चाहते हैं. बावजूद छिटपुट हिंसा के उत्साहजनक खबरें भी मिल रहीं हैं. जनता आगे बढ़कर माओवादियों को चुनौती दे रही है. इस बीच माओवादियों ने कई जगह हमले किए हैं. सबसे बड़ा हमला गढ़चिरौली में हुआ है, जहाँ 15 कमांडो और एक ड्राइवर के शहीद होने की खबर है.

चुनाव शुरू होने के पहले ही माओवादियों ने बहिष्कार की घोषणा कर दी थी और कहा था कि जो भी मतदान के लिए जाएगा, उसे गंभीर परिणाम भुगतने होंगे. इस धमकी के बावजूद झारखंड, उड़ीसा, महाराष्ट्र, आंध्र और तेलंगाना में मतदाताओं ने बहिष्कार के फरमान को नकारा. छत्तीसगढ़ में निर्वाचन आयोग ने सुरक्षा की दृष्टि से अचानक 132 मतदान केंद्रों के स्थान बदल दिए. फिर भी सैकड़ों मतदाताओं ने जुलूस के रूप में 30 किलोमीटर पैदल चलकर मतदान किया. इससे जाहिर होता है कि मतदाताओं के मन में कितना उत्साह है. यह हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था की जीत है. माओवादियों ने गांवों में ही मतदाताओं को रोकने की कोशिशें कीं, जो बेअसर हो गईं.

गढ़चिरौली में माओवादियों की हिंसक कार्रवाई के बाद नक्सलवाद शब्द एकबार फिर से खबरों में है. नक्सलवाद और माओवाद को प्रायः हम एक मान लेते हैं. ऐसा नहीं है. माओवाद अपेक्षाकृत नया आंदोलन है. नक्सलवाद चीन की कम्युनिस्ट क्रांति से प्रेरित-प्रभावित आंदोलन था. उसकी रणनीति के केन्द्र में भी ग्रामीण इलाकों की बगावत थी. शहरों को गाँवों से घेरने की रणनीति. वह रणनीति विफल हुई.

Thursday, May 2, 2019

ताकत यानी पावर का नाम है राजनीति!

समय के साथ राजनीति में आ रहे बदलावों पर क्या आपने ध्यान दिया है? कुछ साल पहले सायास और अनायास मुझे कुछ ऐसे लोगों से मिलने का मौका लगा, जो ऊँचे खानदानों से वास्ता रखते हैं और राजनीति में आना चाहते हैं। उन्होंने जो रास्ता चुना, वह जनता के बीच जाने का नहीं है। उनका रास्ता पार्टी-प्रवक्ता के रूप में उभरने का है। उन्हें मेरी मदद की दो तरह से दरकार थी। एक, राजनीतिक-सामाजिक मसलों की पृष्ठभूमि को समझना और दूसरे मुहावरेदार हिन्दी बोलने-बरतने में मदद करना। सिनेमा के बाद शायद टीवी दूसरा ऐसा मुकाम है, जहाँ हिन्दी की बदौलत सफलता का दरवाजा खुलता है।

पिछले एक दशक में राजनीतिक दलों के प्रवक्ता बनने का काम बड़े कारोबार के रूप में विकसित हुआ है। पार्टियों के भीतर इस काम के लिए कतारें हैं। मेरे विस्मय की बात सिर्फ इतनी थी कि मेरा जिनसे भी सम्पर्क हुआ, उन्हें अपने रसूख पर पूरा यकीन था कि वे प्रवक्ता बन जाएंगे, बस उन्हें होमवर्क करना था। वे बने भी। इससे आप राजनीतिक दलों की संरचना का अनुमान लगा सकते हैं। सम्बित महापात्रा का उदाहरण आपके सामने है। कुछ साल पहले तक आपने इनका नाम भी नहीं सुना था।