Wednesday, June 30, 2010

कौन बनेगा चैम्पियन?






अंतिम 8 में चार टीमें दक्षिण अमेरिका की 3 युरोप की और 1 अफ्रीका की। 1930 के बाद पहली बार दक्षिण अमेरिका की चार टीमें क्वार्टर फाइनल में हैं। क्या आप सेमी फाइनल की स्थिति का अनुमान लगा सकते हैं। ठीक समझें तो आखिरी चार के अनुमान लगाएं। टिप्पणी लिखकर यह काम किया जा सकता है। आप चाहें तो फाइनल और चैम्पियन का अनुमान भी लगा सकते हैं। 


Round of 16Quarter-finalsSemi-finalsFinal
              
26 June – Port Elizabeth      
  Uruguay 2
2 July – Johannesburg
  Korea Republic 1 
  Uruguay 
26 June – Rustenburg
   Ghana  
  United States 1
6 July – Cape Town
  Ghana 2 
  Winners of Match 58 
28 June – Durban
   Winners of Match 57  
  Netherlands 2
2 July – Port Elizabeth
  Slovakia 1 
  Netherlands 
28 June – Johannesburg
   Brazil  
  Brazil 3
11 July – Johannesburg
  Chile 0 
  Winners of Match 61 
27 June – Johannesburg
   Winners of Match 62 
  Argentina 3
3 July – Cape Town
  Mexico 1 
  Argentina 
27 June – Bloemfontein
   Germany  
  Germany 4
7 July – Durban
  England 1 
  Winners of Match 59 
29 June – Pretoria
   Winners of Match 60  Third place
  Paraguay (pen.) 0 (5)
3 July – Johannesburg10 July – Port Elizabeth
  Japan 0 (3) 
  Paraguay   Losers of Match 61 
29 June – Cape Town
   Spain    Losers of Match 62 
  Spain 1
  Portugal 0 








सायना नेहवाल के बहाने


सायना नेहवाल को आजतक की सर्वश्रेष्ठ भारतीय महिला खिलाड़ी माना जा सकता है। उम्मीद है कि वह दुनिया की नम्बर एक बैडमिंटन खिलाड़ी बन जाएगी। इसका श्रेय उसके कोचों, खासकर पी गोपीचंद को भी जाता है, जिन्होंने उसे इस लायक बनाया। गोपीचन्द ने कुछ साल पहले कह दिया था कि सायना के अन्दर चैम्पियन बनने वाली बात है।

सायना मानती है कि हमारा लेवल अभी काफी नीचा है। चीन, जापान और कोरिया में लड़किया, लड़कों से कम नहीं होतीं। शारीरिक दम-खम में भी। उस लेवल तक जाने के लिए हमें काफी कोशिश करनी होगी। खेल की टेक्नीक एक बात है और दम-खम दूसरी बात। दम-खम का खान-पान , संस्कृति और रहन-सहन से भी रिश्ता है। इसके बाद किलाड़ी की साधना भी माने रखती है।

सायना नेहवाल ने सफलता हासिल की तो हम शायद उसे कुछ समय के लिए महत्व दें, पर हम खेलों को बढ़ाना नहीं जानते। क्रिकेट को नहीं हम उसके कारोबार को बढ़ावा दे रहे हैं। खेल सामाजिक विकास के औजार हैं। सायना के बहाने हमें इसके इस पहलू पर भी ध्यान देना चाहिए।

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Tuesday, June 29, 2010

कहाँ है मॉनसून?


इस साल मॉनसून ठीक रहने की उम्मीद है, पर उसकी शुरुआत अच्छी नहीं है। खासकर उत्तर भारत की उम्मीदों को उसने तोड़ा है। मौसम विभाग के इस नक्शे से आप अंदाज़ लगा सकते हैं कि कहाँ-कहाँ मॉनसून पीछे है।   

बंगाल की खाड़ी में एक बार कम दबाव क्षेत्र बन जाए तो मॉनसून उत्तर पश्चिम की ओर बढ़ जाएगा। यों इस साल सितम्बर में अच्छी बारिश के आसार हैं क्योंकि अल नीनो की जगह ला-नीना बन रहा है। प्रशांत महासागर के ऊपर ठंडक आने से उधर चला जाने वाला पानी अब हमारी तरफ आएगा। 

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Monday, June 28, 2010

जोरदार और जानदार जर्नलिज्म !!


मार्क ट्वेन ने अपने शुरुआती वर्षों में अखबारों में भी काम किया। उनकी पुस्तक रफिंग इटसे एक छोटा सा अंश आप पढ़ें :

13 साल की उम्र से ही मुझे कई तरह के रोज़ी-रोज़गारों में हाथ लगाना पड़ा। पर मेरे काम से कोई खुश नज़र नहीं आया। एक दिन के लिए परचूनी की दुकान पर क्लर्क का काम मिला, पर उस दौरान उसकी दुकान की इतनी चीनी मैने फाँक ली कि मालिक ने मुझे चलता किया। एक हफ्ता कानून की पढाई की, पर वह काम इतना लिखाऊ(प्रोज़ी) और थकाऊ था कि अपुन से नहीं बना। फिर लोहार का काम सीखा। वहाँ धौंकनी नहीं सम्हली और उस्ताद ने बाहर कर दिया। कुछ समय के लिए किताब की दुकान में मुंशी बना। वहाँ कस्टमर इतना परेशान करते थे कि आराम से कोई किताब पढ़ ही नहीं पाता था। एक ड्रग स्टोर में काम किया, वहाँ मेरे नुस्खे अभागे साबित हुए।
अपने अच्छे दिनों में मैं वर्जीनिया डेली टेरीटोरियल एंटरप्राइज़ को लैटर्स लिखता था। जब वे छपते तब मुझे बड़ा विस्मय होता। सम्पादकों के बारे में मेरी अच्छी राय भी बिगड़ने लगी। छापने के लिए उनके पास और कुछ नहीं था क्या। तभी मुझे एक रोज़ चिट्ठी मिली कि वर्जीनिया चले आइए और एंटरप्राइज़ के सिटी एडीटर बन जाइए। सो अपुन वर्जीनिया पहुँच गए, नया काम करने।
अखबार के प्रधान सम्पादक और प्रोपराइटर एम गुडमैन से मैने कहा, मुझे क्या काम करना है और कैसे करना है कुछ बताएं। उन्होंने कहा, शहर में जाओ। तमाम तरह के लोगों से मिलो। उनसे हर तरह के सवाल करो। जो जानकारी मिले उसे नोट करते रहो। दफ्तर आकर उसे लिख दो। उन्होंने फिर कहाः
यह कभी मत लिखना कि ज्ञात हुआ है या जानकारी मिली है या कहा जाता है। सीधे मुकाम तक जाओ, पक्की जानकारी लाओ और लिखो ऐसा-ऐसा है। वर्ना लोग तुम्हारी खबर पर विश्वास नहीं करेंगे। पक्की बात से ही किसी अखबार को इज्जत मिलती है।

मैं अपने पहले दिन को कभी नहीं भूलूँगा। मैने हरेक से सवाल पूछे। पूछ-पूछकर बोर कर दिया। मुझे अपने सम्पादक के वचन याद थे, बात पक्की हो। पर यहाँ तो किसी को कुछ पता नहीं था। पाँच घंटे खपाने के बाद भी मेरी नोटबुक खाली थी। मैने मिस्टर गुडमैन को सारी बात बताई। वह बोलेः
तुमसे पहले डैन उन दिनों भी जब आगज़नी नहीं होती, या मुकदमों की सुनवाई नहीं होती थी सिर्फ भूसा गाड़ियों की खबरें निकाल लाता था। क्या ट्रकी से कोई भूसा गाड़ी तक नहीं आ रही? आ रही है तो तुम भूसा बाज़ार की एक्टिविटीज़ पर खबर बना सकते हो। यह टॉपिक मज़ेदार नहीं, पर बिजनेस न्यूज़ तो है।
मैंने शहर का मुआयना फिर किया। किसी ने किसी की हत्या कर दी। मैने हत्यारे का शुक्रिया अदा किया। मज़ा आ गया। फिर देखा गाँव की ओर से एक भूसागाड़ी घिसटती चली आ रही है। मैने उसे 16 से गुणा किया। फिर 16 दिशाओं से उसे शहर में प्रवेश दिलाया। इससे 16 अलग-अलग आइटम बनाए। वर्जीनिया में भूसे के कारोबार का कुछ ऐसा नजारा पेश किया जैसा इतिहास में कभी नहीं हुआ।
इसके बाद मैने कुछ वैगन देखे जो बागी इंडियन इलाकों की तरफ से आ रहे थे। उन्हें कुछ परेशानियों का सामना करना पड़ा। मुझे परिस्थितियों ने जितनी अनुमति दी उतनी बढ़िया रपट बना दी। पर दूसरे अखबारों के रिपोर्टर भी थे। मैं चाहता था कि मेरी रपट में कुछ और बातें हों, जो उनकी रपटों से अलग नज़र आती। एक वैगन कैलीफोर्निया की ओर जाता नज़र आया। उसके मालिक से पता करके यह पक्का किया कि अगले रोज यह इस शहर में नहीं होगा। इसके बाद उसमें बैठे यात्रियों के नाम लिखे। अपनी रपट में मैने उस वैगन को इंडियनों की ऐसी हिंसा का शिकार बनाया जैसी इतिहास में कभी हुई न थी। लोगों के नाम की लिस्ट मेरे पास थी। मेरी खबर में वे हताहत थे।
मेरे दो कॉलम पूरे हो गए। उन्हें जब मैने पढ़ा तो मुझे लगा कि वह धंधा मुझे मिल गया, जिसकी तलाश थी। खबरें और जोशीली खबरें ही किसी अखबार की सबसे बड़ी ज़रूरत हैं। और मुझमें ऐसी खबरें लिखने की क्षमता है। इस इलाके के सारे लोगों को अपने पेन से मार सकता हूँ, अगर्चे ज़रूरत पड़ी और अखबार ने माँग की।…..’’

मार्क ट्वेन ने यह किताब 1870-71 में लिखी थी। इसमें पत्रकारिता से जुड़े कुछ प्रसंग हैं, जिनमें आज के संदर्भ खोजे जा सकते हैं। उनका स्मित व्यंग्य 140 साल बाद भी प्रासंगिक है। सेंसेशनल, एग्रेसिव, वायब्रेंट, एक्सक्ल्यूसिव और एंटरटेनिंग शब्द आज हवा में हैं। मीडिया में कम्पटीशन है। नया करने की चुनौती है। अखबारों और चैनलों में कुछ डिग्री का फर्क है। इसकी एक वजह है चैनलों का छोटा इतिहास और अपेक्षाकृत युवा नेतृत्व। हैंगोवर से मुक्त। जो ओपन है और इंडस्ट्री की ज़रूरत को पहचानता है। अखबार उसी रास्ते पर जाना चाहते हैं। कुछ नाटकीय, हैरतंगेज़ और अविश्वसनीय। मीडिया विश्वसनीय रहे या न रहे अपनी बला से।
विश्वसनीयता की फिक्र किसे है? हाल में आर वैद्यनाथन का एक लेख पढ़ने को मिला। वे किसी ऐसी जगह गए, जहां 500 के आसपास पोस्ट ग्रेजुएट छात्र मौज़ूद थे। उन्होंने छात्रों से पूछा, आप में से कितने लोगों को मीडिया पर यकीन है? कोई दसेक हाथ उठे। हो सकता है, इससे ज्यादा लोगों को यकीन हो। कम से कम हिन्दी पाठक को है। वह कम पढ़ा-लिखा है। उसे मीडिया का सहारा है। फिर भी लगता है, इस यकीन में कमी आ रही है। या हम पाठक को धोखा दे रहे हैं। सेंशेनल शब्द आज वैसा अग्राह्य नहीं है, जैसा पहले होता था। हिन्दी में इसका एक पर्याय तेज-तर्रार है। ईमानदारी और सार्वजनिक हित पत्रकारिता की साख बढ़ाने वाले तत्व हैं। तेज़-तर्रारी और सौम्यता उसकी एप्रोच या तौर-तरीका है। पत्रकार संदेशवाहक है। लड़ाई उसकी नहीं है। खबर को सरल, रोचक और सबकी पसंदीदा बनाना एक काम है। ऑब्जेक्टिव, फेयर और एक्यूरेट बनाना दूसरा। दोनों में कोई टकराव नहीं।  
खबरों में रोचकता बढ़ी है, पड़ताल, होमवर्क और संतुलन में कमी आई है। सनसनी का तड़का है। पिछले कुछ दिनों की खबरें देखें। आईपीएल, सानिया-शोएब, भोपाल मामला, रुचिका मामला, हॉरर (या ऑनर) किलिंग्ज़, नितीश-नरेन्द्र मोदी ऐसे मामले हैं, जिन्हें न्याय कामना के बजाय सनसनी की वज़ह से कवर किया गया। बेशक मीडिया की सकारात्मक भूमिका थी, पर इसमें छिद्र हैं। न्याय करने से ज्यादा यह दिखाने की इच्छा है कि हम न्याय कर रहे हैं। हर खबर में सनसनी का न्यूज़-पैग खोजने की कोशिश हो रही है। पिछले पच्चीस साल से भोपाल से जुड़े एक्टिविस्ट अक्सर दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करते रहे। किसी को ख्याल नहीं आया कि वहाँ अन्याय हो रहा है। अदालत का फैसला आने के बाद अचानक मीडिया ने तेजी पकड़ी। ऐसा ही नक्सली हिंसा के साथ है। मीडिया-प्रतिनिधि नक्सली इलाकों के भीतर जाकर सच्चाई को सामने लाने की हिम्मत नहीं कर पा रहे हैं।
बर्गर जेनरेशन तेजी से निकल कर आती है। मिनटों में फैसला करती हैं और आगे बढ़ जाती है। हाल में पेट्रोलियम की कीमतें बढ़ीं हैं। इसका असर क्या होगा, हर पखवाड़े कीमतों में बदलाव किस तरह होगा और सरकार सब्सिडी को घटाकर क्या करने वाली है, इसके बारे में कुछ खास काम दिखाई नहीं पड़ा। बजाय इसके एक सुपर मॉडल की आत्महत्या ज्यादा महत्वपूर्ण खबर है। हिन्दी के अखबारों मे डिटेल्स एकदम कम हो गए हैं। मौसम और मॉनसून तक के बारे में वैज्ञानिक सामग्री कम है। इस बार अल-नीनो की जगह ला-नीना का असर दिखाई पड़ेगा। क्या है यह ला-नीना?  इससे देश की अर्थ-व्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा? ऐसी खबरें नज़र नहीं आतीं।
दो साल पहले बिहार में कोसी की बाढ़ के साथ यही हुआ। अरसा गुज़र जाने के बाद कोसी नज़र आई। कैलीफोर्निया की आपदा फौरन नज़र आती है। अपनी आपदा दिखाई नहीं पड़ती। छोटी खबरें और छोटे पैकेज आसानी से पसंद किए जाते हैं, पर किसी न किसी जगह डिटेल्स भी चाहिए। अक्सर कवरेज एक-तरफा और अपूर्ण लगती है। ऐसा मार्केट की वजह से नहीं शॉर्ट कट्स की वजह से है। पत्रकार मेहनत करना नहीं चाहता। जल्दी स्टार बनना चाहता है। ऐसे में वे पत्रकार हार रहे हैं, जो समय लगाकर क्रेडिबल खबरें लिखना चाहते हैं।
खबर वजनदार तब होती है जब वह हमारे आसपास की हो, काफी लोगों की दिलचस्पी की हो और उसका इम्पैक्ट हो। यानी महत्वपूर्ण व्यक्ति से जुड़ी हो। अक्सर लोग सवाल उठाते हैं कि खबरों से गाँव कहाँ चला गया। एक जवाब है, जहाँ अखबार बिकता है वहाँ की खबरें ही तो होंगी। दिल्ली के अखबार के पास गाँव के लिए जगह कहाँ है। ऐसा है तो दिल्ली के स्लम्स की खबरें क्यों नहीं हैं? क्योंकि स्लम्स में रहने वाले पाठक नहीं हैं। मीडिया और पाठकों का तबका जो इस बिजनेस-सिस्टम से बाहर है, वह खबर के बाहर है।
सनसनी और खबरों की स्लांटिंग के पीछे सिर्फ मार्केट नहीं है। इसके पीछे एक कारण कम समय में कम मेहनत से ज्यादा इम्पैक्ट वाली खबर बनाने की इच्छा भी है। तथ्य संकलन में समय लगाने का वक्त नहीं है। खबर को जाँचने-बाँचने वाले भी नहीं हैं। उससे किसकी प्राइवेसी भंग हो रही है, किसके व्यक्तिगत अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है, यह देखने वाले भी नहीं। अपनी ताकत को लेकर एक प्रकार की एरोगैंस पत्रकार के भीतर है। वह न्यायपालिका तक पर प्रहार कर रहा है। यह शुभ लक्षण नहीं है। वह अपने को अब असाधारण मानता है क्योंकि वह बड़े लोगों के सम्पर्क में है। इसमें कोई दोष नहीं बशर्ते वह यह याद रखे कि वह मैसेंजर है, मैसेज नहीं।   

Sunday, June 27, 2010

विश्व कप अपडेट-5


घाना ने यूएसए को 2-1 से हराकर इतिहास बनाया है और क्वार्टर फानल में पहुँचने वाली वह तीसरी अफ्रीकी टीम बन गई है। 1990 में केमरून और 2002 में सेनेगल की टीमों को यह गौरव मिल चुका है। घाना ने 2006 के विश्हाव कप में यूएसए को हराकर उसे पहले दौर से बाहर कर दिया था। अफ्रीका से यह अकेली टीम बची है, पर यह सेमी फाइनल तक जगह बना ले तो आश्चर्य नहीं। इसका अगला मैच 2 जुलाई को उरुग्वाय से है।

सेमी फाइनल में यह पहुँची तो इसके मुकाबले के लिए ब्राज़ील-चिली और  नीदरलैंड-स्लोवाकिया इन चार टीमों में से कोई टीम होगी। मुझे लगता है, वह ब्राज़ील होगी। बहरहाल वह दूर की बात है। पहले इन चारों के प्रि-क्वार्टर फाइनल मैच देखें।

टूर्नामेंट की अंतिम 16 टीमों में इस बार 6 टीमें युरोप की, 2 एशिया की, 1 अफ्रीका की, 2 टीमें उत्तर, मध्य अमेरिका और कैरीबियन देशों की और 5 टीमें दक्षिण अमेरिका की हैं। यानी लैटिन अमेरिका से आई पाँच की पाँच टीमें पहला राउंड पार करने में सफल रहीं। युरोप की 13 में से 6 टीमें ही पहला राउंड पार कर पाईं। इसकी तुलना 2006 के विश्व कप से करें, जब अंतिम 16 में 10 टीमें युरोप की थीं।

इस हिसाब से एशिया की टीमें अच्छी रहीं। एशिया की 4 में से 2 टीमें अंतिम 16 में आईं। इसमें ऑस्ट्रेलिया को एशियाई टीम मानना मुझे उचित नहीं लगता। यह तो कोटा बनाना था। इसका फायदा न्यूज़ीलैंड को मिला, जो ओसनिया ग्रुप से आई। यह बात मैं इसलिए लिख रहा हूँ क्योंकि आने वाले समय में विश्व कप की शक्ल और बदलेगी। यह युरोपमुखी नहीं रहेगा।

विश्व कप के मैचों का शेष बचा कार्यक्रम इस प्रकार हैः


Round of 16Quarter-finalsSemi-finalsFinal
26 June – Port Elizabeth
  Uruguay 2
2 July – Johannesburg(Match 58)
  Korea Republic 1
  Uruguay
26 June – Rustenburg
  Ghana
  United States 1
6 July – Cape Town (Match 61)
  Ghana (a.e.t.) 2
  Winners of Match 58
28 June – Durban (Match 53)
  Winners of Match 57
  Netherlands
2 July – Port Elizabeth(Match 57)
  Slovakia
  Winners of Match 53
28 June – Johannesburg(Match 54)
  Winners of Match 54
  Brazil
11 July – Johannesburg(Match 64)
  Chile
  Winners of Match 61
27 June – Johannesburg(Match 52)
  Winners of Match 62
  Argentina
3 July – Cape Town (Match 59)
  Mexico
  Winners of Match 52
27 June – Bloemfontein(Match 51)
  Winners of Match 51
  Germany
7 July – Durban (Match 62)
  England
  Winners of Match 59
29 June – Pretoria (Match 55)
  Winners of Match 60Third place
  Paraguay
3 July – Johannesburg(Match 60)10 July – Port Elizabeth(Match 63)
  Japan
  Winners of Match 55  Losers of Match 61
29 June – Cape Town(Match 56)
  Winners of Match 56  Losers of Match 62
  Spain
  Portugal